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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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उनका शास्त्र

कबीर साहिबकी स्वसंवेद वाणी है क्योंकि, उसमें परमार्थका निरूपण है यही वाणी सभी हंसोंके लिये नियत है स्वच्छ तथा निर्मूल है अनेक स्थानोंपर स्वसंवेदकी भिन्न २ पुस्तकें मिलती हैं सन्त महन्त उनके बड़ी सावधानीसे रक्षा करते हैं कि, उनमें किसी प्रकारका उलटफेर न हो जायें एवं जो मिथ्या पक्षपाती जनोंने अपनी ओरसे कुछ मिला दिया हो तो वो जाननेमें आजावे इस कारण पूरी चौकसी की जाती है। इतना करने पर भी छली लोग छलसे नहीं चूकते। इसी कारण कबीर साहब कुछ सताद्वियोंके पीछे अपनी पुस्तकोंको रद्दकर देते हैं। वर्तमान कालमें कबीर पन्थियोंके पास सत्ययुग, त्रेता, और द्वापर युगोंकी पुस्तकें नहीं हैं। उसका भी मुख्य कारण यही बात है गरीबदासजी अपने अर्जनाम में यही बहुत लिखते हैं कि—

है सतगुरु मेहवीन अविनत' कबीर । छुटे इस्मके 'नालजनम की जञ्जीर ॥
वाबन लाख वाणी जो दीनी डुबोय । सुने रामानन्दा रहे मुख गोय' ॥
अगम धन्य ध्यानं अमानं अमाँ । स्वसम्बेद साखी सुरती कर वयौ' ॥
स्वसम्बेद पढिये जो पूरन मुराद' । स्वसम् पर स्वसम्बाच लागी समाध ॥
है सत्यपुरुष साहब दयाके जो मूल' । गरीबदास झूले समाधान फूल ॥

किन्हीं २ छला कपटी, तथा विद्वोही गुरुविमुखियोंने स्वयं ग्रन्थबनाकर उसमें अपने मतलबकी सारी बातें रखदी हैं पर उनमें वक्ता कबीर साहब और श्रोता धर्मदासजीको ही लिखा है। सद्गुरुके हंस लोग तो उन छलियोंके छल को शीघ्रही पहचान लेते हैं, कितने एक सरल दृश्यके भोले भाले लोग उन ग्रन्थोंको पढ सुनकर भटक जाते हैं। इस प्रकार कालपुरुष तथा उसके पुत्रलोग बड़ा छल करके स्वच्छ अमृतको विषमय करनेका उद्योग करते हैं। परन्तु बुद्धिमान सचेत लोग तुरन्तही पहिचान लेते हैं स्पष्ट जान लेते हैं कि, जो कबीर साहबके प्राचीन ग्रन्थ तथा वाणी हैं उसके विरुद्ध यह बात कैसे हो सकती है। इस कारण स्वसंवेद पाठ करनेवालोंको सदा सावधान रहना चाहिये कि, जब सत्यगुरुके ग्रंथ तथा वाणीको पढे अथवा सुनें तो उसपर भली प्रकार शोध विचार किया करें। जहाँ कहीं कबीर साहबके वाणीके विरुद्ध पावें तो तुरन्त समझ लें कि, यहाँ तो काल के पुत्रोंमेंसे किसीकी कबीरके नामसे बनावट है कि, वो कितनेही कबीर पन्थी कबीर साहब तथा धर्मदासजीके नामसे धूर्तता करके कबीर पन्थियोंको भटकाया चाहते हैं वही यमके दूतोंकी धूर्तता है। कालके पुत्रोंने अनेक युक्तियाँ