कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 645, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबिना अहारी जीव है, बिना अग्नि बिन पान ।
बिना पिण्ड हंसा चलै, है छन कर पहचान ॥
चित्र हंस बिना पिण्डका, उदय सो देखो नाम ।
भेद जो दे गुरु समर्थ, तब देखो वह ठाम ॥
शब्द—धरमनि वहि देश हमारो बासा ।
अमर पुरुष जहाँ आप विराजै हंसा करत विलासा ॥
विष्णु विरञ्जि औ शिव सनकादिक थके ज्योतिके पासा ।
चौदह खण्ड वसै यम चौदह यह सब काल तमशा ॥
सात सुरतिके आगे समरथ श्वेत भूमि परकाशा ।
संशय लोक नहीं है बाकी खुले केवडा बारह मासा ॥
वहांके गये बहुरि नहिं आवे आवागमनको नाशा ।
सदा आनन्द होत है वा घर कबहू न होत उदासा ॥
चन्द्र न सूर दिवस नहिं रजनी नहिं धरणी आकाशा ।
अमृत भोजन हंसा पावे रहत पुरुष के पासा ॥
कहैं कबीर सुनो धरमदासा छाडो खलक की आशा ।
सत्यगुरु कबीर साहब कहते हैं कि, जो जीव पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग हो वही सत्यपुरुषके दरबार पहुँचता है । परन्तु जितने जीव सत्यगुरुके शरणमें आते हैं उन सब पर साहबकी दया होती है । उनको रहने को उत्तम स्थान दिये जाते हैं, जहाँ वे सुखपूर्वक निर्भयतासे रहते हैं, परन्तु पुरुषका दर्शन नहीं पाते । जो पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग होते हैं, वही त्रिगुणातीत लोग सत्यपुरुषके दर्शनके अधिकारी होते हैं । इसी कारण सत्यगुरुने कहा है कि, सत्यलोकमें अट्ठासी सहस्र द्वीप हैं, उन सब द्वीपोंमें हंसोंका स्थान होता है, जहाँ वे आनन्द पूर्वक रहते हैं । जो कोई उसमें कर्म करता है, वह सत्यगुरुकी दयासे पाँच तत्त्व तथा तीन गुणसे छूट जाता है । बिना पाँच तत्त्व तीन गुणसे छूटना अत्यन्त असम्भव है । युगों युगोंमें सत्यगुरुके हंस अपने कर्तव्योंसे सत्यपुरुषोंके लोकके मार्गका उपदेश देकर जीवोंको सत्यलोकके पथपर करते हैं । पीछे अपने कथनको चरितार्थ करते हुए अपनी चर्यासे सिद्ध करके दिखाते हैं कि, सत्यपुरुषके हंस ऐसे होते हैं, कलियुगके हंसोंने भी इस कराल युगमें सिद्ध करके दिखा दिया है कि, इस कराल युगका भी सत्य पुरुषके हंसोंपर कोई असर नहीं होता ।