कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextहंस कबीरोंमें ही ताकद है कि, अन्यान्य ब्रह्माण्डोंमें उड़कर चले जायें वहाँकी सैर करें। अतः नानक साहब केवल इस पृथिवीपरही नहीं बरन् अन्यान्य देशों तथा द्वीपों और ब्रह्माण्डोंकी भी सैर करते रहे हैं, केवल संसारहीमें बंद न रहे तथा लोकोपकार भी अच्छा किया।
तीनलोकके जीव तो कूएके मेंडकके समान हैं, क्योंकि वे बाहर नहीं निकल सकते। परन्तु हंस कबीर शक्तिमान हैं जहाँ चाहें चले जावें एक पल भरमें करोड़ों योजन उड़ जावें। नानक साहबकी जन्म साखियोंमें लिखा है तथा स्वयं नानकसाहबने कहा भी है कि, मैंने अनेक बार देह धारण की है, मैं सदैव ठाकुरपूजा करता था, इस कारण मुझको मुवितपद शीघ्र प्राप्त हुआ है, मुझको जिन्दा बाबा मिले, आवागमनका समस्त दुःख दूर हुआ।
एक अंग्रेजी पढ़े लिखेका मुझसे बातलाप हो रहा था, तब नानक साहबके सैरकी बात छिड़ी तो मैंने कहा कि, वे एक ऐसे देशमें गये जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई मर्द ही नहीं था, वह स्त्रियोंका देश था। यह बात सुनकर उसने मेरी बातका खण्डन किया कि, भला जी ? योरोपवासियोंने समस्त पृथ्वीको छान डाला पर ऐसा देश पृथ्वीपर कोई नहीं जहाँ केवल स्त्रियाँही हों कोई मर्द न हों ! मैंने उत्तर दिया कि, विलायतवालोंने केवल पृथ्वीका ही भ्रमण किया है आकाशका नहीं। नानक साहब तो करोड़ों योजन एक पलभरमें उड़ जाते थे, न जाने यह वृत्तान्त किस ब्रह्माण्डका है जहाँ केवल स्त्रियाँ ही हैं ? नानक साहब ब्रह्मज्ञानी थे। ब्रह्मज्ञानी स्वयम् पवित्र परमेश्वरके समान हैं, ब्रह्मज्ञानीकी बड़ी प्रतिष्ठा कही है यथा—“ब्रह्म जानाति ब्रह्मैव भवति” इति श्रुतिः। यदि नानक साहब ब्रह्मज्ञानी न होते तो आपही सत्यलोकको कैसे जा सकते थे ? सारे सिद्धोंमें इनकी श्रेष्ठता कैसे होती ? यथार्थमें उन्हें ईश्वरी विद्या प्राप्त थी। इसीके बल वे बली थे।
दादूरामजी
दादूरामजी भी कबीर साहबके मुख्य शिष्योंमें थे, जबतक संसारमें रहे तब तक सत्यगुरुके अनुगृहीत होते हुए कृतज्ञ रहे। उनके सिधारनेके बाद उनके अनुयायियोंने वही काम किया जो नानक साहबके शिष्योंने किया है। उन लोगोंने कबीर साहबका नाम छोड़ दिया। सत्यगुरुका नाम छोड़तेही सत्य-पुरुषकी उपासना और स्वसंवेदकी शिक्षा उनसे पृथक् होगई। वे लोग स्वयम् सत्यगुरुका नाम छोड़कर अन्धकारमें चलते हुए भौति भौतिकी उपासना करने लगे। जहाँ जहाँ कबीर साहबका नाम और श्रेष्ठता थी उसको छोड़कर अपने