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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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आप अपने पैरपर कुल्हाड़ा मारते गये। सत्यगुरुके नामसे उनको घृणा होने लगी—जहाँ कबीर साहबका नाम देखते उसी ग्रंथको पसन्द न करते। कालपुरुषने उनकी बुद्धिपर ऐसा परदा डाला कि, उनको तनिक भी सुधि नहीं रही, सत्यगुरुके नाम छिपानेमें ही प्रसन्न होने लगे। दादुराम स्वयम् सत्यगुरुसे बड़ा प्रेम रखते थे। सुतरां गरीबदासजीकी बाणीमें लिखा है कि, दादुरामजी एक दिवस अपनी सभामें बैठे थे तब लोगोंसे पूछा कि, इस सभामें ऐसा भी कोई है जिसने कबीर साहबका दर्शन किया हो? उस समय एक बूढ़ा मनुष्य बोला कि, महाराज! मैंने कबीर साहबका दर्शन किया है। उस समय श्रीदादुरामने कहा कि, यदि तुमने दर्शन किया है तो मुझको सत्यगुरुका रङ्गरूप बतलाओ? वह बूढ़ा विवरण करने लगा कि, जब मैं छोटा बालक था, तब मेरा दादा कबीर साहबके दर्शनोंको जाया करता था, मैं भी अपने दादाकी उँगली पकड़कर उसके साथ जाता, जब मुझे कबीर साहबका दर्शन होता था उस समय मैं कबीर साहबकी शरीरकी ओर देखा करता था। साहबकी देह ऐसी जान पड़ती थी जैसे स्वच्छ दर्पण हो, उसके आर पार दिखाई देता था, दृष्टि रुकती नहीं थी। स्वच्छ काँचमें तो दृष्टि रुकभी जावे पर कबीर साहबका शरीर दृष्टिको तनिक भी नहीं रोकता था। यह बात सुनकर दादुरामने जान लिया कि, इस बूढ़ेने निश्चय कबीर साहबका दर्शन किया है। तब दादुरामने एक जलसे भरा बर्तन मँगवाया और उस बूढ़ेकी आँखें धोई उस जलको आप पीकर सभी सभासदोंको पिलाकर कहा कि, धन्य वे आँखें हैं जिन्होंने सत्यगुरुका दर्शन किया। ऐसी देह इस पृथिवीमें न किसी दूसरेकी है न होनी है वे तो एक केवल कबीर साहबही थे उसी समयकी दादुरामजीकी यह साखी है कि—

“जिन आँखन गुरु देखिया, सो किन पीवे धोवे।” कबीर साहबका शरीर नहीं था। वह एक केवल कौतुक था जिससे कि, शरीर दिखाई देता था। समस्त स्वसंवेदका यही कथन है कि, कबीर साहब विदेह हैं। उनकी देह केवल देखने मात्र है वास्तवमें नहीं है।

गोपालदास दादूपन्यी कृत दादुरामजीकी जन्म साखीके पहले विश्रामके अनुसार दादुरामजी सम्बत् १६०१ विक्रमीमें उत्पन्न हुए जब ग्यारह वर्षके हुए तो उनको कबीर साहब बूढ़े के स्वरूपमें मिल गये। उस समय दादुराम लड़कोंके साथ खेल रहे थे। बूढ़े बाबाने उनसे एक पैंसा मँगगा, दादुरामने पैंसा, लाकर उसी समय दे दिया। उस पैंसेका बूढ़े बाबाने पान मँगवाकर खाया। पीछे दादुरामजीसे पूछा कि, इस पानकी पीक कहाँ डालूँ। दादुरामने कहा कि, मेरे

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