कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकमरू मांहि कमक्षा जानी । नीमक्षार मिश्री यम खानी ॥
नगर अयोध्या राम हैं राजा । कहहि दैतें बांधे सब साजा ॥
यही पैठ जग जीव भुलाई । केहि विधि जीव लेहु मुक्ताई ॥
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले अस बानी । यमते जीव छोड़ैहौं आनी ॥
पुरुष नाम कहूँ समझाई । यम राजा तब छोड़ि पराई ॥
घाट बाट बैठे अरु झेरा । हमरे शब्दते होय निबेरा ॥
सुनुरे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सन्धि हंसा घर जाई ॥
निरञ्जन वचन
केहि ज्ञानी देहु अधिकारा । हमसे नहि छूटे यम जारा ॥
पाँच पचीस तीन गुण आई । पहले सकल शरीर बनाई ॥
तामें पाप पुण्यका बासा । मन बैठे ले हमरो फाँसा ॥
जहाँ तहाँ सब जग भरमावे । ज्ञान सन्धि कछु रहन न पावे ॥
एक शब्दके केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फाँसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी वचन विचारी । छूटे चौरासीकी धारी ॥
छूटे पाँच तीस गुण तीनी । ऐसो शब्द पुरुष मोहि दीनी ॥
निरञ्जन वचन
हो ज्ञानी क्या करो बड़ाई । हमते नहीं छूटि जिव जाई ॥
इतने युग हम तुम नहि पेखा । ज्ञानी हंस न एको देखा ॥
क्या तुम करो क्या शब्द तुम्हारा । तीनलोक परलय करि डारा ॥
साधु सन्त हम देखा रीता । परलय परे सकल जग जीता ॥
करम रेख बांधे सब साधू । सुरनर मुनी सकल जग बाँधू ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहैं काल अन्याई । शब्द बिना तैं खाइ चबाई ॥
अब कैसे कहिये बटमारा । पुरुष शब्द दीना टकसारा ॥
जग जीवनको लेउँ उवारी । करम रेख तोरौं धरि न्यारी ॥
तीन सौ पाँच और गुण तीनी । तेहिंते हंसा लेइहौं छीनी ॥
पाँच जनैकी मेटूं आसा । पुरुष शब्द भाषूं विश्वासा ॥
शुभ अरु अशुभको करूँ निबेरा । मेटूं काल सकल अरुझेरा ॥