भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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निरञ्जन वचन

निर्गुन काल तो बोले बानी । अरुझे जीव सकल यमखानी ॥
कैसेके तुम शब्द पसारो । कौन विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल है धरनी । कैसे पहुँचे पुरुषकी शरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचे पुरुष दुवारा ॥
क्रोधी जीव प्रीति अभिमानी । धरे सो जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सर्व विकारा । माटी भस्ने जीव अधिकारा ॥
लोभी जन्म शूकर औतारा । कैसे पावे मुक्ती द्वारा ॥
विषया विष सब विषकी खानी । यह सब है जनमकी सहिदानी ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं सुनो बरियारा । हमतो कीन सकल निर्धारि ॥
जो कोइ प्राणी होय हमारा । काम क्रोधते रहे निनारा ॥
तृष्णा लोभ सब देइ बहाई । विषय जन्म तब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारा । काम क्रोध सब होत निनारा ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत यम करे बडाई ॥
उनपर यमकी परे न छाहीं । ताते हंस लोकको जाहीं ॥

निरञ्जन वचन

कहैं निरञ्जन सुनोहो ज्ञानी । कथिहौं ज्ञान तुम्हारी बानी ॥
जगत महात्म सबै बताई । नाम तुम्हारे पन्थ चलाई ॥
जगके जीव सभी भरमाऊँ । ज्ञानवन्तको करम दूढाऊँ ॥
मारि जीवको करूँ अहारा । कथूँ ज्ञान तुम्हरे टकसारा ॥
ज्ञान हमार रहे तन छाई । ते सब जीव काल धरि खाई ॥
कैसे जैहैं लोक तुम्हारे । ज्ञान सन्धिमें मूँदूँ द्वारे ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं सुनौ बरियारा । हमरे हंस होई हैं न्यारा ॥
नाम जपै औ सुरति लगाई । मैल करम लागे नहिं भाई ॥

निरञ्जन वचन

ज्ञानी मोरा पिरियल ज्ञाना । वेद कितेब भरम हम साना ॥
यह विधि जगके जीव भुलाई । जरा मरण सब वन्द्य बँधाई ॥
सूतक पातक वेद विचारा । पूछे वेद तब करैं सँभारा ॥
एकादशी मुक्तिकी माई । यो युक्ति करिबे अधिकाई ॥