कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 684 of 1367
Read in contextसाखियोंमें लिखा है । यह धर्मदासजी और कबीर साहिबका संवाद भेद सारमें लिखा हुआ है जिसमें कि, अपने शरण होनेका उपदेश दिया है ।
शरणागतके नियम
१—प्रत्येक विधि और निषेध अपने गुरु और शास्त्रके अनुसार करे ।
२—तन मन धनसे ईश्वर गुरु तथा साधुओंकी सेवा करे ।
३—इस बातका पूर्ण निश्चय रखे कि, मेरा साहब मेरे पापों तथा अपराधोंको क्षमा करके मुझे मुक्तिप्रदान करेगा ।
४—सच्चे परमेश्वरके अतिरिक्त और किसीसे सहायता न मांगे । यहाँ तक कि, कौसीभी आपत्ति क्यों न आवे तो भी दूसरे किसीसे सहायता न मांगे ।
५—अपने सत्यगुरुकी मूर्त्तिका ध्यान करे ।
६—अपने आपको परमेश्वरके अर्पण कर दे । इस प्रकार सत्य हृदयसे कहें, “प्रभु ! जो तू चाहे कर, मेरा इसमें कुछ नहीं है ।”
मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझको सौंपता, क्या लागत है मोर ।
७—भजन न छोड़े, सर्वथाही साहबकी आज्ञाको निरखत रहे ।
अपनेको अर्कचन मानता हुआ भगवान्के दर्शनकी अभिलाषाओंको बढ़ाता जाय । गुरु और सत्यपुरुषमें कोई भेद न माने, सदा उसी प्रकार सम्मान करता रहे । अपना अधिक समय भगवान्की विनतीमेंही लगावे, यहाँ हम सत्यपुरुषके विनय करनेकी साखियोंको उद्धृत करते हैं —
विनती अंगकी साखी
कबीर—अव गुण मेरे बापजी, बछशो गरीब निवाज ।
जों हौं पूत कपूत हौं, तऊ पिताको लाज ॥
कबीर—अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार ।
भावेबन्दा खशिये, भावे गरदन मार ॥
कबीर भूल बिगाड़िया, नाकर मैला चित्त ।
साहब गुरुवा चाहिये, नफर बिगाड़े नित्त ॥
कबीर भूल बिगाड़िया, कर कर मैला चित्त ।
नफर भी ऐसा चाहिये, साहबसे राखे हित्त ॥
कबीर—साईं तेरे बहुत, गुड़ अवगुण कोई नाहिं ।
जो दिल खोजौं आपना, सब अवगुण मोहि माहिं ॥