कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकबीर—साहब तुम जनि बीसरो, लाख लोग मिलि जाहिं ।
हमसे तुमरे बहुत हैं, तुम सम हमरे नाहिं ॥
कबीर—तेरे बिन जोर जुल्म है, मेरा होय अकाज ।
बिरद तुम्हारे लाजसे, शरण पडेकी लाज ॥
कबीर—या मुखले बिनती करूँ, लाज आवत है मोहिं ।
तुम देखत अवगुण, किये, कैसे भाऊँ तोहिं ॥
कबीर—बनजारी बिनती करै, नरियल लीने हाथ ।
टांडा था सो लद गया, नायक नाहीं साथ ॥
कबीर तुम्हें विसारिके, किसकी शरणे जाय ।
शिव विरञ्जिच्च मुनि नारदा, हिरदय नाहिं समय ॥
कबीर—मूझमें गुण एकौ नहीं, जानू राय सिर मौर ।
तेरे नाम प्रतापते,, पाऊँ आदर ठौर ॥
कबीर—मैं अपराधी जनमका, नख सिख भरा विकार ।
तुम दाता दुखभञ्जना, मेरी करो उबार ॥
कबीर—सुरत करो मेरे साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं ।
आपहिं हम बह जायँगे, जो नहिं पकडो वाहिं ॥
कबीर—और पुरुष सब कूप हैं, तू है सिन्धु समान ।
मोहिं टेके तव नामकी, सुनिये कृपानिधान ॥
कबीर—अवसर बीता अल्पतन, पीव रहा परदेश ।
कलङ्क उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥
कबीर—साईं मेरा सावधान है, मैं ही भया अचेत ।
मनवच कर्म न हरि भजा, ताते निर्फल खेत ॥
कबीर—मन परतीत न प्रेम रस, ना कोई तन में ढङ्ग ।
ना जानू उस पीवसे, क्योंकर रहसी रङ्ग ॥
कबीर तुमतो शैल हौ, हलकी अपनी चाल ।
रङ्ग कुरङ्गी रङ्गया, और किया लगवार ॥
कबीर—जिनको साईं रंगदिया, कवहुँ न होय कुरङ्ग ।
दिन दिन बाणी आगरी, चढ सवाया रङ्ग ॥
कबीर—मेरा मन जो तुझसे, तेरा मन कहि और ।
कहैं कबीर कैसे बनै, एक चित्त दुई ठौर ॥
कबीर—ज्यों मेरा मन तोहि से, या तेरा जो होय ।
अहिरन ताती लोहि ज्यों, सन्धि लखे नहिं कोय ॥