कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकबीर—अबकी जो साईं मिले, सब दुख आंसू रोय ।
चरणो ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥
कबीर—साईं तो मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात ।
आदि अन्तकी सब कहूँ, उर अन्तरकी बात ॥
कबीर—सिद्धक सबूरी वाहरा, कहा हज्ज को जाय ।
जिनका दिल सावित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥
कबीर—अन्तरयामी एक तू, आत्मको आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथको, कौन उतारे पार ॥
कबीर—भवसागर भारा भया, गहरा अगम अगाह ।
तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ।
कबीर—साहब तुमहि दयाल हो, तुम लग मेरी दौर ।
जैसे काग जहाजको, सूझत और न ठौर ॥
कबीर—स्वास सुरतके मध्यही, न्यारा कभी न होय ।
ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरतितसे जोय ॥
कबीर—सद्गुरु बडे दयालू हैं, सन्तनके आधार ।
भवसागर आथाहमें, खेई उतारें पार ॥
कबीर—लेनेको हरिनाम है, देनेको अनदान ।
तरनेको आधीनता, बूडन को अभिमान ॥
अज्ञ सर्व जो मैं कहूँ, परम पुरुष उपदेश ।
कहै कबीर अब हरि मिलै, मानूँ साखि सँदेश ॥
शरणका तो यही अर्थ है कि, दूसरी ओर ध्यानहीं न हो । जब दूसरी ओर ध्यान होगा तो शरणागति अवश्यही मिथ्या ठहर जावेगी । इस संसारमें जितनी शरणागति तथा भक्ति हैं वो सभी व्यर्थ हैं । सबके ऊपर केवल एक सत्यपुरुषकी शरणमें मनुष्यको सुख मिलता है । इसके अतिरिक्त समस्त शरणागतियाँ झूठी हैं । उनमें अणुमात्रभी वास्तविकता नहीं है । इसी बातको कवितामें भी कहते हैं—
मुखम्मस तरजीअबन्द
अँधेरा छा गया वक्ते अशामें । हुआ खौफो खतर बस दश दिशामें ॥
पनः ले जा पनःकी खास जामें । नहीं आराम है अरजो समामें ॥
मुसाफिर जल्द चल सुल्तां सरामें
हैं फिरते चोर ठग रहजन लुटेरे । नहीं कोई बदरकः है सज्ज तेरे ॥
पडा जङ्गलमें सबदुःख दन्द घेरे । तु हो आनन्द सुन यह पन्थ मेरे ॥ मु० ॥