कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextअवाचा स्वप्नरूपसो अनूप हैं । चन्द्रसूर्यभासस्वप्न पञ्चमँ प्रपञ्चस्वप्न स्वर्ग नकँ
बीच बसै सोऊ स्वप्नरूप है ॥ १ ॥ ओहँ और सोहँ स्वप्न पिण्ड और ब्रह्माण्ड
स्वप्न आत्मा परमात्मा स्वप्न रूपसो अरूप हैं । जरामृत्युकालस्वप्न गुरु शिष्य
बौध स्वप्नअक्षर निअक्षरआत्मा स्वप्नरूप है ॥ कहत कबीर सुन गोरख वचन
मम, स्वप्नते परे सत्य सत्यरूप भूप है । सोई सत्यनाम सत्यलोक बीचवास करँ,
नहीं कहँ आवे नहीं जावैं सत्यरूप है ॥ २ ॥
इस कलियुगमें गोरखनाथ जैसा प्रतापी योगी कोई नहीं हुआ, उन्होंने
कबीर साहबसे बहुत वादविवाद किया था पर अन्तको जब सद्गुरुने भली भाँति
समझाया और दिखलाया कि, तेरी सब योगशक्ति मिथ्या है, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड
दोनों स्वप्नवत् मिथ्या है । जो कुछ कहा सुना जाता है वो स्वप्नके तुल्य संकल्प-
मात्र है । जब गोरखनाथजीने सद्गुरुकी बातें समझीं तब चरणोंपर गिरकर शिष्य
होगये । ऐसेही दत्त दिगम्बर जो संन्यासियोंके गुरु पूर्ण विरक्त अवधूत और
यती पुरुष थे, सत्यगुरुका ज्ञान सुनकर साहबके चरणोंपर गिरकर सांसारिक
वासनाओंसे मुक्त हुए । इसी प्रकार बड़ेही प्रसिद्ध तपस्वी दुर्वासा ऋषि सत्यगुरु
की कृपादृष्टिसे वांछित स्थानपर पहुँचे, अनगिनती ऋषि, मुनि उसी साहबकी
दयासे उच्च श्रेणीको प्राप्त हुए हैं । जितने सत्यगुरुके सांसारिक शिष्य हुए वे
सब भी उसी श्रेणीपर अधिकृत हुए हैं जहाँकि, ऋषि मुनि पहुँचते हैं। सब सांसारिक
लोग जिन पर कि, सद्गुरुकी पूर्ण कृपा होगी अपने बालबच्चे सहित उसी लोकको
पहुँचेंगे ।
साखी—कबीर साहब सबका बाप' है, बेटा किसीका नाहिं ।
बेटा होकर ऊतरा, सोतो साहब नाहिं ॥
कबीर—जन्म मरनसे रहित है, मेरा साहब सोय ।
बलीहारी उस पीवकी', जिन सिरजा सब कोय ॥
कबीर—पिण्ड प्राण नहिं तासुके, ढम देही नहिं सीन ।
नादविन्द आवे नहीं, पांच' पचीस' न तीन' ॥
कबीर—मुहँ माथा जाके नहीं, नाही रूप कुरुप ।
पुष्प वासते पातला, ऐसा तत्व अनूप ॥
कबीर—देही माहिं विदेह' है, साहब सुरति स्वरूप ।
अनन्त लोकमें रम रहा, जाको रङ्ग न रूप ॥