कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 694, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर—चारभुजाके भजनमें, भूल रहे सब सन्त ।
कबीर सुमिरो तासुको, जाकी भुजा अनन्त ॥
कबीर—रूप रेख जाके नहीं, अधर धरे नहि देह ।
गगन मंडलके मध्यमें, रहता पुरुष विदेह ॥
कबीर—बूझो कर्ता आपना, मानो बचन हमार ।
पांच तत्त्वके भीतर, जिसका यह संसार ॥
कबीर—पानी हू ते पातला, धूवाँ हूँ ते छीन ॥
पवन वेग उतावला, दोस्त कबीरा कीन्ह ॥
पुष्प वासते पातला धूवे हूँ ते छीन ।
कबीर तासों मिल रहा, ज्यों पानी ते मीन ॥
प्रासंगिक
इस संसारमें कबीर साहब और हंस कबीरोंका तो यही वृत्तान्त है कि इधर मनुष्योंकी बुद्धिको कालपुरुषने ऐसी अन्धो कर दिया है कि, कोई भी सत्य पुरुषकी भक्तिमें नहीं लगता । जो कोई सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश करता है उसके उत्तम बर्ताव होते हैं कि, मनुष्य कैसे मुक्ति पावे ? सबको अंधकार मय पथ पसन्द है, उसी ओर आग्रह पूर्वक दौड़ते हैं, इन्द्रियनिग्रह तथा देवीप्यमान, ज्ञानके मार्गसे भागते हैं । जो कोई उनको अंधकारसे निकालना चाहता है उसके साथ प्रेम करनेके वनस्पति बैरी होजाते हैं ।
जो कुछ कबीर साहबने पांच वर्षकी अवस्थामें गुरु रामानन्दजीसे कहा था । वही बात अन्तिम समयतक सब लोगोंसे कहते चले आये हैं कि, मैं स्वयम् सत्य-पुरुष एवं सर्व शक्तिमान हूँ, मेरे ऊपर दूसरा कोई नहीं है । जिस किसीको कुछ सन्देह हुआ उसका सन्देह उसी समय मिटा दिया, उसके साथ साथ अनेकानेक कौतुक दिखाते आये वे मनुष्यके कार्यों कभी नहीं होसकते । कबीर साहबका देह केवल उनकी शक्तिका प्रकाश था । वास्तवमें वह देह नहीं था । वह तो केवल देखने मात्रको शरीर था । वास्तवमें तो वह तेजका पुंजही था, उस शरीरकी कोई प्रशंसा नहीं कर सकता कि, वह क्या था । यदि तेजःपुंज कहूँ, तो मनुष्य तो उसको देख नहीं सकता, परन्तु वह देह देखी जा सकती थी, वह ऐसा प्रकृतिका कौतुक था जो कि मनुष्यके ध्यानमें किसी प्रकारसेभी न आसके, प्रत्यक्षमें देह दिखाई देती थी पर वास्तवमें वह देह नहीं थी । ये भगवान् रामके सच्चे भक्त थे, इन्हें रामको भरोसा था, ये रामके थे, राम इनका था । किसी भी समय राम इन्हें और ये रामको नहीं