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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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इस संसार में दो सम्प्रदाय हैं—एक दैवी सम्प्रदाय और दूसरी आसुरी सम्प्रदाय । दैवी सम्प्रदायके आचार्य विष्णुजी हैं और आसुरी सम्प्रदायके आचार्य गुरु शिवजी हैं । विष्णु सम्प्रदायमें समस्त देवते और साधु इत्यादि संयुक्त हैं । शिव सम्प्रदायमें भूत, प्रेत, राक्षस और दैत्य इत्यादि हैं । दैवी सम्प्रदाय द्वारा भक्ति तथा मुक्ति की राह मिलती है, आसुरी सम्प्रदाय आवागमनके बन्धनमें फँसाती है । यही कारण है कि, आसुरी सम्प्रदाय को छोड़कर सद्गुरुने दैवी सम्प्रदायका महत्त्व दिखानेके लिये इसी संप्रदायकी दीक्षा ली । जम्बूद्वीपमें अपना पन्थ स्थिर किया, धर्मदासजीके वंशको समस्त संसारकी गुरुआई प्रदान की ।

समस्त पृथिवीमें भारतवर्ष देश धर्म कर्म और ज्ञान ध्यानका स्थान है । उसके समान कोई देशही नहीं है, न कहीं ऐसा धर्म स्थान ही है । पहले समस्त संसारमें वृत्तपरस्ती प्रचलित थी, किसी को तनिक भी सुधि नहीं थी कि, परमेश्वर पूजा कैसे कहते हैं वो क्या है ? किस रीतिसे होती है ? सब मनुष्य वृत्तपरस्त हो गये थे । परमेश्वरी पूजा संसारसे उठ गयी थी । परन्तु भारतवर्षमें उस समय भी कहीं कहीं दैवी सम्प्रदायके लोग विष्णु तथा राम-कृष्णकी भक्ति करते थे । शेषमें हनुमान, भैरव, चण्डी, भूत, प्रेत, देवी, देवता और अनगिनती प्रकारके भ्रमभूत पूजे जाते थे इसी प्रकार मिथ्या पूजाकर करके भी मनुष्य कालके प्राप्त बनते जाते थे । समस्त भारतवर्षमें प्रायः भ्रमभूतकी पूजाका प्रभाव फैल रहा था केवल द्राविड़ देशमें रामकृष्णकी भक्ति ही रही थी । उस देशसे रामानन्दजी भक्ति लेकर आये तथा अन्यान्य देशोंमें प्रचार किया । इस भक्तिद्वारा मनुष्य सत्यपुरुषकी भक्तिपर अधिकृत होजाता है । यह सतोगुणी भक्ति सीधी मुक्ति मार्ग है । जब कोई मनुष्य इस सतोगुणी भक्तिकी पूर्णताको पहुँचता है तब वह विशुद्ध परमात्मा प्रसन्न होकर अपनी यथार्थ भक्ति प्रदानकर परमधामको लेजाता है । रामानन्द स्वामीने सतोगुणी भक्तिका पहले भारतवर्षमें प्रचार किया । इसी कारण कहा करते हैं कि—

साखी— भक्ति द्राविण ऊपजी, लाये रामानन्द ।

प्रगट कियो कबीरने, सातद्वीप नौखण्ड ॥

जब रामानन्दने भक्तिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया तब सत्यपुरुषकी दया हुई उनको उच्च पदवीपर आरूढ़ किया स्वयम् आप उनके शिष्य बन गये । उनका नाम समस्त संसारमें प्रकाशित कर दिया । रामानन्दकी श्रेष्ठता स्वर्ग पर्यन्त पहुँची । धर्मदासके बयालीस वंशको यह श्रेष्ठता प्रदान की जो कि,

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