कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 701, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब हंसोंका सरदार बनाया जिससे वे समस्त भ्रम और बुतपरस्तीका बीज पृथिवीसे मिटा दें । जिससे कि, कोई भी मनुष्य भ्रम भूतकी पूजा करके काल-पुरुषके बन्धनमें न पड़ने पावे ।
इस संसारमें दो सम्प्रदाय ठहराये हैं प्रत्यक्षमें भी दोनों प्रकारके मनुष्य दिखाई देते हैं । दैवी सम्प्रदायमें कदाचित् कोई कुकर्म करता होगा पर आसुरी सम्प्रदायका व्यक्ति कदाचित्ही कोई सुकर्म करता होगा । इसी प्रकार कितने योगी तथा सन्यासी अच्छा करते हैं परन्तु उनके भीतरी रीति व्यवहारपर जब दृष्टि जावेगी तब चित्तको अत्यन्त घृणा होगी । संन्यासियोंमें दण्डी तथा दिगम्बर ये अच्छे सन्यासी हैं । परन्तु उनका अहं ब्रह्म मानलेना बन्धनका कारण है । इसी कारण आसुरी सम्प्रदाय सर्वथा त्याज्य है । जिन लोगोंने काम क्रोध आदि सब वासनाओंको त्याग दिया, अभिमान ईर्षा, भ्रान, बड़ाई, सब छोड़कर धर्मदासजीके समान सत्यगुरुके चरणोंकी धूल हुये वे पवित्र हो गये, वेही हंस कबीर हैं ! जिन लोगोंने अपनी श्रेष्ठता चाही सत्यगुरुके नामको छिपाया, सांसारिक कामनाओंसे मन लगाया, उनको वह पद कभी भी प्राप्त न होगा । हाँ ! सत्यगुरुके शरणका फल उनकी भक्तिके अनुसार उन्हें अवश्य मिल जावेगा ।
धर्मदासजीने सब अभिमान त्याग दिया था, भान बड़ाईको छोड़ दिया था, सांसारिक वासनाओंको शेष न रखा था, वार पार सत्यगुरुके सिवाय दूसरे किसीको भी न जाना था इस कारण कबीर साहबने धर्मदासजी और उनके वंशको अपना स्थानापन्न किया, अपना अधिकार उनको प्रदान करके जीवोंके कल्याण करनेकी आज्ञा दे दी थी ॥
अध्याय १७.
बन्धनके कारण ।
हृदय
अपने मनको देखो इसपर विचार करो कि, यह किससे उत्पन्न हुआ क्या है, यदि पूरा विचार करोगे तो पता चलेगा कि, यह सर्व शक्तिमान् है । प्रत्येक मनपर इस मनकाही राज्य है । सब मन इसके वशमें हैं, इसी मनके बनाये हुये यही मन सबके हृदयोंमें है । जब अपना मन वशमें आ जाता है तब यह मन मृत कहलाता है । जब अपना मन मृत्यु हो जाता है तो समस्त संसारके मन नष्ट हो जाते हैं । न फिर काल है न मैं हूँ न तू है । सब एक रङ्ग और ही