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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कहो है ? जब मनके वशमें पड़कर विवश हो कार्य करना पड़ता है, समस्त व्यवहार मनके अधीन रहा फिर स्वतंत्रता कहो रही । इस कारण स्वतंत्रताकी झूठी डींग मारनी मूर्खता नहीं तो और क्या है । मन पर विचार करनेसे सजीवका कार्य स्वतन्त्रताका, अभिमान तो मिथ्या हो चुका । अब तो केवल इतनी बातका उज्र रह गया कि, यदि मैं अपने कार्यमें स्वतन्त्र नहीं हूँ तो फिर मैं दोषी काहेको ठहराया जाता हूँ । इसका हेतु यह है कि, यह अपने आपको नहीं जानता इस कारण अपराधी होता है, जो अपने यथार्थ स्वरूपको जानले तब फिर कोई दोषी ठहराने वाला नहीं हो सकता । जबतक अपने यथार्थ स्वरूपको न जानले तबतक अवश्यही दोषी रहकर बन्धनमें पड़ा रहेगा । जब अपनेको पहचान लेगा तब फिर कहने सुननेका स्थान न रह जावेगा । अपने यथार्थस्वरूपके प्राप्त करनेकी यही युक्ति है कि, सच्चे साधु और सद्गुरुकी सेवा करे, बिना इसके कदापि छुटकारा न होगा । दिन दिन बन्धन अधिक होता जावेगा । सच्चे साधु गुरुकी सेवा समस्त कठिनाइयोंको सरलकर ज्ञानके कपाटको खोल देती है ।

जो मनकी गति और स्थितिसे अनभिज्ञ हैं वे अचेत कीडेमकोडेके बराबर हैं बड़े बड़े ऋषीश्वर करोड़ों वर्ष तप करके भी इस मनका दमन न कर सके किन्तु इस मनने सबके ऊपर अधिकार करके उनकी तपस्याको नष्ट कर दिया । तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं है जो इस मनपर विजय प्राप्त करसके, जब बड़े बड़े सिद्धोंकी भी वो चटनी कर गया तो दूसरे किसकी शक्ति है जो इसका सामना कर सके, मन मायाकी चक्की चल रही है सारे जीव इसीमें पीसे जाते हैं । सब देवता इसीके गुलाम हैं । यह सारे संसारका सर्व शक्तिमान् अधिकारी है, यह सारे संसारमें व्याप रहा है इसी कारण इसे कई सुयोग्य व्यक्ति महत्त्व कहकर भी स्मरण करते हैं, इसके बलका कोई ठिकाना नहीं है ॥

हृदयकी व्याख्या

सीनेके भीतर कमलकोश जैसा नीचेकी ओर मुख करके लटका हुआ हृदय कमल है मन इसीमें विराजा करता है इस कारण मनको भी हृदय कहते हैं । "हृ धातुसे कयन् प्रत्यय तथा दुक्" का आगम होकर उक्त शब्द बनता है इन्द्रियाँ, विषयसंबन्ध इसीकी प्रेरणासे करती हैं, यह इन्द्रियोंसे विषय तक भी पहुँचता है, जीव इसीमें रहता है, परमात्माका भी निवास इसीमें है, जिसके लिये कबीर साहिबने भी कहा है, कि—“खोज दिल बीच जहाँ वसत हक्का” इन कारणोंसे यह हृदय कहलाता है, इसीने सबको भुला रखा है, संसारमें यह बड़ा दुर्दन्त वैरी है, जीव अपने त्राणका उपाय करता हुआ भी इसके वशमें