कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextआजाता है। गुरुआ लोग मिलते हैं वे भी हृदयके आधरे ही होते हैं उनसे भी यही दशा होती है कि—
साखी—जानंता पूछी नहीं, पूछि किया नहिं गौन।
अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥
गजल—पुर जह्न सर तापाय है उस सौपनीका सौप है।
खालिक है लोक और वेदका सब भेद मख्जन आप है ॥
बरतर यही शौतान है विष्णु यही भगवान है।
पीर और पैगम्बर औलिया सिद्ध साधुका यह जाप है ॥
ऋषि मुनि इसीकी बगलमें भूले सब उसकी दगलमें।
दोनों करम उसके धरम कहीं पुण्य और कहीं पाप है ॥
नेकी बदी यह कर जुदी जाँदार पर दोनों लदी।
दोजख विहिश्त एराफ़में सब तौल और सब माप है ॥
इस सौपके दो दौत हैं माया व ब्रह्म दो भाँत हैं।
काटा है सब मुरदा हुये घेरे जो तो तीनों ताप हैं ॥
आलमको यह अजदर लड़े आजिज कदम सतगुरु पड़े।
आदम बेचारा क्या करे चारा यही एक थाप हैं ॥
यह गजल भी मनकी कल्पनाओंका ही खोंका खींचता है कि, जो कुछ है सो यह है, यह भवसागर एक अगम्य समुद्र है वेग पूर्वक इसकी लहरें बह रही हैं। सब जीव उसीमें बहे जाते हैं। कोई भी जीव ठौर ठिकानेपर नहीं पहुँच सकता। सब इसीमें पड़े गीते खा रहे हैं। कोई सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर पैगम्बर, सत्यपुरुषकी सहायता बिना कदापि नहीं निकल सकता। यह मन इस समुद्रमें मस्त होकर मौज मारता फिरता है, किसीके रोकनेसे नहीं रुकता। यह मन भवसागर है और भवसागरही मन है, समस्त संसारमें इसीकी पूजा हो रही है। जिसको पूर्ण पारख प्राप्त हो वह इस मनके भेदको जाने। जितने औलिया, अम्बिया ऋषि, मुनि हो गये, तथा अब हैं और होते हैं सबमें थोड़ा बहुत ज्ञानका प्रकाश रहता है। परन्तु ऐसा प्रकाश किसीमें न हुआ कि, सब भेदको जाने। कितने ऐसे पैगम्बर हुए कि, जो केवल आकाश वाणीसे जानते और उसीके अनुसार चलते थे। इसका तो उनको तनिक भी ज्ञान नहीं था कि, यह आकाशवाणी स्वयम् जगदीश्वरकी ओरसे है अथवा भूत पिशाचकी ओरसे है। भाँति भाँतिकी कामनाओंमें फँसकर परमेश्वरसे प्रार्थना करते थे और उनकी इच्छानुसार आकाशवाणी होती थी। उस आकाशवाणीको वे परमेश्वर-