कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextइस मनको यों मारना चाहिये कि, वाँछित पदार्थकी ओर गति न करने पावे। अन्तरही अन्तरगति करके रह जाय, बहिर्गत न होने पावे। जो इच्छा मनमें उठे उसको रोके तब मन शान्त हो जाता है, यह मन शून्य स्वरूप है। संकल्प विकल्पहीका नाम मन है और चिन्तन करनेसे यह चित्त कहलाता है। जब प्राण स्फुरता है तब मन प्रगट होते हैं उसीसे संसारकी उत्पत्ति होती है। इस चित्तके दो बीज हैं—एक तो प्राणोंकी गति और दूसरे वासनाका चलायमान होना। कुण्डलिनीके शब्दसे जो शब्द उत्पन्न होता है, वही मन है वो हृदय आकाशसे निकलता है और बाहर जाता है। बाहरसे भीतर आता है वही प्राण है जिसमें मन विराजमान है और कामनाओंके कारण देश देशमें फिरा करता है।
पाँच वृत्ति
इस मनकी पाँच वृत्ति अर्थात् अवस्थाएँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति इनका लक्षण योग शास्त्रमें किया है। अब उन पाँचोंका विवरण सुनो—
१ प्रमाण—प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं। इसमें यथार्थ ज्ञानका नाम प्रमा है, इसके जो प्रत्यक्षादि साधन हैं वे सब प्रमाण कहलाते हैं।
२ विपर्यय—मिथ्या ज्ञानका नाम है यानी जो जिस रूपका हुआ हो वो वास्तवमें उस रूपमें प्रतिष्ठत न हो किन्तु भ्रमसे हो रहा हो।
३ विकल्प—जो पदार्थ शशशृंगकी तरह वास्तवमें न होकर भी शब्दकी शक्तिकी महिमासे प्रतीत हो रहा हो।
४ निद्रा—सब इन्द्रियोंके विषयोंके अनुभवके अभावके कारण तमका अवलंब करनेवाली वृत्तिका नाम नीन्द है क्योंकि, जब मनुष्य उठता है तो उसे सुषुप्तिकालके तमका अनुभव होता है।
५ स्मृति—अनुभव किये हुए विषयको उद्घोधकके व्यापारसे फिर हृदयमें उपस्थित हो जानेको कहते हैं।
ये पाँचों वृत्तियाँ किलष्ट और अकिलष्ट भेदसे दो दो प्रकारकी हैं। जब ये परमात्माकी तरफ दौड़ने लगती हैं तो ये अकिलष्ट कहलाने लगती हैं। निम्नलिखित शब्दमें कबीर साहिबने मनका सर्प तथा उनकी पाँचों वृत्तियोंको पाँच फन कहा है यह नीचेके दो टुकड़ोंसे झलकता है।
शब्द—बिछुवा कैसे रहे बन ठनके
बिछुवा वीर विषय रस बोरी शुद्ध हरी हरिजनके ॥
द्विज कन्या गुरु कीन्ह अरब सुत लै चौबीस मत मनके ॥