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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages
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इस मनको यों मारना चाहिये कि, वाँछित पदार्थकी ओर गति न करने पावे। अन्तरही अन्तरगति करके रह जाय, बहिर्गत न होने पावे। जो इच्छा मनमें उठे उसको रोके तब मन शान्त हो जाता है, यह मन शून्य स्वरूप है। संकल्प विकल्पहीका नाम मन है और चिन्तन करनेसे यह चित्त कहलाता है। जब प्राण स्फुरता है तब मन प्रगट होते हैं उसीसे संसारकी उत्पत्ति होती है। इस चित्तके दो बीज हैं—एक तो प्राणोंकी गति और दूसरे वासनाका चलायमान होना। कुण्डलिनीके शब्दसे जो शब्द उत्पन्न होता है, वही मन है वो हृदय आकाशसे निकलता है और बाहर जाता है। बाहरसे भीतर आता है वही प्राण है जिसमें मन विराजमान है और कामनाओंके कारण देश देशमें फिरा करता है।

पाँच वृत्ति

इस मनकी पाँच वृत्ति अर्थात् अवस्थाएँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति इनका लक्षण योग शास्त्रमें किया है। अब उन पाँचोंका विवरण सुनो—

१ प्रमाण—प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं। इसमें यथार्थ ज्ञानका नाम प्रमा है, इसके जो प्रत्यक्षादि साधन हैं वे सब प्रमाण कहलाते हैं।

२ विपर्यय—मिथ्या ज्ञानका नाम है यानी जो जिस रूपका हुआ हो वो वास्तवमें उस रूपमें प्रतिष्ठत न हो किन्तु भ्रमसे हो रहा हो।

३ विकल्प—जो पदार्थ शशशृंगकी तरह वास्तवमें न होकर भी शब्दकी शक्तिकी महिमासे प्रतीत हो रहा हो।

४ निद्रा—सब इन्द्रियोंके विषयोंके अनुभवके अभावके कारण तमका अवलंब करनेवाली वृत्तिका नाम नीन्द है क्योंकि, जब मनुष्य उठता है तो उसे सुषुप्तिकालके तमका अनुभव होता है।

५ स्मृति—अनुभव किये हुए विषयको उद्घोधकके व्यापारसे फिर हृदयमें उपस्थित हो जानेको कहते हैं।

ये पाँचों वृत्तियाँ किलष्ट और अकिलष्ट भेदसे दो दो प्रकारकी हैं। जब ये परमात्माकी तरफ दौड़ने लगती हैं तो ये अकिलष्ट कहलाने लगती हैं। निम्नलिखित शब्दमें कबीर साहिबने मनका सर्प तथा उनकी पाँचों वृत्तियोंको पाँच फन कहा है यह नीचेके दो टुकड़ोंसे झलकता है।

शब्द—बिछुवा कैसे रहे बन ठनके

बिछुवा वीर विषय रस बोरी शुद्ध हरी हरिजनके ॥

द्विज कन्या गुरु कीन्ह अरब सुत लै चौबीस मत मनके ॥

घीसाजी

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काया नगर नाग एक रक्षित छापा है पाँचों फनके ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो यहिते मोर पैया झनके ॥

यह मन व्याघ्र सदृश है । इन पाँचों हथियारोंसे सभी जीवोंका शिकार करता है, कोई इसकी पकड़से छूट नहीं सकता, सबको पकड़ पकड़कर खा लेता है । कोई भी ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु इससे बच नहीं सकता । यही मन काल-पुरुष है इसके भेदको किसीने नहीं जाना । मनुष्यका कुछ बल नहीं चलता । जिधरको चाहता है उधरही बुद्धिको फेर देता है । यह मनुष्य विचारा वैसेही कार्य करने लगता है । भलाई बुराईकी ओर झुका देना मनके आधीन है । यह समस्त इन्द्रियोंका राजा है । सभी इन्द्रियाँ मन राजाके सिपाही हैं । केवल एकही इन्द्रिय ज्ञान और कर्म नष्ट करनेको बहुत है । जिसके साथ इतनी इन्द्रियाँ लग रही हैं फिर यह जीव कैसे बच सकता है ? जिधरको यह मन बाद-शाह झुकता है उधरही समस्त इन्द्रियाँ दौड़ पड़ती हैं । यह मन तथा सब इन्द्रियाँ शिकारी हैं कोई जीव इनसे बच नहीं सकता । यह भाव इस निम्नलिखित साखीसे स्पष्ट प्रतीत होता है —

कबीरसाहबकी साखी

काहे हिरनी दूबरी, यही हरियरे ताल ।

लाख शिकारी एक मृग, केतक टारे भाल ॥

ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों एक प्रकारके हैं, बाल बराबर भी विभिन्नता नहीं है । एक बहुत बड़ा अण्डाकार स्वरूप तो ब्रह्माण्ड है, दूसरा छोटा अण्डाकार स्वरूप मनुष्यका शरीर है । दोनोंकी एकही बात है । कुछ विभिन्नता नहीं है । इस बनने ही आवागमनका पथ बनाया और आपही एकसे अनेक हुआ । चौरासी लाख योनिमें मारा मारा फिरता है । जिस पथसे निकलता है उसीमें बारम्बार घुसनेका उद्योग करता है । उसकी तृष्णा कभी कम नहीं होती । उस स्त्रीने पहले ब्रह्मा, विष्णु और शिवको मार लिया फिर समस्त संसारको मारने और खाने लगी । यह बड़ी बलिष्ठ डायन है । यह ज्ञानरूप बच्चोंका कलेजा खाया करती है । इस स्त्रीने अपने छः स्वरूप बनाये हैं । पद्मिनी, चित्रिनी, हस्तिनी, शंखिनी, नागिनी, डाकिनी उनके नाम हैं और इन छः प्रकारकी स्त्रियोंके छः पुरुष हैं । पद्मिनीका पुरुष खरगोश (शशा) है । चित्रिणीका पुरुष हिरन है । हस्तिनीका पुरुष बैल है । शंखिनीका पुरुष गद्दा है । नागिनीका नर घोड़ा है । डाकिनीका जोड़ा भैंसा है ।

इस प्रकार छः प्रकारकी स्त्रियाँ छः प्रकारके पुरुषोंको ढूंढ़ती हैं । जिस स्त्रीको अपनी इच्छानुसार पति मिले वह तो प्रसन्न रहती हैं और उसका कार्य

१६ अध्याय । आद्या और निरंजन पर जीत

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पूरा होता है। यदि विरुद्ध मिले तो उस स्त्रीका प्रेम अपने पतिसे नहीं होता। उसमें मन नहीं लगता। अपने उपपति को ढूँढ़ती फिरती है। वह जिसके साथ विवाही जाती है वह तो उसका पति नहीं। इस कारण कामाग्नि उसके हृदयको जलाती रहती है। तब मस्त फिरती है और धूर्त तथा व्यभिचारिणी हो जाती है। जब तक उसका पति नहीं मिलता तब तक उसके कामकी अग्नि शान्त नहीं होती।

मायाने अपने तीन स्वरूप बनाया है वे जड़ चैतन्य और वाणी हैं जड़ तो चाँदी सोना रत्न आदि हैं। चैतन्य स्त्री है वाणीमें समस्त वेद पुस्तकें और वाणी विद्या इत्यादि संयुक्त हैं। इन तीनों स्वरूपसे उसने समस्त संसारको अपने वशीभूत कर लिया है। बिना तात्पर्य समझे वेद और वाणी पढ़ पढ़ सभी मस्त होकर इस बाणीमें डुबकियां खा रहे हैं। इस वेद बाणी रूप समुद्रका भेद किसीने नहीं पाया। पढ़ा तो सही पर यथार्थ भेदको नहीं जान सका। इस कारण उनका पढ़ना निरर्थक हुआ। इससे कुछ मनकी स्वच्छता नहीं हुई। क्योंकि जो सत्य तात्पर्य है उसको नहीं सूझा न मनमें विचार आया।

(कबीर साहबकी) शब्द अङ्गकी साखी

कबीर—एक शब्द गुरु देवका, तामें अनंत विचार।

पण्डित थाके मुनि जना, वेद न पावें पार ॥

कबीर—आसा बासा सन्तकी, ब्रह्मा लखे न वेद।

षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावें भेद ॥

कबीर दीपक जोइया, देखा अपरं देव।

चार वेदकी गम नहीं, तहां कबीरा सेव ॥

कबीर—ऐसी अद्भुत मत कथो, कथो तो धरो छिपाय।

वेद कुरानों ना लिखी, कथों तो को पतियाय ॥

कबीर—माँ मूँडूँ ता गुरुकी, जाते भरम न जाय ॥

आप बूड़े चहुँ वेदमें, चेले दियो बहाय ॥

कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारों वेद हजूर।

करनी तो गारा करे, साहबका घर दूर ॥

कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारो वेद हजूर।

चूको सेवा बन्दगी, किया चाकरी दूर ॥

उस बाणीने सर्व मनुष्योंके मनमें अभिमान और अहंकार भर दिया। जब मनुष्य कामनाके आधीन होता है तब वस्तुको इतनी हानि होती है : तप, सत्य, शौच, लक्ष्मी, लज्जा, बुद्धि, सुकृति और आयु।

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विषयियोंके निमित्त पूर्व लिखित येही तीनों पदार्थ हैं जबतक संसारमें रहते हैं तबतक तो विषयवासना और शरीरके पालन पोषणमें लगे रहते हैं। मृत्युके पीछे वैकुण्ठमें आनन्द लूटते तथा अप्सराओंसे सम्भोगकी आशा रखते हैं। विषयी पुरुषोंकी विषय भोगसे कभी निवृत्ति नहीं होती। जैसे संसारमें वैसेही परलोकमें भी इसी वासनामें फँसे रहते हैं। वासनायें इनको उसी प्रकार नचाती फिरती हैं, जैसे कि, कलन्दर बन्दरको नचाता फिरता है उसी मनकी गतिसे सब मनुष्यों की हीन दशा हो रही है।

यह मन निरञ्जन है। नेत्रोंके श्वेत स्थानमें इसका निवास है। इसी स्थानपर बैठकर समस्त विषय वासनाका आनन्द लेता है। इस कारण प्रथम नेत्र गतिमान होते हैं। पहले नेत्रोंमें गति होती है पीछे देह चलती है, तब उसकी कामना पूरी होती है। निरञ्जन आँखोंकी सफेदीमें बैठकर सब भोग भोगता है। यही कारण है कि, रुग्नावस्थामें मनुष्यका समस्त शरीर तो शुष्क हो जाता है पर उसकी आँखोंकी डलियाँ ज्यों की त्यों रह जाती हैं। वह न कभी घटती हैं और न बढ़ती हैं। यह निरञ्जनका स्थान सर्वदा समानरूपसे रहता है। सर्व शरीर सूख जाता है तथापि निरञ्जनकी ज्योति समान रूपसे रहती है। इसी कारण साधु लोग पहले अपनी दृष्टिको साधते हैं जिससे इधर उधर बहकने न पावे। आँखोंको एक स्थानपर स्थिर रखते हैं। जब आँखोंको अपने वशमें कर लेते हैं तब फिर मनको आधीन करते हैं। नेत्रोंके भटकनेसे मन सदैव अस्थिर तथा चञ्चल रहता है। जब यह मनही वशीभूत न हो तो अपने रूपका ज्ञान कैसे होगा ?

अन्धी आँखोंमें निरञ्जन मिट जाता है। जब उसका स्थानही नहीं रहता तो वह भी नहीं रहता। इस कारण जो अन्धा होता है उसकी बुद्धि अधिक होती है। अन्धा बिना देखे सब कुछ जान लेता है। अन्धेकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण होती है।

घोर निद्राको सुषुप्ति कहते हैं। वो दो प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञान सुषुप्ति दूसरी ज्ञान सुषुप्ति। इन दोनों सुषुप्तियोंमें संसार नष्ट हुआ जान पड़ता है परन्तु संसारका बीज रहता है। यदि बीज न होता तो वही कदापि जाग्रत अवस्थामें न आता। इसी कारण जब ध्यानमें लीन होता है तब बड़ा प्रकाश उत्पन्न होता है। इस प्रकाशमें वासना तो दूर हुई जान पड़ती है पर वासनाका बीज नष्ट नहीं होता। ये मनके व्युत्थित होतेही फिर उसी रूपमें प्रगट हो जाती है। सदाकी तरह फिर संसारको उपस्थित करती है पर जब

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उनकी बीज शक्तिका नाश कर दिया जाता है फिर वो जगज्जाल नहीं फैला सकती किन्तु जबतक इनकी बीज शक्ति नहीं नष्ट होती अवकाश पातेही मनकी एकाग्रताको मिटा देती हैं इस दशामें साधकको सच्चे गुरुकी आवश्यकता होती है ।

योगी योगयुक्तिसे समाधिके समयमें मनको वश कर लेते हैं पर समाधिके हरतेही मनकी वृत्तिसरूपता हो जाती है । बिना सच्चे गुरुकी कृपासे वासनाओंको नहीं मार सकता ये बड़ी प्रदल है अब हम वासनाओंकाही निरूपण करते हैं ।

मनके पाँच अहङ्कार

स्थूल, लिङ्ग, कारण, महाकारण और कौवल्य मनके ये पाँच अहंकार हैं इसीमें स्वामी सेवक देवता और पुजारी सभी बन्द हैं । इन पाँचों अहंकारोंसे बाहर निकलना कठिन है । जिसने इन अहंकारोंको बनाया है वह स्वयम् इन्हीं में ही फँसा है । सत्यगुरु बिना इसको कौन निकाले । बंधेको बँधा कैसे छुड़ावे । अन्धेको अन्धा क्या राह दिखा सकेगा । ये ही पाँचो अहंकार मनुष्यके बन्धनकी जड़ें हैं सब जीव इन्हींमें आवागमन किया करते हैं ।

१ स्थूल अहंकार—स्थूल अहंकारके अभिमानीमें यह कामना रहती है कि, पुत्र, गृह, धन, संसार, राग, रङ्ग, अच्छे अच्छे भोजन सौन्दर्य, सुगन्ध, सृंग अच्छे वस्तु, सवारी, शिकार और सम्भोग इत्यादि मिलें ये तो मिल जाय प्रसन्न होता है । नहीं तो दुःखी रहता है ।

२ लिंग अहंकार—लिङ्ग, कहो अथवा सूक्ष्म कहो । इस अहंकारवाले के मनमें यह रहता कि, स्वर्ग तथा बैकुण्ठके द्वारोंसे मिलूं । यंत्र मंत्र तंत्रादिकी योग्यता प्राप्त करूं । राजा इन्द्र इत्यादिके राज्यको प्राप्त करूं, उसकी विद्या जानूं जो यह सब मिले तो प्रसन्न रहता है न मिले तो दुःखी होता है ।

३ कारण अहंकार—कारण अहंकारवालेके मनमें यह ध्यान रहता है कि, योग समाधि वचन सिद्धि, प्राणायाम और प्रत्याहार, भूत, भविष्य, वर्तमानका हाल जाननेकी सिद्धि इत्यादि हों । दूसरोंकी देहमें समा जाना एकसे सहस्रों हो जाना, फिर सहस्रोंसे एक हो जाना, यह सब इसी अहंकारीके काम हैं । सुतरां जैसे शंकराचार्यजी संन्यासियोंके गुरु राजा अमरूकके शरीरमें समा गये और छः मास पर्यन्त रह आये वो इसीके बलसे रह आये थे ।

४ महाकारण अहंकार—महाकारण देहके अभिमानीको यह इच्छा होती है कि, योग वैराग्य, समाधि किया और उपरम, तितिक्षा, शम, दम, मुमुक्षताकी अवस्था और ज्ञान मिले । मैं ज्ञानी और मैं मुक्त हूँ । दूसरे सब बन्धनमें हूँ । केवल मैं छूटा हुआ हूँ । ऐसी अवस्था जब पूरी हो तो बड़ी प्रसन्नता हो और

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न हो तो दुःख होगा । जब ज्ञान हुआ तो सर्व दुःख सुख भोगता है और समस्त सामर्थ्य रखता है ।

५ कौवल्य अहंकार—कौवल्य अहंकारवालेके देहमें यह ध्यान होता है कि, मैं अद्वैत ब्रह्म हूँ—मैं आत्मा अधिष्ठान हूँ यह जगत् जड़ तथा चैतन्य सब मेराही स्वरूप है । घड़ा और मिट्टी जल तथा लहर सुवर्ण और आभूषण सभी मैं ही हूँ । जब ऐसा भास हो तो प्रसन्न और न हो तो दुःखी हृदयके ये पाँच अहंकारोंमें नर तथा नाथ दोनों फँसे हैं । जो कोई इन पाँचों अहंकारोंसे पृथक् हुआ वो ही भवजालसे छूटा, इन पाँचों अहंकारोंमें ज्ञानी तथा ध्यानी सभी फँसे हुए हैं । इनसे बाहर निकलना असम्भव है । किसीने उन पाँचों अहंकारोंका भेद नहीं पाया । इस भवसागरमें तो यह पाँचों देह श्रेष्ठ हैं बाकी सभी निकुण्ट हैं ।

मनकी विषय वासना

अब मैं मनकी विषय वासनाके बारेमें लिखता हूँ जिसके कि, कारण सब मनुष्य कालपुरुषके जालमें फँसे हैं । इसकी पूजा कालपुरुषसे प्रगट हुई है । क्योंकि वह स्वयम् विषय वासनाको अच्छा समझता है । उसका निराकार शरीर पशुवत् वासना विशेष तृष्णासे मिला हुआ है । जितने विषयी हैं सब उसके दास हैं । जब चित्त वासनाओंकी ओर झुकता है तभी मन भी चञ्चल होता है उसी समय बाहरी भीतरी सब इंद्रियें चैतन्य हो जाती हैं, सूक्ष्मता दूर होके स्थूलता प्रगट हो जाती है । एकसे अनेक होता है । चौरासी लाख योनिके जीव उत्पन्न होते हैं । एक योनिसे दूसरीमें मारा मारा फिरता है । अधोकी तरह टटोलता फिरता है परन्तु कुछ भी हाथ नहीं आता । जैसे जल मथनेसे मक्खन नहीं निकलता, उसी प्रकार यह जीव जप तप तपस्या करके भी बिना ज्ञानके खाली ही रह जाता है । उसकी कहीं भी स्थिति नहीं होती । पाँचों देवताओंका शरीर वासनामय है इन्हींकी सन्तान समस्त संसार है । इस कारण यह समस्त संसार वासनाओंसे पूर्ण है । जो कोई वासनासे पृथक् होगा वही मनुष्यत्वको प्राप्त करेगा, वही मुक्तिका अधिकारी होगा । कितनेही ऋषि मुनियोंने कठिन तपस्या की पर जब उनपर काम क्रोधादिका प्रभाव हुआ तब वे पशुसे भी अधिक नीच हो गये । यहाँ तक कि, पशुओंकी योनिमें जाकर भी अशान्तही फिरते रहे ।

पारख गुरुके बिना समस्त धम्मोंके आचार्य काम क्रोधादिककी वासनामें फँस रहे हैं । जैसे कोई कुत्ता एक सूखा हाड़ अपने मुंहसे पकड़ लेता है । उसको

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बड़े हर्षसे चबाता चाटता है वह हड़डी उसके मुंहमें घाव कर देती है उसके मुंहसे रक्त बहने लगता है। पर वह मूर्ख कुत्ता जानता है कि वह रक्त उस हड़डीसे निकल रहा है जिसे कि, वो बड़े स्वादसे चाट रहा है उसके मुंहमें हड़डी देखकर दूसरे कुत्ते दौड़ते लड़ते काटते तथा उसको छीन लेनेका उद्योग करते हुए मारते मरते हैं परन्तु उसको वह नहीं छोड़ता इसी प्रकार इस संसारके पदार्थ सूखी हड़डीके समान हैं। जो लोग इससे ग्रेम करते हैं तो सब संसारी कुत्ते हैं वे भी अपने शरीरके सारको नष्ट करते हुए अपनी आत्माके सुखको विषयका सुख समझ रहे हैं जो अप्सरा तथा गन्धर्वों तथा अमृत और कल्पवृक्ष आदिक स्वर्गीय पदार्थोंकी अभिलाषाये हैं। ये सब अत्यन्त तुच्छ एवं मायिक पदार्थोंकी ही हैं। मनुष्यका मन जबतक वासनाओंसे कलुषित है तब तक वह कालपुरुषका चेरा है। किन्तु इससे पृथक् होते ही अपने कर्तव्यको पूरा कर-लेता है।

गजल—आया जो तू बाजारमें फ़ैज आम कर फ़ैज आमकर।
सोदा करो मिल यारमें कुछ काम कर कुछ काम कर ॥
पकडा गया बेगार है तेरे सिरके ऊपर भार है।
तुझको बहुतसा कार है अज्जाम कर अज्जाम कर ॥
सरे आशकां बुरीदः है दिलवरको यह खुश ईदहै।
हरदीदनी नादीह है आराम कर आराम कर ॥
यह नफ़्त ऐन उन्नीस है आहनको मेकनातीस है।
बखुदा नहीं तकदीस है सम्सामकर सम्सामकर ॥
तेरे बरमें आजिज कोह रुवा सब खारो खस लिपटा गया।
अब छोडकर शर्मो हया सतनाम रर सतनाम रर ॥

यह वासनाही समस्त संसारका मुख्य कारण है। इससे मन उत्पन्न होता है, हृदयसे तीन लोक तथा चारों वेद बर्हिर्गत होते हैं। अब कुण्डलिनी शक्तिका भिन्न २ वर्णन किया जायगा। जो कि, वासनाओंके बीज जालकी मुख्य पोषिका है।

वासनाओंकी जननी

जिसका संक्षेपसे वृत्तांत में चक्र निरूपणमें कर चुका हूँ यही कुण्डलिनी वासनाओंकी जननी है, महामाया नाभी तले रहती है। यह समस्त संसारका कारण है इसीसे तीनों गुण हैं। उसके मुंहसे फुँफकारकी आवाज आया करती है। उसी सौपिनीकी फुँफकारसे सौहं शब्द बर्हिर्गत होता है। जिसके भीतर

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प्रणव विराजा रहता है। इसी कुण्डलिनीकी फुँफकारसे यह मन चैतन्य होता है। मनके चैतन्य होतेही समस्त संसारकी उत्पत्ति होती है। कुण्डलिनी मायामाया वासनाओंसे भरी हुई है भाँति भाँतिकी सांसारिक वासनाएँही उसका विष हैं। जब उस कुण्डलिनीमें फुर्ना होती है तब मन प्रगट होता है। जब निश्चय हुआ तब बुद्धि उत्पन्न हुई और जब अहम् भाव होता है तब उससे अहंकार उत्पन्न होता है और जब चिन्तन करता है तब चित्त उत्पन्न होता है। जब स्पर्शके सन्मुख होता है तब वायु प्रगट होती है, जब देखनेकी ओर होता है तब अग्नि प्रगट होती है, जब रस लेनेकी इच्छा होती है तब जल उत्पन्न होता है। जब सृंघनेकी ओर ध्यान गया तब पृथिवी उत्पन्न होती है। पाँचों तन्मात्राएँ और चारों अन्तःकरण चौदह इन्द्रियाँ और सब नाडियाँ इसी कुण्डलिनीसे उत्पन्न होती हैं।

तीन प्रकारकी इच्छाएँ हैं। प्रथम—किसी वस्तुके मिल जाने और उसके पानेके निमित्त उद्योग करनेकी इच्छा। यह अज्ञानीकी इच्छा है।

दूसरी यह है कि दुःख और आपत्तिके पृथक् होनेकी इच्छा। यह बड़े अज्ञानीमें होती है।

तीसरी यह कि जो काम करना उसका फल चाहना। जब इच्छानुसार फल न हो तब उसके लिये चिन्ता तथा शोच होता है, यह एक साधारण है।

वासना चार प्रकारकी है। एक सुषुप्ति वासना है, दूसरी स्वप्न वासना है, तीसरी जागृत वासना है, चौथी क्षीण वासना है।

१—स्थावर अर्थात् वृक्ष पत्थर इत्यादिको सुषुप्ति वासना होती है।

२—पशुओंको स्वप्नवासना होती है। उनको वासनाका ध्यान भी नहीं होता।

३—मनुष्य तथा देवताओंको जागृत वासना होती है कि, वे वासनामें ही लगे रहते हैं। यह तो तीन वासनाएँ अज्ञानी जनोंकी हैं।

४—क्षीण वासना ज्ञानीकी है। जब वासना मर गयी किसी प्रकारकी इच्छा नहीं रही, तब संसार लय हो जाता है। संसार वृक्षका बीज वासना है। दसो दिशा संसारके पत्ते हैं। शुभ अशुभ कर्म उसके फूल हैं। मनुष्य पशु वृक्ष तथा पत्थर आदि उसके फल हैं। इस सृष्टिका बीज वासनाएँ हैं। इनके नष्ट करनेसे संसार भी नष्ट हो जाता है, वासनासे स्थिर रहता है। शारीरिक और मानसिक दो रोग हैं, दोनोंही वासनाओंसे उत्पन्न होते हैं। यही दो प्रकारके रोग हैं। शारीरिक रोगको व्याधि और मानसिक रोगको आधि कहते हैं।

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शरीरकी व्याधि तो औषधी तथा पुण्य करनेसे दूर हो जाती है। जन्म मरणकी बीमारी, (आधि) मनकी स्वच्छतासे दूर होती है।

इस सौपिनीसे यह मन बड़ा बलिष्ठ तथा विबैला सर्प बना हुआ है। इसने समस्त संसारको ऐसा डंक मारा है कि, सबके सब मर गये। किसी को चेत नहीं होता। इस मन सौपके विषसे सब अचेत हो रहे हैं, इसी सर्पका विष तीनों लोकोंमें भरा हुआ है। इसी सर्पिणीके विषकी द्वारसे सर्व जीव ऐसे अचेत हो रहे हैं कि, जगानेसे भी नहीं जाग सकते। संसारमें जितने रोग शोक, दुःख, दरिद्र, कष्ट और आपत्ति हैं सब इस कुण्डलिनीसे हैं। प्राण अपान दोनों वायुको योगेश्वर लोग सुषुम्ना नाड़ीके मार्गसे ब्रह्माण्डमें पहुँचाते हैं। एक क्षणभर उस स्थानपर वायुके ठहरानेसे सिद्धोंका दर्शन हो जाता है।

नाभिके मूलमें सूर्य तथा तालुके मूलमें चन्द्रकी स्थिति है इस शरीरमें दो और कमल हैं एक नीचे और दूसरा ऊपर है। नीचेके कमलमें सूर्य रहता है। ऊपरके कमलमें चन्द्रका वास है चंद्रसे अमृत च्युता है सूर्य शोष लेता है। स्वाधिष्ठान चक्रके आगे महामाया कुण्डलिनी रहती है। जैसे मोतियोंका भण्डार हो ऐसेही कुण्डलिनी लक्ष्मी बड़ी सुन्दरताके साथ रहती है। जैसे डण्डेके साथ हिलानेसे सर्पनी शब्द करती है ऐसेही इस कुण्डलिनीसे सोहम्का शब्द वहिर्गत होता है। यही आदि शक्ति समस्त संसारका कार्य करती है। उससे आपसे आप जो वायु निकलती है वह वायु बहुत मुलायम है। वह वायु जो छूटती है फिर दो सूरतोंमें स्थिर होती है। एकका नाम प्राण तथा दूसरेका नाम अपान है। ये दोनों वायु आपसमें टक्कर खाती हैं। इसीको (हरारत गरीजी) कहते हैं। उसीसे हृदय कमलमें सूर्य समान महान् प्रकाश होता है। इस हृदय कमलमें सुवर्ण रङ्गका एक भौरा है। इस भौराके दर्शन करनेसे योगीकी दृष्टि लाख योजनाकी हो जाती है। पेटमें जो अग्नि रहती है उसको जठराग्नि कहते हैं। ऐसी ही वडवाग्नि समुद्रमें रहती है। यह दोनों अग्नि जलको शोषण करती हैं। हृदय कमलसे जो शीतल वायु निकलती है उसको चन्द्रमा कहते हैं। प्राण-वायु जो गर्म वायु है वह सूर्य है। इन दोनों अर्थात् सूर्य और चन्द्र करके यह समस्त सृष्टि स्थित हैं। कुण्डलिनीकी अचेतावस्थामें जीव वासना करके दुःखी सुखी होता रहता है। इसीसे भूख, प्यास, आलस्य, नींद, जरा, मरण आदि भीतरी और वाहरी दुःख हैं। इस कुण्डलिनीका विष समस्त संसार पर छाया हुआ है। जो इस कुण्डलिनीके भेदको जानता है वा इस सर्पके विषसे बचकर अमृत पीवे और युगयुग जीवे। इस नागिनका विष चारखानि चौरासी लाख

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योनिके जीवोंमें सिरसे पाँव तक व्याप रहा है । इस सोंप तथा सोंपिनके वशमें सारा संसार है । इन्हींके विषसे सब जीव मृतक हैं । मृतकोंको जो चाहे सो करे वे क्या कर सकते हैं । यह नाग और नागिन पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों पर अधिकार किये हुए और सर्व शक्तिमान् कहलाते हैं । इन दोनोंक जालसे निकलकर कोई जीव बाहर जा नहीं सकता । इस कुण्डलिनीके विषने सबको अन्धा कर रखा है ।

शङ्खल

कहाँ मैं कहाँ दिलवर रहा यह नागिनी जब डस गयी ।
नहीं मैं नहीं वह घर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
जादू नहीं मंतर कोई अफसूँ नहीं यंतर कोई ।
उस डंक मारा मर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
यह दम्बदम लहरा गया तनमें जहर जब छा गया ।
इस जिन्दगीका खतरः रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
घेरे अँघेरी रात है और सद बला आफात है ।
शामका न सेहर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
अपना व बेगाना कहीं पहचानमें आवे नहीं ।
न बसर रहा न हजर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
इनसान सुम्-बकुम हुआ होशो हवासो गुम हुआ ।
दायम दिले मुजतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
नहीं इल्म असर पजीर है कुछ ऐसीही तकदीर है ।
तदबीर कर बदतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
आवे नहीं कोई काम जब आजिज जपो सतनाम तब ।
जारी न जोरो जद रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥

ये नाग नागिनी एक है समस्त संसारको इन्होंने काट खाया है । जो कोई सच्चा साधु होकर गुरुकी सेवा करेगा उसपर इस सोंपका विष असर न न करेगा । साधु सेवा अवश्यही सत्यपथपर आरूढ़ कर देगी । कभी भटकने न देगी । जहाँ साधु और गुरुकी सहायता न होगी वहाँ कदापि जीवका छुटकारा न होगा ।

जितने शब्द, नाद और वाक्य इत्यादि हुये और होते हैं सब इन्हीं दोनोंसे हैं । कोई वाक्य और शब्द इत्यादि बिना इन दोनोंके नहीं हैं । केवल इस एक सोंपिनीने अपनीही मूर्तियाँ बनाईं । इस मनको मनु अथवा स्वयम्भु मनु कहो

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और माया इसकी स्त्री सतरूपा हुई जो मन है उसीको अंग्रेजी भाषामें मैन (Man) कहा हैं। जिसको मनुष्य कहते हैं सोही मन या मैन है। जबतक यह अकेला था तबतक कुछ कर न सकता था। फिर जब दूसरा स्वरूप उसके साथ हुआ तब उसका नाम स्त्री अथवा अंग्रेजी भाषामें वोमैन (Woe-man) अथवा (Woman) हुआ। इस (Man) के शब्दमें (Woe) बढ़ाया तब वोमैन हुआ। वो के अर्थ कष्ट तथा आपत्तिके हैं। जब मैनके (Man) साथ (Woe) वो मिला तब कष्ट तथा दुःखसे भर गया जब मैनके (Man) साथ वो (Woeman) मैन हो गई तब एकसे अनेक हो गया। तब संसारके जाल जञ्जालमें फँसकर बँधुआ हो गया। वही नागिनी कष्ट तथा आपत्तिका घर हुई। फारसीमें इसका नाम जन हुआ। जनका अर्थ मार—वह समस्त संसारको मारने और खाने लगी। संस्कृतमें इस औरतको अस्त्री कहते हैं। अ शब्दको विलोपित करनेसे स्त्री हुआ। यथार्थमें यह शब्द अस्त्री है। स्त्री नहीं।

अस्त्र और शस्त्र ये दो प्रकारके हथियार हैं। बन्दूक कमान इत्यादि अस्त्र कहलाते हैं क्योंकि इनमें एकमेंसे दूसरा निकलकर घाव करता है। बन्दूक नहीं मारती पर गोली मारती है। कमान नहीं मारती पर तीर मारता है। इस प्रकारके समस्त हथियार अस्त्र कहलाते हैं। तलवार, कटार, छुरा आदि शस्त्र हैं जो कोई अस्त्र बाँधता है उसे अस्त्री कहते हैं और जो शस्त्र बाँधता है उसको शस्त्री कहते हैं। अतः इस स्त्रीने अस्त्रको बाँधकर समस्त संसारको मार डाला। उसके ये पाँच अस्त्र हैं—मोहन, मारन, वशीकरण, उन्मादन, उच्चाटन, मोहन, वशीकरना-मारन, मार डालना। वशीकरण—गुलाम बना लेना। उन्मादन—पागलोंके समान बकना झकना। उच्चाटन—कुछ अच्छा न लगना। इस स्त्रीके ये पाँचों तो हथियार हैं। बेटी बेटे जितने उत्पन्न होते हैं सबके सब मोहमें फँसाकर मार लेते हैं। समस्त जन्म फँसाकर यह मार लेती है। इसी मन तथा मायाका समस्त खेल फँल रहा है। मन आकाश और निरञ्जन है। माया शक्ति और पृथिवी है। इसीसे सबकी उत्पत्ति है। इसी ब्रह्म तथा मायाकी रचनासे समस्त संसार है। इन दोनों विषयोंकी सन्तान तो सभी हैं और इन्हींका विष सबमें समा रहा है। विशेषतः यह स्त्री जो मोहिनीरूप है। इसने सबका मन मोह लिया है। जो इस मोहिनीसे बच जावेगा वह बड़ा बलिष्ठ तथा भाग्यवान है। जो स्त्रीको छातीसे लगावे वह भली भाँति याद रखे कि, उसने विषेली काली नागिनको हृदयसे लगाया है। जब यह नागिन हृदयसे

आद्या और कबीर नाम मालाका संक्षेप

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लगी तो निश्चयही काट खावेगी जिससे मनुष्य मर जावेगा । जीवित रहनेकी आशा न रह जावेगी । केवल उसके विषका औषध यही है कि, तन मन धनसे साधु सेवा करे तो बचेगा नहीं तो अवश्यही मर जावेगा । अतः यह हथियारबन्द अस्त्री समस्त संसारको मारने तथा खानेके लिये बनी है ।

मनने तनको बनाया और तनने धनको बनाया । इस कारण तन और धन दोनोंका रचयिता मन है । तन और धन जब दोनोंको छोड़दे और परमेश्वरमें लीन होजावे तब वस्तुतः मन पर विजय पानेकी आशा देख पड़ती है । जबतक मनके सत्वका इच्छुक रहेगा तबतक अवश्यही मनका गुलाम बना रहेगा । कुण्डलिनी शक्ति और मनका मुंह नीचेकी ओर है । यह स्पष्ट प्रगट करता है कि, मेरे साथ प्रेम करनेवाले मनुष्य नीचेके स्थानोंको जायेंगे अर्थात् नरकको पावेगे और सदैवके लिये आवागमनके बखेड़ेमें फँसे रहेंगे मेरे विषकी औषध कदापि उनके हाथों न पड़ेगी । इस विषकी औषध तो केवल पारखगुरुकी दया है । पारखगुरु उसके विषको पृथक् कर सकता है दूसरा कोई नहीं कर सकता । पारखगुरु साधुसेवासे दयालु होता है । जब सुकृत अथवा सुकर्म पूर्णताको पहुँच जाते हैं तब उसकी कृपा प्राप्त होती है । इस नागिन तथा नागके भेदको केवल हंस कबीर जानते हैं दूसरा कोई जान नहीं सकता । इस नागिनीने सब जीवोंको डंक लगाया है सभी अचेत तथा बधिर हो रहे हैं । यह कुण्डलिनी महामाया वासनास्वरूप है । जिसका ध्यान उसकी ओर होता है वह कामनाओंसे भर जाता है ।

इसी इच्छा अथवा वासनास्वरूप स्त्रीका समस्त कारखाना है । जो वासनाओंसे भरा हुआ है वो सब इसी महामायाका खेल और कौतुक है । इसी बाजीगर और बाजीगरनीने अपना कौतुक दिखाके सब जीवोंको अन्ध कर रक्खा है । जो इस बाजीगरको पहचान सकेगा उसके बन्धनमें न आवेगा वही मन मायाके पार जानेका पथ पावेगा । जो कोई योग युक्तिसे कुण्डलिनीको जगाकर सुषुम्नाके द्वारको निरापद बना लेगा वही उत्तम योगीराज वासनाओंको जीतकर निष्कंटक हो जायगा ।

कच्चे गुरुवोंने इसको वेद तथा शास्त्रके यथार्थ अभिप्रायको तो न समझाया दूसरी रीति पर समझाकर भ्रममें डाल दिया है ।

कर्म

जब कालपुरषने सृष्टिकी उत्पत्ति की तब कर्मका जाल बनाया । वे कर्म दो प्रकारके हैं । एक शुभ दूसरा अशुभ । ये दोनों कर्म बड़ी बेड़ी हैं । इन दोनों

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कर्मोंकी बेडीने समस्त सृष्टिको बाँध लिया है। जो कोई शुभ कर्म करता है वो सांसारिक धन स्वर्ग वैकुण्ठ इत्यादि सब सुखकी सामग्री पाता है उस पुण्यका अन्तिमफल अन्तःकरणकी बुद्धि है। इससे अधिक नहीं। ऋषीश्वरोंने कठिन तपस्या की और योग समाधि तथा पूजादिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया। दाससे स्वामी बन गये तो भी कर्मक्षय न होनेके कारण बन्धन न छूटा आवागमनमें फँसे रहे। कालपुरषने सबको इन्हीं दोनों कर्मोंमें बाँध लिया है। इस कर्मके तीन भेद हुए हैं। कर्म, अकर्म, विकर्म। कर्म तो मनुष्यको करना उचित है। अकर्मसे दूर भागना और विकर्मसे मनुष्य अपनेको मुक्त और भाग्यवान् बनाता है। जो शास्त्रानुसार कर्म ईश्वर निमित्त किया जाता है वह विधि है। दूसरा अकर्म। जिससे लोक परकलौमें कहीं सुखकी प्राप्ति नहीं होती है, उसे शास्त्रसे निषेध कहते हैं, यह अकर्म ईश्वरके विरुद्ध है। विकर्म उसको कहते हैं जिसके करनेसे कर्मसे छूटे बंधनकी पाश टूटे और ज्ञान लाभ हो पहिले स्वर्ग आदिका लालच दिखाकर कर्म करवाते हैं। इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादिके सुखका त्याग है। जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़डू दिखाकर औषधि देता है उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिका लालच मनुष्योंको दिखाया गया है। फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ है। सञ्चित प्रारब्ध और क्रियमान। सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षा पूर्वक रखा हुआ हो। यह सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा। दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं। इसी प्रारब्ध कर्मके अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है अर्थात् अपने पूर्व कर्मानुसार शरीर बना है जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है। अहम्के अर्थ मैं हूँ। अहम् बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है। जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है जो वृक्षोंके पत्तों पर रहता है। जब यह एक पत्तेको छोड़कर दूसरे पत्ते पर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पँरोंको पत्ते पर जमा लेता है। जब उसके अगले पँर दूसरे पत्ते पर भली प्रकार जम जाते हैं तब वह अपने पिछले पँरोंको भी खींचकर दूसरे पत्ते पर जमा लेता है और अगले पत्ते पर भली प्रकार जमकर बैठ जाता है। पिछले पत्तेसे सम्बन्ध छोड़ देता है। इसी प्रकार उस जीवका भी आवागमन हुआ करता है। ब्रह्मासे लेकर सर्व जीवोंमें अहंकार भरा हुआ है। जिसमें अहंकार नहीं उसका आवागमन नहीं। अहम् बोलनेसे उसके आवागमनका सम्बन्ध बराबर जारी रहता है। वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावों

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में चारोंखानमें समा रहा है । अहम् कम्मोंका आकर्षण है । जो एक योनिसे खींच कर दूसरीमें ढाल देता है जैसे कि, चूर्मक लोहेको खींच लेता है ।

तीसरा क्रियामाण कर्म वह है जो अब कर रहे हैं । यदि यह क्रियामाण कर्म बलवान् होकर शुभ वा अशुभकी ओर झुका तो वह अपना रङ्ग दङ्ग दिखला देता है । यदि वह शुक्कर्मकी ओर झुककर सुकम्मकी पूर्णता करले तो वह अपने स्वरूपको प्राप्त करा देता है । यदि अशुभकी ओर झुका तो जड़योनिमें जा समाता है, नरकके समस्त दुःखों तथा अत्यन्त कष्टोंमें अपनेको डालकर कंकड़ पत्थरकी तरह बेकाम कर देता है फिर उसको सुपथ नहीं मिलता । सुपुरुष महाकर्ता, महाभोगी और महात्यागी इन भेदोंसे तीन प्रकारके होते हैं । महाकर्ता उसको कहते हैं कि, जो कर्म करता है और अपनेको कर्ता नहीं मानता । महाभोगी उसको कहते हैं कि, जो सब भोग भोगता है और अपनेको भोगता नहीं मानता । महात्यागी उसको कहते हैं जो अहंकारको त्याग दे । इस त्यागका गुण तब जाना जाता है जब उसको अन्तरदृष्टि होती है । जबतक इन बातोंका गुण भली प्रकार नहीं जाना जाय तबतक वेद और पुस्तक पाठसे कोई लाभ नहीं होगा । अन्तर दृष्टिसे जाना जाता है कि, ये तीनों क्या बात हैं ।

महाकर्ता तो यह तब होता है कि जब यह अन्तर दृष्टिसे भली भाँति देखता है कि, मैं कुछ करही नहीं सकता, मैं किसी कार्य्यका कर्ता नहीं हूँ, केवल मैं अपनी मूर्खतावश आपको अपने कार्य्यका कर्ता समझ रहा हूँ । यह समस्त संसार कलके सद्गुण चल रहा है । मेरा और किसीका कोई वशही नहीं कि, कोई काम करे । न मालूम वह कौन है जो मुझको तथा समस्त संसारको चला रहा है । जब मैं कुछ करताही नहीं और न मेरा किया कुछ हो ही सकता है । ऐसी अवस्थामें यह अपनेको कम्मोंका कर्ता नहीं मानता, जब यह अपनी अंतर दृष्टिसे भलीप्रकार देख लेता है तब फिर यह दूसरी ओर ध्यान नहीं देता, जानता है कि, जब मैं किसी कार्य्यका कर्ता ही नहीं तो मैं व्यर्थही अपनेको क्यों कर्ता ठहराऊँ । तब वह इस अज्ञानतासे पृथक होता है । संसारी इसी अज्ञानतामें फँसा रहकर आपको अपने कम्मका कर्ता समझ कर दुःख सुखमें धक्के खाता है । मैं क्यों अहम् बोलता हूँ नहीं जाने मुझे कौन अहम् बुलाता है, कौन डोलाता है । अतः इससे जाना गया और प्रमाणित हुआ कि, मुझको मेरे कार्य्यके बन्धन अहम् बोलाते हैं और दूसरा कोई नहीं । जब मैं अपने कम्मोंके बन्धनसे छूट जाऊँगा तो मेरा अहम् बोलना भी छूट जायेगा । जबतक यह आपको कार्य्यका करनेवाला मानता है तब तक यह क्रियामें आपको स्वतन्त्र समझता है । जब यह

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अन्तर दृष्टिसे भली भाँति निगाह कर लेता है कि मैं अपने कर्म्मोंका कर्त्ता नहीं तब अपने शुभ अशुभ कामोंको परमेश्वरको सौंप उसके शरणमें होकर उससे सहायता माँगता है, जान लेता है कि, मेरे कार्य्य भुझको बचाने योग्य नहीं, मैं सत्यगुरुकी शरण लूँ, इसके अतिरिक्त और छुटकारेका कोई उपाय नहीं है। अपनी अज्ञानताके कारण मैं अपने कार्य्योंका कर्त्ता आपको जानता था परन्तु आगे ऐसा कदापि न करूँगा। यदि यह स्वतन्त्र होता तो सब कुछ कर लेता। फिर अपनेको दीनता तथा दुर्दशामें कदापि नहीं फँसाता। एक दिनका वृत्तान्त है कि, एक पादरी साहब आकर मेरे पास बैठे और बाद विवादपर प्रस्तुत हुये। उसने कहा कि, मनुष्य अपने कार्य्योँमें स्वतन्त्र हैं। इसपर मैंने उत्तर दिया कि, यह बात कदापि नहीं कर्म स्वतन्त्रता किसीको प्राप्त नहीं। सब कलके समान गतिमान हैं। सुतरां तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तक देखो जब आदम उत्पन्न हुआ खुदाने उसको मना किया कि, तू यह कार्य्य कदापि न करना और इस वृक्षके फलको न खाना। आदमने न माना और खाया। जिससे वह ऐसा दुर्दशा प्रस्त हुआ कि, फिर न संभला।

यदि आदम कर्म करनेमें स्वतन्त्र होता तो ऐसा कदापि न होता। फिर आदमके पुत्र काबील और हाबील हुए वे भी तो ऐसेही थे। क्योंकि दोनोंने एक दिवस परमेश्वरके समक्ष भेंट चढ़ाई। छोटे भाईकी भेंट तो स्वीकृत हुई पर बड़े काबीलकी अस्वीकृत हुई इस कारण काबील अत्यंत क्रुद्ध हुआ। परमेश्वरने कहा कि, ऐ काबील ! तू क्यों क्रोध करता है ? यदि तू अच्छे मनसे देता तो क्या तेरी भेंट स्वीकार न की जाती ? परन्तु तू अपने भाईपर जय पावेगा। काबीलने अपने भाईपर जय पाई उसको मार डाला। परमेश्वरने उससे पूछा कि, तेरा भाई हाबील कहाँ है ? तब उसने उत्तर दिया कि, मैं नहीं जानता क्या मैं अपने भाईका रख-वाला हूँ। इसपर खुदाने उत्तर दिया कि, तेरे भाईका खून मुझे पुकारता है। अब तू हत्यारा तथा दोषी हुआ यह कहकर खुदाने उसको श्राप दिया। भलाजी ! यह न्यायकी बात थी कि, खुदाने तो स्वयम् कहा कि तू अपने भाईपर जय पावेगा। उससे जय पाई और उसको मार डाला। फिर वह दोषी कैसे ठहरा ? यदि अपने भाईको न मारता तो खुदा झूठा होता और मारा तो दोषी हुआ, हजूरसे दूर किया गया। वह तथा उसकी सन्तान पापिष्ठी ठहरी।

ऐसाही नूहके विषयमें जानना चाहिये कि, नूह सिखाते सिखाते विवश हो गया। किसीने उसका कहना न माना। अन्तको बाढ़ आई और समस्त मनुष्य डूब मरे। कोई जीव सिवा उनके कि, जो नूहकी नावपर था नहीं बचा। फिर

सुकृत आदि भेदसे ग्रन्थ

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नूहकी शिक्षा तथा खुदाकी चौकसी किस काम आयी । वह भी कर्ममें स्वतन्त्र न ठहरा । जब बाढ़से सबका सत्यानाशकर चूका तो नूहकी ओर खुदाने ध्यान दिया तब खेद करने और पछ्ताने लगा कि, मैंने सबको बाढ़से क्यों नष्ट किया । कारण यह कि मनुष्योंके ध्यान तो बचपनसेही बुरे हैं अब भविष्यमें मैं बाढ़से लोगोंको न मिटाऊँगा । इससे प्रमाणित हुआ कि, इस खुदाको भी स्वतन्त्रकार्याधिकार प्राप्त नहीं । यदि ऐसा होता तो जब वह आदमका पुतला बनाने लगा तब फिरीशतोंने मना किया कि, आदमका पुतला न बनाओ पाप करेंगे । फिर पृथिवी रोई और कहा कि, मुझसे मिट्टी मतलो मनुष्यका पुतला न बनाओ, मनुष्य बड़ा पाप करेंगे । पर खुदा साहबने किसीका कहना न माना । अपनी इच्छासे मनुष्यका पुतला बनाया । आगे मनुष्योंके पापोंसे रुष्ट होकर बाढ़ लाकर पछ्तताया । फिर मैं कैसे कहूँ कि खुदा साहबको कार्य स्वतन्त्रता प्राप्त थी । हजरत नूहके उपरान्त हजरत इबराहीम अच्छे और पवित्र खुदाके पैगम्बर हुये, वे भी स्वतन्त्र नहीं थे । क्योंकि उनकी शिक्षासे नमरुद बादशाह इत्यादि सभी विरुद्ध हो गये थे । इबराहीमके पीछे इसहाकको पैगम्बरी मिली । इसहाककी स्त्री रबका जब गर्भवती हुई, उसके पेटमें दो बालक थे, वे दोनों पेटके भीतर परस्पर लड़ते थे । तब रबकाने खुदाके निकट जाकर निवेदन किया कि, मेरे पेटके दोनों लड़के आपसमें क्यों फिसाद करते हैं ? तब खुदाने कहा कि, बड़ा छोटेकी सेवा करके बड़ाई पावेगा । फिर इसहाकने ज्येष्ठ पुत्र ईसूको बरकत देनी चाही पर उस बरकतको छोटा पुत्र याकूब ले गया । इसहाककी युक्तिने काम नहीं दिया । देखो मूसाकी पहली पुस्तक २५ बाबका २१-२२-२५ आयत । उसमें ये सब लिखा हुआ मिलेगा ।

इनके उपरान्त हजरत मूसा थे । वह भी अपने कार्योंमें स्वतन्त्र नहीं थे क्योंकि, परमेश्वरने मूसाको मिस्रमें फिर्तूनके लोगोंको सिखलानेके लिये भेजकर यह कह दिया था कि, फिर्तूनके मनको मैं कड़ा करूँगा । वह तेरा कहना न मानेगा । इसके विषयमें मूसाकी शिक्षा किसी काम न आयी । मूसाके पीछे हजरत ईसाने खुदासे बहुत प्रार्थना की कि, मैं सलीबसे बच जाऊँ पर नहीं बचे । इसके पीछे मुहम्मद मुस्तफाने बहुत कुछ बल लगाया । बहुतसा रक्तपात किया तो भी सबको मुसलमान नहीं कर सके । यह सब बात कहकर और लिखी दिखाकर फिर मैंने पादरी साहबसे कहा कि, इन महाशयोंमें तो कोई स्वतन्त्र नहीं ठहरा । कदाचित् आपके नाम अब खुदाई परवाना कार्य स्वतन्त्रताका उत्तर पड़ा हो तो क्या आश्चर्य है ? मेरी बातें सुनकर पादरी महाशय चुप हो रहे और मुखतारीके फेलका दावा छोड़ दिया ।

शरण

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स्वतन्त्रता केवल कबीर साहबकोही है दूसरेको नहीं है। क्योंकि, जब वे मनसे जिसको छुटकारा दिलाना चाहते हैं उसको अवश्य छुड़ा ही लेते हैं जो कुछ करना चाहते हैं करही लेते हैं। उनको रोकनेवाला दूसरा कोई नहीं है।

जाग्रत अवस्थामें यह मनुष्य जैसा कुछ कार्य करता है वैसाही स्वप्नावस्थामें किया करता है। परन्तु स्वप्नावस्थाके कर्मोंको कोई नहीं कहता कि मैंने किया। यद्यपि जाग्रत अवस्थाके कर्मोंका करता यह स्वयम् बनता है कि यह कर्म मेरे हैं ज्ञान दृष्टिसे जाग्रत तथा स्वप्नावस्था दोनोंही समान हैं। केवल इतनीही विभिन्नता है कि, जाग्रत देरतक उसके साथ रहती है एवं स्वप्न थोड़ीही देरमें बीत जाता है। यदि स्वप्नके कर्म उसके नहीं तो जाग्रतके कर्म भी उसके नहीं हैं। इस कारण आपको स्वकर्ममें स्वतन्त्र समझना अज्ञानता है क्योंकि यह स्वतन्त्र कदापि नहीं है। ज्ञानकी दृष्टिसे यह अहंकार जाता रहता है। इस जीवकी चारों दशा स्वप्नके समान हैं।

दूसरा महाभोगी वह है जो कि समस्त भोगोंको भोगता है और आपको भोगनेवाला नहीं मानता। यह भी बिना अन्तर प्रकाशके जाना नहीं जा सकता कि, भोगनेवाला कौन है और मैं कौन हूँ। यदि मैं भोगने वाला होता तो जो मैं चाहता सो भोग भोग लेता। भोगोंसे कभी न भागता कोई भोग ऐसा नहीं है कि जो भोग भोगते भाग न जाय और थक न जाय। जो अपनेको भोगोंसे अलग जानता है उसके सामने अच्छा और बुरा समान है क्योंकि रानी द्रौपदीने श्वपच सुदर्शनके सामने भांति भांतिके स्वादिष्ट भोजनोंके थाल धरे, उन्होंने सब खट्टा, मीठा और नमकीन एकमें मिलाकर खाना आरम्भ किया। क्योंकि उनको स्वादों की कामना नहीं थी। एक साधुको एक मनुष्यने कड़ुई तुम्बेकी तरकारी बनाकर खिला दी, वह साधु कड़ुई तरकारीको बिना कुछ कहे सुने खागया, जब पीछे गृहस्वामी खाने लगा। तब उसको वह तरकारी कड़ुई जहर मालूम हुई। वह अपनी स्त्रीको डांटने लगा कि, तूने यह विष समान तरकारी साधुको खिला दी, उसको कितना दुख हुआ होगा। उसके मनमें बड़ा भय समाया और वह साधुके पास जाकर उससे क्षमा प्रार्थना करने लगा। एक साधुको एक गृहस्थने खीर खिलाई और चीनीके बदले भूलसे नमक डाल दिया। कारण यह कि, वह नमक चीनीके समान पीसा हुआ था। वह साधु बिना कुछ कहे खा गया। उसके भीतर जब नमककी आग लगी तब उस गृहस्थके घरमें आग लगी। जब घर में देखने लगे तब जान पड़ा कि, साधुको चीनीके भ्रमसे नमक दे दिया गया। लोगोंने कहा

शरणगतके धर्म

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कि, उस साधुके हृदयमें ठण्ढक आवे तब घरकी आगभी बुझे । थलीमें कोई सरदार था उसके पास एक वैष्णव साधु आगया उसने नहा धोकर ठाकुर पूजा की । सरदारने साधुके लिये दूध और चीनी मँगवा दी । उस वैष्णवने ठाकुरको भोग लगाया । इसके पीछे जब वह आप दूध पीने लगा तब उस सरदारको याद आगयी कि, जहाँ चीनी थी वहाँ घोड़ेकी दवाईके लिये संखिया भी पीसा धरा था कहीं ऐसा न हुआ हो कि, साधुको संखिया दिया गया हो । दौड़के देखा तो संखिया दिया गया था । उस सरदारने पुकारकर कहा कि, महाराज ! यह दूध मत पीजिये इसमें संखिया पड़ गया है । उस वैष्णवने कहा कि, अब तो यह संखिया ठाकुरको * भोग लगाया जा चुका है । मेरे ठाकुर संखिया पीवें और मैं चीनी पीऊँ ? यह कभी

  • मूर्तिके रूपमें विराजनेवाले भगवान् के अर्चावतारको ठाकुरजी कहते हैं । भक्तजन छोटे-छोटे भगवान् अपने साथ रखते हैं एवं परम भक्तिभावके साथ भजन पूजन करके नैवेद्य बना भगवान् ठाकुरजीके भोग धरकर पीले भोग लगी हुई वस्तुका आप भोजन करते हैं । वे बिना भगवान् के निवेदन किये किसी भी वस्तुको ग्रहण नहीं करते । यद्यपि वे ठाकुरजी अज्ञानियोंकी दृष्टिमें तो कंकर पत्थर ही हैं पर इन भक्तोंकी दृष्टिमें इनके प्यारे इष्ट देव ही हैं । उसमें और इस मूर्तिमें कोई भेद नहीं रहता । यदि विष्णुकी मूर्ति विष्णुके उपासकोंके लिये विष्णु नहीं तो संखियाका असर किसने आरोगतेही खींच लिया । वैष्णवके भोग धरतेही संखिया कहाँ चला गया ? यदि उपासकके लिये वो पत्थरही होती तो वैष्णवके ठाकुरजीके भोग धरतेही विषका चला जाना नितान्त कठिन था क्योंकि, पत्थरमें यह शक्ति कदापि नहीं है कि, समीपस्थके विषको हर ले एवं उसके भक्तोंपर विष भी असर न करे । स्वामी परमानन्दजीके इन अक्षरोंकी ओर ध्यान डालतेही हमारी दृष्टि अनुरागसागरकी-समालोचनात्मक भूमिकापर जाती है । इसमें कबीराश्रमाचार्य भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्द विहारी लिखते हैं कि, "भगताई तो बीजककोही अपना सर्वस्व समझकर सबसे अलग उसीके पठन पाठनमें लगे रहते थे और वैष्णवोंमें खपते थे, किन्तु बीजककी वाणीके प्रतापसे उनके और जड़ मूर्तिपूजक वैष्णवोंमें फेर पड़नेसे कबीरपन्थी कहलाने और कबीरपन्थियोंमें मिलने लगे ।" इस लेखके हमें इस कथनपर विचार होता है कि, जिस मूर्तिके भोग लगानेसे उसके सच्चे भक्त वैष्णवपर विष भी असर न करे तो फिर वो मूर्ति जड़ हुई या चैतन्योंकी भी चैतन्य ? बिहारीजी ! स्वामी परमानन्दजीके अक्षरोंपर गहरी दृष्टिसे विचार करेंगे तो एक हृदयके आनन्दका देनेवाला रहस्य ध्यानमें आ जायगा कि, वो मूर्ति जड़ भी कि, चैतन्योंकी भी चेतना उसीके अन्तर्हित थी । भारतके दर्शन शास्त्रके ध्रुन्धर पाश्चात्य देशवासी स्वर्गीय मोक्षमूलरने मरतीवार कहा था कि, भारतीयोंकी विज्ञान विज्ञताको देखो । उन्होंने जड़ पत्थरसे भी सत्यपुरुषको प्रकट कर लिया । जो मूर्ति पूजाका महत्त्व नहीं जानते । उन्हें तो सिवा पत्थरके और कुछ नहीं है, पर जो सच्चे भक्त हैं उनके लिये वो साक्षात् भगवान् हैं । उनके लिये संखिया के विषकी क्या ? संसारके विषको भी हर लेगा । वोही उसे मोक्ष धाम सत्यपुरुषके लोकको पहुँचा देगा । इसी कबीर मन्शूरमें स्वामी परमान्दजीने कहा है कि, "सत्यपुरुषकी भी मूर्ति इसीमें है ।" यह बात सत्य भी है । अपने भक्तोंके लिये यह सत्यपुरुष तथा भक्तोंके सतानेवालोंके लिये यही कालपुरुष है । अतः यह सुतराम् सिद्ध हो जाता है कि, विष्णुकी मूर्तिमें भी उपासकके लिये सत्यपुरुषही विराजमान है । फिर उसके पूजकोंके लिये जड़ मूर्तिपूजक शब्दका व्यवहार करना उचित नहीं मालूम होता । विज्ञ पाठक उस भूमिकाको इस टिप्पणीसे सुधार करके पढ़ें ।

शरणगतके नियम

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नहीं हो सकता। वह वैष्णव वह दूध तथा संखिया सब कुछ पी गया और चङ्गन रहा। संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई। उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था। आप उस भोगसे अलग रहा। मीराकी भी तो यही बात थी। यह है मूर्तिपूजाका महत्त्व। फिर जो मूर्तियोंको कंकड़ पत्थर कहते हैं यह उनकी भूल है।

तीसरे महात्यागी तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े। जबतक देह का अभिमान न छूटे तबतक त्यागी नहीं। अभिमानही करके यह देह मिलता है और इसीसे स्थित हो रहा है। सहस्रों त्यागी हो गये परंतु देहका अभिमान न छोड़नेसे बन्धनमें रहे। बाहरसे तो उन्होंने सब छोड़ दिया पर भीतरसे न छोड़ सके न देहका अभिमान छूटा, देहका अभिमान छूटा तो तब जाने कि, किसी प्रकारकी आपत्ति तथा सहसाकी घटना संघटित हो तब स्थिरता न छूटे न किसी प्रकारकी घबड़ाहट हो। सुतरां ऋषि मुनिगण उजाड़ बनमें बसते हैं वहां उनको प्रत्येक प्रकारकी आपत्तियाँ आ घेरती हैं। शोर, सोंप, भेड़िये, रीछ और कानखजूर इत्यादि नानाप्रकारकी आपत्तियाँ दिखाई देती हैं। इस स्थानपर साधु अपने मनको बहुतही दृढ़ रखते हैं। कोई हिंसक जीव फाड़कर खाजावे तनिक भी नहीं समझते कि, यह मेरी देह है सब तपस्वियोंकी ऐसीही अवस्था होती है। जब भीतरी अथवा बाहरी अपने शरीरकी ओर ध्यान हुआ तब तो उनका कुछ भी त्याग नहीं। सुतरां सर्व त्यागियोंमें बड़े त्यागी शुक्देवजी थे जो कि, मायाके भयसे बारह वर्षतक माताके गर्भमें रहे थे, जब बाहर निकले तो उनको त्याग और वैराग रहा। उनका हाल बहुत प्रसिद्ध है जब राजा जनकके समीप गये तब उन्होंने एक कौतुक दिखाया कि, उनके समस्त नगरमें आग लगी सब कुंछ जलने लगा। राजा। जनक निभंय बैठे रहे और शुक्देवजी अपनी तूँबी लंगोटी लेने दौड़े। राजाने कहा कि बैठ किधर जाता है तू तो आपको बड़ा त्यागी समझता है अब लंगोटी और तूँबी लेने दौड़ा? मेरे राज्यका समस्त सामान जल रहा है मैं तनिक भी अधीर नहीं हुआ। तू कौनसा त्यागी है तुझे तो लंगोटी और तूँबीकी चिन्ता लगी हुई है। जिसकी तूँबी लंगोटीकी चिन्ता नहीं छूटी उसका देहका अभिमान कैसे छूट जायगा? अतः जबतक देहका अभिमान न छूटे, तबतक महात्यागी कैसे हुआ? यह सब प्रशंसा तथा गुण कबीर साहबहीके हैं दूसरेके नहीं हो सकते हैं। बनारस में कैसे कैसे कष्ट मिले परन्तु उनका तनिकभी ध्यान नहीं किया, न मनमें ही कुछ माना। महात्याग इसीका नाम है। सहस्रों साधु सन्तोंने अपनेको ईश्वरमें लीन कर दिया तो भी उनके मनमें देहका अभिमान और वासना रही ही, इस

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कारण उनका भगवान्में लीन होना भी काममें न आया । जो लोग सत्यगुरुको पहचानकर भगवत्में लीन होते हैं वे धन्य हैं, उन्हींका भगवत्में लीन होना सफल है ।

वेद तीन भागोंमें विभक्त हुआ—कर्म, उपसाना, ज्ञान । कर्मोंमें दो भाग हुये—एक तो यज्ञ इत्यादि जो सांसारिक अर्थोंके लिये करते हैं, दूसरा योग जो अपनी मुक्तिके लिये करते हैं । इन कर्मोंद्वारा सांसारिक तथा पारलौकिक अभिप्राय सिद्ध होते हैं । जिसके जैसे पाप पुण्य होते हैं वैसेही अवस्थामें वे जाते हैं वैसेही उनका भोग मिलता है ।

दूसरी उपासना है । सांसारिक लोग उपासना करते हैं और उपासनाके निमित्त विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, चण्डी, सूर्य और गणेश आदि देवता ठहराये गये हैं ।

तीसरा ज्ञान काण्ड है । उसमें जीव परमात्मा और सत्य पुरुषका विचार है, इसकी सात भूमिका हैं । ये समस्त कर्मकाण्डी उपासक और ज्ञानी अपनी अपनी सीमाको पहुँच जाते हैं ।

मीमांसक और जैन कर्महीसे मुक्ति समझते हैं परन्तु यह नहीं जानते कि, यह कर्म कहाँसे उत्पन्न हुआ कहाँतक पहुँच सकता है । यह विधि निषेद दोनों शाखा निरञ्जननिमित्त हैं । वहाँही तक पहुँचानेकी सामर्थ्य रखते हैं । इन कर्मों द्वारा स्वर्ग तथा नरक सब कुछ प्राप्त होता है । जहाँतक कर्मोंकी पहुँच है वहींतक कालपुरुष हस्तक्षेप करता है । कर्मोंका सुविशाल बन है उसमें यह जीव भूलकर अपने घरसे बाहर हो गया है । यह बन हिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ है, सूर्य चन्द्र सितारे इत्यादि तनिक भी दिखाई नहीं देते । न कोई सड़क और न पगडण्डी है, जो पगडण्डी कहीं है सो पशुओंकी है मनुष्योंकी नहीं हो सकती । इस कारण इन कर्मोंके बनसे कोई बाहर हो नहीं सकता । कर्म करता है फिर २ कर्म करनेके लिये देह धारण करता है । इसको कुछ पता नहीं लगता कि, वह कौन कर्म है जिससे मेरे कर्मोंका बन्धन कटे । वह कर्म जिससे इसका बन्धन कटे केवल स्वसंवेदकी शिक्षा ही है । उससे तो यह जीव अज्ञान है । इन्हीं लौकिक कर्मोंसे सारी योनि ठहराई गई हैं ।

जैनी जिनका कि समस्त ध्यान कर्मोंपर है वे आठ प्रकारके कर्म कहते हैं वे कबीर सागर नं. ९ जैन धर्म बोधसे लिखे जाते हैं : १—ज्ञानावर्णी कर्म । २—दर्शनावर्णी कर्म । ३—वेदनी कर्म । ४—मोहिनी कर्म । ५—नाम कर्म । ६—आयु कर्म । ७—गौत कर्म । ८—अन्तराय कर्म । अब इन आठों कर्मों