कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंन हो तो दुःख होगा । जब ज्ञान हुआ तो सर्व दुःख सुख भोगता है और समस्त सामर्थ्य रखता है ।
५ कौवल्य अहंकार—कौवल्य अहंकारवालेके देहमें यह ध्यान होता है कि, मैं अद्वैत ब्रह्म हूँ—मैं आत्मा अधिष्ठान हूँ यह जगत् जड़ तथा चैतन्य सब मेराही स्वरूप है । घड़ा और मिट्टी जल तथा लहर सुवर्ण और आभूषण सभी मैं ही हूँ । जब ऐसा भास हो तो प्रसन्न और न हो तो दुःखी हृदयके ये पाँच अहंकारोंमें नर तथा नाथ दोनों फँसे हैं । जो कोई इन पाँचों अहंकारोंसे पृथक् हुआ वो ही भवजालसे छूटा, इन पाँचों अहंकारोंमें ज्ञानी तथा ध्यानी सभी फँसे हुए हैं । इनसे बाहर निकलना असम्भव है । किसीने उन पाँचों अहंकारोंका भेद नहीं पाया । इस भवसागरमें तो यह पाँचों देह श्रेष्ठ हैं बाकी सभी निकुण्ट हैं ।
मनकी विषय वासना
अब मैं मनकी विषय वासनाके बारेमें लिखता हूँ जिसके कि, कारण सब मनुष्य कालपुरुषके जालमें फँसे हैं । इसकी पूजा कालपुरुषसे प्रगट हुई है । क्योंकि वह स्वयम् विषय वासनाको अच्छा समझता है । उसका निराकार शरीर पशुवत् वासना विशेष तृष्णासे मिला हुआ है । जितने विषयी हैं सब उसके दास हैं । जब चित्त वासनाओंकी ओर झुकता है तभी मन भी चञ्चल होता है उसी समय बाहरी भीतरी सब इंद्रियें चैतन्य हो जाती हैं, सूक्ष्मता दूर होके स्थूलता प्रगट हो जाती है । एकसे अनेक होता है । चौरासी लाख योनिके जीव उत्पन्न होते हैं । एक योनिसे दूसरीमें मारा मारा फिरता है । अधोकी तरह टटोलता फिरता है परन्तु कुछ भी हाथ नहीं आता । जैसे जल मथनेसे मक्खन नहीं निकलता, उसी प्रकार यह जीव जप तप तपस्या करके भी बिना ज्ञानके खाली ही रह जाता है । उसकी कहीं भी स्थिति नहीं होती । पाँचों देवताओंका शरीर वासनामय है इन्हींकी सन्तान समस्त संसार है । इस कारण यह समस्त संसार वासनाओंसे पूर्ण है । जो कोई वासनासे पृथक् होगा वही मनुष्यत्वको प्राप्त करेगा, वही मुक्तिका अधिकारी होगा । कितनेही ऋषि मुनियोंने कठिन तपस्या की पर जब उनपर काम क्रोधादिका प्रभाव हुआ तब वे पशुसे भी अधिक नीच हो गये । यहाँ तक कि, पशुओंकी योनिमें जाकर भी अशान्तही फिरते रहे ।
पारख गुरुके बिना समस्त धम्मोंके आचार्य काम क्रोधादिककी वासनामें फँस रहे हैं । जैसे कोई कुत्ता एक सूखा हाड़ अपने मुंहसे पकड़ लेता है । उसको