कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 716, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़े हर्षसे चबाता चाटता है वह हड़डी उसके मुंहमें घाव कर देती है उसके मुंहसे रक्त बहने लगता है। पर वह मूर्ख कुत्ता जानता है कि वह रक्त उस हड़डीसे निकल रहा है जिसे कि, वो बड़े स्वादसे चाट रहा है उसके मुंहमें हड़डी देखकर दूसरे कुत्ते दौड़ते लड़ते काटते तथा उसको छीन लेनेका उद्योग करते हुए मारते मरते हैं परन्तु उसको वह नहीं छोड़ता इसी प्रकार इस संसारके पदार्थ सूखी हड़डीके समान हैं। जो लोग इससे ग्रेम करते हैं तो सब संसारी कुत्ते हैं वे भी अपने शरीरके सारको नष्ट करते हुए अपनी आत्माके सुखको विषयका सुख समझ रहे हैं जो अप्सरा तथा गन्धर्वों तथा अमृत और कल्पवृक्ष आदिक स्वर्गीय पदार्थोंकी अभिलाषाये हैं। ये सब अत्यन्त तुच्छ एवं मायिक पदार्थोंकी ही हैं। मनुष्यका मन जबतक वासनाओंसे कलुषित है तब तक वह कालपुरुषका चेरा है। किन्तु इससे पृथक् होते ही अपने कर्तव्यको पूरा कर-लेता है।
गजल—आया जो तू बाजारमें फ़ैज आम कर फ़ैज आमकर।
सोदा करो मिल यारमें कुछ काम कर कुछ काम कर ॥
पकडा गया बेगार है तेरे सिरके ऊपर भार है।
तुझको बहुतसा कार है अज्जाम कर अज्जाम कर ॥
सरे आशकां बुरीदः है दिलवरको यह खुश ईदहै।
हरदीदनी नादीह है आराम कर आराम कर ॥
यह नफ़्त ऐन उन्नीस है आहनको मेकनातीस है।
बखुदा नहीं तकदीस है सम्सामकर सम्सामकर ॥
तेरे बरमें आजिज कोह रुवा सब खारो खस लिपटा गया।
अब छोडकर शर्मो हया सतनाम रर सतनाम रर ॥
यह वासनाही समस्त संसारका मुख्य कारण है। इससे मन उत्पन्न होता है, हृदयसे तीन लोक तथा चारों वेद बर्हिर्गत होते हैं। अब कुण्डलिनी शक्तिका भिन्न २ वर्णन किया जायगा। जो कि, वासनाओंके बीज जालकी मुख्य पोषिका है।
वासनाओंकी जननी
जिसका संक्षेपसे वृत्तांत में चक्र निरूपणमें कर चुका हूँ यही कुण्डलिनी वासनाओंकी जननी है, महामाया नाभी तले रहती है। यह समस्त संसारका कारण है इसीसे तीनों गुण हैं। उसके मुंहसे फुँफकारकी आवाज आया करती है। उसी सौपिनीकी फुँफकारसे सौहं शब्द बर्हिर्गत होता है। जिसके भीतर