भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना

पञ्चीसवाँ प्रकरण ।

सत्यलोकका वर्णन ।

सत्य पुरुषके लोकमें जब हंस पहुँचते हैं, तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है । इन हंसोंका आगमन फिर कभी नहीं होता, वहाँ वे सदा सत्यपुरुषकी स्तुति किया करते हैं । वे हंस सत्यपुरुषके रूप हो जाया करते हैं । सत्यलोकके अधीन अट्टासी सहस्र द्वीप हैं, सब द्वीपोंमें सत्यगुरुके हंस आनन्द करते हैं । द्वीप द्वीपोंमें हंस स्वतंत्र फिरा कहते हैं, उन्हें कहीं भी रोकटोक नहीं है ।

इस तयलोकके गुणोंका वर्णन किसी प्रकार भी किया नहीं जा सकता है । जो कोई उस लोकको जावे उसको कालपुरुषके भयसे सदाके लिये छूट जाता है, इस लोकमें स्त्री पुरुषका भेद नहीं और न वहाँ काम क्रोधादिकी झंझट है । सब हंस सत्यपुरुषके स्वरूप हैं । शारीरिक विकार यहाँ तनिक भी नहीं है, सब हंस समस्त बुराइयोंसे पवित्र होकर सत्यपुरुषके साथ सदैव आनन्दमें रहते हैं ।

छठ्ठीसवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन होना ।

कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस स्थानमें पहुँचे और सत्यपुरुषका दर्शन कराये । कबीर साहब और मुहम्मद साहब दोनोंने सत्यपुरुषको दंडवत् किया । मुहम्मद साहब सत्यपुरुषका दर्शन करके अत्यंत प्रसन्न और नम्र हुए । सत्यपुरुषकी दया तथा कृपा मुहम्मद साहबपर हुई तब मुहम्मद साहब कबीर साहबके अत्यंत अनुगृहीत तथा कृतज्ञ हुए । सत्यपुरुषकी ओरसे मुहम्मद साहबको कितनीही शिक्षा मिली, धर्म कर्मकी कुल आज्ञाएँ वहींसे प्रदान हुई । जब सब आज्ञाएँ मिल चुकीं, तब मुहम्मद साहबको कबीर साहबने पुनः मक्काममें पहुँचा दिया ।

सत्ताईसवाँ प्रकरण ।

पाँच कलमाका वर्णन ।

कबीर वचन ।

नबी मुहम्मद बन्दगी कीन्हा । दर्शन पायके भय लौलीना ॥
तहाँते फिर मृतलोक चलि आये । और निज नाम को पान भी पाये ॥
अब आपनो कौल फिर दीजे । पीछे पान जीवके लीजे ॥

साखी—शब्द भरोसे नामके, दिया नबीको पान ।

तब हम साँचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥

तुम आपनो फ़रमान चलाये । खुदको भेद तुम धरु छिपाये ॥
जो यह भेद तुम परगट करिहौ । तो तुम कौलके बाहर परिहौ ॥
चारो कलमः परगट भाखो । पँचवाँ कलमः गुप्त राखो ॥
पँचवाँ कलमः इल्म फ़कीरी । जाके पस्ने कुफ़ हो दूरी ॥
हम काशीको जात हैं भाई । उबलों अपनो कौल बजाई ॥
तुम पर दाय़ा समरथ केरी । पाँचों कलमः दिलमें फेरी ॥
साखी—हम काशीको जात हैं, तुम मक्के अस्थान ।
हम रामानंद गुरु करें, तुम देव जगत फ़रमान ॥
फ़रमान जग को दीजिये, उलटी अदल चलाय ।
तुम कलमः का हुक्मले, निभंय निसान बजाय ॥

मुहम्मद साहबको कबीर साहबने चार कलमः प्रगट करनेको कहा, और एक कलमः को गुप्त रखनेके लिये कहा । कुल पाँच कलमः मुहम्मद साहबको पढ़ाया जिसमेंसे एक छिपा रखनेके लिये कह दिया, चार कलमः मुसलमानोंको बतानेके लिये कहा । जब मुहम्मद साहब वह कलमः पढ़ा करते थे उस समय किसीको निकट आने नहीं देते थे, उस कलमका भेद मुहम्मद साहबके अतिरिक्त और कोई भी जानता नहीं था । कबीर साहबने मुहम्मद साहबको अपना पान दिया और मुहम्मद तथा मुहम्मदियोंको मुक्ति दिलानेकी आशा दिलाई । सो चार कलमः तो मुसलमानोंको मिले और पाँचवाँ कलमः स्वयम् मुहम्मद साहबके निमित्त था दूसरोंको उसका कुछ भी पता नहीं है ।

अट्टाईसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें कलमका वृत्तान्त ।

मशकात बाब क्रैयाम शहर रमजान फ़स्ल औबल ज़ेद बिन साबितकी खायत दोखारी और मुसल्लमसे यों लिखा है कि, हज़रत रसूल अल्लाहने मस्जिद में चटाईकी एक झोपड़ी बनाई थी, और इस झोपड़ीमें अकेले निमाज पढ़ा करते थे । जब लोगोंने यह दशा देखी तो वे लोग आने लगे । तब भी कई रात्रियोंके उपरान्त एक रात्रिको आए बाहर नहीं निकले तब लोग बाहर खड़े खड़े खँखारने लगे, कदाचित् हज़रत आवाज सुनकर बाहर निकल आवें और निमाज़ पढ़ें परन्तु हज़रत न आये बल्कि कह दिया कि, तुम्हारी रुचि सबैव निमाजपर रहे—पर मैं इस कारण निमाजके निमित्त बाहर नहीं आता कि, कहीं खुदा इस निमाजको भी तुम पर फर्ज न करदे । क्योंकि, यदि यह तुम्हारा फर्ज होगया तो तुम उसको पूर्ण

मधुकरकी कथा

न कर सकोगे । इस कारण ए मनुष्यों ! यही उत्तम है कि, इस निमाजको तुम लोग अपने २ घरोंमें पढ़ा करो । यह बात तालीम मुहम्मदीमें लिखी है जो चाहे सो देख ले । यह पुस्तक मौलवी अमाउद्दीन रचित है ।

अब जानना चाहिये कि, यह वही निमाज और कलमः है जिसके विषयमें कबीर साहबने मुहम्मद साहबको मना किया था कि, किसीपर प्रकट न करना । स्वयम् मुहम्मदसाहब भी इसको गुप्तरीति से पढ़ा करते थे । इस कलमेकी खबर किसी मुसलमानको तनिक भी नहीं है ।

इस तेजोमय पुरुषको, जिसने मुहम्मद साहब को सत्पुरुषका दर्शन करवाया और पाँच कलमा पढ़ाकर पुनः मक्केमें पहुँचाया, जो पहचानेगा सो मुक्ति पावेगा । सो मनुष्य उस सत्यगुरुको पहचानता है उसमें फिर किसी प्रकारकी बुराई नहीं रह जाती है । वह कदापि किसी प्रकार किसी जीवको दुःख नहीं पहुँचाता और न किसी प्रकार किसीको कष्ट पहुँचने देता है, वह सबपर दयालु होता है ।

उनतीसवाँ प्रकरण ।

नवा बर प्रगट होकर इबराहीम अधम सुलतानको शिक्षा देने और शिष्य करनेका वृत्तान्त ।

इब्राहीम अधम बादशाह बलखको बोध करनेका वर्णन सुलतान बोध नामक ग्रन्थमें है जो बोधसागरमें श्रीवैकटेश्वर प्रेसमें छप चुका है । यहाँ पर स्वामी परमानन्द ने उसका विस्तारसे वर्णन नहीं दिया है, इसका कारण यह है कि, आगे इसी ग्रन्थके दूसरे भागमें इनका वृत्तान्त विस्तारसे लिखा है । यद्यपि कितने संत महात्माओंका कहना है कि, यहाँपर भी ग्रन्थोंका प्रमाण देना चाहिये किन्तु, जब आगे विस्तारसे कथा आती है तब यहाँ विशेष लिखकर ग्रन्थ बढ़ाना उचित न समझ कर, इतनी सूचना देनाही अलम है । पाठक दूसरे भागमें देख लेवें । वहाँ विस्तारसे कथा है । यों तो बल बोधकी रमैनी, निर्भय ज्ञान आदि ग्रन्थोंमें भी बहुत रोचक और उपदेशप्रद रीतिसे सुलतान इब्राहीमकी कथा लिखी हुई है ।

तीसवाँ प्रकरण ।

दशवीं बेर कबीर साहबका काफिरिया देशमें प्रगट होना और उस देशके काफिरोंको समझाने तथा शिक्षा देनेका वृत्तान्त ।

द्रापरयुगकी कथा

(काफिर बोध दूसरा अभीतक नहीं मिला जो मिला सो यहाँ दे देते हैं।)

काफिर बोध

कौन सो काफिर कौन मुर्दार । दोऊ शब्दका करो विचार ॥
गुस्सा काफिर मनी मुर्दार । दोऊ शब्दका यही विचार ॥
हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ धूँठे सरवर के तीर ॥
चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ।
नंगे पायन पृथ्वी फिरें । हाट न लूटै वाट न परें ॥
हमतो किसीका कछु न विगारें । दर्दमन्द दिल दया सवारें ॥
दुनिया लोक सो उल्टी करें । सत्यनाम सदा उच्चरे ॥
सिकका देखि न कहिये फकीर । फकीर, न कूटे पुरानी लकीर ॥
काफिर सो कुफराना करे । अल्लाह खुदा सो नाहीं डरे ॥
करें न बन्दगी फिरे दिवाना । गरब वाँधि फिरे गैवाना ॥
बोल कुबोल सेवा बिसरावैं । खून खराफात न द्वार बहावैं ॥
दिलमें चोर कमरमें कत्ती । लोगनके घर भाजे रत्ती ॥
अलहके नामें बाँटे खाना । सो कहिये साँचे मुसलमाना ॥
मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥
खड़ी ना छेडे पड़ी न खाय । सो मुसलमान बिहिश्त को जाय ॥
कलमा पढैं न आवैं बिहिस्त । हिरदे रहे बापकी दिष्टि ॥
हिन्दू मुसलमान खुदाक बन्दे । हमतो योगी न राखे छन्दे ॥
देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम अधार ॥
टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दावैं हाथ न बढै ॥
तहाँ न अग्नि पवनका डर । ऐसा अलखपुरुष जिन्दपीर का घर ।
चूरा पथ्थर बनाया दादा आदमकी करनी । हमतो रहें अलेख
पुरुष, जिन्दा पीरकी शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत

छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलना करे विचार । मक्खी किया बटा अहँकार ॥

मक्खी तो गाये भखे, तो सूअर भखे मक्खी तो हला भखे, मक्खी
तो मुर्दार भखे ॥ मक्खी जाय विगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह
परवाना । कोरा कलमा बहुतेरा बोलै । खैर मिहरका खीस न खौले ॥
मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस-
बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहि
चाना । दर्दमन्द दुरवेश बखाना ॥ रहमत है सुरशिद पीरको ॥ जहमत

रानी इन्द्रमतीकी कथा अनुरागसागरका प्रमाण

सूम महसूदको ॥ निश्चय परिचे निमाज गुजारै । श्रवण नेत्रको वैर
निहारौ ॥ मुहम्मद मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढै ॥ किधर
किधरकी राह बतावे । विनु गुरु पीर राह ना पावे ॥

साखी—हाजी गाजी गुरु चेला, खोजो दस दरकाजा ।

अलख पुरुष कहूँ माथ नवाओ, इस विधि सरै निमाज ॥

सभै साचे काजी, साँचे साँचे मुलना वेद कुरान ॥

कहै कबीर आबसो सब आलम उपजाना ॥

हिन्दू कहिये कि, कहियै मुसलमाना । राम रहीम बसे एक थाना ॥
मनको जाने सोई मुल्ला जान । दरको जाने सोई दरवेश बखान ॥
हमतो बाबा नेकी बदी सो न्यार । दुनिया मति कोइ लावे दोष हमार ॥
हम तो कहि हैं अकेलेदस्त । ताका साहेब मक्का वस्त ॥
मक्कवन्तका साहेब अकिल मन्द । अकिल मन्द अकिल सो जाना ॥
मनमुरीद दोस्ती दाना ॥ सहर गदाई कौन पार । सिर खुरदती कौन
यार ॥ बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशायी कौन यार ॥ काया
यार सिर खुर्दनी । दिल यार माहीं मर्दनी ॥ जीव यार बन्दी खाने ॥
मन यार निशस्त बादशाही ॥ मन लाल दिल लाल लाल पोतदार ।
रहममाही हम साहसाह पोतदार ॥

इति कबीर साहबका वचन उचार विचार ।

अथ खान मुहम्मद अली बादशाहका प्रबोध ।

कलिक कीमोक लिप्त रसमेकी चशमें । खदयर संयम करदम ।

ओजूद राह चकित करदम ।

औबल—अक्ले पीर है मन मुरीद है । तन शहीद है असल कदाई है ॥
तकबुर दुश्मन है । गुस्सा हराम है । नफस शौतान है । चोरी लानती है । जुवारी
पलीदी है । अदब आदिल है । बे अदब कम असल है । राह पीर है । बैराह
बेपीर है । सांच बिहिश्त है । झूठ दोजख हैं । मोमदिल पाक है । संग दिल
नापाक है । हिर्स है । हैवान है । बेहिर्स वली है ।

लाइलाह हरकत है । अचेतबेगुलाम है । असलजाबेको सलाम है ।
कृतहीन जर्दरू है । दाना जौहरी है । असलकी दोस्ती है दाना शायर है । बूझे
महबूब है । बन्दगी कबूल हैं । अल्लाह नूर है । आलम हद्द है । साहिब बेहद्द
है । यकीन मुसलमान है । शील रोजा है । शर्म सुन्नत है । ईमान मुसलमान

है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है । बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है । नासबूरी मक्कारी है । दरोग दन्द है ॥

इति समझौता ।

अथबन्द ।

प्रथम बोलिये मूल बन्ध दुजे बोलिये बोलिये कमर बन्ध । तीजे बोलिये लंगोट बन्ध पाँचवे बोलिये दानिश बन्ध ॥ छठै बोलिये शस्त्र बन्ध । सातवाँ बोलिये सहस बन्ध ॥ आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म विरले पाया ॥ मक्के हिंस मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौवल वीर मुसलमान कहाया । मुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दूके छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं मुसलमान ॥ दादा आदमने गाया । बडे बडे पीरनको फरमाया । खुदाने अली बादशाहको चिताया । हिम्मतें बन्दा मददे खुदा । दुआ फकीरा रहम अल्लाह । कदम दवैशाँ रद्द बलाय दादा आदम मामा हौ आ । मक्क मदीनेमें चढा तवा, पहिली रोटी फकीरको खा ॥ ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा हौवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजीने कह्यो ॥ कहै कबीर वीरको जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण बानी ।

इति श्रीकाफिरबोध ।

फिरिस्तोंका ब्यान ।

१ ओवल फिरिस्ता वसर (दृष्टि) है । जैसे खुदाकी सूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बसरकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने यह फिरिस्ता सब ीवधारीके संग लगा दिया है जो हर एकको बतलाता है कि, देखकर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिस्ता समग्र (श्रवणेंद्रिय) है उसक द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह (बुरा) मरगूब (भला) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

३ तीसरा फिरिस्ता शाम (घ्राणेंद्रिय) है । यह फिरिस्ता सुगन्धि दुर्गन्धि को बतलाता है ।

४ चौथा फिरिस्ता लमस (स्पशेंद्रिय) है जो बतलाता है कठिन और कोमल को ।

५ पाँचवा फिरिस्ता जायका (रसेन्द्रिय) है जो छः प्रकारके रसोंका ज्ञान बतलाता है ।

६ छठा फिरिस्ता हाथ है जो हाथसे करने योग्य कामोंको सिखाता है ।

७ सातवों फिरिश्ता पोंब है जो चलने फिरनेको बतलाता है ।
८ आठवों फिरिश्ता जबान (जिह्वा) है जो भला और बुरा वचन बोलनेको सिखाता है ।
९ नवों फिरिश्ता आलातनासुल (जननेन्द्रिय) है जो मूत्र त्याग करने और संसारकी वृद्धि करनेका मार्ग बतलाता है ।
१० दशवों फिरिश्ता मेकअद (गुदेन्द्रिय) है जो शरीरके मलोंको बाहर निकालता है ।
११ ग्यारहवों फिरिश्ता दिल (मन) है जो इच्छा उत्पन्न करता है और राग द्वेष करता है । दिल वह नहीं है जिसको राक्षस मांसाहारी लोग कबाब बनाकर खाते हैं ।
१२ बारहवों फिरिश्ता इदराक (चित्त) है जो सर्व पदार्थोंका चिंतन करता है ।
१३ तेरहवों फिरिश्ता अहंकार है जो जीवनकी रक्षा करता है ।
१४ चौदहवों फिरिश्ता अकल (बुद्धि) है जिसे जिबराईल कहते हैं । जो सबके भेदको जानता है और सबको उपयुक्त मार्ग बतलाता है ॥
१५ पन्द्रहवों फिरिश्ता शहवत (काम-रजोगुण) है जिसको ब्रह्मा कहते हैं ।
१६ सोलहों तमीज (विवेक-सत्तोगुण) है जो सत्य असत्यका विचार बतलाता है इसीको विष्णु कहते हैं ।
१७ सत्तरहवों फिरिश्ता गजब (अहंकार-तमोगुण) हैं जो दुखदाई पदार्थोंसे रक्षा करता है इसीको शिव कहते हैं ।

इसी प्रकार पांच तत्त्व और सर्व प्रकृतियाँ आदि संसारके सर्व वस्तु फिरिश्ते हैं और जिस प्रकार शरीरका राजा जीव है, उसी प्रकार सब, जड़ चैतन्यका स्वामी निजस्वरूप साहिब है जिसके शरणमें जानेसे अटल सुख प्राप्त होता है ।

इति काफिरबोध ।

इकतीसवों प्रकरण ।

ग्वारहवों बेर कबीर साहबका प्रगट होना और शंकराचार्य संन्यासीको बोध देने और समझानेका वृत्तान्त ।

स्वामी शंकराचार्य और कबीर साहबकी गोष्ठी कबीर भानुप्रकाशमें विस्तारसे दिया है, वहांसे देखना चाहिये और इस कबीरमन्शूरके दूसरे भागके पहले अध्याय में भी देखो ।

बत्तीसवाँ प्रकरण ।

बारहवीं बेर रामानुज स्वामी वैष्णवको उपदेश करनेका वृत्तान्त ।

तेतीसवाँ प्रकरण ।

तेरहवीं बेर शेख मनशूर आदिको बोध करनेका वृत्तान्त ।

२९ से ३३ तकके चारों प्रकरणोंका पूरा खुलासा इसी कबीर मनशूरके दूसरे भागमें मिलेगा । इसके आगे ।

कबीर साहबका काशीमें चौदहवीं बेर प्रागट्य की उत्थानिका ।

सत्यपुरुषके तेज तथा ज्योतिका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशीके लहर तालावमें ठहरना, पृथ्वी तथा आकाशका प्रकाशमय होजाना, समस्त तालावमें प्रकाश तथा जगमगाहटका फैल जाना । अष्टानन्दजीका इस आश्चर्यमयप्रकाशको देखकर आश्चर्यान्वित होना और इस घटनाका समाचार रामानन्द स्वामीको देना । उस प्रकाशका बालकके रूपमें होकर कमलके पुष्पों पर ठहरना । नीरू जोलाहेका अपनी स्त्रीका गवन लिये हुए उस तालाबके समीपसे होकर जाना । जोलाहिनका बालकको तालाबमें देखना और उसको लेकर अपने घरमें ले जाना । कबीर साहब का नीरू जोलाहेके घरमें रहना और भाँति २ के कौतुक दिखलाना । फिर रामानन्द स्वामीका शिष्य होना और समस्त सिद्धोंके साथ शास्त्रार्थ करके सबको वादविवादमें परास्त कर, वैष्णव धर्मकी रक्षा करना । शाह सिकन्दरलोदी का काशीजीमें आना । शेखतक्री बादशाहके पीर, का ब्राह्मणों तथा मुल्लाओं की साटसे कबीर साहबको बावन कसनी देना और कितनेही कौतुक कबीर साहब द्वारा प्रगट होकर कबीर साहबका निष्कलंकित रहना, उन्हें किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचना । कबीर साहबका स्वसम्बेदकी आज्ञाएँ प्रगट करना फिर आपका अन्तिमलीला करनेको मगहर जाना और हिन्दू मुसलमान दोनों जातियोंका कबीर साहबकी लाशको न पाना । वहाँ से आपका विलोपित हो जाना और शवकी जगह केवल चादर और कमलोंका फूल मिलना । हिन्दू मुसलमानोंका केवल चादर तथा कमलोंके फूलोंकी समाधि और कबर बनाना । और हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकताका वृत्तान्त । फिर अपना बाँधो गढ़में प्रगट होकर धर्मदास द्वारा सत्यपथ चलाना ।

सत्य पुरुषकी आज्ञा ।

सत्यपुरुषने जानी से कहा कि, ऐ जानीजी ! कालपुरुषने सब जीवोंको

फँसाकर मार लिया, समस्त मनुष्य भटक-२ कर कालकी फौसीमें पड़ गये । कोई जीव मेरे लोकमें नहीं आता है । मैंने सुकृत (धर्मदास) को सत्यपथके प्रचलित करनेके लिये भेजा था सो उसे भी काल निरंजनने लोक वेदके जालमें फँसा लिया और धर्मदास सत्य पुरुषकी भक्ति को छोड़कर कालपुरुषकी भक्ति और मूर्ति पूजामें लग गया । इस कारण आप पृथ्वीपर जाओ और सुकृतजीको अचेत निद्रासे उठाकर मुक्तिपथ प्रगट करो । बयालीस वंश स्थापित करके पृथ्वीपर थाना जमाओ । तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषकी आज्ञा पा और दंडवत प्रणाम करके सत्य-लोकसे बिदा हुए ।

चौतीसवाँ प्रकरण ।

सत्यपुरुषके तेजका लहर तालाब में उतरना ।

सत्यपुरुषके तेज और प्रतापका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशी नगरीके लहर तालाबमें ठहरना और फिर उस तेजका मनुष्यके बालक सदृश होकर तालाबके कमलपर स्थित होना ।

सम्बत् चौदहसौ पचपन विक्रमी, ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवारके दिन सत्यपुरुषका तेज काशीके लहर तालाबमें उतरा । उस समय पृथ्वी और आकाश तक प्रकाशित हो गया । उसी समय अष्टानन्दजी वैष्णव उस तालाबपर बैठे थे और वृष्टि होरही थी, बादल आकाशमें घिरे रहनेके कारण अंधकार छाया हुआ था, बिजली चमक रही थी । जिस समय वह नूर उस तालाबमें उतरा, उस समय तालाब जगमग जगमग करने लगा, फिर वह प्रकाश उस तालाबमें ठहर गया । प्रत्येक दिशाएँ जगमगाहटसे परिपूर्ण हो गयीं । इस आश्चर्यमय प्रकाशको देखकर अष्टानन्दजी आश्चर्य चकित हो गये । उस समय उस लहर तालाबमें महाज्योति फँल रही थी. मयूर, चकोर आदि पक्षी बोल रहे थे । चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, पनडुब्बियाँ फिर रही थीं, कमल तथा नीलकमलके पुष्प लहलहा रहे थे, भँवरे गूँज रहे थे । ऐसे समय वह तेज आकर उस तालाबमें स्थिर हुआ । अष्टानन्दजीने जो उस तेजको देखा तो जानकर उसका समस्त विवरण रामानन्द स्वामीसे कहा मुझको अत्यंत आश्चर्य हुआ, उस ज्योतिको आकाशसे उतरते और लहर तालाबमें ठहरते देखा । जब वह प्रकाश उस तालाबमें उतरा तब समस्त तालाब ज्योतिर्मय हो गया । यह बात सुनकर स्वामी रामानन्दजीने अष्टानन्दजीने कहा कि, वह प्रकाश जो तुमने देखा था उसका फल शीघ्रही तुम्हारे देखने तथा सुननेमें आवेगा, उसकी धूम मच जावेगी ।

फिर वह तेज मनुष्यके बालकके आकारमें होकर उस जलके ऊपर कमलोंके

पुष्पोंपर बालकोंके सद्गुण हाथ पोंच फँकने लगा । वह बालक अलौकिक शोभा लिये अत्यंत सुंदर दिखलायी देता था । पश्चात् तो जैसा कि, रामानन्द स्वामीने अष्टानन्दजीसे कहा था इसकी धूम समस्त संसारमें मचगयी ।

पैंतीसवाँ प्रकरण ।

नीमा और नीरू ।

मैं इसके पहले पूर्व लिख आया हूँ कि, श्वपच सुदर्शनके जो माता-पिता थे वे दोनों डोमका शरीर छोड़कर ब्राह्मण ब्राह्मणी हुए थे, और चन्दवारे नगरमें रहते थे । उनके पूर्व प्रेमसे कबीर साहब उनके घर गये और उनको मुक्तिमार्ग बतलाने लगे परन्तु, उन्होंने ध्यान नहीं दिया । तब सत्यगुरु उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये । इसके उपरान्त वे दोनों ब्राह्मण ब्राह्मणी परलोकगामी होकर काशीमें जुलाहा जुलाही हुए, उनका नाम नीरू और नीमा पड़ा । सुदर्शनजीके माता-पिता जो तीसरे जन्ममें जोलाहा जोलाही हुए थे । इसको मुक्ति प्रदान करनेके निमित्त जैसे पहले कई बार उनके घर गये थे उसी प्रकार इस बार भी उनको चेतानेके लिये उनके घर जानेका विचार किया । इसलिये का ठीके लहर तात्ताबमें प्रगट हुए ।

श्वपचसुदर्शनके माता पिताके तीन जन्मका वृत्तान्त ।

अनुराग सागरसे

कबीर बचन धर्मवास प्रति ।

संत सुदरसन द्वापर भयऊ । तासु कथा तोहि प्रथम सुनयऊ ॥
तेहि लै गयो देस निज जबहीं । बिन्ती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
कहे सुपच सतगुरु सुनि लीजे । हमरे मातु पिता गति दीजे ॥
बन्दीछोर करो प्रभु जाई । जमके देस बहुत दुख पाई ॥
मैं बहु भौति पिता समझावा । मातु पिता परतीत न आवा ॥
बालक बद नहि मान सिखावा । भगति करत नहि मोहि डरावा ॥
भगति तुम्हार करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन मम आगे ॥
अधिक हरष तिनहि चित होई । ताते विनती करूँ प्रभु सोई ॥
आनहु तिनहि सत सब्द दिढाई । बन्दीछोर जीव मुकताई ॥
बिन्ती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर बचन मानि हम लीन्हा ॥
ताकर विनय वहुरि जग आवा । कलिजुग नाम कबीर कहावा ॥
हम इंक बचन निरंजन हारा । वाचा बँध उदधि पगु धारा ॥
और दीप हंसन उपदेसा । जम्मू दीप पुनि कीन परवैसा ॥

संत सुदरसनके पितु माता । लछमी नरहर नाम सुहाता ॥
सुपच देह छोडि तिन भाई । मनुषहि जनम धरे तिन आई ॥

श्वपच सुदर्शनके माता पिताका पहला जन्म ।

संत सुदरसनके परतापा । मानुष जनम विप्रके छापा ॥
दोनो जनम ठाम दोय लीना । पुनि विधि मिलै तिनहि कहैं दीना ॥
कुलपत नाम विप्र कर कहिया । नारि नाम महैसरि रहिया ॥
बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि असनान सूरज व्रत धारी ॥
अंचल लै विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कहैं दौरी ॥
ततछन हम अंचलपर आवा । हम कहैं देखि नार हरषावा ॥
बाल रूप धरि भेटो वोही । विप्र नारि ग्रह ले गइ मोही ॥
कहै नारि किरपा प्रभु कीना । सूर व्रत कर फल यह दीना ॥
बहुत दिवस लग तहौं रहाये । नारि पुरुष मिलि सेवा लाये ॥
रहे दरिद्र ते दुखी अपारा । हम मन महैं अस कीन विचारा ॥
प्रथमहिं दरिद्रता इन कर हारों । पुनि भगति मुक्ति कर बचन उचारों ॥
जब हम पलना झटक झकोरे । मिलत सुवरन ताहि इक तोरे ॥
नित प्रति सोन मिले इक तोला । तातै भये वह सुखी अमोला ॥
पुनि हम सत सब्द गोहरावा । बहुत प्रकारते उर्नहि समझावा ॥
तिन हिरदय नहिं सब्द समाया । बालक जानि परतीत न आया ॥
ताही देह चीन्हसि नहिं मोही । भयो गुप्त तहैं तन तजि ओही ॥

श्वपच सुदर्शनके माता पिताका दूसरा जन्म

नारि द्विज दोउ तन त्यागा । दरस परभाव मनुज तन जागा ॥
पुनि दोनो भये अंस मिलाऊ । रहहिं नगर चंदवारे नाऊ ॥
ऊदा नाम नारि कहैं भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ ॥
पुरुषोत्तम ते हम चलि आये । तब चंदवारा जाइ परगटाये ॥
बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीनेउ ताल मांहि बिसरामा ॥
कमल पत्र पर आसन लाये । आठ पहर हम तहौं रहाये ॥
पाछे ऊदा असनामहिं आयी । सुन्दर बालक देखि लुभायी ॥
दरस दियो तिहिं सिसु तन धारी । ले गयि बालक निज घर नारी ॥
ले बालक गिरह अपने आयी । चंदन साहु अस कहा सुनायी ॥
कहु प्यारी बालक कहैं पायी । कौनी विधि ते इहवों लायी ॥
कह ऊदा जल माहीं पावा । सुन्दर देखि मोरे मन भावा ॥

कह चंदन तै मूरख नारी । बेगि जाहु दै बालक डारी ॥
जाति कुटुम हरिहैं सब लोगा । हंसत लोगं उठि है तन सोगा ॥
ऊदा तरस पुरुष कर माना । चन्दन साहु जबै रिसियाना ॥
बालक चेरिहि दीन उठायी । ले बालक जल देहु खसायी ॥
चल चेरी बालक कहैं लीना । जल महुँ डारन ताहि चित दीना ॥
चलि भइ मोहि पंवैरन जबहीं । अन्तरधान भये हम तवही ॥
भयो गुपुत तेहि करसे भाई । रुदन करै दोनो विलखाई ॥
विकल होय बन ढूँढत डोले । मुगध ज्ञान कछु मुख नहिं बोले ॥
यहिविधि बहुत दिवस चलिगयऊ । तजि तन जनम बहुरि तिन पयऊ ॥

श्वपचसुदर्शनके माता पिताका तीसरा जन्म

मानुष तन जुलहा कुल दीना । होउ संजोग बहुरि विधि कीना ॥
कासी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलाहा होई ॥
नीमा नाम नारि कर भाई । नारि पुरुष हो मिल पुनि आई ॥

इति श्वपचसुदर्शनके मातापिताके तीन जन्मकी वार्ता

छत्तीसवाँ प्रकरण ।

नीमा और नीरूका बालक पाना

इसका विवरण इस प्रकार है कि, नीरू जोलाहा काशी नगरीमें रहता था । एक दिवस वह अपना मुकलावा (गवना) लेनेको गया और अपनी स्त्री सहित चला आता था । देवात् वह लहर तालाबके समीपसे होकर निकला । उसकी स्त्री नेमा प्यासी हुई और जल पीनेके निमित्त उस तालाबपर गयी । जब जल पी चुकी तब दृष्टि उठाकर उस तालाबको देखने लगी । देखा तो एक बड़ाही सुंदर बालक कमलके फूलोंपर हाथ पौंव फेंक रहा है । उस बालकको देखकर वह जोलाही तालाबके भीतर घुस गयी, और उस बच्चेको अपनी गोदमें उठा लिया । तालाबसे बाहर निकलकर नीरूके पास गयी । प्रमाण आदि मंगल—

दोहा—“नीरू नाम जुलाहा, गमन लिये घर जाय ।

तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥

तब जोलाहेने पूछा, कि, यह किसका लड़का ले आयी है ? तब नीमाने उत्तर दिया कि, मैंने तालाबमें पाया है नीरूने कहा, यह लड़का जहांसे तू ले आयी है वहांही रख आ । नहीं मालूम यह किसका लड़का है ? तब उस स्त्रीने उत्तर दिया कि, ऐसा सुन्दर बालक तो मैं कदापि नहीं फेकूंगी । नीरूने कहा कि, लोग

मुझको हँसेगे और ठठुएँ उड़ावेंगे कि, गौनेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेआया है इस कारण तू इस बालकको फँकआ ।

“नीरू देख रिसावई, बालक दे तू डार ।

सब कुटुम्ब हँसी करे, हसि मारे परिवार ॥

इस बातको जब नीमाने नहीं माना; तब वह जोलाहा अपनी स्त्रीको मारने पीटने पर तत्पर हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । तब नीमा खड़ी २ अपने चित्तमें चिन्ता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, हे नीमा ! मैं तुम्हारे पूर्व जन्मके प्रेमके कारण तुम्हारे घर आया हूँ । तुम मुझको मत फँको और अपने घर ले चलो । यदि तुम मुझको अपना गुरु करके मेरा कहना मानोगे तो मैं तुम्हे आवागमनके झंझटसे छुड़ाकर मुक्त कर दूंगा और तुम्हारा समस्त दुःख संताप हर लूंगा । तुमको वह शब्द बतलाऊँगा कि, जिससे तुम कभी कालके फन्देमें नहीं पड़ोगे ।

“तब साहब हुँकारिया, ले चल अपने धाम ।

मुक्ति सन्देश सुनाइहौं, मैं आया यहि काम ॥

पूरब जनम तुम ब्राह्मण, सुरति बिसारी मौहि ।

पिछली प्रीतिके कारने, दरसन दीनो तोहि ॥”

जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी और अपने पतिसे नहीं डरी । तब नीरूभी फिर कुछ नहीं बोला ।

“कर गहि बेगि उठाइया, लीन्हो कंठ लगाय ।

नारि पुरुष दोउ हरषिया, रंक महा धन पाय ॥

वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर गये ।

सैतीसवाँ प्रकरण ।

बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना ।

काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेता आया है, तो लोग ठठटा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है और बालकका कुल विवरण कह सुनाया ।

फिर नीरू ब्राह्मणको बुलाकर पूछने लगा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? ब्राह्मण तो पत्रा लिये विचारही रहा था इतनेमें बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है । दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता

मत करो । यह बात सुनकर सब लोग अत्यंत चकित हुए कि, यह बालक तो स्वयम् ही अपना नाम बतलाता है, यह कैसा बालक है यह किसी सिद्धका अवतार है अथवा स्वयम् परमात्मा है या कोई देवता है । काशीमें इस बातकी चर्चा घर-घर होने लगी कि, नीरुके घरमें एक बच्चा आया है सो बातें करता है ।

साखी—“कासी उमगी गूल भया, मोमिनका घर घेर ।

कोई कहे ब्रह्मा विष्णु है, कोइ कहे इन्द्र कुबेर ॥

को कह वरुण धर्मराय है, कोइ कोइ कह ईस ।

सोलह कला सुमान गति, कोइ कहे जगदीस ॥

कोइ कहे बल ईश्वर नहीं, कोइ किन्नर कहलाय ।

कोइ कहे गन ईसका, ज्यों ज्यों मातु रिसाय ॥

कासीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द ।

ऐसे दुल्लह ऊतरे, ज्यों कन्या अर्बिन्द ॥

खलक झलक देखन गया, राजा परजा रीत ।

जम्बु दीप जहानमें, उतरे शब्दातीत ॥

दुनी कहै यह देव है, देव कहे यह ईस ।

ईस कहै परब्रह्म है, पूरन विस्वा वीस ॥

(गोसाई गरीबदासजीके पारख अंगकी साखी)

अङ्गीसवों प्रकरण ।

काजीका नाम धरने आना और कबीर नामका निश्चय होना ।

फिर नीरुने काजीको बुलाया और पूछा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? तब काजी कुरान और अन्यान्य किताबें खोलकर बालकका नाम देखने लगा, तब कुरानके अनुसार उस बालकके चार नाम निकले— १ कबीर, २—अकबर, ३ किबरा ४ किबरिया । जब ये चार नाम निकले तब काजी चुप हो अपने दांतोंके नीचे उंगली दबाने लगा । बार बार वह कुरान खोलकर देखता तो समस्त कुरान उसको उन्हीं नामोंसे भरा दिखलाई देता था । काजीके मनमें अत्यंत संदेह उत्पन्न हुआ कि, ये चारो नाम तो खुदाके हैं । काजी गंभीर चिन्तामें बुड़कियाँ लगाने लगा कि, क्या करें ! हमारे धर्मकी प्रतिष्ठा गई, इस बातपर गरीबदासजीकी साखी सुनो :—

“काजी गये कुरानले, धर लडकेका नावैं ।

अच्छर अच्छरमें फुरा, पन कबीर पहि जावैं ॥

सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।
कासीके काजी कहैं, नई दीन की टेक ॥”

जब काशीके सब काजियोंको यह समाचार मिला तो वे इस समाचार-को सुनकर बड़े ही चिन्तित हुए । वे परस्पर कहने लगे कि, अत्यंत आश्चर्यका विषय है, यह कैसा अद्भुत व्यापार है ? समस्त कुरानमें कबीर ही कबीर दिखाई देता है, अब कौनसा उपाय करना चाहिये कि, ऐसे दरिद्री जोलाहेके पुत्रका इतना बड़ा नाम न रखवा जावे । यह बात अच्छी नहीं है, फिर फिर कुरान खोलकर देखते तो यही चारों नाम निकलते, इन चारों नामोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं निकलता ।

उनचालीसवाँ प्रकरण ।

काजियोंका नीरूको कबीरको कत्ल करनेकी सलाह देना ।

तब काशीके काजियोंने आपसमें सम्मति करके नीरू से कहा कि, ऐ नीरू ! तू इस बालकको अपने घरके भीतर लेजाकर मार डाल नहीं तो तू काफिर हो जायगा तब वह जोलाहा कबीर साहबको अपने घरके भीतर लेगया और मार डालनेके लिये उनके गले पर छुरी मारना आरम्भ किया वह छुरी गलेमें एक ओरसे दूसरी ओर पार निकल गयी, न कोई जखम हुआ और न रक्तका एक बूंदही निकला, न गर्दन पर कोई चिन्हही हुआ । ऐसा जान पडा मानो हवामें छुरी चली ।

तब कबीर साहब बोले कि, ऐ नीरू ! मेरा कोई माता पिता नहीं है । न मैं जन्मता हूँ, न मरता हूँ न मुझको कोई मार सकता है, न मैं किसीको मारता हूँ, न मेरा शरीर है । यह शरीर जो दिखलाई देता है, वह तुम्हारी भावना मात्र शब्दरूपी है । न मेरे मांस चर्म हड़डी और रक्त है, मैं स्वयम् परमात्मा हूँ । यह बात सुनकर जोलाहा और जोलाहिन अत्यंत भयभीत हुए और समस्त काशीमें हुल्लड मच गया कि, नीरूके गृहपर जो बालक है वह वार्तालाप करता है ।

अन्तमें विवश होकर कबीरही नाम ठहराया गया और किसीका कुछ वश न चला कि, उसको बदल सके और सबको भय उत्पन्न हुआ देखो गरीब-दासजीकी वाणीमें ।

चालीसवाँ प्रकरण ।

बालक कबीरका दूध पीना ।

बिना भोजनादि किये ही कबीर साहबका शरीर बड़ा होता जाता था और दिन प्रति आपका तेज तथा प्रताप बढ़ता जाता था । प्रमाण गरीबदासजी—

“दूध पिवे न अन्न भखे, नहिं पलन झूलंत ।

अधर अमान ध्यानमें, कमल कला फूलंत ॥”

जब जोलाहा जोलाहीने देखा कि, बालकको तो कुछ भोजन करने की आवश्यकता नहीं है और प्रति दिवस उसका सौन्दर्य उन्नतिपर है तब वे अपने मनमें अत्यंत चिंतित होकर कहने लगे कि ऐ कबीरजी ! आप कुछ भोजन करो यदि आप अन्न न खाओगे तो हम भी नहीं खायेंगे, यों दोनों कंदन करने लगे । तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि ऐ नीरू ! गायकी एक कोरी बछिया और कुम्हारके घरसे एक कोरा बरतन लेआ । कबीर साहब की अज्ञानुसार नीरू गया और कोरी बछिया दूँढ़कर और कुम्हार के गृहसे एक बरतन ले आया । तब कबीर साहबने उस जोलाहेसे कहा कि, इस बछियाको मेरे सामने बाँध दो और उसके स्तनोंके नीचे बरतन रखदो । जोलाहेने वँसाही किया तब बालक कबीर साहबने उस बछियाकी ओर देखा तो उसके स्तनोंमें से दूध निकलने लगा और बरतन भर गया । वह दूध लेकर नीरूने कबीर साहबके सामने रख दिया तिसको आपने पीलिया । उसी प्रकार नीरू प्रतिदिवस किया करता था ।

निर्भयज्ञानमें इसी बालको इस प्रकार लिखा है कि, जब बालक कबीर कुछ खाते पीते नहीं थे, तब नीमा नीरूको बड़ा दुःख हुआ, सबसे वह पूछते फिरते कि, भाई ! हमारे घर जो अजीब बालक आया है, कुछ खाता पिता नहीं है, यद्यपि इससे उसके शरीरमें कुछ कमी नहीं दीखती बल्कि शरीर तो दिन दूना रात चौगुना तेजोभय और पुष्टही होता जाता है, तथापि हम लोगोंका मन नहीं मानता, कोई कुछ उपाय बतलावे तो हमें संतोष हो । यद्यपि नीमा नीरूकी बातोंको सुनकर प्रत्येक अपनी अपनी बुद्धि अनुसार कुछ न कुछ बतलाता और वे अनेक प्रयोग करते भी किन्तु जब बहुत उपाय करके थके तब निराश हो बहुत दुःखी हुए । अंतमें किसीने उन्हें सलाह दी कि, स्वामी रामानन्दजी वर्तमान कालमें बड़े सिद्ध और महात्मा त्रिकालदर्शी हैं, तुम उनके पास

जाकर पूछो तो वह कुछ उपाय बतला सकते हैं । इस बात पर नीमा नीरू स्वामी रामानन्दके आश्रमपर गये, किन्तु, वहाँ तो हिंदुओंमें से भी कितनी जातियोंका प्रवेश नहीं हो सकता था । क्योंकि, स्वामी रामानन्दजी शूद्रोंका मुहँ तक नहीं देखते थे । फिर मुसलमान वह भी मुसलमानोंमें भी सबसे नीच जाति जुलाहेकी गुजर वहाँ तक कैसे होसकती थी किन्तु “जिन ढूँढा तिन पाइयों” के अनुसार नीमा नीरूकी सच्ची लगनने, किसी प्रकार उनकी प्रार्थना स्वामी रामानन्दजी तक पहुँचा दी, तब स्वामीजीने ध्यान धरके बतलाया कि, एक कोरी (कुमारी) बछिया लाकर बालककी दृष्टि सन्मुख खड़ी कर दो, उसके थनसे दूध निकलेगा उसीको बालकको पिलाओ वह पी लेगा । नीमा नीरूने वैसाही किया और उस दिनसे सिद्ध बालक कबीर दूध पीने लगा ।

इकचालीसवाँ प्रकरण ।

बाल लीला ।

जब आप कुछ बड़े हुए तब छोटे छोटे लड़कोंके साथ खेलने लगे, उस समय आप उन लड़कोंसे ब्रह्मज्ञानकी बातें किया करते थे । वे बेसमझ क्या समझें । तब आप साधुओंके साथ बातें करने लगे । जब साधु लोग आपका ज्ञान सुनते तब अत्यंत आश्चर्यान्वित होते कि, यह छोटा बालक इस प्रकारकी बातें कैसे करता है ? इन बातोंकी सुध तो बड़े बड़े साधुओंको भी नहीं है, इसने चौथे पदकी बातें कहाँसे सीखीं ! साधुओंको विदित हो गया कि, यह बालक नहीं बरन् कोई सिद्ध है, लड़केके वेषमें प्रगट हुआ है ।

कबीर साहबके उस बालपनके अनेक कौतुकोंका विवरण ग्रंथोंमें लिखा है—उस समय जलनके रोगका काशीमें प्रकोप था । एक बूढ़ा स्त्री आयी और आप धूल मिट्टी खेल रहे थे । कबीर साहबसे बोली कि, मैं जलन रोगसे व्यथित हूँ, यदि तेरी इच्छा हो तो मैं आरोग्य लाभ करूँ । तब कबीर साहबने उस स्त्रीपर थोड़ीसी धूल डालदी और वह आरोग्य हो गयी और सुखी होकर प्रसन्न होती चली गयी । इस प्रकारकी अनन्त कथाएँ आपके बाल लीलाकी प्रसिद्ध हैं ।

बृहत् कबीर कसौटीसे बाललीला ।

जब कबीर साहब कुछ बड़े हुए और छोटे २ लड़कोंके साथ खेलने लगे तब आप उन लड़कोंसे ब्रह्मज्ञानकी बातें करते, किन्तु वे संस्कार हीन बच्चे उन बातोंको तो समझते नहीं । परन्तु उधरसे चलनेवाले साधु संत अथवा कोई

विद्वान् पण्डित उनकी बातोंको सुनकर आश्चर्य करता । कोई २ नीमा नीरूसे जाकर कहता—

कोइ (कोइ) जाइ नीरूसो कहई । सुत तुम्हार बड बादी अहई ॥

सिद्ध साधु सम ज्ञान बखाने । ऐसी अगाध मति कैसे वह जाने ॥

तब— नीरू नीमा दोउ मिलि, बिनवें ताहि बहूत ।

सब गुनाह मोहिं बखसौ, जोरे बिगारा पूत ॥

उनकी अधीनता देखकर लोग उन्हें कहते—

सभै कहें कछु गुनह न कीन्हा । ज्ञान न गोष्ठि उन पूछै लीन्हां ॥

सुत तुम्हार होइहै बड़भागी । होइहै भक्त नाम अनुरागी ॥

यहि कहि जाहिं भवन निज सोई । नीरू महा हरष चित होई ॥

नीरूके घर मांस आनेकी बातको जानकर कबीर साहबका

अन्तर्धान होजाना ।

इस प्रकारसे कुछ दिन बीतनेपर एक दिन नीरूके घर, कोई मिहमान आया और वह मिहमान दूसरे मुसलमानोंका बहकाया हुआ नीरूसे मांस खिलानेका हठ करने लगा । यद्यपि नीरूने उसे बहुत समझाया तथापि उसमें पैठा हुआ भूत नहीं निकला । अन्तमें जातिपातिके डरसे नीरूको मांस लानेके लिये भजबूर होना पड़ा । सत्य है—

जाति पाति हुर्मंतके गाहक । तिनको डर उर पैठयो नाहक ॥

जब सन्ध्याको सब लड़के अपने २ घर आये किन्तु, कबीर साहब नहीं आये, तब नीमाने अडोस पडोसके लड़कोंसे पूछना प्रारम्भ किया । जब उन लोगोंसे कुछ पता न पाया तब दोनों स्त्री पुरुष बहुत बिकल हुए । रातभर उन लोगोंने अन्न पानी तो ग्रहण कियाही नहीं, बल्कि उनको निद्रा भी न आयी । भोर होतेही नीरू उठकर खोजनेको निकला । तमाम नगर छान डाला, किन्तु कबीर साहब उसे कहीं भी नहीं मिले । तब वह पागलके समान जाने अनजाने हरएक आदमियोंसे पूछने और जिधर तिधर भटकने लगा । अन्तमें सन्ध्याको “कबीर साहबको लिये बिना घर लौटकर जानेसे नीमा कबीर साहबको न पाकर प्राण त्याग देगी ।” यही विचारकर नीरू गंगाजीमें डूबनेके लिये गया जैसे वह गहरे पानीमें जाकर गोता खाने लगा वैसेही उसे मालूम हुआ कि, किसीने उसका हाथ पकड़कर बाहर किया हैं । उसने जब आंख खोलके देखा तो कबीर साहब उसके सामने खड़े हैं वह प्रेम और आनन्दसे एकदम कबीर साहबको पकड़ने चला; किन्तु कबीर साहब उससे दूर हो गये और कहने लगे—

३ अ० कलियुगका वृत्तान्त

खबरदार ! मेरे शरीरको हाथ मत लगाना । तुम लोग महाभ्रष्ट हो । कबीर साहबके कहनेका भाव न समझकर नीरू वात्सल्यभावसे बालकको फिर यह कहता हुआ पकड़नेको चला—

कहु प्यारे काल्ह कहैं रहेऊ । हम खोजत थकित होइ गयेऊ ॥

तब कबीर साहबने कहा—

कहहिं कबीर हम उहाँ न जाहीं । तुम अभच्छ आनेहु घरमाहीं ॥

अब नीरूको चेत हुआ, तब उसने कहा—

कहे नीरू कर जोरि अधीना । अब तो चूक सही हम कीना ॥

अबकी चूक बकसिये मोहीं । हाथ जोरिकै विनवैं तोहीं ॥

इस प्रकार कहकर नीरू रोने और नकरगडी करने लगा, तब कबीर साहबने उससे कहा—

ऐसे हमं नहिं जैबे भाई । घर आंगन सब लीपौ जाई ॥

बर्तन अशुच दूर सब करिहौ । करि अस्नान वस्तर तन फेरिहौ ॥

ऐसी करिहौ जाइ तुम, तौ पइहो वहि ठाँउ ।

नाहीं तो घरको को कहै, तजि जाऊं यह गौँउ ॥

इतना सुनकर नीरू मनमें बहुत डरा और उसी क्षण घरपर जाकर कबीर साहबकी आज्ञानुसार, सफाई करके इन्तजार करने लगा, तब कबीर साहब प्रकट हुए और नीमा तथा नीरूसे बोले—

नीरू सुनहु श्रवण दै, फेर जो ऐसी होइ ॥

तब कछु मेरो दोष नहीं, जैहो जन्म बिगोइ ॥

दोनों स्त्रीपुरुषने हाथ जोकर कहा—हे प्यारे ! अब कभी ऐसी भूल न होगी । आप हमको मत त्यागो । (बृहत्कबीर कसौटी)

बयालीसवाँ प्रकरण ।

सुव्रत ।

कुछ दिवसोंके उपरान्त समस्त जोलाहे एकत्रित होकर कहने लगे कि, ऐ नीरू ! हमारे रसूल अल्लाहकी आज्ञाके अनुसार अब तुम अपने पुत्रका खतनः (मुसलमानी) कराओ । इसी अभिप्रायसे समस्त जोलाहे एकत्रित हुए और काजीको बुलाया और नाई उस्तरा लेकर कबीर साहबके सामने गया । जब नाई उस्तरा लेकर आपके निकट गया तब, आपने पाँच लिङ्ग उसको दिखलाये

कलियुगमें शानीजीका पृथ्वीपर सत्य कबीर, सैयद अहमद कबीर व शेख कबीर, जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे पृथ्वीपर प्रगट होकर मनुष्योंके उद्धार करनेका वृत्तान्त, उत्थानिकां श्वपंचको सुदर्शन चेताना कलियुगका प्रमाण

और नाईसे कहा कि, इन पाँचोंमेंसे जिसको चाहे तू काट ले । यह व्यवस्था देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया और आपका खुतनः नहीं हुआ ।

तेतालीसवाँ प्रकरण ।

कुरबानी ।

एकबार आप छोटे छोटे बच्चोंके साथ खेल रहे थे, उस समय काजीने गायकी कुरबानीका प्रबंध किया—जिस समय गऊको जबह करने लगे । उस समय कबीर साहबने, जो बालकोंके साथ खेल रहे थे जान लिया कि, काछी गौके जबह करनेको तय्यार हैं—तब आप तुरन्त बालकोंके साथका खेलना छोड़कर गौकी ओर दौड़े । जब तक, आप गायके समीप पहुँचे तबतक तो काजीने गऊको समाप्त कर दिया । कबीर उसाहब आकर उस काजीको अनेक उपदेश देके अत्यन्त धिक्कारा और लज्जित किया तब यह काजी लजाकर अपने अपराधके निमित्त क्षमाका प्रार्थी हुआ । फिर आपने उस गऊको जीवित कर दिया और आप अन्तर्धान होगये । प्रमाण बृहंतकबीरकसौटी—

कबीर साहबकी सुन्नतका । (बृ. क. कसौटी)

एक तो नीरूके घर सिद्ध बालकको देखकर उसकी प्रसिद्धीसे लोग जलते थे । दूसरेही मांसाहारी मुसलमानोंके विरुद्ध नीरूने सदाके लिये मत्स्य-मांसको अपने घरमें न लानेकी प्रतिज्ञा करली थी । इससे मूर्ख मुसलमानोंने उसे अपने धर्मसे भ्रष्ट होते समझकर उसे सुधारनेकी फिक्र करना आरम्भ किया—

काशीके जोहलन मिली, आनि कियो परपंच ।

सबै कहैं नीरू तुम, क्या बैठे निश्चिन्त ? ॥

बेटेकी तुम सुन्नति कराओ । पंचोंका तुम हाथ धुलाओ ॥

काछी मुलनाको बुलवाओ । गैनी^१^ और शराब मँगाओ ॥

इस प्रकारकी उनकी बात सुनकर नीरूने कानपर हाथ रखकर कहा—

नीरू कहै सुन्नति करवाओं । पै नहिं गैनी गला कटाओं ॥

तब उसके जाति विरादरीबालोंने उससे क्रोध करके कहा—

जोलहा सब तब कहैं रिसाई । क्या नीरू तुम अकिल गवाईं ॥

अपने कुलकी रीति न छाड़ो । कुल परिवार करिहैं सब भांडो ॥