कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुष्पोंपर बालकोंके सद्गुण हाथ पोंच फँकने लगा । वह बालक अलौकिक शोभा लिये अत्यंत सुंदर दिखलायी देता था । पश्चात् तो जैसा कि, रामानन्द स्वामीने अष्टानन्दजीसे कहा था इसकी धूम समस्त संसारमें मचगयी ।
पैंतीसवाँ प्रकरण ।
नीमा और नीरू ।
मैं इसके पहले पूर्व लिख आया हूँ कि, श्वपच सुदर्शनके जो माता-पिता थे वे दोनों डोमका शरीर छोड़कर ब्राह्मण ब्राह्मणी हुए थे, और चन्दवारे नगरमें रहते थे । उनके पूर्व प्रेमसे कबीर साहब उनके घर गये और उनको मुक्तिमार्ग बतलाने लगे परन्तु, उन्होंने ध्यान नहीं दिया । तब सत्यगुरु उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये । इसके उपरान्त वे दोनों ब्राह्मण ब्राह्मणी परलोकगामी होकर काशीमें जुलाहा जुलाही हुए, उनका नाम नीरू और नीमा पड़ा । सुदर्शनजीके माता-पिता जो तीसरे जन्ममें जोलाहा जोलाही हुए थे । इसको मुक्ति प्रदान करनेके निमित्त जैसे पहले कई बार उनके घर गये थे उसी प्रकार इस बार भी उनको चेतानेके लिये उनके घर जानेका विचार किया । इसलिये का ठीके लहर तात्ताबमें प्रगट हुए ।
श्वपचसुदर्शनके माता पिताके तीन जन्मका वृत्तान्त ।
अनुराग सागरसे
कबीर बचन धर्मवास प्रति ।
संत सुदरसन द्वापर भयऊ । तासु कथा तोहि प्रथम सुनयऊ ॥
तेहि लै गयो देस निज जबहीं । बिन्ती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
कहे सुपच सतगुरु सुनि लीजे । हमरे मातु पिता गति दीजे ॥
बन्दीछोर करो प्रभु जाई । जमके देस बहुत दुख पाई ॥
मैं बहु भौति पिता समझावा । मातु पिता परतीत न आवा ॥
बालक बद नहि मान सिखावा । भगति करत नहि मोहि डरावा ॥
भगति तुम्हार करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन मम आगे ॥
अधिक हरष तिनहि चित होई । ताते विनती करूँ प्रभु सोई ॥
आनहु तिनहि सत सब्द दिढाई । बन्दीछोर जीव मुकताई ॥
बिन्ती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर बचन मानि हम लीन्हा ॥
ताकर विनय वहुरि जग आवा । कलिजुग नाम कबीर कहावा ॥
हम इंक बचन निरंजन हारा । वाचा बँध उदधि पगु धारा ॥
और दीप हंसन उपदेसा । जम्मू दीप पुनि कीन परवैसा ॥