भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बलिका निषेध

निकालना चाहा, पर उस लिङ्गका अन्त उनको नहीं मिला। तब विवश होकर उसको उन्होंने छोड़ दिया और हिन्दू उसको पूजते हैं।

नानकशाह महाशयकी जन्मसाखीमें लिखा है कि, जब आप भवकेमें गए तब मरदानाने पूछा कि, गुरुजी ! इस भवकेके भीतर क्या है ? तब नानकसाहबने उत्तर दिया कि, तुम जाकर देखो। तब मरदानाने कहा कि, मुझको यहाँके झाड़ू देनेवाले भीतर जाने न देंगे। तब नानकसाहबने कहा कि, तू जा, तू सबको देखेगा पर तुझको कोई न देखेगा। मरदाना भीतर जाकर देख आया। फिर नानकसाहबने पूछा, क्या देखा ? तब मरदानेने कहा कि, वहाँ देखनेको क्या है ? भवानके भीतर एक नग्न मूर्तिमात्र पड़ी है, दूसर, कुछ नहीं। तब नानकशाहने कहा कि, वह शिवजीकी मूर्ति है। मुहम्मदसाहब और अलीने समस्त मूर्तियोंको तोड़ा तथा पृथक् किया, पर उस मूर्तिको हटा नहीं सके। मुहम्मद साहबके पीछे खूबवार हुसेनी नामक एक बादशाह हुवा। उसने उस मूर्तिको अलग करना चाहा। तब उसके सारे शरीर तथा उसके समस्त सैन्यमें आग लग गई। सब मरने लगे तब उस बादशाहने अपने दोषके निमित्त क्षमा-प्रार्थना की। इस कार्यसे हाथ रोका। तब उसको और उसकी फौजको सुख मिला।

भवतवर पीपा कबीर साहिबके गुरु भाई थे। आपका बाहा विश्वास था जो कि कबीर साहिबका है। आप भी उसी तत्त्वके उसी पथसे उपासक थे जिसकी तत्त्वसे तथा जिस पथसे कबीर साहिब थे। पीपाके विश्वासकाही प्रभाव था कि सच्ची द्वारिकामें पहुँच गया कबीर साहिबके राम मंत्रके विश्वासकी करामात थी कि सिद्ध पदवी पाई। यद्यपि असत्में सत्का विश्वास उतना लाभदायक नहीं होता जितना कि सद्दस्तुका होता है संवादी भ्रम तो साक्षात् कल्याणकारी दीखताही है। पर झूठे विश्वासमें सुख नहीं है भक्तोंके श्रद्धा विश्वास निराले हुआ करते हैं उनकी दीवानगी अनन्य भक्तिको लिये हुए होती है। जो कुछ वो चाहते हैं सत्य पुरुषको वही बनना पड़ता है। इसका रहस्य साधारण व्यक्ति नहीं समझ सकते। इसे वे ही समझ सकते हैं जिनके दिलमें कुछ प्रकाश हो।

जीवकी हालत ।

पहिलेमें कुछ और था पर जब मेरी यथार्थ अवस्था बदल गई और मैं दूसरी अवस्थामें आया तब मैं भ्रमका पुतला हो गया और मैं सहस्रों प्रकारके धर्म कर्म स्थिर करने लगा। एक धर्मको मैं सच्चा ठहराता हूँ तथा दूसरेको झूठा समझता हूँ अनगिनती धर्म मैंने स्थिर किए और कर रहा हूँ और भविष्यमें

करूँगा। सो सब मेरे भ्रमकी अवस्थामें ठहराए गये हैं। एक स्थिर करता हूँ तथा दूसरे को काटता हूँ न मेरी बुद्धि ठिकाने है और न मेरे विश्वास स्थिर हैं। मैं अपने पागलपनमें सब कुछ कर रहा हूँ। इसी पालगपनेकी अवस्थाको मैं अपनी बुद्धि अवस्था मानी तथा दूरदर्शिता समझता हूँ। यद्यपि यह सब बातें मैं अपने अज्ञानावस्थामें करता हूँ। जबसे मैं भ्रममें पड़ा तबसे मैंने अपने निमित्त दो मकान बनाएँ। इन्हीं दोनों मकानोंमें रहा करता हूँ। एकका नाम पिण्ड तथा दूसरेका नाम ब्रह्माण्ड है। ये दोनों पागलखाने हैं मैंने अपने मकानमें नौ महल बनाए वे ये हैं—दानमयीकोश शब्दमयी कोश बाणमयीकोश आनन्दमयी-कोश मनुमयीकोश प्रकाशमयीकोश ज्ञानमयीकोश आकाशमयीकोश प्रज्ञानमयीकोश।

इस नौ महला मकानमें मैं रहने लगा। जब जिस महलमें जाकर बैठता हूँ तब मेरा ढङ्ग वैसाही हो जाता है। सब बल धन इत्यादि उसीके अनुसार प्राप्त होता है। मेरी स्थिति सदैव इसी नौमहला मकानमें रहती है। बाहर जानेका बल नहीं। कभी मैं नदी कभी बूंद बन जाता हूँ। नदी बूंद दोनोंमें एकही कौतुक है। मैं अपने असलको भूल गया। मैंने अपने गलेमें मालाको पहनकर इधर उधर ढूँढ़ता फिरता हूँ। मैं अपने कानपर लेखनी रखकर भूल गया ढूँढ़ता फिरता हूँ। जब किसीने कहा कि, कलम तो तुम्हारे कानपर है तब मैंने अपनी कलम पायी। मैं जान बूझकर भटकता रहा, दूसरेके बतलानेका ओहताज हो गया। इस प्रकार मैं अपनी पूर्वावस्थामें पृथक् होकर दूसरोंके बतानेका ओहताज हो गया। पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों हमारे बनाए हैं पर मैं भूल गया। नहीं जानता कि, किसने बनाया। आपको और तथा बनानेवालेको और जानता हूँ। मैंही दास तथा मैंही परमेश्वर बन बैठा, असली परमेश्वरको मैं नहीं जानता, नहीं पहचान सकता, असल परमेश्वर मेरे कहने सुननेसे परे हैं। उसको न पहचाननेसे मैं पागल बन रहा हूँ। मेरे जप तप पूजा वंदना आदिक सब भ्रम हैं, इनके, द्वारा जो कुछ प्राप्त होता है वह सब अस्थायी तथा जल परकी लकीरके समान है। कबीर साहबका वचन है कि, ये सब मनुष्योंके कर्म हैं सो सब भ्रम हैं यही बात देवी भागवतके नवें स्कन्ध और १९ अध्यायमें देखा—महामायाका वचन है कि, सात करोड़ महामंत्र जो हैं सो सब मेरे नाम हैं। अतः जो वेद शास्त्र हैं और जो कहने सुननेमें आता है सो सब माया है जो कुछ माया है, सो सब भ्रम और धोखा है। मायाको माया खाजाती है। जो मायासे पृथक् है वो ही बचा है। दूसरे सब नष्ट हो जावेंगे मैं जब सर्जन कर्ता बन बैठता हूँ तब जानता हूँ कि,

यह सब सृष्टि मेरी है । जब मैं स्वयं सृष्टि बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह रचयिता मेरा है । इसी प्रकार जब बादशाह बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह सब प्रजा मेरी हैं । जब मैं धनहीन तथा दरिद्र हो जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह मेरा सच्चाट है और मैं इसकी प्रजा हूँ । मैं ही तो बादशाह हूँ मैं ही प्रजा हूँ । न बादशाह कुछ है न प्रजा कुछ है । केवल एक जीव है, उसका कुछ नाम रखलो । न यह मनुष्य है, मनुष्यका जन्माया हुआ है । पशु पक्षी जड़ चैतन्य सभी कुछ यह है पर सबसे पृथक् यह है । मैं नहीं जानता कि, पहले मैं क्या था । अब मैं क्या हूँ । मैं पाँच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्रियोंसे पृथक् हूँ । तथा संयुक्त भी हूँ । मैं अब भ्रमरूप हूँ । मैं पहले एक भ्रम था फिर अनेक हो गया । मैं ढोल बजाता हुआ जाता हूँ एक दूसरा भ्रम व्याहकर लाता हूँ । एक भ्रम दूसरे भ्रमके साथ मिलावट करते हैं तब दूसरा तीसरा फिर चौथा भ्रमरूप लड़का लड़की उत्पन्न होते हैं फिर उनके प्रेममें फँसकर मर जाता हूँ । जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब अनगिनती भ्रम एकसे अनेक हो जाते हैं । जैसे बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है वो समस्त बनको भस्म कर देती है इसी प्रकार जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब उसके समस्त सुकार्य तथा भले कामोंको भस्म करके राखमें मिला देते हैं । यह अज्ञानवश कहता है कि मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी पुत्री मैं अपने बाल बच्चोंके निमित्त कमाई करूँ । कमाकर उनका पालन करूँ । यह मूर्ख इतना नहीं सोचता कि, जिसने मुँह पेट बनाया है वही पालन भी करेगा मैं बाल बच्चोंके सोचमें जोमरता हूँ सो मेरा क्या किया होता है । जिसने मुँह और पेट बनाया उसीने आटा दाल नमक आदिक सब कुछ बनाया । जीवन-भर कमाईके ध्यानमें फँसकर खराब होता है । अपने परमेश्वरकी वंदनाकी ओर तनिकभी ध्यान नहीं देता है न सोच तथा विचारही करता है कि, मैं किस-कारण मनुष्य कहलाता हूँ । मनुष्यता क्या है । यदि मैं मनुष्य हूँ तो मुझको अवश्यही मनुष्यताकी ढुंढाई करनी चाहिये ? जब मैं मनुष्यता पर अधिकृत होता हूँ तब मेरा समस्त कार्य पूरा होगा । जबलों केवल मेरी सूरत मनुष्योंकी है कार्य पशुओंका है बुद्धि पशुओंकी है, तबलों मैं कदापि मनुष्य नहीं हूँ । इस कारण मुझको अवश्यही उद्योग करना चाहिए, । जिसमें मनुष्यताकी बातोंको प्राप्त करूँ । जबतक मुझमें मनुष्यता न हो तबतक मैं कदापि मनुष्य नहीं समझा जा सकता हूँ ।

चार-पशु

क. ११ पृ. ११७—नरपशु गुरुपशु, वेद पशु, तिरयापशु संसार ।

कहैं कबीर सो पशु नहीं, जाके विमल विचार ॥

कबीर साहब कहते हैं कि, इस संसारमें चार पशु हैं। ये पूरे तथा पक्के पशु भीतरी आँखोंसे अंधे हैं। यद्यपि वे बाहरी आँखोंसे देखते हैं तथापि अंधोंके समान समझे जाते हैं। ये चारो पशु, मूर्खता तथा नासमझीके खूंटोंके साथ बंधे पड़े रहते हैं।

नरपशु ।

नरपशु, पशुरूपी वह मनुष्य है जो बिनाजाँचे किसीके कहनेसे विश्वास करके उसका पीछा करे। जैसे किसीने कहा कि, कौवा तेरा कान लिये जाता है तो वे नहीं टटोले पर कौवेके पीछे दौड़े। यह नरपशु अपने मनमें नहीं सोचता कि, मैं उसके कहनेका विश्वास क्यों करूँ मेरे कान तो मेरी देहमें है। पर वह कहता है कि, अमुक मनुष्य जो कहता है उसकी बात मिथ्या कैसे ठहर सकती है? इसी प्रकार यह एक उदाहरण है :—

दृष्टान्त ।

एक राजा था उसके पास एक बड़ा श्रेष्ठ बुद्धिमान मंत्री था। वो राजा तो मूर्ख तथा नरपशु था। उसके मंत्रीका नाम मूच्छु था। इस मंत्रीसे समस्त दरबारी महान् शत्रुता रखते थे। सब चाहते थे कि, मूच्छु किसी प्रकार हट जावे तो हम राजाको भलीभाँति लूटें। पर मूच्छु बड़ा चैतन्य रहता था। बड़ी नमकहलालीके साथ काम किया करता था। राज्यमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित नहीं होने देता था। एक बार इस राजाको चढ़ाईकी आवश्यकता हुई।

वैरी राजाका दुर्ग बड़ा दृढ़ था कि, उसका टूटना दुष्कर था तब समस्त अन्यान्य कर्मचारियोंने सलाह की कि, इस अवसरपर मूच्छुको भेजना उचित है। जिसमें यह जब वहाँ जावेगा तो निश्चय मारा जावेगा। सबोंने मिलकर राजासे कहा कि, ऐ महाराजा ! आप इस युद्धमें मूच्छु मंत्रीको भेजो तो वह दुर्ग हस्तगत होगा। राजाने कहा मान लिया मूच्छुको भेजा, वह गया। लड़ भिड़कर उस दुर्गको करकवलितकर लिया। समस्त वैरी अधीन हो गए। तब मूच्छुके वैरियोंने आपसमें परामर्श किया कि, अब तो मूच्छु विजयी हुआ। इस राजाके सामने उसकी बड़ी मान मर्यादा होगी। हम लोगोंका निरादर होगा। इस कारण अब कुछ धोखा करना चाहिए। तब इन सबोंने आकर कहा कि, महाराजा ! मूच्छु तो मारा गया। हम लोगोंने दुर्गको विजय कर लिया। मूच्छु भूत हो गया। इस राजाको विश्वास हो गया उसने मूच्छुके स्थान दूसरा मंत्री रख लिया। जब मूच्छुने सुना कि राजाने दूसरा मंत्री रख लिया, तब उसको संसारसे बड़ी घृणा होगई। भगवद्भजनमें लग गया। मूच्छुके वैरियोंने राजाको

सिखला रक्खा था कि, अब मूच्छु भूत बनकर फिरा करता है । यदि वह आपके समीप आवे तो उसको कदापि आने न देना एकदं उसको देखकर भागना । कारण यह कि, जो कोई उसके समीप जाता है उससे वह चिपट जाता है । यह बात राजाके मनमें भली प्रकार बैठ गई । एक दिवस राजा आखेट करनेके निमिख बनको गये । मूच्छु एक पेड़के नीचे बैठकर भगवद्भजनमें लीन था । जब राजा बनमें गया तब मूच्छु मंत्रीको बूझके नीचे देख जान लिया कि, यह वही मेरा मंत्री है जो प्रेत हुआ है । ऐसा न हो कि, यह भूत मुझसे चिपट जावे । राजा तुरंतही अपना घोड़ा दौड़ाकर भाग गया । उस नरपशुको तनिक भी सुध नहीं हुई कि, इस चकमेको तो जान जाय ।

दूसरा दृष्टान्त ।

एक राजाने अपने नौकरोंको घाटपर भेजा कि, धोबीसे वस्त्र धोनेको सहेजदें । भूत्य जब घाटपर धोबीके पास गया तो देखा कि, धोबी सूढर सूढर कर रो रहा है । इस धोबीको रोता देखकर राजाके भूत्यने पूछा कि, तू क्यों रोता है ? उसने उत्तर दिया कि, सूढर मर गया । यह बात सुनकर राजाका भूत्य भी सूढर सूढर कहकर रोता हुआ राजाके पास लौट गया । राजाने पूछा तू क्यों रोता है ? उसने उत्तर दिया कि, सूढर मर गए । उसे रोता देखकर राजा भी सूढर सूढरकर रोने लगा । राजाके रोते हुए, राजाके महलकी समस्त रानियाँ और समस्त नगर सूढर सूढर कहकर रोने और पछाड़ खाने लगे । कुछ कालोंके पीछे राजाका मंत्री आया । राजाको रोते तथा समस्त नगरको शोकाकुल देखकर उसने पूछा कि, ए महाराज ! आपके विलापका क्या कारण है और समस्त नगरमें ऐसा शोक क्यों फैला हुआ है ? तब राजाने कहा कि, सूढर मर गए । तब मंत्रीने पूछा कि, सूढर कौन था ? तब राजाने कहा कि, मैं तो नहीं जानता । अपने भूत्यको रोता देखकर मैं भी क्रंदन करने लगा था । मंत्रीने उस भूत्यको बुलाकर पूछा कि, सूढर कौन था जिसके निमित्त तू रोता था । भूत्यने उत्तर दिया कि, मैं कुछ नहीं जानता पर धोबी सूढर सूढर करके रोता था । उसको देखकर मैं भी रोने लगा तब मंत्रीने उस धोबीको बुलाया और पूछा कि, तू बतला कि, सूढर कौन था जिसके निमित्त तू रोता था ? तब धोबीने उत्तर दिया कि, मेरे पास एक गदहेका बच्चा था उसका नाम मैंने सूढर रख दिया था उसको मैं बहुत चाहता था वह आज घाटपर मर गया उसके दुःखसे मैं रो रहा हूँ ।

गुरुपशु ।

गुरुपशु वह है कि, जो बिना ज्ञांचे शिष्य किया करता है । जो शिष्य

समझदार होता है पहले भलीभाँति समझबूझ लेता है तब गुरु करता है। चार बातोंकी जाँच करलेना चाहिए। अर्थात् गुरु, शास्त्र, आचार्य, ईश्वर, ये चारों बातें जब भली भाँति जानी, जाय तब गुरु करना उचित है। प्रथम गुरु, सर्वतोभावसे योग्य हो। द्वितीय शास्त्र निर्दोष तथा निष्कलङ्की हो। तीसरे धर्मका अग्रगण्य सब प्रकारसे योग्य तथा निर्दोष हो। चौथे यह जानना चाहिये कि, वह गुरु किस ईश्वरकी भक्तिमें लगाता है। जिस ईश्वर अथवा देवताकी प्रार्थना बतलाता है वह देवता कैसे गुण तथा क्या बल रखता है ? हमें वह छुटकारा देसकता है वा नहीं ? यदि वह सर्वतोभावसे योग्य तथा सामर्थ्यवान् है तो उसका पूजन उचित है क्योंकि मनुष्य अंधे गुरुसे मुक्ति नहीं पा सकता है।

साखी - कबीर - जाको गुरु है अंधरा, चेला खरा निरंध ।

अंध अंधको ठेलिया, परे कालके फंद ॥

चौपाई - गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोई जिन तत्त्व विचारा ॥

प्रथम गुरु हैं पिता व माता । रज वीरजके सोई दाता ॥

दूसर गुरु है मनकी दाई । ग्रीहवासकी वंद छोड़ाई ॥

तीसर गुरु जो धरियानामा । लै लै नाम पुकारै गाभा ॥

चौथे गुरु जिन दीक्षा दीना । जगव्यवहार रहत सब चीना ॥

पँचवें गुरु जन वैष्णव कीना । रामनामको सुमिरन दीना ॥

छठवें गुरु जिन भ्रमगढ़ तोड़ा । दुविधा मेट एकसे जोड़ा ॥

सातवा गुरु सत शब्द लिखाया । जहाँका ततले तहां समाया ॥

साखी - कबीर - सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार ।

सतगुरु सोई जानिए, भवजल उतारे पार ॥

कबीर कान-फूँका गुरु, हृदका बेहृदका गुरु और ।

बेहृदका गुरु जब मिले, तो लहे ठिकाना ठौर ॥

अर्थ-कबीर साहिब कहते हैं कि, जिसका गुरु अन्धा है उसका चेला उससे भी अधिक आंधरा होगा, अन्धागुरु चेलाको अन्धकारकी ओर ही ठेलता है इस तरह दोनों ही नरकके फन्देमें फस गये। कालने उन्हें कवलित कर लिया सारा संसार गुरुगुरु कहता है, पर वही गुरु है जो तत्त्वका बिचार रखता है। सबसे पहिले तो मा और बाप गुरु हैं क्योंकि, वे ही अपने रज वीर्यसे शरीरको उत्पन्न करते हैं। दूसरी गुरु सुखपूर्वक जतन करानेवाली दाई है जिसने गर्भवासकी कैंद छुटादी। नाम करण करने वाले तीसरे गुरु हैं क्योंकि, सब लोग उन्हींके रखे नाम से बोलते हैं। यज्ञोपवीत कराने वाले तथा पढ़ाने लिखाने और व्यव-

हार सिखानेवाले चौथे गुरु हैं । पाँचवे गुरु वे हैं जिन्होंने वैष्णव बना राम नामका मंत्रका सुमिरन देकर भगवान्की ओर लगाया । भ्रमदुर्गके तोड़ने वाले छठे गुरु हैं । जिन्होंने दुविधा मिटाकर एकसे नेह लगवा दिया । सातवे वे गुरु हैं जो शब्द लिखा दिया जिससे यथार्थ तत्त्व जान उस तत्त्वमें निमग्न हो गया अथवा संसारका तत्त्व लेकर इसे जैसेका जैसा दिखा दिया । मैं जहाँसे आया था वहीं जा दाखिल हुआ । कबीर साहिबका कथन है कि, दुनियाँमें सात गुरु हैं सारा संसार इन्हींका सेवक है । सतगुरु या सातवों उसीको समझिये जो भवसागरसे पार लगादे । कानफूका तो हृदका गुरु है । बेहद (ब्रह्म) का नहीं । जब बेहदका गुरु मिल जाता है उस समय वो औरका और ही हो जाता है । संसारीका असंसारी एवं अल्पज्ञका सर्वज्ञ बन जाता है ।

जो शिष्य होना चाहे वह पहले भली भाँति जाँच करे । जो कोई बिना जाँचे गुरु करता है वो बिगड़ता है । अँधेरे कुएमें गिरता है ।

अंधोंका पन्थ ।

एक अंधा पुकार पुकारकर कह रहा था कि, मुझको सातों आकाश और वैकुण्ठ सब कुछ दिखाई दे रहा है । उसके पास एक मनुष्य खड़ा था । वह अंधेसे कहने लगा कि, ए भाई ! मुझे भी वह आकाशका मार्ग बता ? अंधेने कहा कि, तूभी आँख फोड़वावे तो तुझको भी दिखाई देने लगे । उसके कहनेसे अपनी आँखें फोड़वाई । उसकी आँखें फुट गईं तब उसने कहा कि, मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं देता । तब पहलेके अंधेने उसे सिखाया कि, तू भी मेरी तरह कह । वह भी उसी प्रकार कहने लगा कि, मुझे समस्त स्वर्ग दिखाई देते हैं । मेरी भीतरकी आँखें खुल गईं । तब इन दोनोंकी बातें सुनकर एक तीसरेने भी अपनी आँखें फोड़दी । फिर चौथे पाँचवने आँखें फोड़वाईं । जो कोई आँखें फोड़वाता उसको पहलेका अंधा सिखा देता कि, जैसे मैं कहता हूँ इसी प्रकार तू भी कह । वह भी वैसाही कहने लगता था । तात्पर्य यह कि, बीस तीस मनुष्योंने मिलकर अपनी आँखें फोड़वालीं । तब एक और मनुष्य आया उसने भी अपनी आँखें फोड़वाईं और जब उसको कुछ दिखाई नहीं दिया तो उसने कहा कि, मुझको तो कुछ दिखाई नहीं दिया ? तब पहलेका अंधा उसको सिखलाने लगा कि, तूभी इसी प्रकार कह जैसे कि, हमलोग कह रहे हैं । उसने कहा कि, मैं ऐसा कभी भी न करूँगा । दूसरे अंधोंसे पूछा कि, तुमको क्या दिखाई देता है ? सबोंने कहा कि, हम सबने इस पहलेके अंधेके कहनेसे अपनी आँखें

एक परमेश्वरपर कुरान

फोड़वाई थी। सब पुकारने लगे कि, इस पहलेके अंधेने हमारी आँख फोड़वाई है। उस पहलेके अंधेका पाजीपना पूरा प्रगट हो गया।

नकटोंका पन्थ।

मैंने सुना था कि, एक राजाके पास एक मोडा जार रहता था। राजा उसकी बहुत कुछ मान मर्यादा किया करता था, वह बड़ा पाजी तथा दुष्ट था, बहुत पाजीपना किया करता था, पर राजा दयापूर्वक उसको टाल देता, उसको दण्ड न देता था। उसकी विद्याके कारण उसकी बुराई ढाँपता। एक बार वह महादोषके कारण पकड़ा गया। कि, जिसके निमित्त दण्ड न देना राजाको नितान्तही अनुचित मालूम हुआ तो भी राजाने इतना पक्ष किया कि केवल उसकी नाक कटवाकर देशसे बाहर निकाल दिया। उस पाजीने देशसे बाहर निकलकर कुछ यंत्र मंत्र इत्यादिकी साधनाकी। कितनीक जादूगरी इत्यादिसे अपनेको बड़ा चढ़ा लिया जब अपना कार्य सम्पूर्ण करचुका तब अनेक मनुष्योंको धोखा देने लगा। मुक्तिकी आशा दिलाने लगा। आप गुरु बन लोगोंको उपदेश देदेकर शिष्य बनाने लगा। कितनेही लोग उसके भृत्य बनगए। जो कोई उसका चेला बनता उससे वह यही कहता कि, यदि अपनी मुक्ति चाहते हो, तो तुम अपनी नाक कटाओ नकटे बन जाओ। उसके सब शिष्योंने नाकें कटवाई। जैसे कि, मुसलमानों तथा इब्रानियोंका खुतना होता है। इसी प्रकार उनकी नाककी खुतना होने लगा। नकटोंका एक बड़ा झुण्ड उसके साथ हुआ। वह मोडा साधुकी सूरतमें भस्म इत्यादि रमाकर अवधूत बन गया। नकटे पंथका अगुवा हुआ। अपने शिष्योंसहित उसी देशमें पहुँचा बहुत दिवस बीत चुके थे। इस पाजी मोडेकी बात लोग भूल चुके थे इस कारण उसको किसीने नहीं पहचाना। भुज नगरमें रहने तथा उपदेश देने लगा। कितने मनुष्य उस नगरमेंभी उसके शिष्य होगए। उसकी बड़ी प्रशंसा होने लगी। लोगोंको उसने बडे कौतुक दिखाए। यहाँतक कि, स्वयम् राजा उनके दर्शनके निमित्त आए, राजाको भी उसने भौति भौतिके खेल दिखाए जिससे राजाके मनमें उसका विश्वास जम गया। तब राजाको वह समझाने लगा कि, ए राजा ! यह देह तुच्छ तथा घृणित है। यदि परमेश्वरके अर्थ लगाई जावे तो मनुष्यकी मुक्ति हो जावे इस कारण हे राजा ! तू अपनी नाक कटवा कर मुक्ति ले। राजाने अपनी नाक कटवाई उसका शिष्य बन गया। जब राजा शिष्य हो चुका, तब वह पिशाच रानीके पास जाकर समझाने लगा कि, ए रानी ! यह शरीर तो चार दिवसोंमें मिट्टीमें मिल जावेगा तू अपनी नाक कटवा कर

मुक्ति लेले । रानीने कहा कि, मैं न अपनी मुक्ति चाहती हूँ न नाक कटवाती हूँ यद्यपि उसने समझाया पर रानीने न माना । कुछही दिवसोंके बाद वह दुष्ट किसी महापापमें फँसा । किसी महादोषमें पकडा जाकर राजाके समक्ष लाया गया जाँच होने लगी । लोगोंने पहचान लिया कि, यह वही मोडा है जो नाक कटवाकर देश बाहर किया गया था । जाँचके पीछे राजाने जाना कि, उसने मुझसे उस धोखेबाजीसे अपना प्रति शोधलिया । मैंने उसकी नाक कटवाई थी । उसनेभी मेरी नाक कटवाली । तब राजाने उस मोडेको जीवितही पृथ्वीमें गड़वा दिया । फिर नकटापंथके लोग तितिर-बितिर हो गए । यदि वह कुछ दिवसोंपर्यन्त और जीवित रहता तो कदाचित नाककटाईका कार्य भी प्रचलित रहता ।

वेदपशु ।

इस संसारमें चार वेद हैं । वे पूर्वदेशको दिये थे उनके अभाव पश्चिम देशवासियोंको प्रदान किए गए । इस आठोंकी आज्ञापर समस्त मनुष्य चल रहे हैं । वेदपशु वे हैं जो वेद तथा पुस्तकोंको पढ़ते हैं, वेदोंके यथार्थ तात्पर्यसे पूर्णतया अनभिज्ञ हैं । वेदका तात्पर्य तो अन्य है । मनुष्योंको अन्य उपदेश देकर वहका देते हैं । वेदपशु एक अर्थ निकालता है । जिसपर सहस्रों नर पशु विश्वास करके सत्य मानते हुए प्रशंसा करते कहते हैं कि, वाह वाह स्वामीजी ! आपने जो अर्थ किया वोही सत्य है । दूसरोंने जो अर्थ किया वह कदापि सत्य नहीं है । लोग प्रसन्न होकर कहते हैं कि, धन्य स्वामीजी ! आपके समान अर्थ और कौन कर सकता है ? आपके समान पहले न कोई हुआ और न होगा । समस्त नर पशु मिलकर प्रशंसा करते हैं । वेदपशु सुन सुनकर घमंड करता हुआ कहता कि, वास्तवमें मैं ऐसाही जानी हूँ । इस एक वेदपशुके पीछे सहस्रों तथा लाखों नरपशु लगे हुए प्रशंसा किया करते हैं । इस वेदपशुको भलीभाँति फुलाकर घमण्डी करदेते हैं । वह वेदपशु ऐसा फूल जाता है कि, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनता, समझता है कि, मैं वेदपाठियोंमें प्रथम श्रेणीका पण्डित हूँ । यद्यपि उसको वर्णमालाकी सुध भी नहीं है । वेदके वास्तविक तात्पर्यको वह क्या समझे ? वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ कहे हैं । एक अर्थ नहीं वरन् अनेक अर्थ हैं । शब्दोंके समस्त अर्थोंमेंसे एक अर्थको अपनी इच्छानुसार चुनके वेदमंत्रका अर्थ करके लोगोंको समझाता हुआ समस्त नर पशुओंको अपनी ओर खींचता है । इसी प्रकार वेदपशु लोगोंको अपने जालमें फँसाता है । जितने वेदपशुके शिष्य हैं सब वेदपशु हैं । इन सब वेदपशुओंके भाँति-भाँतिके ध्यान

भीतरके अन्धे

हैं। पर जो वेदके सच्चे ज्ञाता होते हैं, वे बड़े भावुक हैं। उन्हें किसीसे द्वेष नहीं होता, न वो लुछचोंकी तरह मूर्तिकी निन्दा ही किया करते हैं।

साखी कबीर — वेद हमारा भेद है, हम वेदोंके माहिं।

जौन भेदमें मैं वसूँ, सो वेदौ जानत नाहिं ॥

कबीरजी कहते हैं कि, मेरा पता वेदसे मिल सकता है कि, मैं कौन हूँ। क्योंकि, हम वेदोंमें हैं, पर अपने आप पता नहीं लग सकता। कहना यह कि, पारखी गुरुकी आवश्यकता है। जिस भेदमें मैं रहता हूँ उसको वेद भी नहीं जानते। केवल नेति नेति कहकर इसकी ओर इशारा ही करते हैं।

यह वेदपशु अज्ञानावस्थामें सब कुछ करता है। मिथ्या तथा सत्यकी उसको तनिक भी सुध नहीं। यह वेदपशु वेद पाठकर घमण्डी होता है। कहता है कि, वेदमें यह बात लिखी है वेदमें वह बात लिखी है। यद्यपि वह पूर्णतया अनभिज्ञ है कि, वेद क्या है तथा किस निमित्त है? उसका वेद और वेद पाठपर इतना घमंड करना और इतराना पाशविक अवस्थामें है। समस्त वेदोंकी आत्मा केवल एक शब्द 'ओम्' है। जो कोई वेदकी आत्माको न पहचान, वेदपाठी होनेका प्रण करे वो कदापि वेदका विद्वान् न होगा। अतः अर्थानुसंधानके साथ वेद पाठ हो। उससे आत्माके जाननेकी चेष्टा करे।

त्रियापशु।

त्रियापशु उसको कहना चाहिये जो स्त्रीका पशु हो। वैसे वो स्त्रीका पशु यह सारा संसार है। स्त्री समस्त जीवोंको नचाया करती है। इस स्त्रीने अपनी गुलामीका फंदा सबके गलेमें डाला है। कामबाण सबके हृदयोंको भेद गया। इस कारणही समस्त मनुष्य मर गए। सांसारिक मनुष्योंकी तो गणनाही क्या है। यह बड़े बड़े सिद्ध साधुओंके हृदयको भी टुकड़े टुकड़े कर देती है। सन्तोष तथा धैर्य मनसे पृथक् हो जाता है। इस स्त्रीका नाम वासना तथा इच्छा है। उसने सबको बांध रक्खा है। इसीके कारण सबका आवागमन हो रहा है इसीके कारण भवसागरकी स्थिति है। यह मनुष्य तथा देवता किसीको भी नहीं छोड़ती। जबसे स्त्री पुरुषके साथ होती है उसी दिनसे तपस्या तथा व्रतसे मनुष्य वञ्चित रहता है। केवल स्त्रीकेही कारण बंधनमें रहता है। उसको उसी स्त्रीने अंधा कर दिया है। समस्त झगड़ों तथा बखेड़ोंकी जड़ स्त्री है। अनगिनती लोगोंके इसने मस्तक कटवाये, कटवाएगी और कटवा रही है। समस्त विद्या तथा कार्यकी वैरिन है, समस्त सांसारिक मनुष्य इसके ही प्रेममें फँसकर अपने सर्जन कर्तासे दूर हो गए हैं। जो कोई इससे प्रेम करेगा उसमें सर्जन कर्ताका

प्रेम तथा उसकी भक्ति न हो सकेगी । इस त्रियापशुमें तनिक भी मानुषिक बुद्धि नहीं होती । पर जब उसको मानुषिक शिक्षा मिले तो वास्तवमें वह मनुष्य बनजावे, नहीं तो सदैव इसी प्रकार फँसा रहेगा । इसको तनिक भी पहुँच, समझ तथा बुद्धि नहीं है कि, अपनी मुक्ति तथा छुटकारेकी युक्ति कर सके । उसके पास तनिक भी औषध नहीं कि बच सके ।

उद्धारकी दवा ।

उसके निमित्त केवल यही एक युक्ति है कि, यह साधु तथा गुरुकी सेवा करे । यदि यह साधु तथा गुरुकी सेवा न करेगा तो इसका बेड़ा कदापि पार न होगा । अवश्यही वह कालका भोजन बनेगा । इस संसारमें दो प्रकारके गुरु हैं—एक पाशविक तथा दूसरा मानुषिक । यदि इस सांसारिकको पाशविक शिक्षा मिलेगी तो उसके हृदयपर बुद्धिका कदापि विकास न होगा । इस संसारमें दोनों प्रकारोंके शिक्षक फिरते हैं । जो कोई उन दोनों गुरुओंमें पहचान करे, उन्हें पृथक् करके पहचाने, एकको छोड़कर दूसरेको ग्रहण करे वो सांसारिक बड़ा ही भाग्यवान् होगा । एक तो कपटी भेष बनाए कूट पुस्तकें लेकर हाथमें खप्पर लिए फिरते हैं । यह तो कालपुरुषका समाचार देते हुए उसकी सूचना चारों ओर फैलाते फिरते हैं । दूसरे श्वेत वस्त्र पहने हाथमें सूक्ष्म वेद तथा कमण्डलु लिये सत्यपुरुषके नामका प्रचार करते घूम रहे हैं । अतः जो कोई सत्यपुरुषके समाचारदाताओंके समाचारको स्वीकृत करेगा वह निश्चयही उत्पत्ति नदीके पार चला जावेगा । जिसने इस गुरुको पहचाना वह उनका चरणरज बन गया ।

मुहम्मद साहिबकी भाँग ।

मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक बार मुहम्मद साहबको जिब-राईल महाशय एक उद्यानमें ले गए । उसमें चालीस साधु बिलकुल नगन बैठे हुए थे । तब संध्याका समय निकट आया वे साधु सब भाँग घोटने लगे । जब भङ्ग घोंट चुके तब भङ्ग छाननेके निमित्त कोई वस्त्र नहीं था । उस समय मुहम्मदसाहबने अपने शिरसे साफा उतारकर दिया कि, इससे भंग छानो । तब उन साधुओंने मुहम्मदसाहबके साफेमें भाँग छानकर पीली । मुहम्मदसाहब पर प्रसन्न होकर नौ घूंट भङ्ग मुहम्मदसाहबको दीं उस नौ घूंट भङ्गके पीने से मुहम्मदसाहबको देवलोककी सुध मालूम हो गई । जो पदार्थ तथा आश्चर्यमय शक्तियाँ आपको मिलीं वह केवल उन्हीं नौ घूंट भङ्गसे थीं । तभीसे इस भङ्गके रङ्गसे मुहम्मदसाहबका साफा हरा हो गया । तबसे हातिमी जातिके श्रेष्ठोंने

कालपुरष किससे डरता है, माया (जगत और देह) चक्र निरूपण

हरे वस्त्रोंको पहनना उचित समझा । मुहम्मदसाहबके श्रेष्ठका नाम हातिम था इस कारणही यह हातिमी वस्त्र कहलाता है ।

ग्रन्थल

ऐ आदम तेरे लिए जञ्जीर यह आई ।
तिफ्ली व जवानी व बुढापामें फँसाई ॥
लारेव सरासर यह हलाहल है हलाकू ।
तेरे लिए तो जान शकर शीर यह आई ॥
अब तेरा कहाँ साहब और सदगुरु साचा ।
सिखलाने सबक सिलसिला गुरु पीर यह आई ॥
शाही जिसे कहते वही बरबादी है अजिज ।
दिनकी नहीं उमीद शबे तीरह यह आई ॥

भावार्थ—ए मनुष्य ! तेरे लिये यह जँजीर आई है यही तुझे बाल्य जवानी और बुढापेमें फँसा रही है । यह सरासर पीते ही प्राण लेनेवाला, लव-लवाता भयंकर विष है, जिसे कि, तू अपनी अत्यन्त प्यारी वस्तु समझ रहा है । अब तेरे साचे सदगुरु कहाँ है यही तुझे नरकका सबक सिखलानेके लिये गुरु पीर चली आ रही है । जिसे तू शाही समझे बैठे है यही बरबादीकी जड़ है इसमें दिनकी उम्मेद नहीं है यही स्त्री रूपी रात है ।

ये चारों पशु इस भवसागरमें रहते हैं । एक दूसरे से बँर मंत्रो रखते हैं । इनकी बुद्धि तथा इनका विश्वास शुद्ध नहीं । ये इस भवसागरके कोड़े हैं । इनका इस नदीके पार जाना असम्भव है । पर सत्यगुरुकी दया सन्तसेवा और चाकरीसे छुटकारेका पथ मिल सकता है । चारों पशु इस और तो पिताके सिंहासन और राज्य तथा श्रेणीको चाहते हैं । उस ओर सांसारिक वासनाओंके आनन्दका उपभोग भी किया करते हैं । इन चारों पशुओंकी बुद्धि तथा विश्वास बड़ाही विचित्र है । उनकी बुद्धि तथा विश्वासमें तनिकभी स्थिरता नहीं है, उनकी बुद्धि तथा उनको विश्वास सदैवही डामाडोल रहा करते हैं ।

ये लोग सहस्रों प्रकारका पहनाव पहनते और भौंति भौंतिके भोजनोंसे अपने चित्तको प्रसन्न करते हुए आपको बहुत बड़ा तथा प्रतिष्ठित समझते एवं घमंडमें मस्त फिरा करते हैं । कोई वस्त्र पहने कोई नङ्गे कोई हरा पीला नीला नानाप्रकारके वस्त्र पहने रहते हैं । कोई अनाज छोड़कर दूध पीता है कोई फलाहार करता है । कोई मांस खाता है मदिरा पीता है कोई स्नान किया करता है कोई शीशपर जटा रखते हैं । कोई भभूत लगाकर बना फिरता है । कोई वस्त्र छोड़कर

चक्रादिकोंका मान चित्र

हिरन तथा बाघकी खाल पहनता है । कोई विष्ठा खाता है एवं मूत्र पीता है । कोई अपनी जूजी छेदकर कड़ा पहन लेता है कोई उसको काटकर फँक देता है । कोई कोई ऐसे कार्य करते हैं कि, जो ऐसे घृणित हैं कि, जिनके लिखनेमें मुझको लज्जा आती है केवल इतना इज्जित कर देनाही यथेष्ट है कि, कोई परस्त्रीगमन करनाही अपना परम धर्म जानते हैं कोई सहस्र स्त्रियोंके साथ संभोग करने तथा उनके भगको देखनेहीसे अपनी मुक्ति समझते हैं, कोई उलटी खानेको बड़ी बात समझते हैं । कोई धूनी लगाकर बैठता है, कोई मौनी बन गया है ॥ कोई तीर्थमें नहाता फिरता है, कोई उलटा लटकता है, कोई धूँवा पीता है । कोई सदा सुहागिन बनकर स्त्रियोंका वस्त्र तथा उनके आभूषण पहनता है कोई घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह कुण्ड खोदकर दाल भात रोटी तथा माँस और भौंति भौंतिके भोजनोंसे भर देता है । चेले और सांसारिक तथा साधु और ब्राह्मण शूद्र चमार सब एक साथ बैठकर इसी कुण्डमें से सब भोजन करते हैं । एक प्याले से मदिरा पान किया करते हैं इससे अपनी मुक्ति समझते हैं । कोई कहते हैं हम अमुक गुरु अथवा धर्मके अगुवा पर भरोसा रखते हैं उसके द्वारा हमारी मुक्ति निश्चय है यहाँतक कि, इस अगुवाको परमेश्वर समझते हैं । यद्यपि वह गुरु नितान्तही विवश तथा पराधीन हैं । कोई कहता है हमारे धर्मके अगुवामें मनुष्यता तथा परमेश्वरी दोनोंही हैं । उन्हें तनिक भी सुध भी नहीं कि, मनुष्य कहाँ ? तथा परमेश्वर एक साथ कहाँ, कहाँ अंधा, कहाँ आखोंवाला, कहाँ साधु कहाँ और चोर कहाँ झूठा कहाँ और सच्चा एकही समयमें कहाँ दिन और कहाँ रात । कोई योग समाधि लगाकर बैठता हुआ अपनेको अमर समझता है । कोई कहता है कि, मैं ब्रह्मा हूँ । अनगिनती ध्यान तथा अनगिनती रङ्ग ढङ्ग इन चारों पशुओंके हैं कि, जिनके विवरणका बल मुझमें नहीं है; जब मैं उनकी यह दशा यानी अवस्था देखता हूँ तो मुझको वह काशीका पागलखाना याद आ जाता है कि, इस आकाश छतके नीचे जो ये सब पशु रहते हैं वे कैसे कैसे कौतुक दिखाते हैं । हर एक अपनेको योग्य तथा श्रेष्ठ समझते हैं । कोई उनमें अपनेको परमेश्वर तथा कोई अपनेको शिष्य समझते हैं । समस्त सांसारिक मनुष्य साधुओंका अनुसरण करके मुक्तिपथसे वञ्चित रहे । उनको सच्चा सत्यगुरु नहीं मिलता । इन चारों प्रकारके लोगोंमें कोई गुरुमुख नहीं है, सब मनमुख हैं । यदि दैवात् इनमेंसे कोई गुरुमुख हो तो उसको अवश्यही आकाशी सहायता मिलेगी । उसको सत्य-

गुरुका दर्शन प्राप्त होगा वह इस गुरुमुखको अपनी ओर खींच लेगा। सत्यगुरु संसारमें आकर समझाते फिरते हैं कि, ए मनुष्यो ! तुम मेरी बात मानों, मैं तुमको वही रङ्ग रूप प्रदान करूँगा जो कठिनसे कठिन तपस्या करनेपर भी ऋषि मुनिगण नहीं पाते हैं। जैसे कीड़ेको भूङ्गी अपने रूपका बनाता है, इस प्रकार तुम मेरे स्वरूपके समान होगे। अनुरागसागर पृ ८ में मृतकभावके वर्णनमें भूङ्गीका दृष्टान्त आया है स्वामी परमानन्दजीने उसीको अति सुन्दर कविताके साथ कयहूँ रख दिया है।

भूंगी कीटका दृष्टान्तकी कविता ।

भूङ्गी जो आन कीटको खुद रङ्ग लगावे ।
आवाज अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥
वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।
गुरु शब्दसे फिलफौर रङ्ग पटल सो जावे ॥
कोई और क्रिस्म कर्मको जिनदार न देखे ।
भूङ्गी जो अपने ढङ्ग कीट टूँढके लावे ॥
वह टूँढ काम अपनेही हम रङ्ग हमेशा ।
दिलदेके उसको तवही अपने रूप बनावे ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

भावार्थ—भौरा स्वयं ही आकर कीड़ेको रंग लगाता है बारबार अपनी आवाजको कीड़ेके कानमें डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि, कीड़ेका पहिला रूप रंग बाकी नहीं रह जाता। गुरुके शब्दसे उसका रूपरंग शीघ्रही बदल जाता है। वो कीड़ा भौरोंके ध्यानके या उसके शब्दके दूसरी बात नहीं देखता, भूंग भी उसे आप ही टूँढकर अपने पास लाता है, अपनी ही इच्छासे सदा अपने रंगका बनानेकी चेष्टा करता है वो अपना दिल देकर अपने रूपका बना लेता है। उसे दिलदे जो दिलदार हो। वो चाहें हिन्दू हो या मुसलमान हो, पर उसका खरीदनेवाला हो ॥

हैं कोट लाख सदमें कोई एकही मेरा ।
जहाँ जाके बारबार भूङ्ग करता है फेरा ॥
वही कीट जेहल अपनेसे गुरुबात न माने ।
तब जाके पास उसके भूङ्ग करता है डेरा ॥
कहता है कीट तुझको लगी आन खराबी ।

नहिं अकल ठिकाने रही नहिं इल्म है तेरा ॥
तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर ।
हो मेरी तू दमशकल तेरा होवे निबटेरा ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

भावार्थ—हजारों लाखोंमें कोई एक ऐसा होता है जहाँ वो भौरा जाता जाता है । जब वो कीट गुरु भृंगके बार २ के कहे सडुपदेशोंको भी नहीं मानता तो फिर भौरा उसीके पास अपना आसन जमा देता है, कहता है कि, ए कीड़े ! तुझे बड़ी खराबी लगी हुई है न तो तेरी बुद्धिही ठिकानेपर रही है एवं न तुझे इसका इल्म ही है, तू अबकी मेरी, बातको अपने कान धर ले इससे तू मेरी सूरतका हो जायगा । ए शिष्य ! मेरे उपदेशके सुनते ही गोबररूपी विषयोंसे तेरा पीछा छूट जायेगा । उसेही दिल देना चाहिये जो कोई दिलदार हो वो चाहे हिन्दू हो भले ही मुसलमान हो, परदिल दे दिलको खरीद ले ॥

मुरशिद जो मेहबान जिसे आन जगाया ।
भूले जो जीव जगत् भगत फेर लगाया ॥
जो अन्ध जीव जगमें कोई बात न माने ।
रही घेर उपर उनके महाकालकी माया ॥
फरमान मानबाज्ज कोई जीव अंकूरी ।
सत पुरुष भगत भाव बहुत बार बताया ॥
समझाए सबको जाय जगमें आपही ज्ञानी ।
आजिज्ज न माने जीव जिसे जमने फँसाया ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

जो जीव जगतके फेरमें पड़कर सबको भुलाये बैठा था उसे सदगुरुने कृपा करके जगा दिया पर जो अन्धा सदगुरुके वचन न माने तो समझना चाहिये चाहिये कि, उसे काल पुरुषकी माया घेर रही है । जिसके दिलमें मुक्त होनेके अंकुर हैं वोही अनुशासनमें श्रद्धा रखनेवाला अनुशासनको मानेगा । ज्ञानीजी सबके समझानेके लिये आते हैं एवम् सत्यपुरुषकी भक्ति अनेक बार वचा चुके हैं । पर जिसे अज्ञानसे घेर रखा है वो किसी तरह भी नहीं मानता । उसे दिल देना चाहिये जो दिलदार हो, वो चाहे हिन्दू मुसलमान कोई भी क्यों न हो ॥

मनुष्यताका उपदेश ।

मनुष्य कहिए आदमी । पहले पाशविक गुणोंका विवरण किया था अब मनुष्यके गुण लिखता हूँ कि, मनुष्य उसको कहते हैं जिसमें मानुषिक बुद्धि हो । मनुष्यकी मूर्ति होनेमात्रसे ही मनुष्य कभी समझा नहीं जा सकता ।

बैत — जो असल काँच कहते हैं गौहर बनामको ।

विन वासनाको फूल कहो कौन कामको ॥

कांचके मोती नाममात्रके मोती होते हैं वास्तवमें बेकाँच हैं । इसी तरह बिना वासनाके फूल, किस कामका होता है ? यानी वो किसी कामका नहीं होता । जिसमें मानुषिक बुद्धि हो वही मनुष्य कहलाता है । बाकी सबी पूरे पशु हैं । खाना, पीना, सोना, विषयसम्भोग इत्यादि सब कुछ पशु तथा मनुष्योंमें समानही हैं । जिसमें मानुषिक बुद्धि नहीं वह वस्तुतः पशु है । मिथ्यावादी गुरुगण झूठे भेष धर, सांसारिकों को धोखा देते फिरते हैं । मनुष्यको उनसे भागना तथा बचते रहना उचित है । जब मनुष्यकी पाशविक चालें दूर हो जावें तथा मानुषिक ढङ्ग आजावें तब मनुष्य बनेगा नहीं तो बनना बड़ा कठिन है । मनुष्यतासे ही मुक्ति हुआ करती है । भौति भौतिके भेष बनाने और राख मलनेसे कदापि मनुष्यता नहीं आती । जब मनुष्य मनुष्यताको ग्रहण करता है तब उसको सत्यगुरु मिलता है उसको मनुष्यताका वस्त्र पहनाता है वे मानुषिकवस्त्र पहनाने-वाले गुण ये हैं—धीरज, दया, शील, विचार और सत्य ।

जब सत्यगुरु देखता है कि 'यह मनुष्य अब, मनुष्य हुवा । तब यह पाँचों वस्त्रका उपहार प्रदान करता है । इन वस्त्रोंको पहनकर मनुष्य अमर तथा अजर हो जाता है । उसके आवागमनका बन्धन टूट जाता है । इन सब भली आदतोंको मनुष्य ग्रहण करता है । १—माँस नहीं खाता है । २—किसी नशेको व्यवहारमें नहीं लाता है । ३—विषयसम्भोगमें लिप्त नहीं होता है । ४—सांसारिक कष्टोंको ध्यानमें नहीं लाता है । ५—अचेत होकर सोया नहीं करता है । ६—मोह उसमें प्रवेशित नहीं होता है । ७—सत्य बोलता है । ८—बिना विचारके कोई काम नहीं करता है । ९—प्रत्येक जीवपर दया करता है । १०—सब कार्योंको बीरताके साथ करता है । ११—सिवाय उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरके और किसीसे कोई आशा न करे । १२।मिथ्या तथा सत्यगुण तथा अवगुणको फभलीप्रकार पहचानकर स्वीकार करे । १३—भ्रम तथा धोखेमें न पड़े । १४—बुद्धि और ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बन जावे । १५—अपने गुरुपर विश्वास

करे । १६-गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञता करे । १७-कुल फलदायक वस्तुओंको तुच्छ जाने । १८-स्वच्छरूपसे विचार करे ।

समस्त मानषिक गुण हों, जो तीन गुण हैं-काम, क्रोध और बुद्धि सो उस बुद्धिसेही समस्त देवतागण हैं, काम क्रोधसे समस्त पशुगण हैं । क्रोधसे नार-कियोंका शरीर है । मनुष्य तीनों गुणोंसे विभूषित है । यदि यह बुद्धिकी ओर, ध्यान दे तो देवता है । यदि यह काम क्रोधही को ओर झुके तो पशु है, क्रोध को ओर झुके तो नारकी है । इस कारण इसको उचित है कि, बुद्धिकी ओर ध्यान देकर मनुष्यताकी श्रेणीपर अधिकृत होकर हंसस्वरूप हो जावे उसीको मनुष्य कहते हैं ।

बीजक साखी ।

कबीर - मानुष जन्म पायके, चूके अबकी घात ।
जाय परे भवचक्रमें, सह्यो घनेरी लात ॥ ११२ ॥

कबीर साहिब कहते हैं कि, मनुष्य जन्म पाकर जो अबकी चूक गये तो फिर भवचक्रमें पड़ो वहाँ अनेको लाते खाओ यानी अपने उद्धारके बिना किये मर जायेंगे तो भव सागरमें पड़ जाओगे वहाँ अनेकों देहोंको धरकर सुख दुख भोगते फिरों ॥ ११२ ॥

कबीर - दुर्लभ मानुष जन्म है, होय न दूजी बार ।
पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुर न लगै डार ॥ ११४ ॥

मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, दुवारा नहीं होता यह जानते हो कि, फल पककर जब पेडसे गिर जाता है तो फिर वो डार पर नहीं लग सकता ॥

कबीर - मानुष हो कोई मुवा नहीं, मुवासो डंगर धूर ।
कोई जीव ठौरन लागियो, भयो सो हाथी घोर ॥ १०८ ॥

जो मनुष्य बनकर अमर बन गया वही मनुष्य है, जिसने मनुष्य होकर भी अपना बचाव नहीं किया मरा ही वो मनुष्य नहीं निरा पशु है । जो अपने ठिकाने पर नहीं पहुँच सका वो चँटीसे लेकर हाथी तक बनता चला जाता है । कभी छुटकारा नहीं पाता ॥ १०८ ॥

कबीर - पाँच तत्त्वको पूतला, मानुष धरिया नाम ॥
एक तत्त्वके बिचले, व्याकुल भया सब ठाम ॥ २३ ॥

पृथिवी, पानी, तेज, वायु आकाश इन पाँचों तत्वोंका बना हुआ पुतला यह देह है जिसका मनुष्य नाम रख छोड़ा है । एक तत्त्वके विछुरते ही सब जगह व्याकुल हुआ फिरता है यानी इसे राम तत्त्वका भान नहीं रहा इस कारण भटकता फिरता है ॥ २३ ॥

कबीर—मानुष वेचारा क्या करे, कहै न खुलै कपाट ।

श्वान चौक बैठायके, फिर फिराय पन चाट ॥ ११० ॥

जब उसे कहनेपर भी बोध नहीं हो तो वो क्या करे ? क्योंकि, कुत्तेको चौकपर बिठानेपर भी वो बारंबार चौकेके चूनको ही चाटता है यानी समझानेपर भी मनुष्य नहीं समझते बारंबार कुत्तेकी तरह विषयोंमें ही मरते हैं ॥११०॥

कबीर मनुष वेचारा क्या करे, जाको शून्य शरीर ।

जूझ झॉक नहि ऊँचिए, कहें पुकार कबीर ॥ १११ ॥

वो मनुष्य क्या करेगा जिसके दिलमें धोखा ही ब्रह्म बनकर बैठो हुआ, है, जिसके कि, हृदयमें अणु मात्र भी प्रकाश नहीं है वो यह समझता हुआ भी कि, इनमें कुछ भी सार नहीं है फिर भी फँसा रहता है वो छुटकारेका उपाय नहीं करता ॥ १११ ॥

कबीर—पूरब उग पच्छिम अयै, भखै पवनको फूल ।

ताहू राहू ग्रासिए, नर काहे को भूल ॥ २३१ ॥

जो सूर्य पूर्वसे उदय होकर पश्चिममें छिप जाता है खानेके लिये भी पवनका ही लहरिया है पर उसको भी राहू ग्रसता है फिर मनुष्य क्यों भूल रहा है कि, मैं ऐसाही रहा आऊँगा ॥ २३१ ॥

कबीर—राम सुमिरिए क्यों फिरे, और की डौल ।

मानुष केरी खालड़ी, ओढे देखा बैल ॥ २७५ ॥

राम राम भी कहते सुनते हैं दूसरोंसे शास्त्रार्थ भी करते फिरते हैं, बिना सोचे समझे दूसरोंके पीछे फिर रहें हैं वे बैल मनुष्यकी खालको ओढें फिरते हैं ॥ २७५ ॥

कबीर—मानुष तेरा गुण बड़ा, माष न आवे काज ।

हाड़ न होते मरनको, त्वचा न बरजत पाज ॥ १९५ ॥

ए मनुष्य ! तू देहाभिमान क्यों कर रहा है, क्या यही तेरा बड़ा गुण है कि, तेरा मांस भी निकम्मा है, हाड़ भी किसी कामके नहीं, उनके भी आभरण नहीं बनाये जाते । न चामसे बाजे ही मढे जाते हैं ॥ १९५ ॥

कबीर—मानुष तेई बड़ पापिया, अच्छर गुरुहि न मान ।

बारबार बनको कहे, गर्भधरे चौखान ॥ १०८ ॥

एक मनुष्य ? तू बड़ा पापी है तूने अकाल पुरुष अक्षरका कहना भी न माना, जैसे बनकी मुर्गी चारों ओर अण्डे देती फिरती है उसी तरह तू भी जनता जन्माता रहा चौरासी लाखमें भ्रम २ करके दुख पा रहा है ॥ १०८ ॥

फुटकर-कबीर-जेहि बेरियां साई मिले, ताहि न भावे और ।

सबको सुखदे शब्द कर, अपनी अपनी ठौर ॥

कबीर-मनुष बेचारा क्या करे, जाका हृदया सुन्न ।

श्वान चौक बिठायके, फिर फिर चारै चुन्न ॥

कबीर-अंकुर भखै सो मानों, मांस भखै सो श्वान ।

जीव बधे सो काल है, सदा सो नरक निधान ॥

जिसका सत्य पुरुष वा उसके प्यारे मिल गये उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि, अपने दिव्य शब्दसे सबको सुख देते हुए अपने सच्चे स्थान-पर कर देते हैं । जिस मनुष्यका हृदय सूना हो वो विषयलंपट न हो तो क्या करे? क्योंकि, कुत्तेको जब चाहो तब चौक बिठा देखो वो मोका मिलतेही चूनही चाटेगा । अंकुरोंका भोजन करनेवाला मनुष्य तथा गोशतखोर कुत्ता एवम् जीवघाती काल है जो जीव हत्या करता है उसे अवश्यही नरक होगा, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है । कहे हुए चारों तरहके पशुओंमेंसे किसीमें भी बुद्धि नहीं है इसी कारण वे सदा आवागमनके चक्करमें फँसे रहते हैं ।

निर्बुद्धिताके अङ्गकी साखियाँ ।

कबीर- 'अकलविहीना आदमी, जानै नहीं गँवार ।

जैसे कपि परवश परा, घर घर नाचै बार ॥

कबीर- अकलविहीना सिंह, ज्यो गया सत्यके संग ।

अपनो प्रतिमा देखके, भयो जो तनको भङ्ग ॥

कबीर- अकलविहीना अंधगज, पन्यों फंदमें आय ।

ऐसेही सब जग बंधा, कहा कहूँ समझाय ॥

कबीर- पछताता परवश परचो, सुवाके बुधनाहि ।

अकलविहीना आदमी, यों बन्धा जग माहि ॥

कबीर- अकल असँसे उत्तरी, विन्धों दीनी बाँट ॥

एक अभागी रह गया, एकन लीनी छौट ।

कबीर- बिना वसीले चाकरी, बिना बुद्धिकी देह ॥

बिना ज्ञानको जोगना, फिरे लगाए खेह ॥

कबीर- जल पर पावे मछली, कुलपर "भाते बुद्धि ।

जाको जैसा गुरु मिला, ताकी तँसी सुद्धि ॥


१ निर्बुद्धि, २ बंदर, ३ चमकना अस्त्र, ४ मदान्ध हाथी, ५ अयो, ६ ऊपर, ७ परमात्मा, ८ दूसरे बुद्धिमान, ९ जरिये, संसर्ग, १० शरीर, ११ विभूति या साधु व साधु १२ रदी, १३ धरानेके अनुसार, १४ होती है, १५ स्मृति या बुद्धि,

ब्रह्माण्ड

कबीर- मनहीको परमोद ले, मनहीको उपदेश ।

जो योमन 'परमोद ले, तो सुख हो सब देश ॥

कबीर- बात बनाए जग ठगा, मन 'परमोद्यो नाहिं ।

कहैं कबीर मन लेगया, लख चौरासी माहिं ॥

कबीर औरनके उपदेशसे, मुखमें पड़ गई रत ।

रास' बेगाने राखिके, खायो अपना खेत ॥

कबीर पण्डितसे तैं कह रहा, भीतर' बेघे' नाहिं ।

औरनको परमोदता', गया 'मेहरकी बाह ॥

कबीर 'अजहूं तेरा सब मिटे, जा माने गुरुसीख' ।

जवलग तू घरमें रहे मत कहूं मागे भीख ॥

बुद्धि तथा विश्वास सब शरीरसे संबंध रखता है । सो शरीर झूठा है और उसका कोई समान सच्चा नहीं है । यह समस्त विश्वासके अधीन है । यदि बुद्धि मान न लेतो किसी नियमका विश्वास न हो । इस शरीरके साथ बुद्धिही झूठी ठहरी फिर विश्वास कैसे सत्य ठहर सकते हैं । यदि यह शरीर मिट जानेवाला न हो तो सदैव एकही समान स्थिर रहे जो कुछ है वो अस्थिर तथा अल्पस्थायी है । यदि उसपर मैं विश्वास करूँ तो अंधकारसे कदापि न निकलूँ । जितनी विद्या कार्य और पुस्तक पाठसे हैं सो सब स्थूल शरीरसे ठहराए हुए हैं । समस्त अस्थिर शरीरकी भाँति हैं इस कारण इस संसारके पढ़े लिखे तथा अपढ़ सब एक समान हैं । क्योंकि, अपनी यथार्थतासे दोनों समान रूपसे अनभिन्न हैं । स्थिरता मृत्युके समय नाश हो जाती है पर उसके कर्मका संबंध उसके साथ रहता है । वह नरक वैकुण्ठके समीप जिस योनि एवं अवस्थाके योग्य होता है वहाँही खींच ले जाता है दूसरी योनिमें प्रविष्ट करा देते हैं । स्थिरताकी मृत्युमें न उसका वेद अथवा पुस्तकोंका पाठ काम आता है न उसकी विद्या कार्य उसको आवागमनसे छुडा सकते हैं वैकुण्ठनरक उसके आसपासकी जगह और चौरासी लाख योनि सब इसी स्थूल शरीरके ठहराए हुए इसीके समान नाश होनेवाली हैं, कोई बची नहीं रह सकती । आन्तरिक ज्ञान बाहरी विचार कार्य करनेका बल ये सब जब मिथ्या ठहरे तो बुद्धि और विश्वास कैसे सत्य माने जा सकते हैं । मृत्युके समय जहाँ इस जीवका ध्यान दौड़ जाता है उसीके अनुसार यह शरीर पाता है । मृत्युके बाद जब मनुष्यका