कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह सब सृष्टि मेरी है । जब मैं स्वयं सृष्टि बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह रचयिता मेरा है । इसी प्रकार जब बादशाह बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह सब प्रजा मेरी हैं । जब मैं धनहीन तथा दरिद्र हो जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह मेरा सच्चाट है और मैं इसकी प्रजा हूँ । मैं ही तो बादशाह हूँ मैं ही प्रजा हूँ । न बादशाह कुछ है न प्रजा कुछ है । केवल एक जीव है, उसका कुछ नाम रखलो । न यह मनुष्य है, मनुष्यका जन्माया हुआ है । पशु पक्षी जड़ चैतन्य सभी कुछ यह है पर सबसे पृथक् यह है । मैं नहीं जानता कि, पहले मैं क्या था । अब मैं क्या हूँ । मैं पाँच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्रियोंसे पृथक् हूँ । तथा संयुक्त भी हूँ । मैं अब भ्रमरूप हूँ । मैं पहले एक भ्रम था फिर अनेक हो गया । मैं ढोल बजाता हुआ जाता हूँ एक दूसरा भ्रम व्याहकर लाता हूँ । एक भ्रम दूसरे भ्रमके साथ मिलावट करते हैं तब दूसरा तीसरा फिर चौथा भ्रमरूप लड़का लड़की उत्पन्न होते हैं फिर उनके प्रेममें फँसकर मर जाता हूँ । जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब अनगिनती भ्रम एकसे अनेक हो जाते हैं । जैसे बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है वो समस्त बनको भस्म कर देती है इसी प्रकार जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब उसके समस्त सुकार्य तथा भले कामोंको भस्म करके राखमें मिला देते हैं । यह अज्ञानवश कहता है कि मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी पुत्री मैं अपने बाल बच्चोंके निमित्त कमाई करूँ । कमाकर उनका पालन करूँ । यह मूर्ख इतना नहीं सोचता कि, जिसने मुँह पेट बनाया है वही पालन भी करेगा मैं बाल बच्चोंके सोचमें जोमरता हूँ सो मेरा क्या किया होता है । जिसने मुँह और पेट बनाया उसीने आटा दाल नमक आदिक सब कुछ बनाया । जीवन-भर कमाईके ध्यानमें फँसकर खराब होता है । अपने परमेश्वरकी वंदनाकी ओर तनिकभी ध्यान नहीं देता है न सोच तथा विचारही करता है कि, मैं किस-कारण मनुष्य कहलाता हूँ । मनुष्यता क्या है । यदि मैं मनुष्य हूँ तो मुझको अवश्यही मनुष्यताकी ढुंढाई करनी चाहिये ? जब मैं मनुष्यता पर अधिकृत होता हूँ तब मेरा समस्त कार्य पूरा होगा । जबलों केवल मेरी सूरत मनुष्योंकी है कार्य पशुओंका है बुद्धि पशुओंकी है, तबलों मैं कदापि मनुष्य नहीं हूँ । इस कारण मुझको अवश्यही उद्योग करना चाहिए, । जिसमें मनुष्यताकी बातोंको प्राप्त करूँ । जबतक मुझमें मनुष्यता न हो तबतक मैं कदापि मनुष्य नहीं समझा जा सकता हूँ ।
चार-पशु
क. ११ पृ. ११७—नरपशु गुरुपशु, वेद पशु, तिरयापशु संसार ।
कहैं कबीर सो पशु नहीं, जाके विमल विचार ॥