भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करूँगा। सो सब मेरे भ्रमकी अवस्थामें ठहराए गये हैं। एक स्थिर करता हूँ तथा दूसरे को काटता हूँ न मेरी बुद्धि ठिकाने है और न मेरे विश्वास स्थिर हैं। मैं अपने पागलपनमें सब कुछ कर रहा हूँ। इसी पालगपनेकी अवस्थाको मैं अपनी बुद्धि अवस्था मानी तथा दूरदर्शिता समझता हूँ। यद्यपि यह सब बातें मैं अपने अज्ञानावस्थामें करता हूँ। जबसे मैं भ्रममें पड़ा तबसे मैंने अपने निमित्त दो मकान बनाएँ। इन्हीं दोनों मकानोंमें रहा करता हूँ। एकका नाम पिण्ड तथा दूसरेका नाम ब्रह्माण्ड है। ये दोनों पागलखाने हैं मैंने अपने मकानमें नौ महल बनाए वे ये हैं—दानमयीकोश शब्दमयी कोश बाणमयीकोश आनन्दमयी-कोश मनुमयीकोश प्रकाशमयीकोश ज्ञानमयीकोश आकाशमयीकोश प्रज्ञानमयीकोश।

इस नौ महला मकानमें मैं रहने लगा। जब जिस महलमें जाकर बैठता हूँ तब मेरा ढङ्ग वैसाही हो जाता है। सब बल धन इत्यादि उसीके अनुसार प्राप्त होता है। मेरी स्थिति सदैव इसी नौमहला मकानमें रहती है। बाहर जानेका बल नहीं। कभी मैं नदी कभी बूंद बन जाता हूँ। नदी बूंद दोनोंमें एकही कौतुक है। मैं अपने असलको भूल गया। मैंने अपने गलेमें मालाको पहनकर इधर उधर ढूँढ़ता फिरता हूँ। मैं अपने कानपर लेखनी रखकर भूल गया ढूँढ़ता फिरता हूँ। जब किसीने कहा कि, कलम तो तुम्हारे कानपर है तब मैंने अपनी कलम पायी। मैं जान बूझकर भटकता रहा, दूसरेके बतलानेका ओहताज हो गया। इस प्रकार मैं अपनी पूर्वावस्थामें पृथक् होकर दूसरोंके बतानेका ओहताज हो गया। पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों हमारे बनाए हैं पर मैं भूल गया। नहीं जानता कि, किसने बनाया। आपको और तथा बनानेवालेको और जानता हूँ। मैंही दास तथा मैंही परमेश्वर बन बैठा, असली परमेश्वरको मैं नहीं जानता, नहीं पहचान सकता, असल परमेश्वर मेरे कहने सुननेसे परे हैं। उसको न पहचाननेसे मैं पागल बन रहा हूँ। मेरे जप तप पूजा वंदना आदिक सब भ्रम हैं, इनके, द्वारा जो कुछ प्राप्त होता है वह सब अस्थायी तथा जल परकी लकीरके समान है। कबीर साहबका वचन है कि, ये सब मनुष्योंके कर्म हैं सो सब भ्रम हैं यही बात देवी भागवतके नवें स्कन्ध और १९ अध्यायमें देखा—महामायाका वचन है कि, सात करोड़ महामंत्र जो हैं सो सब मेरे नाम हैं। अतः जो वेद शास्त्र हैं और जो कहने सुननेमें आता है सो सब माया है जो कुछ माया है, सो सब भ्रम और धोखा है। मायाको माया खाजाती है। जो मायासे पृथक् है वो ही बचा है। दूसरे सब नष्ट हो जावेंगे मैं जब सर्जन कर्ता बन बैठता हूँ तब जानता हूँ कि,