कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनुष्यताका उपदेश ।
मनुष्य कहिए आदमी । पहले पाशविक गुणोंका विवरण किया था अब मनुष्यके गुण लिखता हूँ कि, मनुष्य उसको कहते हैं जिसमें मानुषिक बुद्धि हो । मनुष्यकी मूर्ति होनेमात्रसे ही मनुष्य कभी समझा नहीं जा सकता ।
बैत — जो असल काँच कहते हैं गौहर बनामको ।
विन वासनाको फूल कहो कौन कामको ॥
कांचके मोती नाममात्रके मोती होते हैं वास्तवमें बेकाँच हैं । इसी तरह बिना वासनाके फूल, किस कामका होता है ? यानी वो किसी कामका नहीं होता । जिसमें मानुषिक बुद्धि हो वही मनुष्य कहलाता है । बाकी सबी पूरे पशु हैं । खाना, पीना, सोना, विषयसम्भोग इत्यादि सब कुछ पशु तथा मनुष्योंमें समानही हैं । जिसमें मानुषिक बुद्धि नहीं वह वस्तुतः पशु है । मिथ्यावादी गुरुगण झूठे भेष धर, सांसारिकों को धोखा देते फिरते हैं । मनुष्यको उनसे भागना तथा बचते रहना उचित है । जब मनुष्यकी पाशविक चालें दूर हो जावें तथा मानुषिक ढङ्ग आजावें तब मनुष्य बनेगा नहीं तो बनना बड़ा कठिन है । मनुष्यतासे ही मुक्ति हुआ करती है । भौति भौतिके भेष बनाने और राख मलनेसे कदापि मनुष्यता नहीं आती । जब मनुष्य मनुष्यताको ग्रहण करता है तब उसको सत्यगुरु मिलता है उसको मनुष्यताका वस्त्र पहनाता है वे मानुषिकवस्त्र पहनाने-वाले गुण ये हैं—धीरज, दया, शील, विचार और सत्य ।
जब सत्यगुरु देखता है कि 'यह मनुष्य अब, मनुष्य हुवा । तब यह पाँचों वस्त्रका उपहार प्रदान करता है । इन वस्त्रोंको पहनकर मनुष्य अमर तथा अजर हो जाता है । उसके आवागमनका बन्धन टूट जाता है । इन सब भली आदतोंको मनुष्य ग्रहण करता है । १—माँस नहीं खाता है । २—किसी नशेको व्यवहारमें नहीं लाता है । ३—विषयसम्भोगमें लिप्त नहीं होता है । ४—सांसारिक कष्टोंको ध्यानमें नहीं लाता है । ५—अचेत होकर सोया नहीं करता है । ६—मोह उसमें प्रवेशित नहीं होता है । ७—सत्य बोलता है । ८—बिना विचारके कोई काम नहीं करता है । ९—प्रत्येक जीवपर दया करता है । १०—सब कार्योंको बीरताके साथ करता है । ११—सिवाय उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरके और किसीसे कोई आशा न करे । १२।मिथ्या तथा सत्यगुण तथा अवगुणको फभलीप्रकार पहचानकर स्वीकार करे । १३—भ्रम तथा धोखेमें न पड़े । १४—बुद्धि और ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बन जावे । १५—अपने गुरुपर विश्वास