कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 499, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहिं अकल ठिकाने रही नहिं इल्म है तेरा ॥
तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर ।
हो मेरी तू दमशकल तेरा होवे निबटेरा ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
भावार्थ—हजारों लाखोंमें कोई एक ऐसा होता है जहाँ वो भौरा जाता जाता है । जब वो कीट गुरु भृंगके बार २ के कहे सडुपदेशोंको भी नहीं मानता तो फिर भौरा उसीके पास अपना आसन जमा देता है, कहता है कि, ए कीड़े ! तुझे बड़ी खराबी लगी हुई है न तो तेरी बुद्धिही ठिकानेपर रही है एवं न तुझे इसका इल्म ही है, तू अबकी मेरी, बातको अपने कान धर ले इससे तू मेरी सूरतका हो जायगा । ए शिष्य ! मेरे उपदेशके सुनते ही गोबररूपी विषयोंसे तेरा पीछा छूट जायेगा । उसेही दिल देना चाहिये जो कोई दिलदार हो वो चाहे हिन्दू हो भले ही मुसलमान हो, परदिल दे दिलको खरीद ले ॥
मुरशिद जो मेहबान जिसे आन जगाया ।
भूले जो जीव जगत् भगत फेर लगाया ॥
जो अन्ध जीव जगमें कोई बात न माने ।
रही घेर उपर उनके महाकालकी माया ॥
फरमान मानबाज्ज कोई जीव अंकूरी ।
सत पुरुष भगत भाव बहुत बार बताया ॥
समझाए सबको जाय जगमें आपही ज्ञानी ।
आजिज्ज न माने जीव जिसे जमने फँसाया ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
जो जीव जगतके फेरमें पड़कर सबको भुलाये बैठा था उसे सदगुरुने कृपा करके जगा दिया पर जो अन्धा सदगुरुके वचन न माने तो समझना चाहिये चाहिये कि, उसे काल पुरुषकी माया घेर रही है । जिसके दिलमें मुक्त होनेके अंकुर हैं वोही अनुशासनमें श्रद्धा रखनेवाला अनुशासनको मानेगा । ज्ञानीजी सबके समझानेके लिये आते हैं एवम् सत्यपुरुषकी भक्ति अनेक बार वचा चुके हैं । पर जिसे अज्ञानसे घेर रखा है वो किसी तरह भी नहीं मानता । उसे दिल देना चाहिये जो दिलदार हो, वो चाहे हिन्दू मुसलमान कोई भी क्यों न हो ॥