कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 498, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरुका दर्शन प्राप्त होगा वह इस गुरुमुखको अपनी ओर खींच लेगा। सत्यगुरु संसारमें आकर समझाते फिरते हैं कि, ए मनुष्यो ! तुम मेरी बात मानों, मैं तुमको वही रङ्ग रूप प्रदान करूँगा जो कठिनसे कठिन तपस्या करनेपर भी ऋषि मुनिगण नहीं पाते हैं। जैसे कीड़ेको भूङ्गी अपने रूपका बनाता है, इस प्रकार तुम मेरे स्वरूपके समान होगे। अनुरागसागर पृ ८ में मृतकभावके वर्णनमें भूङ्गीका दृष्टान्त आया है स्वामी परमानन्दजीने उसीको अति सुन्दर कविताके साथ कयहूँ रख दिया है।
भूंगी कीटका दृष्टान्तकी कविता ।
भूङ्गी जो आन कीटको खुद रङ्ग लगावे ।
आवाज अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥
वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।
गुरु शब्दसे फिलफौर रङ्ग पटल सो जावे ॥
कोई और क्रिस्म कर्मको जिनदार न देखे ।
भूङ्गी जो अपने ढङ्ग कीट टूँढके लावे ॥
वह टूँढ काम अपनेही हम रङ्ग हमेशा ।
दिलदेके उसको तवही अपने रूप बनावे ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
भावार्थ—भौरा स्वयं ही आकर कीड़ेको रंग लगाता है बारबार अपनी आवाजको कीड़ेके कानमें डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि, कीड़ेका पहिला रूप रंग बाकी नहीं रह जाता। गुरुके शब्दसे उसका रूपरंग शीघ्रही बदल जाता है। वो कीड़ा भौरोंके ध्यानके या उसके शब्दके दूसरी बात नहीं देखता, भूंग भी उसे आप ही टूँढकर अपने पास लाता है, अपनी ही इच्छासे सदा अपने रंगका बनानेकी चेष्टा करता है वो अपना दिल देकर अपने रूपका बना लेता है। उसे दिलदे जो दिलदार हो। वो चाहें हिन्दू हो या मुसलमान हो, पर उसका खरीदनेवाला हो ॥
हैं कोट लाख सदमें कोई एकही मेरा ।
जहाँ जाके बारबार भूङ्ग करता है फेरा ॥
वही कीट जेहल अपनेसे गुरुबात न माने ।
तब जाके पास उसके भूङ्ग करता है डेरा ॥
कहता है कीट तुझको लगी आन खराबी ।