कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरे । १६-गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञता करे । १७-कुल फलदायक वस्तुओंको तुच्छ जाने । १८-स्वच्छरूपसे विचार करे ।
समस्त मानषिक गुण हों, जो तीन गुण हैं-काम, क्रोध और बुद्धि सो उस बुद्धिसेही समस्त देवतागण हैं, काम क्रोधसे समस्त पशुगण हैं । क्रोधसे नार-कियोंका शरीर है । मनुष्य तीनों गुणोंसे विभूषित है । यदि यह बुद्धिकी ओर, ध्यान दे तो देवता है । यदि यह काम क्रोधही को ओर झुके तो पशु है, क्रोध को ओर झुके तो नारकी है । इस कारण इसको उचित है कि, बुद्धिकी ओर ध्यान देकर मनुष्यताकी श्रेणीपर अधिकृत होकर हंसस्वरूप हो जावे उसीको मनुष्य कहते हैं ।
बीजक साखी ।
कबीर - मानुष जन्म पायके, चूके अबकी घात ।
जाय परे भवचक्रमें, सह्यो घनेरी लात ॥ ११२ ॥
कबीर साहिब कहते हैं कि, मनुष्य जन्म पाकर जो अबकी चूक गये तो फिर भवचक्रमें पड़ो वहाँ अनेको लाते खाओ यानी अपने उद्धारके बिना किये मर जायेंगे तो भव सागरमें पड़ जाओगे वहाँ अनेकों देहोंको धरकर सुख दुख भोगते फिरों ॥ ११२ ॥
कबीर - दुर्लभ मानुष जन्म है, होय न दूजी बार ।
पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुर न लगै डार ॥ ११४ ॥
मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, दुवारा नहीं होता यह जानते हो कि, फल पककर जब पेडसे गिर जाता है तो फिर वो डार पर नहीं लग सकता ॥
कबीर - मानुष हो कोई मुवा नहीं, मुवासो डंगर धूर ।
कोई जीव ठौरन लागियो, भयो सो हाथी घोर ॥ १०८ ॥
जो मनुष्य बनकर अमर बन गया वही मनुष्य है, जिसने मनुष्य होकर भी अपना बचाव नहीं किया मरा ही वो मनुष्य नहीं निरा पशु है । जो अपने ठिकाने पर नहीं पहुँच सका वो चँटीसे लेकर हाथी तक बनता चला जाता है । कभी छुटकारा नहीं पाता ॥ १०८ ॥
कबीर - पाँच तत्त्वको पूतला, मानुष धरिया नाम ॥
एक तत्त्वके बिचले, व्याकुल भया सब ठाम ॥ २३ ॥
पृथिवी, पानी, तेज, वायु आकाश इन पाँचों तत्वोंका बना हुआ पुतला यह देह है जिसका मनुष्य नाम रख छोड़ा है । एक तत्त्वके विछुरते ही सब जगह व्याकुल हुआ फिरता है यानी इसे राम तत्त्वका भान नहीं रहा इस कारण भटकता फिरता है ॥ २३ ॥