भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मुक्ति लेले । रानीने कहा कि, मैं न अपनी मुक्ति चाहती हूँ न नाक कटवाती हूँ यद्यपि उसने समझाया पर रानीने न माना । कुछही दिवसोंके बाद वह दुष्ट किसी महापापमें फँसा । किसी महादोषमें पकडा जाकर राजाके समक्ष लाया गया जाँच होने लगी । लोगोंने पहचान लिया कि, यह वही मोडा है जो नाक कटवाकर देश बाहर किया गया था । जाँचके पीछे राजाने जाना कि, उसने मुझसे उस धोखेबाजीसे अपना प्रति शोधलिया । मैंने उसकी नाक कटवाई थी । उसनेभी मेरी नाक कटवाली । तब राजाने उस मोडेको जीवितही पृथ्वीमें गड़वा दिया । फिर नकटापंथके लोग तितिर-बितिर हो गए । यदि वह कुछ दिवसोंपर्यन्त और जीवित रहता तो कदाचित नाककटाईका कार्य भी प्रचलित रहता ।

वेदपशु ।

इस संसारमें चार वेद हैं । वे पूर्वदेशको दिये थे उनके अभाव पश्चिम देशवासियोंको प्रदान किए गए । इस आठोंकी आज्ञापर समस्त मनुष्य चल रहे हैं । वेदपशु वे हैं जो वेद तथा पुस्तकोंको पढ़ते हैं, वेदोंके यथार्थ तात्पर्यसे पूर्णतया अनभिज्ञ हैं । वेदका तात्पर्य तो अन्य है । मनुष्योंको अन्य उपदेश देकर वहका देते हैं । वेदपशु एक अर्थ निकालता है । जिसपर सहस्रों नर पशु विश्वास करके सत्य मानते हुए प्रशंसा करते कहते हैं कि, वाह वाह स्वामीजी ! आपने जो अर्थ किया वोही सत्य है । दूसरोंने जो अर्थ किया वह कदापि सत्य नहीं है । लोग प्रसन्न होकर कहते हैं कि, धन्य स्वामीजी ! आपके समान अर्थ और कौन कर सकता है ? आपके समान पहले न कोई हुआ और न होगा । समस्त नर पशु मिलकर प्रशंसा करते हैं । वेदपशु सुन सुनकर घमंड करता हुआ कहता कि, वास्तवमें मैं ऐसाही जानी हूँ । इस एक वेदपशुके पीछे सहस्रों तथा लाखों नरपशु लगे हुए प्रशंसा किया करते हैं । इस वेदपशुको भलीभाँति फुलाकर घमण्डी करदेते हैं । वह वेदपशु ऐसा फूल जाता है कि, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनता, समझता है कि, मैं वेदपाठियोंमें प्रथम श्रेणीका पण्डित हूँ । यद्यपि उसको वर्णमालाकी सुध भी नहीं है । वेदके वास्तविक तात्पर्यको वह क्या समझे ? वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ कहे हैं । एक अर्थ नहीं वरन् अनेक अर्थ हैं । शब्दोंके समस्त अर्थोंमेंसे एक अर्थको अपनी इच्छानुसार चुनके वेदमंत्रका अर्थ करके लोगोंको समझाता हुआ समस्त नर पशुओंको अपनी ओर खींचता है । इसी प्रकार वेदपशु लोगोंको अपने जालमें फँसाता है । जितने वेदपशुके शिष्य हैं सब वेदपशु हैं । इन सब वेदपशुओंके भाँति-भाँतिके ध्यान

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