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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

प्रह्लाद वचन, फिक्रिया सिद्धान्त, शिष्टका वचन विद्याभिमानियोंका आधार

वचन, ३—शान्त बुद्धि, ४—प्रत्यक्ष पारख ५—प्रत्यक्ष सुख ये शीलकी पांच प्रकृतियां हैं ।

विचारकी पांच प्रकृतियां—१—अस्ति नास्तिपदका निर्णय करना, २—यथार्थ ग्रहण करना, ३—व्यवहार शुद्ध रखना, ४—शुद्धभावना रखना ५—सच्चि तता (ज्ञान और विज्ञानकी प्राप्ति) करना ये हैं ।

सत्यकी पांच प्रकृतियां—१—निर्णय, २—निर्बन्ध, ३—प्रकाश, ४—स्थिरता, ५—क्षमा । इन्हीं पांचतत्त्व और तीन गुणों और पचीस प्रकृतियोंकी देह थी । इस शरीरमें यह ेवे परवाह और बन्ध रहित था । ने कोई इच्छा थी न विषयवासनाका बन्धन एव न पशु वृत्तिही थी, बरन इसका बड़ा प्रभाव और प्रकाश था । जब इसने अपने प्रकाशको देखा तो सोचने लगा कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं, मेरा रूप और गुण अनुपम हैं । ऐसा संकल्प होतेही इसको परम आनन्द प्राप्त हुआ, उस आनन्दमें यह अचेत हो गया, अपने आपकी कुछ भी सुधि नहीं रही । इसी अचेता अवस्थाका नाम ब्रह्म सच्चिदानन्द रख लिया । यह महान् सुषुप्तिकी अवस्था थी । जब यह ऐसी सुषुप्तिकी अवस्थामें आ अचेत हुआ तो इसके पक्के तत्व गुण और प्रकृति आदिक सब पलट गये । पक्कीसे कच्ची देह होगई ।

स्थूल देह ।

पाँच कच्चे तत्व तीन गुण और पचीस प्रकृति—धैर्यसे आकाश उत्पन्न हुआ, दयासे वायु निकल पड़ी, शीलसे अग्नि प्रगट हुई, विचारसे जलका प्रादुर्भाव हुआ, सत्यसे पृथिवी बन गई, पक्के तत्वसे बने हुये येही कच्चे तत्व हैं । इनके तीन गुण ये हैं—पृथिवी और जलसे सतो गुण हुआ, अग्नि और वायुसे रजोगुण हुआ, आकाशसे तमोगुण स्थित हुआ । उन्हीं पाँच तत्व और तीनों गुणोंका मेल होकर पचीस प्रकृतियाँ प्रगट हुईं ।

कच्चे तत्वकी पचीस प्रकृतियाँ—१ आकाशकी पाँच प्रकृति १ काम, २ क्रोध, ३ लोभ ४ मोह, और ५ भय ।

२—वायुकी पाँच प्रकृति—१ चलना, २ बोलना, ३ बल करना, ४ सकोचना और पसरणा ।

३—अग्नि तत्वकी प्रकृति—१ आलस्य, निद्रा, ३ भूख ४ तृषा और ५ जम्हुआई ।

४—जलकी पाँच प्रकृति—१ रक्त, २ मूत्र, ३ प्रसेब, ४ लार और ५ बिन्द (बीर्य) ।

बुल्लेशाह और शरई

५—पृथिवीकी पाँच प्रकृति—१ अस्थि, (हाड) २ मांस, ३ नाड़ी, ४ चर्म, (त्वचा) ५ रोम ।

इन्हीं तत्व गुण और प्रकृतियोंकी कच्ची देह बनी है इस कारण इसका देह हुआ । हंस देहसे उलटी यह स्थूल देह उत्पन्न हुई, इसी को मनुष्य नामक स्थूल देह कहने लगे इसके प्राप्त होतेही अहंकार उत्पन्न हुआ, इसने अपनेको सबका स्वामी समझा । सुषुप्तिसे उत्थित होतेही दृष्टि उठाकर देखनेसे अपनी छाया दीख पड़ी, वह स्त्रीके स्वरूपमें स्थित हुई । उसीका नाम इच्छा हुआ । यह कामनाओंसे भरी हुई है । यह जीव एकसे दो हुआ इसी कारण नाम ब्रह्म और माया हुआ । दोनोंके संयोगसे स्त्रीको गर्भ रहा उससे तीन पुत्र उत्पन्न हुये, ब्रह्म अन्तर्धान हुआ ।

स्थूल सृष्टि ।

इस जीवसे मन उत्पन्न हुआ, ज्योति मनसे हुई, ज्योतिसे तीनों गुण प्रगट हुए. रजोगुण ब्रह्मा, सतोगुण, विष्णु, तमोगुण शिव हुआ. इस प्रकार यह जीव पक्केसे कच्चा हुआ । पीछे चौरासी लाख योनिकी कल्पना की । आपही आप सब योनियोंमें प्रवेश कर रहा है, आपही जगत है आपही ईश्वर है । अज्ञानताके कारण अपने आपको नहीं जान सकता । अविद्याके भवचक्रक्रममें पड़कर अन्धकारमें बन्ध हो गया । अज्ञान हुआ, अब व्याकुल होकर विचार करने लगा कि, मेरा कर्त्ता दूसरा कोई है । भिन्न कर्त्ताके निश्चय करतेही मिलनेकी इच्छा बढ़ी । अब तो जप, योग, तप आदिक नाना प्रकारकी युक्तियाँ करने लगा पर सफलता नहीं हुई । कुछ तेदेख नहीं पड़ा, तो कहने लगा मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है । वह बेचून बेचरा किसी प्रकार जाना नहीं जा सकता । उसी बेचून बेचराके वर्णनमें सर्व वेद, शास्त्र ग्रन्थ, किताब आदि बनाए । ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी उसकी पहचान नहीं हुई । कभी कहता है निर्गुण, कभी कहता है सगुण ऐसे भ्रम और धोखेमें पड़ा । यह तो हिन्दुओंका सिद्धान्त हुआ ।

मुसलमानोंका सिद्धान्त सुनो अर्थात् नहीं खुदा, है खुदा, सब धोखे और भ्रमका कलमा पढ़ने लगे ।

इस प्रकारसे जगतसे ईश्वर, ईश्वरसे जगत्, ऐसे नाना सिद्धान्त बनने लगे । सब मनुष्य भ्रममें पड़कर अविद्याके अन्धकारमें भटक रहे हैं । किसीको कुछ भी नहीं सूझता न पता लगता है । इस जीवको कहीं शान्ति नहीं मिलती सब प्रकार दुःखही दुःख उठा रहा है ।

यदि किसी पर विश्वास करे तो उसका खण्डन हो जाता है, न विश्वास

मूतकाचार्योंके शिष्य, उपदेशके अयोग्य

करे तो नष्ट भ्रष्ट होता है, किसी प्रकार सुख नहीं मिलता । यह इस प्रकार आवागमनके रहटमें पड़ा कि, कभी ऊपर जाता तो कभी नीचेको पतित होता है, कभी तो ब्रह्म सच्चिदानन्द बन जाता है, कभी महान् दरिद्र नीच अवस्थाको प्राप्त होता है । किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती, न श्रेय पदको प्राप्त होता है । सदा बन्धनमें ही पड़ा रहता है ।

इसने सहस्रों युक्तियों की तथा करता जाता है, इस कारण इसने नवधा भक्ति, योग युक्ति, षट् दर्शन, छयानबे पाखण्ड आदि नाना प्रकारके मार्ग प्रगट किये, सहस्रों प्रकारके धर्म और मजहब स्थित किये । अनन्त सिद्ध, साधु, पीर, पैगम्बर, औलिया, अम्बिया बीत गये । किसीको अपने यथार्थ स्वरूपमें मिलनेकी राह न मिली । एक दूसरेसे कपट छल करके धोखेमें डाले देते हैं, स्वयं अन्धे बने हैं दूसरोंको मार्ग बतलाते हैं । अन्धे अन्धेको राह बतावें तो दोनों मुंहके बल गिरे । एक राह भूला हुआ पुरुष दूसरेका पथदर्शक बने तो उसकी जैसी गति होगी, वैसेही नाना प्रकारके मतवादियोंकी है । यथार्थमें किसीको मालूम नहीं होता कि, सत्य और असत्य क्या है ?

प्रपंचसे छूटनेके साधन ।

जो कोई सन्त गुरुकी सेवा करे, जिसपर सत्यगुरुकी दया हो उसी पर सत्य परमात्माकी भी कृपा होती है, जिससे पारख गुरुकी प्राप्ति होती है, पारख गुरुके प्राप्त होतेही सब भ्रम और धोखे नष्ट होकर सत्य पदकी प्राप्ति हो जाती है, अपने सत्य स्वरूपको पा लेता है और जहांसे पतित हुआ था उसी स्थान पर फिर पहुँच जाता है ।

पक्के तत्त्वकी प्राप्ति—जब यह जीव पारख पदपर स्थित हो जाता है तो इसके एक अनेकका भ्रम नष्ट हो जाता है । सब दौड़ धूप छूट जाती है, पारखसे ही मन और बुद्धि स्थिर और शुद्ध होते हैं । इसका आवागमन दूर होता है । पक्के तत्त्वकी प्राप्ति होती है । कच्चे तत्त्वका सम्बन्ध छूटता है, पारख गुरुसे मिल कर गुरु रूप हो जानेमें कुछ भी सन्देह नहीं रहता ।

हंस कबीर और दूसरोंमें भेद—हंसदेह तथा पक्के और कच्चे तत्व पर ध्यान देकर विचार करनेसे प्रगट होगा कि, हंस कबीर और दूसरोंमें क्या भेद है ? हंस कबीर सब विषय वासनाओंसे मुक्त होते हैं । दूसरे विषयके बन्धनसे बाहर नहीं हो सकते, सहस्रों युक्तियों किया करते हैं पर बन्धनमेंही पड़े रहते हैं । चौरासीके जीवको सत्यमार्ग नहीं मिलता, अब अचेत हैं । लोगोंका सत्यमार्ग नहीं ऋषि मुनियोंको यह बात स्वप्नमें भी प्राप्त नहीं होती कि, यथार्थ क्या है ?

प्रामाणिकता—यह बचन सत्यगुरु सत्य कबीरका ज्यों का त्यों अनुवाद किया है। जिस किसीको परमात्माने दूरदर्शिता शुद्ध और सूक्ष्म विचार तथा तीव्र बुद्धि प्रदान की हो वही विचारे और समझेगा। जब खूब समझ जायगा तो उसे ज्ञान हो जायगा कि, स्वसम्बेदको और किताबों पर किस प्रकार श्रेष्ठता है? इसमें कौसी सूक्ष्म और अगम्य बातें लिखी हैं, जिससे सारा संसार अचेत है जिसके पथदर्शक था उपदेशक केवल हंस कबीरही हैं।

कथन—कबीर साहब कहते हैं कि, जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा उसकी दशा बाल, मूक, जड़ और पिशाचके समान हुई। यह पतित होकर इन अवस्थाओंमें पड़ा अपने सत्य स्वरूपको एकदम भूल गया। इस बातकी तनिक भी सुधि न रही कि, मैं पहले क्या था और अब क्या हो गया हूँ।

समस्त संसार और उसके कार्य—जब यह इस प्रकारसे उन्मत्त हुआ एकसे अनेक हो गया, नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प होने लगे, नानारूप दृश्य आने लगे, जिस प्रकार पागलोंको भ्रम करके नाना प्रकारके स्वरूप दिखाई देते हैं वह उनसे लड़ता झगड़ता और बकबाद किया करता है। एकको सत्य दूसरेको असत्य ठहराता है, एकको छोड़ता है दूसरेको ग्रहण करता है इस प्रकार अनेकोंको ग्रहण करता और छोड़ता है, स्थिर नहीं होता। अपने जाननेमें पागल होशमें अच्छाही करता है। पर सचेत और बुद्धिमान् पुरुषोंके जाननेमें वही पागल होता है। ज्ञान सुषुप्ति और अज्ञान सुषुप्ति दोनों उन्मत्त अवस्थाही हैं, इसी प्रकार तत्त्व-मसिके तीनों पद झूठे हैं, जो कुछ यह कहता और सुनता है सब उसी प्रकार निर्मूल होते हैं कोई ठीक नहीं। यावत् मतमतान्तर हैं सब ऐसेही भ्रमके ऊपर खड़े हैं। जिस अवस्थामें यह संसारही अचेततामें रचा गया है तो उसके कर्म और वाणी बचन सब वैसेही भ्रम और अज्ञान संयुक्त होंगे, उनका माननेवाला बुद्धिमान् विद्वान् अथवा सचेत नहीं समझा जा सकता। इस कारण यह संसार अचेत और अज्ञान है, इसके सारे कार्य अचेतताके ही हैं।

निर्गुण सगुण भ्रम—यह जितना योग, युक्तियाँ, यज्ञ, जप, तप, भजन, भक्ति आदिक करता है सबका यही परिणाम है कि, ब्रह्म सच्चिदानन्दके पदको पहुँच जावे पर हंस देह नहीं पा सकता, इसकी समझमें यह बात नहीं आती इस संसारमें जितने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर हुये हैं और होंगे किसीमें यह सामर्थ्य नहीं कि, वह यथार्थ पदको बतला सके; सबके सब सगुण निर्गुणमें पड़े हुये हैं, निर्गुण और सगुण सब भ्रम और धोखा है सब इसी निर्गुण और सगुणके बन्धनमें रहा करते हैं, इससे बाहर निकालनेवाला कोई सत्य पथ दर्शक नहीं दीखता।

परमात्माके तुल्य, साधुओंके दर्शनका फल

छाया वासना—यह अपने जानते तो वासनाको त्याग देता है, मनको मार लेता है पर यथार्थमें न तो इसका मन मरता है न वासनाही नष्ट होती है, वासना सर्वदा इसके सङ्ग बनी रहती है । सब ओरसे ज्ञानका सूर्य मध्याह्नको पहुँचता है तो इसकी वासना जो यथार्थमें इसकी छाया है, इसके शरीरमें गुप्त हो जाती है, बाहर नहीं दिखाई देती पर सर्वतः इससे अलग नहीं होती । ज्ञानरूपी सूर्य नीचेको ढलने लगता है तो वासनारूपी छाया फिर प्रगट होने लगती है यह उस छायरूपी स्त्रीसे प्रेम करने लगता है सदैव उसको अपने हृदयमें लगा रखता है, इस कारण वह इससे दूर नहीं होती ।

उसका साथ—यद्यपि यह अपनी तपस्या, भजन भक्ति, और ज्ञानसे पूर्णताको पहुँच जाता है, बहुत ऊँचे पदको प्राप्त करता है तो भी वासना इसको खींच लेती है पूर्वकी अवस्थामें डाल देती है, इसी कारण यह तत्त्वभसिके तीनों पदमें फँस गया है, बाहर निकलनेकी राह नहीं पाता । वासना ही माया है, यही उसकी छाया है यही इसकी प्यारी स्त्री है, यही इसको पकड़ कर नचाया करती है । उसका इससे छूटना कठिन है, इसको पक्के तत्वका घर नहीं मिलता, सदा कच्चे तत्वमें बंधा रहता है ।

कबीरसाहबका शब्द ।

कहु वैकुण्ठ कहाँ रे भाई ।

कितना ऊँचा कितना नीचा केती है चौड़ाई ।

अटकल पञ्चो भरमत डोलें कौन महलको जाही ॥

जिस साहबने किया पसारा ताको चेतत नाहीं ।

करत फिरे सगरी बद फेली चारों गई भुलाई ॥

कोइ कोइ पहुँचे ब्रह्मलोकको धरि माया ले आई ।

आन पड़े यम कालके फन्दे फिरि फिरिगोता खाई ॥

इस प्रकार यह जीव दुःखी और बिकल हुआ इसको कुछ सूझता नहीं कि क्या उपाय करें ?

कर्म उपासना भ्रम है—यह अपनीही भूलसे अपने स्वरूपसे भ्रष्ट हुआ स्वयं चौरासी लाख योनिकी कल्पना की आपही प्रत्येक योनियोंमें मारा मारा फिरता है । समस्त संसारमें आपही व्यापक हो रहा है अपने भूलसे आपको नहीं पहचानता । इसको कितनाही सिखलाया जावे नहीं सीखता, अपने हठको नहीं छोड़ता मन इसको जिधर भटकाता है उधरही ठोकर खाता फिरता है, आपही सब कौतुक कर रहा है, अपनेही कौतुकको आप नहीं जानता । कर्म उपासना,

साधुओंके भोजन देनेका फल

योग और ज्ञान असत्य हैं उसी प्रकार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष निर्मूल और जल तरङ्गवत् हैं।

गजल ।

भूल मत यार यह शराब सुरआब । पिये हुयेमस्त दिल किया है कबाब ॥
झूठ को सच जान गलतीसे । यह खयालात सारे नकश बर आब ॥
पञ्च हंकार है तमाशए दिल । होते और जाते रहते मिसल हबाब ॥
वार सब रह खबर न पार कहै । कौन जानै सो बरतरीन जनाब ॥
लौलियां ह्विस जो जिस्मानी । कर दिया सारे शहरको खराब ॥
और इन्सान किस हकीकत में । औलिया अम्बिया अल्लाह ए हबाब ॥
अस्ल इसरार जाने आजिज कौन । दिल जो चाहे सो राग रङ्गो रबाब ॥

बटमार—जितने जीवन्मुक्त कहलाये सात ज्ञानभूमिकाके अनुरागी हुये किसीका छुटकारा न हुआ । इस कारण यह है कि, उन लोगोंने मनुष्यके यथार्थ धर्म न जाने धर्मके स्वरूप न पहचाने सबके सब एक दूसरेकी चाल पर चले आते हैं, सत्य बातको कोई स्वीकार नहीं करता । यदि कोई सत्यकी ओर झुके तो दूसरे लोग उसको भटका कर फिर अंधेरेमें डाल देते हैं इसको सत्यकी चाल पर नहीं चलने देते । सचार्ई रूपी मार्गमें अनेक बटमार लुटेरे हैं इस कारण सबही डूब रहे हैं ।

चार प्रकारके आनन्द ।

१ अज्ञानानन्द—जो सांसारिक रागद्वेषमें प्रवृत्त हो परलोक तथा ईश्वरी भयसे अचेत रहे, मदिरापान करता हो, मांस खाता और व्यभिचार तथा विषय-भोगमें फस रहा हो देहको सच जानकर उसीके शृंगारमें लगा हुआ हो, सदा स्वाद और विषय लम्पटताका अभिलाषी रहे ।

२ ज्ञानानन्दका—स्वरूप है कि, स्थूल सूक्ष्म और कारण—जो तीनों देह हैं इनके स्वरूप और तीनों अवस्थाको जानें, पांच तत्वके पञ्जीकरण को जानें, चारों अन्तःकरणका स्वरूप जानें, मायाकी उपाधियोंको त्याग करें, समझें कि, सब मायासे हैं, चेतन ज्ञानके सत्यसारमें आनन्द रहे अपने स्वरूप आत्माको श्रेष्ठ मानता रहे उसीमें अहम्भाव (अर्थात् वह मैं ही हूँ) भावना रख वारम्बार अभ्यास करें ।

३ विज्ञानानन्द—अवस्थामें क्रिया कर्ता और कर्म कुछ शेष नहीं रहता आत्मा स्वयम् प्रकाश विज्ञानानन्दमें मग्न रहता है और यह विज्ञान हंस सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।

४ परमानन्द—वह है कि, सुरतीको सत शब्दमें लीनकर देवै सत लोकमें प्रविष्ट हो । यह पदवी सबसे उत्कृष्ट है । स्वसम्बेद इसीकी प्रशंसा करता है । इससे बढ़कर कोई पदवी नहीं है इस आनन्दको पानेपर इसके आगे सब आनन्द तुच्छ हैं । उक्त तीन पदवीमें जीवमुक्ति कहलाती हैं असत्य हैं । यह परमानन्द पद सत्य है ।

तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन ।

यह जीव अपने यथार्थ स्वरूपको भूलकर झोंई को साई कहने लगा, अन्वेषण करते करते थक गया, भी चक्करमें पड़ा, योगी, जड़म सेवड़ा आदिके पास गया, जीव ईश्वरका तत्व पूछने लगा. उन्होंने इसे कर्म उपासना ज्ञान और साधनोंमें लगाया, नानाप्रकारके माहात्म्य बुनाये । चित्त चला बुद्धिने निश्चय करलिया, अहङ्कार उठा इस अहङ्कारकी गांठ पड़ी तो इसमें ऐसा विचार हुआ कि, हम सबसे पहलेही तरेंगे । इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी सब धोखेमें पड़कर आवागमनमें प्रवृत्त हुये हैं ।

गुरुओंने जो झूठे विचार बतलाये सब मनुष्योंने उन्हींको सच करके मान लिया । उन्हीपर ऐसा निश्चय किया कि, कोई पारख पदको भी समझावें तो भी कोई नहीं मानता । जहाँ मन बुद्धिकी पहुँच नहीं वहाँ ब्रह्मका खोज क्यों कर होगा ? न कहीं, ब्रह्म न कहीं ईश्वर, न अल्लाह न खुदा न राम न रहीम, यह सब जीवके संकल्प मात्र हैं । एक यह जीव सत्य है, सब झूठ हैं, जहाँतक यह दौड़ता गया वहाँतक इसी प्रकार मानता गया । जहाँ पर यह थककर बैठ गया, वहाँ परब्रह्मका स्वरूप समझ लिया । जिसको इसने ब्रह्मका स्वरूप निश्चय कर लिया बोही इसका भ्रम है । इसका भ्रमही ब्रह्म ठहर गया । इस प्रकार यह भुलाकर चौरासीके बन्धनमें पड़ा तत्त्वमसिके तीन पदोंमें जकड़ा गया ।

(१) त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन ।

इस त्वं पदमें सबविषयी बंधे हुये हैं, इसको विशेष अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं । जो खाना पीना स्त्री प्रसङ्ग करना, भोगविलास पसन्द करता है, अपने जात्याभिमानमें रहता है, वेद शास्त्र और गुरुको नहीं मानता, बुद्धिमानों और ज्ञानियोंकी निन्दा करता है, साधुओंका ठठुा करता है. उनसे कहता कि, यह अभागे हैं उत्तम सांसारिक सुखोंको छोड़कर धक्के खाते और दुःख उठाते फिरते हैं । मृगनैनीके सुखका आनन्द उनके भाग्यमें नहीं है । मुक्ति कोई पदार्थ नहीं केवल मनकी भ्रममात्र कल्पना है । जब मृत्यु होती है तभी मोक्ष हो जाती है, जबतक शरीर है तभीतक सब कुछ है, पीछे कुछ भी नहीं रहता. जिस प्रकार वृक्षसे पत्ता गिर

जाता है वह फिर वृक्षमें नहीं लगता इसी प्रकार संसाररूप वृक्षमें शरीररूप सब पत्ते लगे हैं। शरीर गिरा तो फिर कुछ शेष नहीं रहता। इस कारण शरीरको दुख देना महान् मूर्खता है। इस अपरोक्ष अज्ञानके दो प्रकार हैं—एक अपनी इच्छासे और दूसरा पर इच्छासे। जो अपनी अज्ञानतासे हो उसे विशेष अपरोक्ष-अज्ञान कहते हैं। जो दूसरोंकी इच्छासे अथवा दूसरोंके बचन पुस्तक आदियोंके सुनने और पढ़नेसे दृढ़ हो उसे समान अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं।

दूसरेका नाम परोक्ष अज्ञान है, इसको समानाधिकरण बोलते हैं। जो इस अज्ञानमें होता है वह ईश्वरको अपनेसे भिन्न जानकर नाना प्रकारके साधन और तप आदिक करता है, इसके भी दो प्रकार हैं, एक सांसारिक, दूसरा पारलौकिक पारलौकिक। प्रथममें—सांसारिक कामनाओंकी पूर्णताके लिये देवताओंकी पूजा और उपासना भक्ति करते हैं। मनमें यह आशा रखते हैं कि, स्त्री, पुत्र, लक्ष्मी मान बड़ाई आदि प्राप्त हो। दूसरा वह है कि, जो अपने उद्धारके लिये नानाप्रकारके यम नियम आदिको धारण करते हैं। मनमें आशा रखते हैं कि, मेरी मुक्ति हो जावे। यह दूसरे प्रकारका साधन करनेवाला पुरुष बड़ा भाग्यवान् है इसीमें सब साधुलोग लगे हैं। नानाप्रकारके संयमों और तपस्याओंमें निमग्न हो रहे हैं। त्वंपदमें सब आज्ञानी लोग फँसे हैं इस अज्ञानका कुछ पारावार नहीं, अनन्त हो रहा है। कर्म उपासना, योग, ज्ञान आदिक जो कुछ तीन लोकमें तो रहा है वो सब लौकिक पारलौकिक विचार अज्ञानकी दशामें है। इसी अज्ञानमें सब पड़े हुए डुब डुब कर रहे हैं।

तत्पदसे दो प्रकारके ज्ञानका कथन।

तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान समान और विशेष है। जो उपाधि और ऋद्धि सिद्धि सहित हो। जिसको विशेष ज्ञान होता है, उसीको ईश्वर कहते हैं। जिसको समान ज्ञान होता है वह ज्ञानी कहलाता है, वह अपने सब गुण दोषोंको जानकर दूसरोंके भी सुख दुःखको जानता है, सब बातका विवेक रखता है। तीनों अवस्थाएँ और सब विषय वासनाके कर्तव्योंको मिथ्या समझता है, सारे संसारको स्वप्नके समान नाममात्रका जानता है, सारे संसारको स्वप्न और सङ्कल्पके समान निश्चित करता है, अपने आपको सत्य और शेष समझता है, इस ज्ञानका नाम परोक्ष ज्ञान है। यह भी दो प्रकारका है। एक तो यह कि, जिसमें सब प्रकारकी शक्ति ऋद्धि सिद्धि आदि साथ हो; जिसमें ईश्वरके छः ऐश्वर्य हों दूसरे ज्ञानका नाम समान ज्ञान है, इस ज्ञानवाला सब प्रकारके ऐश्वर्यको तुच्छ मिथ्या और दुखदाई एवं उपाधिमात्र समझता है। उसका निश्चय होता है कि,

तिमिर लिंगको रोटीका फल, शास्त्र जैन साहित्यका दृष्टान्त

मैं त्रिगुणसे परे हूँ, मुझे कोई भी नहीं जान सकता, मैं सर्वका साक्षी द्रष्टा हूँ । यह परोक्ष ज्ञानका वर्णन हुआ ।

अब अपरोक्षका वर्णन सुनो । अपने शरीरके अन्तर बाहरके दोषोंको भली प्रकार जानता है इसी प्रकार दूसरोंके शरीरकी उपाधिको भी जानता है, तीनों अवस्थायोंके दुःख सुखसे भली प्रकार विज्ञ होकर जाग्रत स्वप्न-सुषुप्तिकी सब सुधि रखता है । इन्द्रियोंके कर्म्मोंसे भली प्रकार विज्ञ होता है सारे संसारको नाशमान् और अपनेको अविनाशी जानता है, अपने आपको सब शक्तिमान् समझता है, सब प्रकारकी सामर्थ्य रखता है, होनीको अनहोनी और अनहोनीको होनी कर देखलाता है । इस प्रकार षट् ऐश्वर्य जिसमें हो वह जगत्का ईश्वर कहलाता है, सब प्रकारकी ऋद्धि सिद्धि उसके आधीन होती है, सृष्टिकर्ता करके पूजा जाता है । यह प्रथम अपरोक्ष ज्ञान कहलाता है ।

अब दूसरे अपरोक्ष ज्ञानका वर्णन करता हूँ—जिसको तीनों कालका ज्ञान हो, जिसकी दृष्टिसे तीनों काल उठ गये हों, जिसकी दृष्टिसे सर्व त्रिकुटी नष्ट होगई हो, जिसका कुछ भी शेष न हो, मैं सत्य हूँ मुझसे अतिरिक्त सब असत्य है, अर्थात् तीन कालमें आत्मभिन्न कुछ हुआही नहीं । ऐसे ज्ञानीको शिव कहते हैं ।

असिपदसे दो प्रकारके विज्ञानका कथन ।

जो कोई जान बूझकर जड़ अवस्थाको धारण करले और ऐसा बन जावे जैसे मछप मतवाला बनजाता है, एक अनेककी सुध नहीं रहती है, परम आनन्दमें निमग्न होजाता है । इसमेंभी दो प्रकार होता है—एक तो असत्यविज्ञानी जो बनावटसे ऐसी दशाको धारण कर लेता है अर्थात् मनमें द्वैतका लेश रहता है परंतु हठसे अथवा बनावटसे दम्भ करके ऊपरसे बाल मूक पिशाच जड़की अवस्था दिखलाता है । सत्य विज्ञान धार्मिक पुरुष वह है जिसकी दृष्टिमें द्वैतका लेश भी न हो आपहीको जगत्, आपहीको ब्रह्म, आपही को कर्ता, आपहीको कर्म्म, आप हीको द्रष्टा, आपहीको दर्शन, आपहीको दृश्य, जो कुछ बोलता और सुनता है सो आपही है, आपही डोलता है आपही डोलाता है अपनीही लीला सब प्रगट है । दूसरा कोई दृष्टि नहीं आता है जिसकी दृष्टिमें ऐसा हो उसे सत्य विज्ञानी कहते हैं । यही तत्वमसिके तीनों पदका संक्षेप विवरण है ।

पारखपद ।

अब स्वसम्बेदके अनुसार पारख पदका वर्णन करता हूँ — तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और मिथ्या हैं । उनमें अन्धकार रहता है जिसके कारण अपने

स्वरूपकी सूक्ष्मताको नहीं जान सकते। तत्वमसिके तीनों पदोंके ऊपर पारखपद है। वही सत्यपद है, उसीसे जीवोंकी मुक्ति होती है। जो कोई पारख पदको प्राप्त कर लेता है वह पारखी कहलाता है। पारखी गुरु सब धर्म और धोखेको नष्ट कर देता है। एक, अनन्त, बाहर, भीतर, पिण्ड, ब्रह्माण्ड सबके भेद कसर खोटको भिन्न २ करके परखा देता है। पारख पदको प्राप्त हुआ पुरुष फिर कभी उससे पतित नहीं होता। तत्वमसिके तीनों पदको इस जीवने मानकर निश्चय कर रखा है इस कारण ये सत्य दीखते हैं, नहीं तो यथार्थमें तीनों पद निर्मूल और भ्रम मात्र हैं क्योंकि जो कुछ इसने अपने मनसे मान लिया निश्चय कर लिया वो सब भ्रम और धोखा है यह मन आशा तृष्णामें फँसाकर भव सागरमें डुबाने-बाला है, इसके उपदेशसे किस प्रकार तर सकता है? इससे तरनेकी आशा रखना मृगतृष्णाके जलसे प्यास बुझानेके समान है। पारख गुरु हंसपद प्राप्त होता है। तत्वमसिके अभिमानी शुद्ध स्वरूपको नहीं पा सकते, सब प्रकारसे अहङ्कारको त्याग करही पारख गुरुसे सत्य स्वरूप प्राप्त होता है।

जन्म मरणकी सात शाखायें।

जीव अपने सत्यस्वरूपसे पतित होकर विरह और प्रेममें फँसकर अपने यथार्थ स्वरूपको विस्मरण कर देता है। फिर इधर उधर दूँढने लगता है कुछ आधार नहीं पाता तो थककर कहने लगता है कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है बेचून बेचरा है। इस प्रकार आदिमें जब जीवोंने नानाप्रकारकी कल्पना और निश्चय करके कुछ प्राप्त नहीं किया तो दुखीके दुखी रहे, शिव ब्रह्मा और सनकादिक ऋषियोंने नाना प्रकारकी वाणी बनाई सब जीवोंको विरह लगाया सब जीवोंको वाणीका विष चढ़ गया। जब उसमें अचेत हुए तब आशा और भय अर्थात् रौचक और भयानकमें नाना प्रकारकी आशा करके फँसे उसीको जन्म मृत्युका बीज कहते हैं। उसी बीजसे सात शाखायें उत्पन्न हुईं।

ॐ श्रीं रं सौं ऐं ह्रीं क्लीं।

अ इ उ ए व ह म

आशा तृष्णासे ये सातबीज उत्पन्न हुये, इन बीजोंमेंसे प्रत्येककी भिन्न २ सात शाखायें हुईं। १ कर्म, २ उपासना, ३ योग, ४ ज्ञान, ५ उत्पत्ति, ६ स्थिति और ७ नाश। इन सातोंमेंसे प्रत्येककी सात शाखायें हुईं, जिनका विस्तार बहुत है पर यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ।

१ कर्मकी सात शाखायें—अ-अर्थात् कर्मकी नाना प्रकारकी रीतियाँ हैं— १ यजन, २ याजन, ३ अध्ययन, ४ अध्यापन, ५ दान, ६ प्रतिग्रह, ७ मैथुन।

यजन—इसलोककी, याजन—पर लोककी, अध्ययन—विद्याभ्यास करना, अध्यापन—अभ्यास कराना, दान देना, प्रतिग्रह (संग्रह करना—अर्थात् दान लेना) और मैथुन कर्मोंकी यही सात शाखायें हैं ।

२ उपासनाकी सात शाखायें—इ—अर्थात् श्री बीज—१ शिव, २ विष्णु, ३ गणपति, ४ सूर्य, ५ शक्ति ६ राम, ७ कृष्ण ये शाखायें हैं, इनके सात करोड़ महामंत्र हैं । जारण, मारण, वशीकरण, उन्मत्तता, आकर्षण स्तम्भन मोहन येही फल हैं ।

३ योगकी सात शाखायें—इसका बीज रं है, १ हठयोग, २ कुण्डलिनी योग, ३ लम्बिका योग, ४ तारक योग, ५ लय योग, ६ अमनस्क योग, ७ साङ्ख्य योगये शाखायें हैं । समाधि फूल और सिद्धि फल है ।

४ ज्ञानकी सात शाखायें—सोहं बीजका ज्ञान अंकुर है उसकी सात शाखायें हैं—२ शुभइच्छा, २-स्वविचार, ३-तनुमानसा, ४ सत्त्वापत्ति, ५ असंशक्ति, ६-पदार्थाभाविनी, ७ तुरिया । परोक्ष ज्ञान फूल है । अपरोक्ष ज्ञान फल है ।

५ उत्पत्तिकी सात शाखायें—ऐं बीज है, उत्पत्ति अङ्कुर है, उसकी सात शाखा हैं—१ शब्द, २ स्पर्श, ३ रूप, ४ रस, ५ गन्ध, ६ इच्छा और ७ वासना ।

शब्द—बादलके गरजनसे और नाना प्रकारके शब्दोंसे कीड़े, मकोड़े और मँढक, जोंक आदि उत्पन्न होते हैं ।

(२) स्पर्श—मैथुनसे जो जीव उत्पन्न होते हैं ।

(३) रूप—अनल पक्षी आदिक बहुतसे जीवधारी केवल दृष्टिसे उत्पन्न होते हैं, वे सब रूप सृष्टि कहलाते हैं ।

(४) रस—इससे समस्त जलके जीवोंकी उत्पत्ति है, वृक्षोंके फलके कीड़ोंकी उत्पत्ति भी इससे ही होती है ।

(५) गन्ध—इससे उषमज योनिकी उत्पत्ति होती है ।

(६) इच्छा सिद्धि योनि है—योगेश्वर लोग अपनी इच्छासे चाहें जैसा स्वरूप धारण करलें जहाँ चाहें चले जाय, एकका अनेक स्वरूप बना लें, लघु दीर्घ आदिक हो जावें, इसीको सिद्धि योनि कहते हैं ।

(७) वासना—वासनासे देवता भूत प्रेतादिककी देह बनती है, यही सात प्रकारकी उत्पत्ति है । स्त्री फूल है । पुरुष फल है ।

दूसरा दृष्टान्त

६ स्थितिकी सात शाखायें—(ह्रीं) अथवा (म) स्थितिका बीज है। १ अन्न, २ पानी, ३ घास आदि, ४ मिट्ठी, ५ पत्ती, ६ फूल, फल आदि।

७ नाशकी सात शाखायें—क्लीं—अथवा हूँ—यह नाशका बीज है, इनसे सात शायायें निकली हैं। वह ये हैं—१ पृथिवी, २ जल, ३ वायु, ४ अग्नि, ५ पग, ६ हाथ, दांत। इसके अतिरिक्त नाशके लिये सहस्रों प्रकारके हथियार बने हैं, सो सब इन्हींके अन्तर्गत हैं।

जीवका भ्रम।

जीवने अपने सत्यरूपसे गिरकर इन्हीं सात शाखाओंमें बासा लिया। इन्हींके वशमें पड़ा हुआ बारम्बार जन्म मृत्युको प्राप्त होता है, कहीं सुख नहीं मिलता। यद्यपि यह बहुत युक्तियाँ करता है पर इसके छूटनेकी आशा नहीं होती, जिस गुरु अथवा आचार्यके निकट जाता है, वेही अपने स्वार्थ और मान बड़ाईके वश होकर नाना प्रकारकी रीति रसम और पाखण्डोंमें फँसाकर अपने आधीन करनेकी इच्छा करते हैं पर अज्ञानियोंको कुछ भी सुधि नहीं होती कि, मुक्ति किसे कहते हैं? और बन्धन किसको है?

भवसागरमें जितने लोग अपनेको ज्ञानी और ध्यानी समझते हैं, जीवन्मुक्त मान रहे हैं, विदेह मुक्तिकी आशा रखते हैं वे सब मिथ्या भ्रममें पड़े हैं। वे लोग जिनको जीवन्मुक्त कहते हैं वे कर्मोंके पाशमें बँधे बारम्बार भगवत्सागरमें फेरा खाया करते हैं। यदि एक दरिद्रीका नाम राजा रख दिया जावे तो क्या वह इससे यह राजा हो सकता है? उसकी दरिद्रता नष्ट हो सकती है।? कदापि नहीं। वह नाममात्रको राजा कहलाता है, यथार्थमें नहीं कहला सकता। इसी-प्रकार वेदने जिनको जीवन्मुक्त बतलाया है वे सब जीवन्बन्ध हैं, जीवन्मुक्त कोई नहीं। वे सब कर्मके रहटमें पड़े हुये हैं; जैसे रहटमें बरतन भरके नीचेसे ऊपरको आता है ऊपर आके फिर नीचेको जाता है, इसी प्रकार यह जीव भी कर्मोंसे ईश्वर पदको प्राप्त करता है, नीचे पड़के नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकता है। इन सात शाखाओंमें पड़ा हुआ पुरुष छूटनेका मार्ग भी नहीं पाता।

संसारके जीवधारी इन्हीं सप्त शाखाओंमें पड़े हुये बारम्बार आवागमन करते हैं। यही कालपुरुषका पंजा है जिसमें पड़े हुये जीवका छूटना दुस्तर है।

सर्व मत मतान्तरको जो ऋषि मुनि जीवन मुक्ति और विदेह मुक्तिकी कथा किया करते हैं। उनकी जीवन मुक्ति हुमा पक्षीके समान है। जिसको न किसीने कभी देखा, न उनका निवास स्थान ही जानते हैं, जो कि, जाकर देख लें, केवल लोगोंकी बनावट और कल्पनाकी ही बातें हैं।

रोटी देनेसे हजरत ईशाका भी शाप चला गया

कबीर साहब सर्वदाससे कहते चले आते हैं कि; किताबोंके द्वारा न किसीकी मुक्ति हुई है न होगी, न इन नाना प्रकारके मतोंके गुरुवा लोकोंके उपदेशसे कोई बन्धनसे छूटा है, न छूटेगा ।

कितने पक्षपाती धर्मद्वेषी नानाप्रकारकी युक्ति और प्रमाणसे सिद्ध करना चाहते हैं कि, अधिकारी लोग विशेष कारणोंसे प्रगट होते हैं पर विचार-नेकी बात है कि, जबतक सांसारिक कामना न हो तो आवागमनमें आनेकी क्या आवश्यकता है ? । कोई किसी प्रकारकी युक्ति, तप आदि क्यों न करे पर जबतक सत्य गुरुकी कृपा न होगी तबतक वासनासे निवृत्त नहीं हो सकता ।

गर्भमें आनेका कारण, मुख्य करके पूर्व जन्मका पाप है । क्योंकि, गर्भ पूर्ण नर्क है । जबतक गर्भमें जाना आना लगा है तबतक ज्ञानी अज्ञानीमें किसी प्रकारका भेद नहीं है । कोई थोड़े दिनोंके लिये, राजा बन गया, कोई दरिद्री रहा तो इससे क्या हुआ ? कोई ज्ञानी हुआ कोई अज्ञानी, किसीको थोड़ी विद्या हुई, किसीको उससे अधिक पर जबतक आवागमनका भ्रम न छूटा तबतक उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ सब बराबर हैं ।

कैवल्य शरीरसे लेकर स्थूल देह तक सभी नाशमान हैं निर्मूल हैं, किसी में अंधकार है, किसीमें प्रकाश, किसीमें थोड़ा ज्ञान है, किसीमें बहुत, किसीमें थोड़ी सामर्थी है, किसीमें बहुत, कोई थोड़े दिन जीता है कोई दीर्घायु होता है । क्या हुआ ? कैसे ही पदको प्राप्त हो पर जबतक इन पांच देहोंके अहंकारसे न छूटेगा तबतक सुखको न प्राप्त करेगा ।

ये पांचों अहंकार काल पुरुषके हैं । इन्हीं द्वारा बिधि निषेध दोनों कर्मके भेद बनाये हैं । इसके भेदको हंस कबीरके बिना दूसरा कोई नहीं जान सकता, जो जीव गर्भमें आते हैं वे सब काल पुरुषके कैंदी हैं । निष्पाप कोई कभी कैंद नहीं हो सकता, जो कैंदी होता है उसका कुछ न कुछ अपराध होता है । निर-पराध कभी भी बन्धनमें नहीं आ सकता ।

केवल अपराधियोंके लिये ही कारागार बनाया गया है । न्यायी प्रभु कभी किसीको बिना अपराध दण्ड नहीं दे सकता । उसके जितने कार्य हैं सब न्याय संयुक्त हैं । जो अपराधी होता है वह जेलखानेके दारोगाके आधीन किया जाता है यह उसको जंजीरोंमें बांधकर जेल खाने (कारागार) में कैंद कर देता है । ये तीनलोक काराग्रह हैं धर्मराय इस जेलखानेका अधिपति है । तो अपराधियोंको कर्मरूप जंजीरसे बांधकर मातृ गर्भमें डाल देता है । वहाँ पर जीव हाय २ करता है, पुकारता है कि, हे प्रभो ! मुझ दोनको इस दुःखसे छुड़ा, मैं

लंगोटी देनेसे चीर बड़ा, सहन शीलता और धैर्य

तेरी शरण हूँ । बाहर निकलकर तेरे भजनके सिवा कुछ न करूँगा । इस प्रकार प्रार्थना कर यह जीव गर्भसे बाहर होता है अपने बचनको भूल जाता है, विषय वासनामें पड़कर मोह भत्सरमें भत्त हो जाता है ।

साखी – कबीर-उर्ध्व कपाले लटकता, वह दिन करले याद ॥
जठरा सेतो राखिया, नाहिं पुरुषकर बाद ॥

मुसद्दस – जिनके डरसे सारे मे हुआ रआशा ॥
एक थिर न रहे खिर गये मानिन्द बताशा ॥
ले मौत पकड़ उनको बटेराको जो बाशा ।
कर बन्दगी बे आज की तब देख तमाशा ॥
अज्ञ सबके इबादत्से किया खुशक जसदको ।
सुरपति भी डरे जिनसे करे दिलमें हसद्को ॥
वह भी न कोई पाया परम पुरुष पद्को ।
सब भूल गये अपने अमल नेक ओ बद्को ॥
सो सारे हक अन्देश किया मस्कने शाशा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥
अलिभो आमिल् कामिल् बडे सरकार कहाये ।
बे पारख पद पर तत्व आनन्द न पाये ॥
माकूल और मन्कूलमें दिन रात गँवाये ।
बे बूझ न सूझे पढ़ गुरु ज्ञान भुलाये ॥
अरबी फारसी तुर्की संस्कृत औ भाषा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥
केते करते दावा बख्शिदये अमाके ।
दादार जमादार जमीनो जमाँके ॥
शक्निन्दए बाज हों कवी पीलदमाके ।
लूँ फेर छूटे तीर जो तकदीर कमाँके ॥
गर बूझ हकीकत तो रती और न माशा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥
बे मुशिदे हकजूर्के बद खोय दवाँ है ।
खुद बीन खुदीसे रहै तारीक रवाँ है ॥
पादोस्त बहर ओस्त इस आजिजका मकाँ है ।

सिद्ध महात्मा और विद्याभिमानी

क्या जाने जाहिल वह साहिल सो कहाँ है ॥
क्या इल्मो अमल आमिल कामिल होवे लाशा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥

जगत्को असत् प्रतिपादन

यह जगत् असत् है । यद्यपि यह सत् होकर भासता है तथापि मृगतृष्णाके जलके समान असत् है । असत्के ग्राहकोंको सत्य पदार्थ नहीं मिल सकता, सांसारिक पदार्थोंके अभिलाषी संसारमें ही रहेंगे । जिन लोगोंने संसार तुच्छ समझ लिया है उनका संसारसे प्रेम नहीं होता । यह संसार उसी मृगतृष्णाके जलके समान है, जो हिरणको दौड़ाकर मार डालता है । गर्मीके दिनोंमें जब हिरण प्यासा होता है, जलके लिये इधर उधर भटकने लगता है तो उस समय उजाड़ मैदानमें उसे दूरसे जल दीख पड़ता है । मृग, जल जानकर उसकी ओर दौड़ता है पर उसके निकट पहुँचते पहुँचते वह जल फिर उसको उतनीही दूर आगे दीख पड़ता है । इसी प्रकार अनेक बार दौड़ते दौड़ते हिरण थककर गिर पड़ता है, प्राण त्याग देता है । इस प्रकार इस संसारके भोग विलास त्रिविध तपोंसे तपे हुये, सुखके प्यासे जीवोंको, सुखदाई दीख पड़ते हैं पर इसकी प्रवृत्ति विषयोंमें होती है तो सुख मिलता नहीं—पर तृष्णा अधिकसे अधिक होती जाती है, अन्तमें निष्फलताके साथ मर कर आवागमनको प्राप्त होता है ।

सांसारिक वासनाके बद्ध पुरुष बारम्बार संसारी पदार्थोंकी इच्छा करके उसीमें फँसे रहते हैं, उसीके लिये प्रयत्न करते हैं, उसीके प्राप्त होनेसे आनन्द समझते हैं । ऐसे पुरुषोंका अंतःकरण मलीन रहता है, वे ईश्वरको प्राप्त नहीं हो सकते । क्योंकि, ईश्वरको प्राप्त होनेके लिये उनको प्रयत्न करनेका समयही नहीं मिलता । ऐसे लोग अपनी आयुको सांसारिक व्यवहारोंमें व्यतीत कर देते हैं । जो लोग सत्संग करते हैं उनको संसार बाजीगरके खेलके समान जान पड़ता है । जिस प्रकार बाजीगर नाना प्रकारके कौतुक दिखलाता है, कभी बाटिका लगा देता है, कभी उसे अन्तर्धान कर देता है । कभी किसीको मृतक करके जीवित कर देता है, कभी कुछ कभी कुछ आश्चर्ययुक्त कार्य कर दिखाता है पर उसकी सब जादूगरी मिथ्या होती है, उसी प्रकार इस संसारके सारे कार्य आश्चर्यमय हैं । उस सर्व शक्तिमान् बाजीगर (जगत्कर्त्ता) ने इस संसारकी रचना की है । जिस प्रकार बाजीगर कौतुक करता करता तमाशेको समेट लेता है उसी प्रकार ईश्वर जगत्का प्रलय कालमें प्रलय कर देता है । अज्ञानी जन इस कौतुकको देखकर आश्चर्य मानते हैं, पर जो पुरुष बाजीगरके कौतुकका

भेद जानता है, कभी धोखेमें नहीं आता। यहाँ पर मैं कई एक दृष्टान्त लिखता हूँ, जिससे लोगोंको संसारकी असत्यता प्रमाणित हो।

प्रथम दृष्टान्त।

सन् १८५७ में जब कि, हिंदुस्तानमें राज विद्रोह हुआ था, दिहली शाह अपराधी ठहराये जाकर शहरसे निकाल दिये गये थे। शहर लूट लिया गया था। उसी समय, महाराजा कपूरथलाके दीवान, रामजसमल नामक खत्रीको एक पुस्तक, लूटमें मिली थी जो स्वयम् शाहजहाँ बादशाहके हाथकी लिखी हुई थी, उसमें एक बात इस प्रकार लिखी थी।

बादशाह लिखता है कि एक दिन एक बाजीगर नाना प्रकारके कौतुक दिखाने वह एक तलवार लेकर आकाशकी ओर उड़ गया। ऊपर जानेके समय वह कहता गया कि "मैं खुदाके साथ लड़ाई करने जाता हूँ"। थोड़ी देरमें देखतेही देखते, वह आखोंसे छिप गया। अधिक समय न लगा होगा कि, ऊपरसे उसका धड़ (जैसे, हाथ, पोंच, आदिसे लेकर समस्त शरीरके) एक एक टुकड़े होकर नीचे गिर गया। अब उसकी स्त्रीने कहा कि, मेरा पति मर गया है, मैं सती होऊँगी। बादशाह तथा अनेक लोगोंने बहुत समझाया पर स्त्रीने एककी भी न मानी, लकड़ियोंका ढेर लगाकर अपने पतिके अंगोंको लेकर सती होगई। उसके जल जानेके पीछे थोड़ी देर बाद बाजीगर आनन्दमें भग्न नीचे उतरा। अपनी स्त्रीको न देखकर बादशाहसे अर्जकी कि, मेरी स्त्रीको बुलवा दिया जाय। बादशाहने कहा कि, तेरी स्त्री तो तेरी लाशके साथ जलकर राख होगई, पर उस बाजीगरने एकका भी कहना न माना। अन्तमें अपनी स्त्रीको ऊंचे शब्दसे पुकारने लगा, तो वह स्त्री बादशाही अटारीपरसे बोली कि, मैं महलमें हूँ। उसने पुकारा कि, चली आ। वह आनन्द पूर्वक हँसती हुई आगई।

बाजीगरका यह कौतुक देख बादशाह प्रसन्न हुआ। उसे बहुत कुछ पारितोषिक देकर बिदा किया।

द्वितीय दृष्टान्त।

सन् १८३० ई० में मैं अपनी जन्मभूमि आजमगढ़में थे। वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। आजमगढ़में मच्छर नहीं थे। लोगोंसे पूछनेपर लोग कहते कि, यहाँके मच्छरोंको एक बाजीगरने बांध दिया है। मैंने पूछा कि, किस प्रकार? लोग कहते कि, एक समय यहाँके राजाके पास एक बाजीगर आया। उस समय राजा अपने राजमहलमें था। राजाको खबर पहुँची तो राजाने कहा कि, इस समय बाहर निकलनेसे मच्छर बहुत दुख देंगे। क्योंकि, मेरे शहरमें मच्छर

बहुत हैं । बाजीगरने कहला भेजा कि, मैं शहर भरके मच्छरोंको बाँधे देता हूँ, राजा साहब आकर मेरा खेल देखें । बाजीगरने अपने मंत्रके बलसे शहर भरके मच्छरोंको क़ैद कर दिया । राजा बाहर आया । बाजीगरने बहुत प्रकारके कौतुक दिखाये पीछे वही कौतुक दिखलाया वैसाही कर्तव्य किया जैसा कि, शाहजहाँ बादशाहके वृत्तान्तमें लिखा गया है । अन्तमें राजाने उपरोक्त बाजीगरको कतल करनेकी आज्ञा दी । अंतमें गिड गिडानेपर भी, अपने प्राणको बचाता हुआ न देखा तो बाजीगरने शाप दिया कि, “ऐ राजा ! तू कोढ़ी होकर बहुत दुःख पावेगा, तेरा राज्य नष्ट हो जावेगा, महान् कष्ट भोगकर प्राण त्यागेगा ।” पीछे बाजीगर तो मारा गया पर राजाको भी ठीक वैसेही विपत्ति, दुःख और कष्टोंका सामना कर प्राण त्यागना पड़ा ; जैसा कि, बाजीगरने शाप दिया था ।

बाजीगरकी समाधि—उपरोक्त बाजीगरकी समाधिपर एक खजूरका वृक्ष उगा जो कि, सीधा शहतीरके समान खड़ा था । राजाके वंशवाले उसपर खारूयेकी गिलाफ लगाते और उसकी पूजा किया करते थे । यदि वे उसकी पूजा नहीं करते तो उनको नाना प्रकार के विघ्नोंद्वारा बहुत दुःख हुआ करता था । नियत समयपर समाधिपर मेला लगा करता था, जिसमें हजारों आदमी इकट्ठे होते थे । राजाका किला टूट फूट कर दरियामें गिरता जाता था । राजाकी संतान, किला खजूर का वृक्ष, मेला और समाधिकी पूजा, मैंने अपनी आँखोंसे देखी थी ।

अनुमान होता है कि, उपरोक्त बाजीगर वही था, जिसने शाहजहाँ बादशाहको कौतुक दिखलाया था क्योंकि, बादशाह और राजा एकही समयमें हुए थे ।

राजाके परिवारका बालक—मूख राजाने विचारा था कि, यदि इस बाजीगरको मार डालूंगा तो यहाँके मच्छर ऐसे ही बँधे रहेंगे । अज्ञानतासे यह न सोच सका कि, जिस शरीरके सुखके लिये मैं ऐसा अनर्थ करता हूँ वह कबतक रहनेवाला है । इसका सुखही क्या है । उस पापका जो फल उसको प्राप्त हुआ वो तो ऊपर लिखा गया पर उसकी संतान भी महान् दुःखमय जीवन व्यतीत कर रही थी । उसी राजाके वंशका एक विद्यार्थी मेरे साथ पाठशालामें पढ़ने आया करता था जो महान् दुःखी था । उस समयके आजमगढ़ जिलाके मजिस्ट्रेट और कलेक्टरको धन्य है जिन्होंने, उसकी सब दशा देख उसके खानदानका हाल जान दया कर उसके पोषण पालनके लिये एक तहसीलदारीकी जगह दिलवा

गुरु दर्शन विधि

दी, जिससे उसे जीवन यात्राका सहारा लगा। यह हाल मैंने अपने कानों सुना कितनीही बार अपनी आँखोंसे देखा।

समन्वय — इस हालके लिखनेसे मेरा यह प्रयोजन है कि, उपरोक्त बाजीगरके खेलसे इस संसारकी दशा प्रगट करूँ कि, यह संसार निरञ्जन नटका खेल है, बड़े बड़े महात्मा सिद्ध, साधु गते इसमें पड़े खा रहे हैं।

पथिकका दृष्टान्त।

एक पथिक कहीं चला जाता था। एक दिन सन्ध्या होनेतक ठहरनेका कोई स्थान न मिला, पथिक घबड़ाकर शीघ्र किसी गाँवमें पहुँचनेकी कोशिश करने लगा। बहुत प्रयत्न करके जल्दी जल्दी मार्ग समाप्त करनेपर भी रात हो जानेतक कोई ग्राम न मिलनेसे और भी अधिक घबराया। अन्तमें बहुत व्याकुल होनेपर दूरसे एक दीपकका प्रकाश दिखाई दिया। उसे देखकर कुछ धैर्य हुआ, मनमें अनुमान किया कि, अवश्य कोई ग्राम है। अब बहुत शीघ्रतापूर्वक चलकर ग्राममें पहुँचा। वहाँ जाकर देखनेपर जान पड़ा यह तो ग्राम नहीं शहर है। ऊँचे ऊँचे मकान खड़े हैं, दीपकोंका प्रकाश फैल रहा है, दोतरफी दूकान लगी हैं, लोग अपने अपने कारबारमें लगे हुए हैं। बाजारमें सब प्रकारके पदार्थ मौजूद हैं। अतः पथिकने अपनी आवश्यकतानुसार पदार्थ लेकर, आनन्दपूर्वक भोजन किया, पानी पीकर सो गया। दिन भरका थका था ही ऐसी गाढ़ निद्रामें सोया कि, दूसरे दिन सात बजे आँख खुली। तो देखा कि, न तो शहर है, न मकान। न दूकान है, न कोई आदमी ही है वरन् शून्य सान जंगल पड़ा है।

पथिक यह कौतुक देख अत्यन्त आश्चर्यमें आकर, सोचने लगा कि, या परमात्मा यह क्या बात है? जिस शहरमें ८-१० घण्टा पहले मैंने पदार्थ खरीदे, इस समय उसका कुछ भी पता नहीं। इसी आश्चर्य सागरमें डूबा हुआ चलते चलते जब कुछ आगे गया तब क्रमशः दूसरे मुसाफिर मिलने लगे। पथिकने लोगोंसे पूछना आरम्भ किया कि, यहाँ पर एक शहर था, जिसके बाजारमेंसे खानेके पदार्थ लेकर रात मैंने भोजन किया उसी शहरमें सो गया पर इस समय उसका कुछ भी पताही नहीं। लोग उत्तर देते कि, क्या कहते हो? यहाँ तो कभी भी न शहर बसा, न बाजार लगा, न यहाँ आदमीही रहते हैं! हम लोग सर्वदासे इस जगहको ऐसाही देखते हैं। यह बात सुन सुनकर पथिक अचम्भमें आता था।

पथिकने जो नगर देखा था उसे गंधर्व नगर कहते हैं। गन्धर्वोंमें यह सामर्थ्य है कि, वे जो चाहें करलें। वे शहर बना लेते हैं पुनः जब चाहते हैं अन्तर्धान कर देते हैं। किन्हीं किन्हीं साधुओंमें भी ऐसी ही सामर्थ्य होती है कि, अपने

संकल्प द्वारा जो, पदार्थ चाहते हैं उपस्थित कर देते हैं फिर संकल्पसेही गायब भी कर देते हैं । यदि चाहें तो नियत समयतक स्थित भी रख सकें ।

कोलम्बसका अमेरिका प्रगट करनेका दृष्टान्त ।

नई दुनियाँ (अमेरिका) का प्रकाश कोलम्बस नामक जहाजीने किया था, जिसको ४०० वर्षके लगभग होता है । उसने चाहा कि, अपना जहाज उत्तर महासागरसे होकर भारतवर्षको ले जाऊँ । क्योंकि, दक्षिणसे तो अंग्रेजोंको मार्ग मालूमही है, उत्तरसे चलकर नया रास्ता निकालना अच्छा होगा । उसने सोचा कि, जब पृथ्वी गोल है तब चाहे दहिनेसे चलो, चाहे बायेंसे, अन्तमें एकही स्थानपर पहुँचना होगा । यह सोच विचार कर कोलम्बसने अपना जहाज उत्तरसे चलाया । जहाज महासागरमें पड़कर ऐसे स्थानपर जाने लगा, जहाँ पृथ्वीका भाग देख पड़ना भी कठिन हुआ । जहाज परके खानेकी सामग्री घटने लगी, यहाँतक कि, लोगोंने घोड़ोंको भी मारकर खा लिया, अन्तमें मनुष्योंको खानेकी बारी आई वरन् दो चार मारे भी गये । दो चार आदमियोंको मारकर खा लेनेके पीछे सबने आपसमें विचार करके यह निश्चय किया कि, कोलम्बसको भी मारकर खालो, उसीके कारण हमलोग इस विपत्तिमें फँसे हैं । जब कोलम्बसके मारनेकी युक्ति करने लगे तो कोलम्बसने सभोंसे कहा कि, एक दो दिन मुझे और जीवित रहने दो, यदि भूमि मिल गई तो अच्छा नहीं, तो मारकर खालेना । कोलम्बस मनमें बहुत घबड़ाया उदास हो जहाजको आगे चलाया । ईश्वरकी कृपा और लीला विचार करने योग्य है कि, जहाज बहुत दूर भी न गया होगा कि, समुद्रमें घास फूस बहे जाते देख पड़े । कोलम्बसके मनमें कुछ घैर्य हुआ, मनमें विश्वास हुआ कि, अब यहाँसे पृथिवी निकट है जिधरसे घास बही आती है पृथिवी उसी ओर है, यह अनुमान करके जहाजको भी उसी ओर चलाया । थोड़ेही दूर चलने पर अमेरिका' देश मिला जिसे कि अब नई दुनियाँ कहते हैं मिला ।

वहाँ पहुँचकर कोलम्बसने देखा कि, वहाँके लोग बड़े सरल सीधे और छल कपट रहित हैं, उनके पास धन बहुत है । कोलम्बसने दो चार तोप लगादी कई आवाजकी, जिसको सुनकर अमेरिकन लोग डर गये । उन लोगोंने आपसमें अनुमान किया कि, यह (कोलम्बस) सूर्यका पुत्र है उसकी पूजा करने लगे, उसकी आज्ञा दासके समान पूरी करने लगे । कोलम्बसने अमेरिकाका समाचार


१ इसी देशको नवीन शीक्षित लोग पाताल अथवा नागलोक कहते हैं बच्चोंको सिद्ध करनेके लिये बहुतसी युक्तियाँ भी दिखलाते हैं ।

सार, फकीर और शेख फरीदुद्दीन

युरोपमें भेजा, जिसको पाकर युरोपके कई एक सन्नाटोंने अपनी सेना भेजकर अमेरिका का बहुतसा भाग अपने आधीन कर लिया।

इस अमेरिकाको नई दुनियाँ बोलते हैं। वहाँके लोग बहुत सरल हृदय और छल कपटसे रहित थे। इससे प्रमाणित होता है कि, यह देश कोलम्बसके सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ था। उसका ऐसा सङ्कल्प हुआ कि, यह देश ऐसाका ऐसाही बना रहा, वही अबतक चला जाता है। इसको पहले कोई भी नहीं जानता था, इसकी रचना भी गन्धर्वनगरके समान है।

नारदजीकी कथा।

एक समय नारदजीने कठिन तपस्या की, जिसको देखकर इन्द्र भयभीत हुआ कि, नारद मेरा राज्य ले लेगा। इसी भयके कारण नारदजीकी तपस्याको नष्ट करनेके लिये कामदेवको भेजा। कामदेवने नारदजीके निकट जाकर शक्तिके अनुसार बहुतसी युक्तियाँ कीं पर मुनि कामातुर न हुये। पश्चात् इन्द्रके निकट गया कहा कि, नारदमुनि पर मेरा कुछ भी बल नहीं चलता, नारदजीने मुझे जयकर लिया। नारदजीको (कामके निष्फल होनेके कारण) अहङ्कार हुआ कि, मैं कामजीत हुआ, मेरे बराबर दूसरा कोई नहीं है। इसीमें नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प करते हुये इन्द्रके पास पहुँचे। वहाँ इन्द्रसे अपनी अपनी बड़ाई आपही करने लगे कि, मैंने कामको जीता। इन्द्रने कहा—क्यों न हो? आप जैसे तपस्वी, महात्मा ज्ञानीका काम क्या कर सकता है। इन्द्रसे यह अपनी प्रशंसा सुन नारदमुनि वहाँसे सीधे चलकर ब्रह्मलोकको पहुँचे। ब्रह्माजीने कुशल मङ्गल पूछनेके बाद पूछा कि, ऐ बेटा ! कहाँसे आ रहा है ? नारदजीने कहा मैं अमुक बनमें तपस्या कर रहा था, वहाँ काम मुझे छलने गया, पर मैंने उसको जीत लिया, इतना कहकर अपने तप तथा कामदेवका सब हाल कह सुनाया। यह बात सुनकर नारदजीको अभिमान देख ब्रह्माने कहा कि ऐ बेटा ! ऐसा अभिमान मत कर काम बड़ा बली है, उसके कारण बहुत लोग नष्ट भ्रष्ट हुये हैं। अबसे यह अभिमान मनसे निकाल दे, मेरे सामने कहा सो कहा, विष्णु भगवानके सामने भूलसे भी न कहना।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनी अनसुनी कर नारद शिवजीके पास गये। शिवजी बड़े प्रेमसे मिले। नारदजीने वहाँ भी अपनी वही बात चलाई, जिसको सुनकर शिवजीने कहा कि, यहाँ जो कहा सो कहा विष्णुके पास यह कभी न कहना। पर नारदजी शिवजीके वचनको भी न मानकर सीधे विष्णुलोकको गये, भगवान्ने बड़े प्रेमके साथ नारदका सत्कार कर कुशल मङ्गल पूछा।