भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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दी, जिससे उसे जीवन यात्राका सहारा लगा। यह हाल मैंने अपने कानों सुना कितनीही बार अपनी आँखोंसे देखा।

समन्वय — इस हालके लिखनेसे मेरा यह प्रयोजन है कि, उपरोक्त बाजीगरके खेलसे इस संसारकी दशा प्रगट करूँ कि, यह संसार निरञ्जन नटका खेल है, बड़े बड़े महात्मा सिद्ध, साधु गते इसमें पड़े खा रहे हैं।

पथिकका दृष्टान्त।

एक पथिक कहीं चला जाता था। एक दिन सन्ध्या होनेतक ठहरनेका कोई स्थान न मिला, पथिक घबड़ाकर शीघ्र किसी गाँवमें पहुँचनेकी कोशिश करने लगा। बहुत प्रयत्न करके जल्दी जल्दी मार्ग समाप्त करनेपर भी रात हो जानेतक कोई ग्राम न मिलनेसे और भी अधिक घबराया। अन्तमें बहुत व्याकुल होनेपर दूरसे एक दीपकका प्रकाश दिखाई दिया। उसे देखकर कुछ धैर्य हुआ, मनमें अनुमान किया कि, अवश्य कोई ग्राम है। अब बहुत शीघ्रतापूर्वक चलकर ग्राममें पहुँचा। वहाँ जाकर देखनेपर जान पड़ा यह तो ग्राम नहीं शहर है। ऊँचे ऊँचे मकान खड़े हैं, दीपकोंका प्रकाश फैल रहा है, दोतरफी दूकान लगी हैं, लोग अपने अपने कारबारमें लगे हुए हैं। बाजारमें सब प्रकारके पदार्थ मौजूद हैं। अतः पथिकने अपनी आवश्यकतानुसार पदार्थ लेकर, आनन्दपूर्वक भोजन किया, पानी पीकर सो गया। दिन भरका थका था ही ऐसी गाढ़ निद्रामें सोया कि, दूसरे दिन सात बजे आँख खुली। तो देखा कि, न तो शहर है, न मकान। न दूकान है, न कोई आदमी ही है वरन् शून्य सान जंगल पड़ा है।

पथिक यह कौतुक देख अत्यन्त आश्चर्यमें आकर, सोचने लगा कि, या परमात्मा यह क्या बात है? जिस शहरमें ८-१० घण्टा पहले मैंने पदार्थ खरीदे, इस समय उसका कुछ भी पता नहीं। इसी आश्चर्य सागरमें डूबा हुआ चलते चलते जब कुछ आगे गया तब क्रमशः दूसरे मुसाफिर मिलने लगे। पथिकने लोगोंसे पूछना आरम्भ किया कि, यहाँ पर एक शहर था, जिसके बाजारमेंसे खानेके पदार्थ लेकर रात मैंने भोजन किया उसी शहरमें सो गया पर इस समय उसका कुछ भी पताही नहीं। लोग उत्तर देते कि, क्या कहते हो? यहाँ तो कभी भी न शहर बसा, न बाजार लगा, न यहाँ आदमीही रहते हैं! हम लोग सर्वदासे इस जगहको ऐसाही देखते हैं। यह बात सुन सुनकर पथिक अचम्भमें आता था।

पथिकने जो नगर देखा था उसे गंधर्व नगर कहते हैं। गन्धर्वोंमें यह सामर्थ्य है कि, वे जो चाहें करलें। वे शहर बना लेते हैं पुनः जब चाहते हैं अन्तर्धान कर देते हैं। किन्हीं किन्हीं साधुओंमें भी ऐसी ही सामर्थ्य होती है कि, अपने