कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शौच या शुद्धि
चौ०— चले राव जहाँ बद्रीनाथा । सुत कलत्र रानी ले साथा ॥
साधुरूप हमहूँ करि लीना । राव संग तत्छन पग दीना ॥
गये नृपति जहाँ प्रतिमा साजा । भौति भौति कर बाजत बाजा ॥
कछुक द्रव्यले आगे राखा । विनय दण्डवत बहुविधि भाखा ॥
होत कोलाहल मङ्गल चारी । भौति भौति गावैं नरनारी ॥
बद्री परसि राव करि आसन । नृपति बैठो जाइ सिंहासन ॥
हम जीवनसे शब्द पुकारा । घर घर फिरचो सबनके द्वारा ॥
चैतो प्राणी शब्द संदेशा । चलो तहाँ जहाँ हंस नरेसा ॥
जहैंवाँ जाव बहुरि नहिं आओ । यकचित होय नाम लौलाओ ॥
सकल जीवसे कहो चित्ताई । एको जीव न हम पतियाई ॥
सात दिवस ऐसे करि बीता । कौतुक एक तहाँ हम कीता ॥
छन्द— गयो मन्दिर पास ततक्षण जहाँ बद्रीनाथ हो ।
रूप पाहन कीन पारस दीन मस्तक हाथ हो ॥
प्रीति निशि भिनुसार भव तब आय पण्डा पूजहीं ।
करत आरति भयो चकित देख द्विज चित बूझहीं ॥
सोरठा— आरति आय कुधातु, प्रतिमा यह कंचन भयो ॥
कहैं सकल सो बात, राव जाय सिर नायऊ ॥
चौ०— राजा सुनत हरषि चित दीना । प्रभु दया कोइ जान न लीना ॥
भयो अचम्भो लोगन सबही । लीला आप कीन जो अबही ॥
स्तुति करें बहुत हरषाई । सत्य भेद कोई जानत नाहीं ॥
राजा दल फेरा सब साधू । चले संत सब युत्थय बांधू ॥
राजा झारी लीने हाथा । सकल भेषको नायो माथा ॥
रानी साधुन चरन पखारे । राजा अपने कर जलढारे ॥
सकल भेष बैठे जेवनारा । जय जय मंगल होत अपारा ॥
तब हम तहैंवाँ बैठे जाई । पूरन शसि सम रूप दिखाई ॥
स्वेत अंग कीन्हो अति पावन । अधर बैठि सुकृत मन भावन ॥
देखि लोग सब भये अचम्भा । हर्षित राय चरन गहि थम्भा ॥
बहुतक साधु मम गूह आवा । ऐसा साधु हम नहिं पावा ॥
को तुम काहु कहाते आये । अपनो परचो कहो बुझाये ॥
सुकृत वचन ।
जो तुम पूछे राय सुजाना । अपनी कथा कहूँ सहिदाना ॥
अमर लोक ते पुरुष पठाये । जीव उबारन हम जग आये ॥
आये उत्तर दिशि चित भाये । श्री नगर तुर्म कारण आये ॥
बद्री नाथ आये तुम जहिया । हमहूँ संग आये नृप तहिया ॥
छन्द-- जीव सबसे कह्यो घर घर शब्द काहू ना गह्यो ।
गयो बद्रीनाथ मन्दिर चित्त मम हर्षित भयो ॥
दीन मस्तक हाथ तब जड़ रूप पारस कर लियो ।
प्रीति तुम यह देखि दृढ़ होय दरस अब तोहिको दियो ॥
सोरठा- भक्ति हेतु तुव अंग, साधु प्रीति तुव अंग अहै ॥
निशि दिन साधू संग, ताते चित तोहि राचेयो ॥
राजा वचन ।
चौ०- एतिक वचन राव सुन जबहीं । बिहँसि पदपंकज गहि तवहीं ॥
निशि गति रवि जिमि उगे अकासा । कोक शोक मिटि होत हुलासा ॥
यहि मर्याद दरस आनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चन्दा ॥
रानी राय चरन उर धारी । कृपा कीन मम विथा विसारी ॥
मोहि सनाथ कीन प्रभु पावन । हम अपकर्मी यम मन भावन ॥
अपना करि कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥
सकल जीव चकित मन भयऊ । नगर लोग सब देखन धयऊ ॥
तरुण वृद्ध बालक सब धाये । सबहीं देखि प्रदक्षिणा लाये ॥
संत वृद्ध बहु जुरे अपारा । स्तुति करहि सकल बहु बारा ॥
छन्द-- पाणि जोरिके राव ठाढे देहु पद मोहि पावनो ।
चरण कमल अधार तुम मोहि उभय और न भावनो ॥
छोड़ी नारि पुत्र पुत्री तुरी गज धन सम्पदा ।
राज काज कान छरडयो देखि पद तुम मनरता ॥
सोरठा- अब प्रभु तुम ते काज, यहि विधि मन मानिया ।
तज्यो लोक कुल लाज, सत पद चित अनुराग मोहि ॥
तात्पर्य - जब सत्ययुगमें कबीर साहब श्रीनगरमें प्रगट हुये वहाँके राजा राममोहन रायको (जो बड़ा विद्वान् वेदपाठी, वेदविधिपूर्वक कर्म करनेवाला और संत सेवी था) उपदेश देने लगे । पर राजाने विशेष ध्यान नहीं दिया । फिर राजा सब परिवार सहित बद्रीयात्राको चला तब कबीर साहब भी साधुके भेषमें उसके साथ हो लिये ।
जब राजा बद्रीनाथमें पहुँचकर दर्शन आदि कर अपने आवासपर आ निश्चित हो बैठा तब कबीर साहबने मंदिरमें जाकर मूर्तिके माथेपर हाथ रखा
जिसके प्रभावसे मूर्तितो पारसकी और मूर्तिके नीचेकी चौकी सोनेकी दीख पड़ी । सबेरा होनेपर पण्डालोग मंदिरमें गये । आश्चर्यमय कौतुक देख अचम्भित हो राजा आदि सबको दिखलाया पर किसीको यह ज्ञात नहीं हुआ कि, यह कौतुक किसका कर्तव्य है । अबभी राजाने सतगुरुको नहीं पहचाना ।
पश्चात् राजाने देश देशमें पत्र भेजकर साधुओंको निमंत्रित किया बड़ा भारी भण्डारा आरम्भ किया । साधुओंकी पंक्ति बंठी तो उनके मध्य कबीर साहब भी पूर्णचन्द्रके समान प्रकाशित पृथ्वीसे अधर बंठे हुये देख पड़े । ऐसी लीलाकी देख सब लोग चकित हो बारम्बार स्तुति करने लगे । राजाको पूर्ण विश्वास हुआ कि, इसी साधुसे मेरा उद्धार होगा । राजा रानी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो स्तुति करने लगे । राजाने विनय पूर्वक प्रार्थना करके पूछा कि, महाराज ! आप कौन हो ? कहाँसे एवं किसलिये पधारें हो ?
कबीर साहबने उत्तर दिया कि, हे राजन् ! हम अमर लोकसे आये हैं, जो हमारा उपदेश ग्रहण करेगा वह भी अमर हो जायेगा । यदि तुम्हें अमरलोक जाना है तो मेरे साथ चलो । राजाने सब संसारी राजवंश त्यागकर अपने साथ रानी और अनेक पुत्र तथा ( १७००० ) सत्रह हजार परिवार और प्रजाको साथ लेकर परम धामकी यात्रा की ।
१५ प्रश्न-संगका फल-सत्संग और कुसंगका फल कहिये ?
उत्तर - सत्संगके प्रतापसे बड़े पापी अधर्मी परम धामको गये । कुसंगसे बड़े २ तपस्वी महात्मा ज्ञानी नरकको अथवा नीच योनियोंको प्राप्त होगये ।
सत्संग अंगकी साखी ।
कबीर- संगति साधुकी, नित प्रति कीजे जाय ।
दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥ १ ॥
कबीर- संगतिसे सुख ऊपजे, संगतिसे दुख होय ।
कहैं कबीर जहाँ जाइये, साधू संगति होय ॥ २ ॥
कबीर- संगति साधुकी, कभी न निष्फल जाय ।
ज्यों पै बोवैं भूमिके, फूले फले अघाय ॥ ३ ॥
कबीर- संगति, साधुकी, हरे औरकी व्याध ।
संगति बुरी कुसाधुकी, आठों पहर उपाधि ॥ ४ ॥
कबीर- संगति कीजै साधुकी, जौकी भूसी खाय ।
खाँड भोजन मिले, साकर संग न जाय ॥ ५ ॥
दान देनेकी रीति
कबीर- संगति, साधुकी, ज्यों गंधीको पास ।
जो गंधी कछु देवे नहीं, तौ हू बास सुवास ॥ ६ ॥
कबीर- एक घड़ी आधी घड़ी, आधी हूमें आधि ।
संगति कीजै साधुकी, कटे कोटि अपराध ॥ ७ ॥
कबीर- मथुरा जा भावै द्वारिका, भावे बदरी नाथ ।
साधु संग हरि भजन बिन, कछू न आवै हाथ ॥ ८ ॥
कबीर- मेरा संगी दोय जनाँ, एक वैष्णव एक राम ।
वे दाता हैं मुक्तिके, वे सुमरावें नाम ॥ ९ ॥
कबीर- संगति साधुकी, जो करि जाने कोय ।
चन्दनवन चन्दन भया, वांस न चन्दन होय ॥ १० ॥
कबीर- मलया गिरिके पेड़में, सरप रहे लपटाय ।
रोम २ विष भीनिया, अमृत कहाँ समाय ॥ ११ ॥
कबीर- चन्दन जैसा संत है, सर्प यथा संसार ।
वाके अंग लपटा रहै, भागे नहीं विकार ॥ १२ ॥
कबीर- जाघर हरिकी भक्ति नहीं, सन्त नहीं मिहमान ।
ताघर यम डेरा किया, जीवत भया मसान ॥ १३ ॥
कबीर- राम तलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।
जो सुख साधू संगमें, सो सुख वैकुण्ठ न होय ॥ १४ ॥
कबीर- खाई कोटका, पानी पिये न कोय ।
जाइ परे जब गंगमें, तब गंगोदक होय ॥ १५ ॥
कबीर- मन पंछी भया, मन माने तहाँ जाय ।
जो जैसी संगति करे, सो तैसो फल पाय ॥ १६ ॥
कुसंगका अंग ।
कबीर- उज्ज्वल देखिये, बक ज्यों माँड़े ध्यान ।
धोरे बैठि चपेटिहै, यों लें बूड़े ज्ञान ॥ १ ॥
कबीर- भेष अतीतका, करतूत अपराध ।
बाहर दीसे साधु गति, माहि बड़ा असाध ॥ २ ॥
कबीर- वामी कुटे बावरा, सरप न मारा जाय ।
मूरख वामी ना डसे, सरप जगतको खाय ॥ ३ ॥
कबीर- बेटी ब्राह्मणकी, मांस शराब न खाय ।
संगति भई कलालकी, मद बिन रहा न जाय ॥ ४ ॥
दान देनेवालेका कर्तव्य, दया
दीक्षाकालके कर्तव्य ।
९६ प्रश्न—गुरु करने और दीक्षा लेनेके समय क्या क्या करना आवश्यक है ?
उत्तर—जो रीति और व्यवहार गुरु बतलावे वह करे । गुरुको प्रतिष्ठाके साथ वस्त्र आदि पहनवावे । उच्च आसनपर बैठकर, रुपया आदि सब यथाशक्ति भेट धरे । साधुओंको भण्डार दे जहाँतक अपनेसे होसके साधुओंको भेटादि देकर प्रसन्न करे । जिसने अपना सर्वस्व तन मन धन गुरुके अर्पण किया उसकासर्व कार्य सिद्धि हुआ । अपने गुरुका आज्ञाकारी रहना गुरुको गोविन्दसे बढ़कर मानना शिष्य का मुख्य कर्तव्य है ।
गुरु अंगकी साखी ।
कबीर—गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परणाम ।
कीट न जानें भूङ्गीको, गुरु करले आप समान ॥ १ ॥
कबीर—गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काको लागों पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय ॥ २ ॥
कबीर—बलिहारी गुरु आपने, घड़ि घड़ि सौ सौ बार ।
मानुषसे देवता किया, करत न लागी त्रार ॥ ३ ॥
कबीर—ते नर अंध हैं, गुरुको कहते और ।
हरि रुठेतें ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर ॥ ४ ॥
कबीर—गुरु हैं बड़े गोविंदते, मनमें देखु विचार ।
हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ ५ ॥
कबीर—गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीस दीजिये दान ।
केतिक भोंदू पछि मुये, राखि जीव अभिमान ॥ ६ ॥
कबीर—गुरु मुख गुरु आज्ञा सुने, छोड़ि देइ सब काम ।
कहैं कबीर गुरु देवको, तुरत करे परनाम ॥ ७ ॥
कबीर—उलटे सुलटे वचनको, शिष्य न मानै दुख ।
कहैं कबीर संसारमें, सो कहिये गुरु मुख ॥ ८ ॥
कबीर—गुरु और पारसमें, बडो अंतरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करे आप समान ॥ ९ ॥
कबीर—राम नामके पटतरे, देवेको कछु नाहिं ।
क्या ले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥ १० ॥
कबीर—निज मन तो नीचा किया, चरण कमलके ठौर ।
कहैं कबीर गुरु देव बिन, नजर न आवै और ॥ ११ ॥
जैन साहित्यका मेघकुमार
कबीर- तनमन दिया तो भल किया, शिरका जासी भार ।
जो कबूँ कहैं कि मैं दिया, धणी सहेगा मार ॥ १२ ॥
कबीर- जो दीसे सो बिनसे, नाम धरे सो जाय ।
कबीर सोई सत्य है, सत गुरु दियो बताय ॥ १३ ॥
कबीर- चित्त चोखा मन मसकला, बुद्धि उत्तम मति धीर ।
सो धीवान सोसंचरे, जो सत गुरु मिले कबीर ॥ १४ ॥
कबीर- सत गुरु बड़े जहाज हैं, जो कोई बैठे आय ।
पार उतारे औरको, अपनो पारसलाय ॥ १५ ॥
कबीर- विनु सत गुरु बांचे नहीं, फिर लोडे भव मांहि ।
भव सागरके बीचमें, सतगुरु पकड़े बाँहि ॥ १६ ॥
कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे मणिहि भुवंग ।
कहैं कबीर विसरे नहीं, यह गुरुमुखको अंग ॥ १७ ॥
कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे शाह दिवान ।
और कबीर न देखई, वाहीक ओर ध्यान ॥ १८ ॥
कबीर- चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा मांहि ।
तिस घर किसका चांदना, जाघर सतगुरु नाहि ॥ १९ ॥
कबीर- कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार ।
सतगुरु मिलिया बाहिरें, दीसे घोर अंधार ॥ २० ॥
कबीर- गुरु विचारा क्या करे, शिष्यहिमें है चूक ।
भावे ज्यों परमोधई, बाँस बजावे फूंक ॥ २१ ॥
कबीर- सेवक मुखहि कहावे, सेवामें दूढ़ नाहि ।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी माहि ॥ २२ ॥
कबीर- फल कारण सेवा करे, निशि दिन चाहे राम ।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चहे चौगुना दाम ॥ २३ ॥
कबीर- सेवक स्वामी एक मत, जो मतसे मत मिलि जाय ।
चतुराई रीझे नहीं, रीझे मनके भाय ॥ २४ ॥
कबीर- सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोई शिष्य जाय ।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समझाय ॥ २५ ॥
कबीर- गुरु बरजा शिष्य नाकरे, क्यों कर बाँचे काल ।
शु कहा बलि ना कियो, ताते गये पताल ॥ २६ ॥
कबीर- द्वार धनीके पड़ा रहे, धका धनीका खाय ।
कबहूँ धनी निवाजि है, जो दर छोड़ि न जाय ॥ २७ ॥
धर्मके चार बँरी
कबीर— साहबके दरबारमें, कमी काहुकी नाहि ।
बन्दा मौज न पावई, चूक चाकरी माँहि ॥ २८ ॥
कबीर— पूरा सतगुरु ना मिला, रहा अधूरा सिक्ख ।
स्वाँग यतीका पहन कर, घर घर माँगे भीक्ख ॥ २९ ॥
कबीर— गुरु किया है देहका, सतगुरु चीन्हा नाहि ।
भवसागरके बीचमें, फिर फिर गोता खाहि ॥
९७ प्रश्न— निर्गुणकी उपासना— यदि आप ब्रह्मा विष्णु शिवादिको अवतार मानते हुए देवताओंको बन्धनमें फँसे हुये मानते हो तो मैं बद्ध तथा अविभूत और भक्तोंका काय्यं करके फिर तिरोंहित होजानेवाले अवतारोंको स्थायी न जान निर्गुण निराकार परमात्माको मानता हूँ ।
उत्तर— एक ब्रह्म निर्गुण निराकार तुमसे किसने आकर कहा था ? यदि कहो कि, वेदने बतलाया तो वेदके समझाने वाले कौन ऋषि हैं जो वेद के यथार्थ भेदको समझा सके ? वेदके उपदेशक ब्रह्मादिक स्वयम् बद्ध हैं वे ब्रह्मको क्या जानें ? अतः उसका जानलेना एवं उपासना करना सहज नहीं है ।
जो कोई कहें कि, हम वेदको मानते हैं अवतारोंको नहीं मानते तो वह झूठा है क्योंकि, संसारमें दोही धर्म (मजहब) है एक तो सत्पुरुषका दूसरा काल पुरुष का । सो सत्पुरुषकी ओरसे सत्यपथ कालपुरुषकी ओरसे असत्यपथ है ।
इन दो धर्मोंसे कोई भी व्यक्ति किस प्रकार बाहर हो सकता है मुक्ति-कांक्षी सत्यपथ तथा नारकी कुमार्गमें लगे रहते हैं ।
९८ प्रश्न— अखाद्य एवं अपेयसे रत रहनेका कारण । मांस अहार और मछपीनेसे लोक परलोककी हानि है । लोग तो भी उसका सेवन नहीं छोड़ते, इसका क्या कारण है ?
उत्तर— जिसमें जो बुरी आदत पड़ जाती है वो उसका स्वभाव हो जाता है उसका छूटना अति कठिन हो जाता है । किसीको मांस खाने, किसीको मछपीने, किसीको जुआ खेलने, किसीको ठगी करने एवं किसीको तो चोरी करने आदि नाना प्रकारकी बुरी आदतोंका अभ्यास होते २ वह स्वभाव हो जाता है । उसके छोड़नेमें असमर्थ हो वारंवार उसीमें लगा रहता है । ऐसे मनुष्योंको भुक्ति मुक्तिका मार्ग नहीं मिल सकता क्योंकि, अशुभ काय्योंके छोड़े बिना कोई भी भक्ति मुक्तिका अधिकारी नहीं हो सकता । जैसे निम्बके कीड़ेको मिश्री और कन्द आदि अच्छे नहीं लगते वे निम्बसेही परितृप्त रहते हैं ।
प्रारब्ध और पुरुषार्थ
दृष्टान्त - उत्तर अमेरिकामें एक जातिके मनुष्य रहते हैं जिन्हें स्वयं मक्स बोलते हैं। वे नाटे होते हैं, उनका मुख्य भोजन मछली और पशुओंका मांस होता है। वहाँ अधिकतासे बर्फ पड़नेके कारण नाज फल नहीं होता। वे बर्फके मकानमें रहते हैं, जिसको वे साल साल बनाते हैं वह गिर पड़ता है वहाँ छः मास का दिन व छः मासकी रात्रि होती है। वे एक प्रकारकी गाड़ी बनाते हैं जिसमें कुत्ते जोते जाते हैं। बर्फपर वे कुत्ते उस बेपहियेकी गाड़ीको खींचकर ले जाते हैं। बेकुत्ते अपने स्वामीके बड़े आज्ञाकारी होते हैं।
पहले पहल जब अङ्गरेज लोग उस देशमें गये तो उनके लिये उत्तम २ पदार्थ लेगये। खानेके पदार्थ चीनी मिश्री आदिभी लेजाकर उनको दिये उन्होंने उसे मुखमें रखतेही थूक दिया फिर नमकीन पदार्थ दिया गया उसेभी घूणसे मुखमें रखके थूक दिया। फिर मोमबत्ती और तेल दिये उन्होंने उसे बड़े प्रेमसे खाया, उसके बदले वहाँके पदार्थ हड्डी और चमड़ा आदि अंगरेजोंको दिया। इसका आशय यह है कि, उन लोगोंने मिश्री न खाकर तेल आदिको स्वीकार किया। यह सब बातें अभ्यासके ऊपर आधार रखती हैं। देखो मछप मिठाई आदि उत्तम पदार्थोंको छोड़कर मांस मछली और मछादि घृणित पदार्थोंको खाते हैं एवं उसीमें वे खुश रहते हैं।
९९ प्रश्न - इब्राहीमके देव, आपने कहा था कि, इब्राहीमका ईश्वर तीन रूपोंमें देख पड़ा वे फिरिश्ते थे ईश्वर नहीं थे।
उत्तर - यह बात कैसे मानली जावे कि, वे इब्राहीमके खुदा नहीं थे क्योंकि, इब्राहीमने उन्हें पृथ्वीतक झुककर नमस्कार किया था कहा था ऐ मेरे खुदाबन्द! ऐ मेरे खुदा!! देखो तौरैतमें पैदाइशका १८ बाब १ से ३ आयत।
इसाई लोग ऐसा अनुमान करते हैं कि, उन तीनोंमेंसे दो फिरिश्ते थे और १ स्वयम् यवाह था। वे उनका नाम बड़ी प्रतिष्ठासे लेते हैं। सच तो यह है कि, समस्त संसार त्रिदेवकी पूजा करते हैं। तीनों देवोंमें विष्णु सर्वश्रेष्ठ देव है। सबका बादशाह वही विष्णु है ब्रह्मा और शिव उसके मन्त्री हैं।
१०० प्रश्न - कलियुगमें भक्तिसे मुक्ति, आपने कहा था कि, बिना पुण्यकी पूर्णताके किसीकी मुक्ति नहीं होती यदि ऐसाही है तो कलियुगके लोगोंकी मुक्ति होना कठिन हैं क्योंकि, कलियुगी मनुष्योंकी वृत्ति पापकी ओर झुकती है।
उत्तर - इसमें संदेह नहीं कि, भक्तिके बिना मुक्ति नहीं होती। इसी कारण निरञ्जनने कबीर साहबसे बरदान मांग लिया है कि तीनों युगोंमें थोड़े जीवोंकी मुक्ति होगी पर कलियुगमें बहुत जीव लोक जावेंगे यह बात सुनकर
कबीर साहबने कहा कि, हे काल पुरुष ! तू मुझको ठगा चाहता है। अच्छा जो तूने माँगा वह मैंने तुझको दिया पर कलियुगमें असंख्य जीव तेरे फन्देसे निकलेंगे ।
बावन वीर कबीर कहाऊँ । कलियुग केर जीव मुक्ताऊँ ।
इस प्रकार साहबसे बचन लेनेका काल पुरुषका यही आशय था कि, कलियुगमें पापकी विशेष प्रवृत्ति होगी, जिससे मनुष्य अनाचारी हो मेरे पाशसे कभी बाहर नहीं जासकेंगे । पर सर्वशक्तिमान् कबीर समरथने यह बचन भी इसीलिये मानलिया कि, कलियुगमें जो जीव सत्गुरुकी शरण हो जावेगा वह अवश्य कालके जालसे निकलकर मुक्त हो जावेगा ।
१०१ प्रश्न — अप्रकाशका कारण, विद्याभिमानियोंके अंतःकरणमें ज्ञानका प्रकाश क्यों नहीं होता ?
उत्तर — मिथ्याभिमानियोंका अंतःकरण छल कपट और सांसारिक प्रवृत्तिसे पूर्ण होता है वे अपनेको सर्वोपरि बुद्धिमान् समझते हैं । नश्रुता और गरीबीसे उनका अंतःकरण शून्य रहता है इनके हृदयमें ज्ञानको अवकाशही नहीं मिलता ।
१०२ प्रश्न — मनुष्यको ईश्वरके रूपमें बनाना, तब का कथन है कि, ईश्वरने मनुष्योंको अपने रूपमें रचा है यदि यह बात सत्य है तो ईश्वर भी मनुष्यके समान नाशमान् होगा ?
उत्तर — नाम रूप सब माया है, ईश्वर मायासे परे, कहने सुननेसे पार है। मनुष्यकेही रूपसे सृष्टिकी उत्पत्ति होती है इस कारण कहा जाता है कि, ईश्वरने मनुष्यको अपने रूपका बनाया है ।
१०३ प्रश्न — पूर्व जैसी विद्या, प्रथमकी अपेक्षा विद्याका प्रकाश अब अधिक है ?
उत्तर — नहीं पूर्वके समान न अब स्मरण शक्ति है, न ज्ञान ही है । पुस्तकावलोकनको ज्ञान नहीं कह सकते क्योंकि, केवल पुस्तकावलोकनसे ही अनुभवका प्रकाश नहीं हो सकता अन्तर ज्ञान तो भजन और विचारसे सम्बन्ध रखता है । वर्तमान कालमें प्रकाश नहीं बरन् अंधकार है वही कारण है कि, मनुष्यका अन्तःकरण विषय वासनामें लग रहा है ।
१०४ प्रश्न — सदा एकासा वही, जो कुछ प्रथम था वही अब भी है सदासे इसी तरह चला आता है ।
उत्तर—यह बात ठीक नहीं है. पहले मनुष्य बालक होता है फिर क्रमशः
गुरु और अधिकारी
किशोर, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्थाको प्राप्त करता है। इसी तरह जन्मके दिनसे मृत्युतक अनेक प्रकारका बदल बदल हुआ करता है एवं होता रहेगा।
संघ्य धर्म एवं गुरुपूजन।
१०५ प्रश्न — स्वामी सेवक सब बंधे हैं भक्ति किसकी करनी चाहिये ?
उत्तर — उसका भजन करना चाहिये जिसे सत्गुरु बतावे।
१०६ प्रश्न — कितने एक कहते हैं कि, सदाचार रखना चाहिये, पुण्य करना चाहिये, धर्म (मजहब) से क्या काम है ?
उत्तर—सत्गुरु और धर्मके बिना पुण्यका मार्ग नहीं पा सकता। विधि, निषेध, शुभ, अशुभ, पाप, पुण्य, सब गुरु और मजहबसेही जाने जाते हैं।
१०७ प्रश्न — गुरुमुख तथा मनमुखका क्या अर्थ है ?
उत्तर — गुरुमुख वह है जो गुरुकी आज्ञाकारितामें बना रहे। धर्म-दासजीके समान तन, मन, धन गुरुके अर्पण करे। सदा गुरुका ध्यान किया करे चाहे गुरुका शरीर निकट हो अथवा दूर हो गुरुमुखकी प्रशंसा वचनसे बाहर है। सब प्रकारकी रिद्धि, सिद्धि, ज्ञान और मुक्ति गुरुमुखके लिये है। इसके विरुद्ध काम करनेवाला मनमुख है।
१०८—प्रश्न—आपने कहा कि, गुरुकी मूर्तिका ध्यान करे तो क्या यह प्रतिमापूजन नहीं है ?
उत्तर—निःसंदेह यह भी प्रतिमापूजन है पर अन्य सब प्रतिमापूजनसे यह उत्तम और श्रेष्ठ है क्योंकि, गुरुकी मूर्तिका ध्यान पारख गुरुको प्राप्त करा कर मुक्त करादेता है। ससारमें सब मनुष्य मायाके पूजक हैं। माया जड़ है। जड़के पूजनेवाले सब जड़कोही प्राप्त होंगे। मायाके पूजक शुद्ध चैतन्य ब्रह्मको कदापि नहीं प्राप्त हो सकते।
१०९—प्रश्न—“गुरु एक और सेवा अनेक” इसका क्या आशय है ?
उत्तर—इसका आशय यह है कि, मनुष्य जितना और जिसको चाहे गुरु करे पर गुरुओं और साधुओंकी सेवा करते २ पारख गुरुके पानेका अधिकारी होना है तब उसको पारख गुरुकी कृपा से अपना अभीष्ट प्राप्त होता है। अनेक गुरुओं तथा संतोंकी सेवा करनेपर पारख गुरु प्राप्त होता है वही अनेक सेवा व एक गुरुका आशय है।
११०—प्रश्न—कालपुरुषकी पूजा—समस्त संसारमें अग्निकी पूजा हो रही है। इसका क्या कारण है ?
उत्तर—सत्पुरुषने अपने क्रोध और बीभत्ससे कालपुरुषको उत्पन्न
काल पुरुष और सत्यपुरुष कबीर साहब और सत्य पुरुषकी——एकता, तुलना निर्वासन मुक्त है, यथार्थसे मुक्ति
किया है उसको तीन लोकका मालिक बनाया है । इस कारण उसी अग्निरूप कालपुरुषकी पूजा हो रही है ।
१११ प्रश्न—मनके प्राबल्यका कारण—क्या कारण है कि, मन सब पर प्रबल सभी मनके परवश पड़े हैं ?
उत्तर—मृत्युको भूलकर विषयवासनामें लुब्ध होनेसेही मनकेव शर्म पड़ा हुआ जीव नाना प्रकारके कष्ट उठाता है । जो कोई मृत्युका स्मरण रखता है, ईश्वरके भयमें रहता है, ईश्वरके भयसे रोया करता है । पश्चात्ताप करके ईश्वरकी दयाकी आशा रखता है उसपर परमात्माकी कृपा दृष्टि होती है । वह मन पर विजयी होकर सुखी हो जाता है ।
११२ प्रश्न—गुरुकी पहिचान—साधु गुरु किस प्रकार पहचाने जाते हैं ?
उत्तर—सत्संगसे ।
११३—प्रश्न—सत्संग कैसे प्राप्त होता है ?
उत्तर—उदारता, सेवा और मनकी शुद्धतासे ।
११४ प्रश्न—बन्ध कबतक—अहंकारमें समस्त संसार बँध रहा है यह कबतक रहता है ? इसके बंधसे कब और कहाँपर छूटता है इसका सम्बन्ध कबतक रहता है ? सो स्पष्ट समझा दीजिये ।
उत्तर—जो जीवकी पाँच अवस्था हैं वेही इसके बंधनके कारण हैं जब तक उनमें अहंता ममता रखता है तबतक इसकी मुक्ति होना असम्भव है । इसकी पाँचों अवस्था तथा अभिमानका विशेष विवरण सुनो ।
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीमा तुरीयातीत ये पाँच अवस्था हैं इनकी स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण और कँवल्य ये पाँच देह हैं । इन्हींके अभिमानो संसार सागरमें बारम्बार गोता खाते रहते हैं । जब तक इनमें वासना है तबतक अहंकारसे मुक्त होना असम्भव है ।
स्थूलदेहके अभिमानमें फँसा हुआ जीव अपनेको सबसे बड़ा बुद्धिमान समझता है सब कला कौशलका प्रकाशक सबका ज्ञाता जानता है, इसकी दशा उस पादरीके समान होती है जो कि, स्वप्नकी दशामें पुस्तकें बनाता था । जब किसी समय किसी अपराधमें पकड़कर जजके सामने उपस्थित किया गया तो उसकी स्वप्नावस्था नष्ट होगई ।
जब जीव जाग्रत अवस्थाको छोड़ स्वप्नावस्थामें प्रवेश करता है उस समय अकलातून जैसा बुद्धिमान भी मूर्खों और अज्ञानियों जैसा नीच काम करता है जिससे अल्प बुद्धिवाला पुरुषभी घृणा करता है । इसी कारण स्थूल देह उसकी अवस्था तथा उसके कर्तव्य सब मिथ्या हैं ।
रक्षकका अवतार
विद्या तथा धनके अभिमानियोंको विचार करना चाहिये, कि, जब उनके अभिमानके मूल विद्या तथा धनादि दूसरीही अवस्थामें नष्ट होजाते हैं तो तीसरी और चतुर्थ अवस्थामें क्या गति होगी।
जैसे जाग्रत् अवस्थाका अहंकार असत्य है वैसेही स्वप्नावस्थाकी भी सब सामग्री मिथ्या हैं। इसी प्रकार सब अवस्थाओंके पदार्थ व अभिमान मिथ्या और मृगतृष्णाके जलके समान दुःखदायी हैं। इन्हीं पाँचोंके अभिमान में सारे अभिमानी बढ़ हैं। इनसे बाहर जानेका मार्ग किसीको प्राप्त नहीं होता।
इन पाँचों शरीरोंके परे छठा शरीर हंस देह है जिसमें प्राप्त होकर अहंकार नष्ट हो जाता है, जीव अपने यथार्थ स्वरूपकोप्राप्त हो जाता है। जिनको उपरोक्त पाँचों शरीर और उनकी अवस्थाकी यथार्थ सुधि नहीं वे कैसे ईश्वरको पासकेंगे। संतलोग इनको भली प्रकार जानते हैं। उसको अपने वशमें करके उनके ऊपर शासन करते हैं। जो इनकी विशेष सुधि नहीं रखता वह उनके बन्धनमें पड़ा हुआ दुःखी होता है।
हंस देहकी प्राप्तिके उपाय।
११५ प्रश्न—क्या उपाय करें कि, हंस देह शीघ्र प्राप्त हो?
उत्तर—हंस देहकी प्राप्तिके लिये सच्चे सत्यगुरुसे सच्चा प्रेम होना चाहिये। चूम्बक जिस प्रकार लोहेको अपनी ओर आकर्षण कर लेता है उसी प्रकार प्रेम शीघ्रही प्रियासे मिला देता है। सत्य प्रेमके विना प्रियाका मिलना असम्भव है।
सत्य प्रेमीके दश चिह्न—१ नेत्रका औसूसे डबडबाये रहना — २ नीदका न आना। ३ ठण्डी ठण्डी स्वांस लेना। ४ पीतरङ्ग। ५ देहकी कृशता। ६ धीमी बोली। ७ अल्प आहार। ८ ओठोंका सूखा रहना। ९ ध्यानावस्थित। १० प्रियकी प्रशंसा करना और लिखना।
उपरोक्त दश चिन्होंसे प्रेमी पहँचाना जाता है। कबीर साहबके प्रेममें राजा अमरसिंह रोते २ मृत्युके निकट पहुँच गये थे। पीछे सत्गुरुने दर्शन देकर कहा कि, हे राजन् ! अभी तुम्हारी शतवर्ष आयु शेष है इसको भोगलो तब लोक चलना। राजाने न माना कहा कि, मुझे कुछ न चाहिये मैं आपके संगही जाऊँगा तब कबीरसाहबने उसे लोकको पहुँचा दिया।
ऐसेही धर्मदास साहबको सत्गुरुके प्रेममें छः महीना रोते बीत गये। तब सत्गुरु मिले कृतार्थ करके अंतर्धान होगये। इस विरहमें अन्न पानी सब छोड़कर बाईस दिनतक रोते २ मृत्युतुल्य हो गये। फिर सत्गुरु प्रगट हुये और दर्शन दिया।
जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति हस्तक्षेप
सेवरीकी कथा ।
शिवरी भीलनी ईश्वरकी भक्तिकी ऐसी रंगी, प्रेमको इस पूर्णता तक पहुँचाया कि, भगवान् रामचन्द्रने उसके हाथके बेर खाये, उसकी कथा इस प्रकार है कि—
एक सूर्य्य वंशके परम प्रतापी महाराज अपनी राजकुमारी तथा राज-महिषी आदिके साथ तीर्थ राज प्रयागके स्नानके लिये गया । वहाँ अन्तःपुरचरीने महाराजसे प्रार्थना की कि, मैं पवित्र उपदेशोंसे विश्वको पवित्र करनेवाले पवित्रात्मा ऋषि गणोंके पुनीत दर्शनोंसे अपनेको पवित्र करना चाहती हूँ । इस पर उत्तर मिला कि, राज महलोंमें रहनेवाली इस तरह नहीं फिरा करतीं । इस तरह फिरनेवाली तो भीलनी होती है । यह सुन तीर्थराजमें स्नान करती बार अभिलाषा प्रगट की कि, मेरा अब जन्म हो तो मुझे नीच कुलोंकी महिला बनाना जो स्वतंत्रता के साथ परम पावन ऋषिमुनियोंकी सेवा कर सकती हूँ । भक्त वत्सल भगवान् अपने भक्तोंकी मनो कामना सदा पूरी करते हैं । उसी पवित्रात्माका शबर राजके कुलमें जन्म होगया उक्त भीलोंके राजाके यह एकही कन्या थी । हाथों २ में ही क्रशमः युवावस्थाको प्राप्त हुई । पिताने विवाहकी तयारी की बड़े २ वन्य पशु विवाहोत्सव में मारनेके लिये इकट्ठे किये गये थे । एक दिन राजकुमारी प्यारी सहेलियोंके साथ राज प्रासादके ऊपर चंद्रकिरण ले रही थी कि, कटहरोमें बंधे हुए बनले पशुओंकी करुण मूर्ति आँखोंके सामने आगई, यही समय शिवरीके हृदय पर्वतनका था । दर्दभरे शब्दोंमें सखियोंसे बूझा किये पशु मुझे क्यों दुखभरी आँखोंसे देख रहे हैं ? उत्तर मिला कि, ए भोली राजकुमारी ! ये तेरे विवाहमें काम आयेंगे । यह सुनतेही शिवरीका मुख तेजसे तमतमा उठा, झट बोल उठी कि, ऐसा विवाह मुझे नहीं करना है जिसमें अनन्त जीव दुःख पावें । भगवान्से लौ लगाई कि, तू ऐसी नींद भेज दे कि सब सोजायं तो मैं महलके बाहिर निकल जाऊँ । जगदीशने अपनी परम भक्ताकी मनोकामना पूरी की । शिवरी उसी समय राज महलका परित्याग करके वनको चली गई ।
यह एक बनमें रहा करती थी । वहाँही पासमें मतंगऋषि भी रहा करते थे । शिवरी रातको छिपकर ऋषिके आश्रममें लकड़ी धर जाती । ऋषियोंके स्नान करने जानेके मार्गको बूहार जाती । यह सब काम रातको इस भयसे करती कि, यदि ऋषि अथवा ऋषिके शिष्य देखलेंगे तो नीच जाति जान क्रोधित होंगे ऋषि नित्य लकड़ी और मार्ग बूहारा हुआ देखकर आश्चर्य करते । बहुत दिनों तक विचार करनेपर भी सेवा करने वालेका पता न लगा कि एक दिन ऋषिके
साधुका द्रव्य हरण
शिष्योंने छिपकर जागनेपर सेवरीको लकड़ी लाकर झाड़ू देते हुये पकड़ा । जब उसे ऋषिपुत्रोंने पहचाना तो उन्हें उससे बहुत घृणा हुई प्रायश्चित्तका स्नान करने पंपासरमें गये । वे तालाबमें नहाने लगे तो तालाबका जल बिगड़ गया और उसमें कीड़े पड़ गये, वो एकदम खराब हो गया ।
मतंग ऋषिने सेवरीका हाल सुनकर उसे बुलाया बहुत प्रेमपूर्वक आश्वासन किया । उसकी अपनी चेली बना लिया अपने शिष्योंको डाँटा कि, तुम लोग सेवरीसे इतनी घृणा क्यों करते हो ? इसपर तो हजारों ब्राह्मण निछावर हैं । मतंग ऋषिने सेवरीसे कहा कि, तुझको रामचन्द्रजी दर्शन देंगे ।
सेवरीने अपने गुरुसे सुना कि, महाराज रामचन्द्रजीका दर्शन होगा । रामचन्द्रजीके दर्शनकी चिन्तासे प्रेममें मग्न होगई । सदा महाराजके मिलनेका स्मरण रखती । महाराजसे मिलनेके लिये दौड़कर उसी मार्गपर जाती जिधरसे कि, महाराजके आनेका समाचार पाचुकी थी, दौड़ते २ उसके मनमें आता कि, हाय मैं भीलनी हूँ ! महाराज मुझसे कैसे मिलेंगे ? मुझको नीच जाति जान घृणा करेंगे । ऐसा विचार होतेही किसी झाड़ीमें छिप जाती, रोने लगती । विचार करती, महाराज पतित पावन हैं, तब फिर झाड़ीसे निकलकर दौड़ती । कभी दूर २ तक मार्ग बुहारती हुई कहती कि, महाराजके आनेका मार्ग शुद्ध करती हूँ कभी २ महाराजको इधर उधर झाड़ियोंमें ढूँढ़ती फिरती, नित्य वनमें जाकर फल तोड़ती. क्योंकि, आपभी फलही फूल खाकर रहा करती । जिस पेड़के फल भीठे देखती उसीको रखलेती पर जो खट्टा होता उसे तो आप खाती जो मीठा होता उस भगवानको खिलानेके लिये रख छोड़ती ।
महाराजने कृपाकर उसके आश्रम पर पदार्पण किया, उस समय वेर और फल लाकर सेवरीने भगवान्के सामने रखे । महाराजने उन फलोंको ऐसे सराह सराहके खाया कि, तीनों लोकके अधिपतियोंको भी ईर्षा हो । उस वनके कितने ऋषियोंके मनमें अहंकार था कि, हम ब्रह्म ऋषि अथवा राजऋषि हैं, सबके मनमें बड़ी ईर्षा और अभिमान हुआ कि, महाराज प्रथम हमारे आश्रम-पर न पधारकर भिलनीके आश्रम पर गये । अन्तर्यामी रामचन्द्रजीने ऋषियोंकी मनकी जानकर कहा कि, है कोई ऐसा तप और धर्म करके पूर्ण जो पम्पासरमें स्नान करे और उसके स्नान करनेसे इसका जल शुद्ध हो जावे । सब ऋषियोंने क्रमशः उसमें गोता लगाया पर जलका शुद्ध होना तो क्या और भी गन्दा तथा भ्रष्ट हो गया । भगवान् रामचन्द्रने सेवरीसे कहा कि, तू इसमें नहा जैसेही सेव-
ग्रहण न करनेका कारण शून्यके हथियार
रोने तालाबमें पग दिया जल वँसाही शुद्ध और स्वच्छ होगया । यह देख सब ऋषि-
योका अभिमान जाता रहा, सेवरीका माहात्म्य अधिकसे अधिक प्रगट हुआ ।
महाराजा सेवरीको कृतार्थ कर वहाँसे चलनेका विचार करके सेवरीसे
चलनेकी बात कहने लग उसी समय विरह और वियोगको न सहनेवाली सेव-
रोंने अपना प्राण त्यागकर इस असार संसारको छोड़ दिया । महाराजने स्वयम्
अपने हाथसे उसका दाह किया, सेवरी परमधामको पहुँच गई ।
प्रेमका पद सबसे श्रेष्ठ है । जिसके मनमें प्रेमने स्थान किया वह प्यारेके
अतिरिक्त सर्व संसारसे मुक्त हो जाता है । समस्त ब्रह्माण्डको तुच्छ समझता
हुआ आशिक अपने प्यारेके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं देखता । प्यारेको
सर्व ठौर देखता है क्षण मात्र भी उसे बिना उसके चैन नहीं पड़ता । जिस हृदयमें
प्रेम नहीं वह मनुष्य नहीं । कबीर साहबने इस प्रेमके विषयमें बहुत बचन कहे हैं ।
प्रेम अंगकी साखी ।
कबीर- ऐसा कोई ना मिला, शब्द गुरुका मीत ।
तन मन अरपे मृग ज्यों, सुने बधिककी गीत ॥
कबीर- प्रेम प्याला सो पिवे, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीस न देइ सके, नाम प्रेमका लेय ॥
कबीर- आया प्रेम कहाँ गया, देखा था सब कोय ।
छिन रोवे छिनमें हँसे, यह तो प्रेम न होय ॥
कबीर- प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥
कबीर- बढे घटे छिन एकमें, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजर बसे, प्रेम कहावे सोय ॥
कबीर- प्रेम प्यारे लालसे, मन दे कीजे भाव ।
सतगुरुके प्रतापसे, भला बना है दाव ॥
कबीर- प्रेमी दूँदत मैं फिर्है, प्रेमी मिला न कोय ।
प्रेमीसे प्रेमी मिले, तो भगती दूढ होय ॥
कबीर- जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान ।
जैसे खाल लुहारकी, सांस लेत विन प्रान ॥
कबीर- प्रेम वणिज न करि सके, चढे न प्रेमके गैल ।
मानुष केरी खोलरी, ओढे देखा बैल ॥
अन्य धर्मोंकी आवश्यकता पश्चिमियोंके घृणितोंके ग्रहण करनेका कारण
कबीर- प्रेम बिना धीरज नहीं, विरह बिना वैराग ।
सतगुरु बिना मिटै नहीं, मन मनसाका दाग ॥
कबीर- जहाँ प्रेम तहाँ नेम नहीं, तहाँ न बुद्धि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार ॥
कबीर- प्रेम छिपाया ना छिपे, जा घट परगट होय ।
जौ पै मुख बोलै नहीं, नयन देत हैं रोय ॥
कबीर- प्रेम भाव एक चाहिये, भेष अनेक बनाय ।
भावे घरमें वासकर, भावे वनमें जाय ॥
कबीर- योगी जंगम सेवडा, संन्यासी दरवेश ।
बिना प्रेम पहुँचे नहीं, दुर्लभ सतगुरु देश ॥
कबीर- पीया चाहे प्रेमरस, राखा चाहे मान ।
एक म्यानमें दो खड़, देखा सुना न कान ॥
कबीर- पियारस पिया सो जो जाने, उतरे नहीं खुमार ।
राम अमल माता रहे, पिये अमी रस सार ॥
कबीर- प्याला है प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥
कबीर- ऐसी भट्टी प्रेमकी, बहुतक बैठे आय ।
शिर सौपे सो पीवसी, नातर पिया न जाय ॥
कबीर- जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं ॥
कबीर- जबलग जो मरनेमें डरे, तबलग प्रेमी नाहिं ।
बड़ी दूर है प्रेमघर, समझ लेउ मन माहिं ॥
कबीर- जैसा लौ पहले लगे, तैसे निबहे ओर ।
अपनी देहको को गिने, तारे पुरुष करोर ॥
कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी नाहीं एक ।
लागी सोई जानिये, करे कलेजे छेक ॥
कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी सोइ सराह ।
लागी सोई जानिये, जो उठि कराहि कराहि ॥
कबीर- लगन लगी छूटे नहीं जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठो कहाँ अंगार है, गहे चकोर चबाय ॥
कबीर- जा खोजत मुनिवर थके, सुरनर मुनिवर देव ।
कहैं कबीर सुन साधुआ, कर सत गुरुको सेव ॥
नजम ।
सुनो यारो मुहब्बतकी कहानी । भरे नेमत दो आलम जिसका पानी ॥
किया शहे इश्कने जिस दिलमें डेरा । वहाँ बाकी रहा तेरा न मेरा ॥
जो दिलवर आनकर जादूको डारा । हुआ तब इश्कसे दिल पारः पारा ॥
जो आकिल या फलाई जमाना । हुआ सब अकल खोकरके दीवाना ॥
शहनशह था सब जमीं और जँका । बना कमतर सो खादिम खादमाँका ॥
हुई जब यारसे अपने जुदाई । गई तब बन्दगी भूली खुदाई ॥
कहाँ तब जुहद है तकवा तिहारत । मुहब्बत यारकी निशि दिन महारत ॥
निछावर कर दिया तन मन धन अपना । सो सब संसारको देखे जो सपना ॥
विरहका तीर दिल छिदकर हुआ पार । बेगाने खे़श आँखोंमें लगे खार ॥
जुदाई यारनेकी जब दिवाना । व्यावौ दशत सेहरा खाक छाना ॥
हैं निसदिन करते फिरत प्रियजारी । सद आह बनालः और अशकबारी ॥
किया दिलवरके कूचा जबसे फेरा । हुआ आँखोंमें कुल आलम अँधेरा ॥
मुहब्बत यारकी दिलमें जो जागी । अकल उस वक्तसे रुखसतको मांगी ॥
अकल कुत्तीको दुरदुर कर दिया है । नहीं तू है जहाँ मेरा पिया है ॥
उठाते गीत गाते अर्गनूसे । मुहब्बत यारमें फिरते जनूसे ॥
अरे हुदहुद मँरे पीतमकी पाती । तू ला पढ़कर जुड़ाऊँ अपनी छाती ॥
कि निसदिन यादमें है ज्ञान उबाली । हुआ सारे हवससे दिल जो खाली ॥
किया खाली जो खानः दिल सहलमें । बैठे दिलदारको तब उस महलमें ॥
नहीं कुछ काम है दुनियाँ व दीसे । तो दम मारना क्या आँ व ईसे ॥
कि जिस घरमें मेरा माशूक आवे । वहाँ कोई दूसरा रहने न पावे ॥
नहीं दुनियाकी कोई मुश्क व बू है । तू देखे दिलके अन्दर तुही तू है ॥
जो सारी मक्खियाँ दिलसे निकाला । तो उस घरबीचमें दिलवर बिठाला ॥
तु हो आनन्द कर दर बन्द नयना । दिल अन्दर दिलरोवासे बोल बैना ॥
सतगुरुकी प्रशंसा ।
मुसद्दस ।
मालम हुआ वेद व कुरआँकी रकमसे ।
जाहिर है तेरी हमद वं सना अहले कलमसे ॥
क्या किलक लिखे हीमः गो वागो अरमसे ।
दुनियामें न कोई वाकिफ है वस्ले सनमसे ॥
जो कुछ नजर आता है सो तेरेही करमसे ।
सब इल्मो अमल बरकत सतगुरुके कदमसे ॥
पृथ्वीका निरूपण इतीपर मुसलमानी धर्मके विद्वान्
जुजसायः कदम तेरे न इनसाँका गुजारा ।
तदवीर नहीं तेरी शरणका है सहारा ॥
लिखते तेरी औसाफ लगे बहर किनारा ।
दिल विदः रौशन करे मजमूं हमारा ॥
पैदा कलम हरकत तुझ दीदः दमसे ।
सब इल्म व अमल वर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥
है कौनसा बाजार तेरा इश्क जहां है ।
है कौन फिरोशिन्दः खरिदार कहाँ है ॥
हमराज कोई आशिक जान वाज वहाँ है ।
जिस रम्जकी फहमीदको सर सिदकः शहाँ है ॥
सो हाथ लगे काइ न दीनार दिरम से ॥
सब इल्मों अमल वर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥
आई है जहाँ जेह्लि सो खुरशौद झलक है ॥
सब तारफना जरः पानूर झलक है ॥
उमीद न कुछ आदम और जिन्ने मलिक है ॥
है जान अमान बख्श तुही फितनः फलक है ॥
जुज तेरे न महरम कोई इनसानके धरमसे ॥
सब इल्मों अमल बरकत सतगुरुकी कदमसे ॥
तू रहबर हो जिसकी करे रहनुमाई ।
फिलफौर सोई खुदमें लिया देख खुदाई ॥
हरजा तू है तुही है तुही अर्ज स्वामी ।
सदहा खाते गोता न इसरार सों पाई ॥
है फजल तेरा आजिजकी दीदः नमससे ।
सब इल्म व अमल वर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥
सत्यकबीर धर्मका मूल ।
<table> <tr> <td>ईश्वर</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>सत्यपुरुष ।</td> </tr> <tr> <td>आचार्य</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>कबीरसाहब ।</td> </tr> <tr> <td>गुरु</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>पारख ।</td> </tr> <tr> <td>शास्त्र</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>स्वसंवेद ।</td> </tr> <tr> <td>मार्ग</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>निर्वाण ।</td> </tr> <tr> <td>चाल</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>सतोगुणी ।</td> </tr> </table>कबीर मन्शूरका स्पष्ट सार ।
यह समस्त संसार कालका दास है, जो कोई कबीरसाहबका शरण गहकर कभी न छोड़ेगा वो अवश्य भवसागरके पार पहुँचेगा। नहीं तो दुःख सागरमें ही पड़ा गोता खावेगा ।
कबीर साहिबकी प्रार्थना ।
ऐ मेरे स्वामी ! बन्दी छोर ! तू गरीब निवाज है, मैं अधम अयोग्य और पापी हूँ । तू मेरे पापोंपर दृष्टि मत कर । तू संसारका उद्धारक है, मेरा भी उद्धार कर । मेरी ओरसे दृष्टि मत फेर । अचेत बच्चोंको माता पिताके बिना दूसरा आश्रय ही नहीं है ।
हे गुरु ! तूने बारम्बार कहा है कि, “मैं कलियुगमें जीवोंका उद्धार करूँगा” तू अपना वचन देख मैं तेरी शरणहूँ तू अपनी शरणकी लाज रखकर मेरा विनय श्रवण कर । जो इस पुस्तकके लिखनेके समय मेरा सहायक पुरुषोत्तमदास साधु था उसको उत्तम फल दे । जो इस पुस्तकको पढ़े सुने और मेरी शिक्षा स्वीकार करे उनको अज्ञान अंधरेसे निकालकर आत्मज्ञानके प्रकाशसे पूर्ण कर दे । सत्य कबीरो जयति ॥
शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
अथ समाप्तिके गजल ।
बुल बुलौं मुझदए बहार आया । इसके साथ ही पयाम यार आया ॥
आह वे नालेके दिन गये हैं गुजर । दिल परा गन्दा बरकरार आया ॥
खुल्द और जन्नते जिनौ क्या जान । दिन बशाशतका वेशुमार आया ॥
शोर बख्तीके दिन गये हैं गुजर । नेक बख्तीका रोजगार आया ॥
मिहर मुरशद कबीर जिसपर हो । उसको है भेद वार पार आया ॥
फिर न कोई दवा दविस आजिज । हाथमें अपने जब शिकार आया ॥
नखले मुहब्बतका समर मुझको दिखा ऐ बागवौं ॥
तेरे बागमें उल्फते शिजर मुझको दिखा ऐ बागवौं ॥
शफकत किया जो निहालपर ताजा किया तो पालकर ॥
भूला करम क्यों टालकर मुझको बता ऐ बागवौं ॥
सब खारो खस को खींचकर पाला है तूने सींचकर ॥
बैठा क्यों आँखें मींचकर मुझको बता ऐ बागवों ॥
खुद बागमें शामिल किया और पालकर कामिल किया ॥
फिर काटना क्यों दिल दिया मुझको बता ऐ बागवों ॥
आजिज पड़ा आजिज पड़ा ऊँधा हुआ पानी घड़ा ॥
तुझ विन भरे फिर कौन आ मुझको बता ऐ बागवों ॥
बागवों बाग कुहनमें तेरे अशजार जिते ॥
कोई है समर बख्श हैं पुर खार किते ॥
तुही खालिक तुही मालिक सबी तहरीक तेरी ॥
तू शहन्शाह जहाँ फौजके सरदार किते ॥
सभी महकूम तेरे हाकिमे आला है तूही ॥
तुही सरकार बड़ा छोटे हैं सरकार किते ॥
है हयात अबदी उनको जिसे तू बख्श अमान ॥
जिन्दा है कोई कोई और हैं मुरदार किते ॥
आलमोंका तू खुदावन्द फिकर सबकी तुझे ॥
सबका दिलवर है तुही और दिलदार किते ॥
नाम लेते हैं बहुत लोग तेरी दुनियामें ॥
हंस है कोई कोई और वह तीमार किते ॥
आसमों और जमीं कापते कब्बीर कहे ॥
आशिकको खबर गो कि खबरदार किते ॥
पेशकश हाथ सर अपनाले गली यारमें आ ॥
बे कीमतके वस्ल खरीदार किते ॥
जिसको तू अमल बख्श है अलमस्त ॥
बे नशः के छूटे हैं सरशार किते ॥
सबका है खुदा तुही खुदावन्दा नेक ॥
बे बहा तू है समर बख्श समर बार किते ॥
आजिजको चखा लज्जते उल्फत ऐ गुल ॥
गोबुलबुलो सदा जानिबे हरचार किते ॥
बुलबुलो खिजां गया अब आया है दिनबहार ॥
गागीत चहचहे सदा कर खेल दिन बहार ॥
गुल्शनमें जाके मगज मुअत्तर कर अपनेको ॥