भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1343

कबीर साहबने कहा कि, हे काल पुरुष ! तू मुझको ठगा चाहता है। अच्छा जो तूने माँगा वह मैंने तुझको दिया पर कलियुगमें असंख्य जीव तेरे फन्देसे निकलेंगे ।

बावन वीर कबीर कहाऊँ । कलियुग केर जीव मुक्ताऊँ ।

इस प्रकार साहबसे बचन लेनेका काल पुरुषका यही आशय था कि, कलियुगमें पापकी विशेष प्रवृत्ति होगी, जिससे मनुष्य अनाचारी हो मेरे पाशसे कभी बाहर नहीं जासकेंगे । पर सर्वशक्तिमान् कबीर समरथने यह बचन भी इसीलिये मानलिया कि, कलियुगमें जो जीव सत्गुरुकी शरण हो जावेगा वह अवश्य कालके जालसे निकलकर मुक्त हो जावेगा ।

१०१ प्रश्न — अप्रकाशका कारण, विद्याभिमानियोंके अंतःकरणमें ज्ञानका प्रकाश क्यों नहीं होता ?

उत्तर — मिथ्याभिमानियोंका अंतःकरण छल कपट और सांसारिक प्रवृत्तिसे पूर्ण होता है वे अपनेको सर्वोपरि बुद्धिमान् समझते हैं । नश्रुता और गरीबीसे उनका अंतःकरण शून्य रहता है इनके हृदयमें ज्ञानको अवकाशही नहीं मिलता ।

१०२ प्रश्न — मनुष्यको ईश्वरके रूपमें बनाना, तब का कथन है कि, ईश्वरने मनुष्योंको अपने रूपमें रचा है यदि यह बात सत्य है तो ईश्वर भी मनुष्यके समान नाशमान् होगा ?

उत्तर — नाम रूप सब माया है, ईश्वर मायासे परे, कहने सुननेसे पार है। मनुष्यकेही रूपसे सृष्टिकी उत्पत्ति होती है इस कारण कहा जाता है कि, ईश्वरने मनुष्यको अपने रूपका बनाया है ।

१०३ प्रश्न — पूर्व जैसी विद्या, प्रथमकी अपेक्षा विद्याका प्रकाश अब अधिक है ?

उत्तर — नहीं पूर्वके समान न अब स्मरण शक्ति है, न ज्ञान ही है । पुस्तकावलोकनको ज्ञान नहीं कह सकते क्योंकि, केवल पुस्तकावलोकनसे ही अनुभवका प्रकाश नहीं हो सकता अन्तर ज्ञान तो भजन और विचारसे सम्बन्ध रखता है । वर्तमान कालमें प्रकाश नहीं बरन् अंधकार है वही कारण है कि, मनुष्यका अन्तःकरण विषय वासनामें लग रहा है ।

१०४ प्रश्न — सदा एकासा वही, जो कुछ प्रथम था वही अब भी है सदासे इसी तरह चला आता है ।

उत्तर—यह बात ठीक नहीं है. पहले मनुष्य बालक होता है फिर क्रमशः