कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1341, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर— साहबके दरबारमें, कमी काहुकी नाहि ।
बन्दा मौज न पावई, चूक चाकरी माँहि ॥ २८ ॥
कबीर— पूरा सतगुरु ना मिला, रहा अधूरा सिक्ख ।
स्वाँग यतीका पहन कर, घर घर माँगे भीक्ख ॥ २९ ॥
कबीर— गुरु किया है देहका, सतगुरु चीन्हा नाहि ।
भवसागरके बीचमें, फिर फिर गोता खाहि ॥
९७ प्रश्न— निर्गुणकी उपासना— यदि आप ब्रह्मा विष्णु शिवादिको अवतार मानते हुए देवताओंको बन्धनमें फँसे हुये मानते हो तो मैं बद्ध तथा अविभूत और भक्तोंका काय्यं करके फिर तिरोंहित होजानेवाले अवतारोंको स्थायी न जान निर्गुण निराकार परमात्माको मानता हूँ ।
उत्तर— एक ब्रह्म निर्गुण निराकार तुमसे किसने आकर कहा था ? यदि कहो कि, वेदने बतलाया तो वेदके समझाने वाले कौन ऋषि हैं जो वेद के यथार्थ भेदको समझा सके ? वेदके उपदेशक ब्रह्मादिक स्वयम् बद्ध हैं वे ब्रह्मको क्या जानें ? अतः उसका जानलेना एवं उपासना करना सहज नहीं है ।
जो कोई कहें कि, हम वेदको मानते हैं अवतारोंको नहीं मानते तो वह झूठा है क्योंकि, संसारमें दोही धर्म (मजहब) है एक तो सत्पुरुषका दूसरा काल पुरुष का । सो सत्पुरुषकी ओरसे सत्यपथ कालपुरुषकी ओरसे असत्यपथ है ।
इन दो धर्मोंसे कोई भी व्यक्ति किस प्रकार बाहर हो सकता है मुक्ति-कांक्षी सत्यपथ तथा नारकी कुमार्गमें लगे रहते हैं ।
९८ प्रश्न— अखाद्य एवं अपेयसे रत रहनेका कारण । मांस अहार और मछपीनेसे लोक परलोककी हानि है । लोग तो भी उसका सेवन नहीं छोड़ते, इसका क्या कारण है ?
उत्तर— जिसमें जो बुरी आदत पड़ जाती है वो उसका स्वभाव हो जाता है उसका छूटना अति कठिन हो जाता है । किसीको मांस खाने, किसीको मछपीने, किसीको जुआ खेलने, किसीको ठगी करने एवं किसीको तो चोरी करने आदि नाना प्रकारकी बुरी आदतोंका अभ्यास होते २ वह स्वभाव हो जाता है । उसके छोड़नेमें असमर्थ हो वारंवार उसीमें लगा रहता है । ऐसे मनुष्योंको भुक्ति मुक्तिका मार्ग नहीं मिल सकता क्योंकि, अशुभ काय्योंके छोड़े बिना कोई भी भक्ति मुक्तिका अधिकारी नहीं हो सकता । जैसे निम्बके कीड़ेको मिश्री और कन्द आदि अच्छे नहीं लगते वे निम्बसेही परितृप्त रहते हैं ।