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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

धर्म रायका० कबीर साहिबको धोखा देकर उनसे गुप्त भेदका पूछना सत्ययुगका वृत्तान्त

(कबीर साहब ! ) पृथ्वीपर जाओ कालपुरुष मनुष्योंको अत्यंत पीड़ा पहुँचा रहा है, उनको उसके हाथसे बचाओ ।

तब मुक्तामणि साहब पृथ्वीपर आये और मक्काः नगरमें उतरे, देखा तो मुहम्मद साहब मस्त हाथीपर सवार, बड़े प्रतापके साथ शासन कर रहे हैं । उस समय कबीर साहब बोले सलाम अलैक और मुहम्मद साहबने सलामका उत्तर देकर पूछा कि आप कौन हो और कहाँसे आये हो ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, मैं सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर आया हूँ, आपसे पूछना चाहता हूँ कि, आप किसकी आज्ञासे ऐसी हिंसा करते हो । तब मुहम्मद साहबने कहा कि हमको लाहूतसे आज्ञा मिली है । तब कबीर साहबने कहा कि, लाहूत स्थान तो बार है, पारकी सुधि आपको नहीं । वह परमेश्वर जो समस्त संसारका स्वामी है उसकी यह आज्ञा नहीं है और व्यर्थके रक्तपातसे वह कदापि प्रसन्न नहीं होता, लाहूत मध्यका स्थान है वह संसारका यथार्थ कर्ता नहीं है । तब मुहम्मद साहबने कहा कि, इसका निश्चय मुझे तब हो जब मैं वह सत्यलोक स्वच्छुसे देखूँ । इस बात पर कबीर साहबने मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन कराया और फिर मक्काको ले आये और रक्तपात तथा मारकाट बंद कराया तथा मुहम्मद साहबको शिक्षा दिया ।

ग्यारहवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबके मेआराजके विषयमें मतभेद ।

मुहम्मद साहबके मेआराजके बारेमें मुसलमान अनेक अनुमान करते हैं । जैसा कि, हदीसों तथा तारीख मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबके नबी होनेके बारहवें वर्षमें यह घटना हुई कि, जिबराईल तथा मेकाइल रात्रिके समय रसूलल्लाहके निकट आये और उनका हृदय फाड़कर प्रत्येक प्रकारके पाप-युक्त दूषित रक्तसे हृदयको विशुद्ध किया और बुराक़ घोड़ा लाकर उसपर इन्हें सवार कराया जिबराईलने रिकाब पकडी और मेकाईलने बाग थामी । पहले बडे़ हैकल अर्थात् बंत अकसाके द्वारपर पहुँचे, बहुतसे फरिश्ते इस स्थानपर उनको सलाम करनेके निमित्त आये, हजरत घोड़ेको बांधकर आप हैकलके भीतर गये और वहाँ आपने समस्त पैगम्बरोंकी आत्माओंको देखा और उनसे वार्तालाप किया. फिर एक सोपान आकाशसे उतरी जिसको अरबी भाषामें मेआराज बोलते हैं वह सीढी पृथ्वीसे अकाशपर्यन्त रक्खी गई और मुहम्मद साहब बुराक़ पर सवार होकर मेआराज सीढी पर चढ़े और उसके डंडोंपर चढ़ते हुए आकाशको चले । जब पहले आकाशपर पहुँचे तब जिबराईलने पहले आकाशका द्वार खटखटाया

सत्य मुक्तका ब्रह्मादिकोंको उपदेश देना प्रमाण अनुराग सागरका

इसराईल नामक फरिश्तः बारह सहस्र फरिश्तों सहित द्वारकी रक्षा किया करता था। वह बोला कौन है ? तब जिबराईलने उत्तर दिया कि, मैं जिबराईल हूँ और मेरे साथ मुहम्मद साहब हैं तब उसने द्वार खोल दिया और सलाम किया।

फिर हजरत आदम मिले और कहा, धन्य है आइये बैठिये। आदमके दाहिने तथा बाएँ दो द्वार थे, एक नरकका तथा दूसरा बँकुण्ठका। एक ओर देखकर हजरत आदम रो थे और दूसरी ओर देखकर हँसते थे।

इसी प्रकारके वार्तालाप करते और प्रत्येक द्वारको खुलवाते मुहम्मद साहब ऊपर गये। जब सदर स्थानके आगे चले तब जिबराईलने कहा कि, अब आप आगेको चलिये। स्वयम् जिबराईल पीछेको हो लिये, आगे चलकर एक सुवर्ण खचित परदा मिला जब जिबराईल इस परदेके समीप पहुँचे तब भीतरसे आवाज आई कि, द्वार पर कौन है ! तब जिबराईलने उत्तर दिया कि, मैं जिबराईल हूँ और मेरे साथ मुहम्मद हैं। जिबराईलने हजरत मुहम्मदसे कहा कि, अब इससे आगे जानेकी मुझको आज्ञा नहीं है आप अकेले जाइये। तब सत्रह परदे मुहम्मद साहबने अकेले तँ किये। प्रत्येक परदेकी मोटाई पांच सौ वर्षकी राह थी अर्थात् प्रत्येक परदा एक दूसरेसे पांच सौ वर्षके मार्गके अन्तर पर था। आगे चल कर वह बुराक भी रह गया। तब वहाँ पर एक पक्षी जिसको रफ़रफ़ कहते हैं, मुहम्मद साहबकी सवारीके निमित्त आया। इस रफ़रफ़पर सवार होकर रसूल-अल्लाः खुदाके सिंहासनके समीप पहुँचे। रसूलअल्लाः और अल्लाःमें बहुत वार्तालाप हुई। मुहम्मद साहबके आने-जानेमें अनेक घटनायें हुईं जिसके लिखनेका स्थान इस स्थानपर नहीं है। पांचों रोजे, निमाज और समस्त आज्ञाएँ वहाँसे मिलीं यह सब बातें एक पलभरमें हुई। प्रातः काल उठकर मुहम्मद साहबने यह सब बातें दरबार आममें कही उस और अबूबकने सुनतेही इस बातका विश्वास करलिया। पर अबूजहलने यह बात सुनकर लोगोंमें बड़ा उपहास किया। जिसको सुनकर मुसलमानी धर्मसे कितनेही लोग विमुख हो गये। मुहम्मदी दीनके पंडितोंमें इस बातका मतभेद है, किसीका कथन है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न मात्र देखा था और कोई रूह तथा कोई शरीरसे मेआराज कहते हैं और किसीका कथन है कि, केवल बैतअक़सापर्यन्त मेआराज हुआ था। इस बातपर हदीसोंके भिन्न २ कथन हैं।

इस मेआराज मुहम्मदके विषयमें लोगोंके अनेक कथन तथा भांति-भांतिके ध्यान हैं। सूरतं नजम अर्थात् तिरपनबी सूरतमें वर्णन किया है कि, मुहम्मद साहब ने एक तेज स्वरूप व्यक्तिको देखा और फ़मुस्सरीन लिखते हैं कि, यह

कबीरसाहिबका ब्रह्मा-विष्णुके पास पहुँचना कबीर साहिबका शेषनागके पास जाना ब्रह्मादिके ध्यान द्वारा राम नामका प्राकट्य

तेजस्वरूप व्यक्ति हजरत जिबराईल थे । उस धर्मके धुरीण विद्वानोंमें मतभेद है—एक मण्डली उनमेंको कहती है कि, यह तेजस्वरूप व्यक्ति जिबराईल फिरशतः नहीं बरन् रवगम् जगदीश्वर था । सुतरां काजी बंजाबी लिखता है —

وَقِيلَ الصَّابِرُ كَلِمَا اللَّهُ تَعَالَى وَهُوَ الْعَزِيزُ الشَّكُورُ وَهُوَ الرَّزِاقُ وَهُوَ الْمَتِينُ

अर्थात् सब ज़मीर खुदाके निमित्त हैं और तात्पर्य है महाबलसे जिसका अर्थ है—बड़ा बलवाला । जैसे कि कुरानमें विवरण हुआ (अन्नदाता और सायब कूवतमतीं) अर्थात् दूध बलका स्वामी ।

मोआलिम तफ़सीर सूरत नजममें यह लिखता है —

وَأَخْلَفُوا فِي الدُّنْيِ رَأْسَهُمْ

अर्थात् और लोगोंने मतभेद किया है कि, मुहम्मदने देखा वह क्या था ।

فَقَالَ نَاسٍ جَبْرَئِيلَ وَصَوُّقُوا ابْنَ مَسْعُودٍ وَعَائِشَةَ

तब कहा एक मंडलीने कि, उसने देखा जिबराईलको और यह कथन इब्न मसऊद आयशःका है ।

وَقَالَ آخَرُونَ هُوَ اللَّهُ مَزَجَلُ

अर्थात् कहा औरोंने कि वह (जिसको देखा मुहम्मदसाहबे) अल्लाह इजक अल्ल था ।

ثُمَّ أَخْلَفُوا فِي رَأْسِهِ فَقَالَ بَعْضُهُمْ جَعَلَ بَصَرَهُ وَفَوَّادَ وَهُوَ قَوْلُ ابْنِ عَسَاكِرِ

अर्थात् पुनः मतभेद किया लोगोंने परमेश्वरके देखनेके विषयमें अर्थात् परमेश्वरको जो देखा तो किस प्रकार देखा, निदान कहा कुछ मनुष्योंने कि, अवश्य परमेश्वरने दृष्टि दी, उसके हृदयमें अर्थात् उसके हृदयचक्षु खोल दिये, निदान देखा उसने हृदयसे यह इब्न अब्बासका कथन है ।

फिरतवातर लेखकोंका अनुवाद करनेके उपरान्त मुआलिममें यह कथन इब्न अब्बासका लिखा है —

पृथ्वीपर आनेकी कथा

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ مَالِكِ بْنِ الْقَوَادِ مَا رَأَى وَلَقَدْ رَأَى نَزَلَ الْخَزَنَةُ قَالَ رَأَى بِنْدَلَةَ مَرْيَمَ

अर्थात् इब्न अब्बासका यह कथन है नहीं मिथ्या कहा हृदयमें जो उसने देखा उसको ।

एक स्थानपर और उल्लेख किया गया है कि, देखा उसको साथ हृदय अपनेके दो बेर । इसके उपरान्त मोआलममें यह लिखा है --

وَدَهْتَ جَمَاعَةً عَلَى أَنَّهُ رَأَى بَعْنِيَّةَ وَهُوَ قَوْلُ الْحَسَنِ وَأَبْنِي وَأَعْلَمُهُ قَالُوا أَرَأَى
مُحَمَّدُ بْنُ زِيَادٍ عُلْوَى عُلْوَمَةَ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ اللَّهُ أَضْطَنَى أَبْرَاهِيمَ بِالْحُكْمِ
وَأَضْطَنَى مُوسَى بِالْكَلَامِ وَأَضْطَنَى مُحَمَّدٌ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِالرَّيْسَةِ

अर्थात् एक मण्डलीवाले यह मानते हैं कि, देखा उसको अपनी दृष्टिसे अर्थात् मुहम्मद साहबने परमेश्वरको स्वच्छुसे प्रत्यक्ष किया और यह कथन है हसन उन्स और अकरमका । उन्होंने कहा है कि, देखा मुहम्मदने अपने परमेश्वरको । अकरमाने इब्न अब्बाससे वर्णन किया कि, चुन लिया अल्लाहने इबराहीमको मंत्रीसे, और चुन लिया मूसाको कलामसे तथा चुन लिया मुहम्मदको दर्शन देनेसे । पूर्वोक्त तफसीर मोआलमसे कई बातें जानी जाती हैं । प्रथम तो यह है कि, इब्न अब्बासका कथन ठीक है कि, मुहम्मद साहबने बुद्धिबल तथा ज्ञान चक्षु द्वारा परमेश्वरको निरखा था और जिबराईलको नहीं । कारण, यह कि, सूरए नजमसे प्रगट होता है कि, जिस प्रतापशाली पुरुषको मुहम्मद साहबने देखा उस पुरुषकी ऐसी बड़ाई और इतनी श्रेष्ठता वर्णन किया कि, वह उत्पत्तिवान् नहीं जान पड़ता था वरन उत्पन्न कर्ता । उनके मेआराजकी कहानी द्वारा प्रकट होता है कि, जिबराईल एक साधारण भूत्य अथवा चोबदारके समान आकाशोंपर गया था, जहां मुहम्मद साहब ठहरते थे वहां जिबराईल बुराकको बांधता था और जब बुराक सुस्ती करता तो वह उसको हांकता था । जब मुहम्मद साहब आकाशके पार पहुँचे तब अकेले मोहम्मदके जानेकी आज्ञा मिली, कारण यह कि, जिबराईल में ज्ञानका उतना प्रताप नहीं था जिससे वह आगे बुलाया जाता । तात्पर्य यह है कि, सूरए नजममें जिस प्रतापशाली मनुष्यको मुहम्मद साहबके देखनेका विवरण किया गया है, वह कदापि जिबराईल नहीं था, वरन् स्वयम् परमेश्वरही था ।

धोंधल राजका वृत्तान्त खेमसरीका वृत्तान्त ठीका पूरने परही लोककी प्राप्ति

बारहवाँ प्रकरण ।

खुदा साकार है ।

हसन उन्स और अकरमाके कथनसे प्रगट है कि, मुसलमानोंके कुरानानुसार यह विश्वास है कि, शारीरिक दृष्टिसेभी परमेश्वर देखा जाता है। सुतरां तफसीर, अजीजीमें शाह अबदुल अजीज साहबने प्रमाणित किया है कि, क्रयामतके दिन खुदा आकाशसे उतरेगा और सिंहासन पर बैठकर न्याय करेगा । उसका तेज तथा प्रताप सांसारिक सन्नाटोंके सदृश होगा । फिर कुरानसे प्रगट है कि, जो इबराहीम और मूसाका खुदा था वही खुदा मुहम्मद साहबका भी है । आदम, नूह मूसा और इब्राहीम इत्यादिने अपनी चर्मचक्षुसे खुदाको देखा । फिर मुहम्मदको खुदा दृष्टिसे कैसे देखा न जावेगा ? निस्सन्देह वह भी चर्मचक्षुसे देखा जाता है, और जो अन्तर दृष्टिसे देखा जाता है, उसका गुण कुछ कहा सुना नहीं जाता ।

तेरहवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबका जलाली खुदा ।

यह तजकीरेजलाली जो कुरान हदीस तथा तफसीरोंमें लिखा गया है, उस जलाली पुरुषसे कबीर साहबका तात्पर्य है । यदि मुहम्मदी दीनके विद्वान् इस बातकी भलीप्रकार जांच करेंगे तो, उनको पता लग जावेगा । कबीर साहबके अतिरिक्त और किसी देवता और मनुष्यमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, मुहम्मद साहबको एक क्षणमें समस्त आकाशोंका परिभ्रमण करावे और खुदाका दर्शन कराकर पुनः मक्कामें लौटा लूवे । वे लोग बाँग देते हैं और अल्लाह अकबरका नाम लेते हैं, सो अल्लाह अकबर जिसको कहते हैं उसीका नाम कबीर है । अकबर तथा कबीरमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है, जो अकबर है वही कबीर है और जो कबीर है वही अकबर है । वे लोग अल्लाह अकबरका नाम लेते हैं परन्तु (छोटे) अल्लाहकी पूजामें तन मन समर्पण करते हैं तथापि उनकी बाँग अकबर अल्लाहमें बड़ा प्रभाव है । यद्यपि छोटे अल्लाहको वे पूजते हैं तथापि बड़े अल्लाहकी उनको सहायता मिलती है सो इसी अकबरने मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन कराया, देखो ग्रन्थ मुहम्मद'बोधका संक्षेप ।

चौदहवाँ प्रकरण ।

(इस ग्रन्थमें कबीर साहबका मुहम्मद साहबको बोध देने,
सत्यपुरुषका दर्शन कराने और मेआराजका विवरण
प्रश्नोत्तर द्वारा विस्तारपूर्वक वर्णित है)

जीवोंके उपदेश करनेका फल आरतीका साज

धर्मदास बचन ।

साखी—धर्मदांस विनती करें, कृपा करहु गुरुदेव ।
नवी मुहम्मद जस भये, सो सब कहिये भेव ॥

सत्यकबीर बचन—रमैनी

धर्मदास बूझ्यो भल वानी । सो सब कथा कहूँ सहिदानीं ॥
विगस्यो पुहुप उठी अस वानी । मुक्तामणि सुनिये तुम ज्ञानी ॥
भवमें जाव जीवके काजा । जीवन कष्ट देत यमराजा ॥
मुक्तामणि चले शीश नवाई । तत्छण भवमें पहुँचे आई ॥
तबहीं मिले मुहम्मद पीरा । तिन सब हुकुम कीन तागीरा ॥
तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ॥
नजर दिदार जो कीन हमारी । मस्त गयन्द केर असवारी ॥
कहु भाई तुम कहाँ भरमाये । कहाँते आय कहाँको जाये ॥
हुये हैरान नजर नहीं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये ॥
कहर छोड मिन्हदिल आये । तव तुम साँचे पीर कहाये ॥
वाहक को नहीं साहब राजी । पढो कुरान पूछो तुम काजी ॥

मुहम्मद बचन ।

साखी—कहाँ से आये पीर, तुम क्यों कर किया पयान ? ।
कौन शक्सका हुकम है, किसका है फरमान ? ॥

रमैनी ।

पीर मुहम्मद सखुन जो खोला । अल्लाः हमसे परदै बोला ॥
हम अहदी अल्लाः फरमाना । बतन लाहूत मोर अस्थाना ॥
उन भजे रूह बारह हजार । उम्झतके हम हैं सरदारा ॥
तिस कारण जो हम चलि आये । सोबत थे सब जीव जगाये ॥
जीव खाबमें परा भलाई । तिसकारन फरमान ले आई ॥
तुम बूझो सों कौन हो भाई । अपनो इस्न कहो समझाई ॥
साखी—दूर की बातें जो करो करते रोजः नमाज ।
सो पहुँचे लाहूतको, छोड़े कुलकी लाज ॥

कबीरबचन ।

कहैं कबीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ॥
तुम भूलै सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हे भरमाया ॥

त्रेतायुगका वृत्तान्त

फिर फिर आवे फिर फिर जावे । बद अमली किसने फरमाए ॥
लाहूत मुकाम बीचका भाई । बिब तहूकीक असल ठहराई ॥
तुम ऐसे उनके बहु तेरे । लै फरमान जाव तुम डेरे ॥
साखी—खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गौना गोन ।
खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचू न ।
बेचू ना जग राचिया, साई नूर निनार ।
आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दीदार ॥

रमैनी ।

तुम लाहूत रचे हो भाई । अगम गम्म तुम कैसे पाई ॥
यह तो एक आदि विसरामा । आगे पाँच आदि निज धामा ॥
तहाँ ते हम फरमाँले आए । सब बदकेलको अमल मिटाए ॥
उन फरमान जो हम को दीना । तिनका नाम बेचून यम लीना ॥
साखी—साहबका घट दूर है, जासु असल फरमान ।
उनको कहो जो पीर तुम, सोइ अमर अस्थान ॥

मुहम्मद वचन—रमैनी ।

कहैं मुहम्मद सुनो कबीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥
लाहूत भेट जो अगम बताई । खुद खुदाय हमहूँ नहिं बाई ॥
हम जानें खुद आपै आही । तुम कुदरत करथा पोताही ॥
हम तो अर्थ हाजिरी आए । तुम तो कुदरतसे ठहराए ॥
तुम्हरे कहिए भरम मोहि आओ । खुद खुदाय तुम दूर बताओ ॥
आप सुनाआ खुदकी बानी । आलम दुनिया कहो बखानी ॥
लाहूत मुकाम हम निजकर जाना । सो तो तुम कुदरत कर ठाना ॥
हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुकम अल्ला फरमाई ॥
साखा—साई मरशिद पीर, साँचा जिस फरमान ।
हलकी मुलकी बासरी तीन हुकूम फरमान ॥

कबीर वचन—रमैनी

सुनो मुहम्मद कहूँ खुदबानी । खुद खोदायकी कहूँ निशानी ॥
कादिरथे तब कुदरत नाही । कुदरत थी कादिरके माहीं ॥
ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रूहको देउँ बताई ॥
असल रूहकी दीदार जो पावे । बोवे निज मुसलमान कहावे ॥
जब लग तख्त नजर नहिं आवे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥

मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करना आदि त्रेतामें जगतके मनुष्योंके विचार

चार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश जाके सुत भाई ॥
एक अंस चौभाग जो कीन्हा । ताते एक गुप्त करलीना ॥
एक अंसते गुप्त छिपाई । तीन अंस संसार पठाई ॥
अंसहि अंस भेद नहीं बीना । यह अचरज अच्छोने कीना ॥
जो तुम कहा हमारा मानो । तो हम तुमते निर्णय ठाणो ॥
साखी—यह परपञ्च बेचूनका, तुमने कहा न भेव ।
आप सारत होइ बैठा, तु चार करत हो सेव ॥

मुहम्मद वचन ।

कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लज्जमी कइबुनिवाई ॥
जब नहीं पिण्ड ब्रह्मण्ड अस्थूला । तब नहींतौ सृष्टिको मूला ॥
नादनकी कहिए उतपानी । आदि अन्त और मध्य निशानी ॥
साखी—बुज्ररुग हकीकत सब कहो, किस विध भया प्रकाश ।
जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बाँधे आस ॥

कबीरवचन ।

सुनो महम्मद साँचे पीरा । समरथ हुकुम खुदआदि कबीरा ॥
अब हम कहें सुनो चितलाई । आदि अन्तको खबर बताई ॥
प्रथमै समरथ आदि अकेला । उनके संग था नहीं चेला ॥
साखी—वाहिद थे तब आपमें, सकल हत्यौ तिहि माँह ।
ज्यों तरुवरके बीचमें, पुहुप पाय फल छाँह ॥

अब इस स्थानपर कबीर साहब-मुहम्मद-साहबको उत्पत्तिके आदि इत्यादि का सब वृत्तान्त सुनाते हैं और वेदों तथा पुस्तकोंके निर्माणका सब विवरण करते हैं । किंतुनेही प्रश्नोत्तर दोनों महाशंयोंमें हुए और कबीर साहबने लाहूत स्थानसे परमेश्वरका निवासस्थान पृथक् बताया और वेद तथा पुस्तक सबका आदि अक्षर अर्थात् लाहूत स्थानसे प्रगट किया यह बात सुनकर मुहम्मद साहबने अस्वीकार किया ।

मुहम्मद वचन ।

पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कुछ नहीं चले तुम्हारा जोरा ॥
अच्छर हुकुम को मेटन हारा । चार वेद जिन कीन्ह पसारा ॥

कबीरवचन ।

सुनिए सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कबीरा ॥
मेटूं अच्छर का विस्तारा । मेटूं निरञ्जन सकल पसारा ॥

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना

मेटूं अचित केर रजधानी । मेटूं ब्रह्मा वेद निशानी ॥
चौदह यमको बाँध नचावन । मृत अंधा मगहर लेआवन ॥
धर्मरायते झगर पसारा । निरञ्जन बाँध रसातल डारा ॥
वेद कतीबको अमल मिटाऊँ । घर घर सार शब्द फँलाऊँ ॥
पाँचहजार पैंचसौ बरस कलियुग जब जाए । महापुरुष फरमा तब आए ॥
समरथ हुकम चले सब माहीं । व्यापे सत्य असत उठ जाहीं ॥

मुहम्मद वचन ।

पीर मोहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहि जानी ॥
सुना कान नहिं आखिन देखा । विन देखे को करे विवेका ॥
जो नहिं देखूं अपने नैना । कैसे मानूं गुरुको बैना ॥
जो तुम खुद अहदी होइ आए । हुकम हुजूर फरमान ले आए ॥
जौ न राहते तुम चलि आओ । तवन राह मोको बतलाओ ॥
साखी—हंसनको सुस्थान देख, तब मानूं फरमान ।
जो समरथको हुकम है, सोमानू फरमाना ॥

कबीरवचन ।

सुनो मुहम्मद कहैं बुझाई । साहब तुमको देउँ बताई ॥
चले सैरको दोनों पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥

अब यहां कबीर साहब मुहम्मद साहबको साथ लेकर संमस्त लोकों की सैर कराते चें और सबका वृत्तान्त बतलाते और सब कुछ दिखलाते चले ।

पन्द्रहवाँ प्रकरण ।

प्रथम नासूत मुकामका वर्णन ।

कबीर साहब मुहम्मदसाहबको पहले नासूतको ले गये, यह मुकाम सुमेरु पर्वतके उत्तर ओर पृथ्वीसे छत्तीस सहस्र योजन ऊँचा है । यहांपर दयाअंश रहते हैं । यह मायाका स्थान है, महामाया इस जगह अपनी ज्योति फँलाती निवास करती है । जब कबीरसाहब और मुहम्मदसाहब उस स्थानपर पहुँचे तब, वहां हजरत दाऊदको बैठे तथा ज़बूरको पढ़ते पाया । वहां पहुँचकर कबीर साहबने अस्सलाम अलैक कहा, तब हजरत दाऊद अलैकुमसलाम कहकर उठ खड़े हुए और उनके हाथोंको चूमकर बड़ी आवाभगतसे उनका स्वागत किया । तब कबीर साहब मुहम्मदसाहबको इस मुकामकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले ।

मुनीन्द्रजीका अयोध्या जाना०

सोलहवाँ प्रकरण ।

दूसरे मलकूत मुकामका वर्णन ।

दूसरा मुकाम मलकूत है । यह स्थान नासूतसे चौबीस सहस्र योजन उंचाई पर है और पृथ्वीसे साठ सहस्र योजनकी उंचाईपर है । इसी श्रेष्ठ स्थानको दूसरे शब्दोंमें वैकुण्ठ कहते हैं । यह वैकुण्ठ विष्णुका स्थान है । इसी स्थानपर पाप पुण्य का लेखा लगता है । इस विष्णुकी सभामें ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादिक समस्त देवतागण उपस्थित रहते हैं । इस विष्णुकाही नाम धर्मराय है । और आपकी आज्ञासे नरक, वैकुण्ठ और आवागमन आदि सब कुछ होता है । इसी स्थानसे विष्णु महाराज समस्त पृथ्वी और आकाशादिमें जाया आया करते हैं । यहाँही चित्रगुप्तजी विष्णुके मंत्रीके रूपमें सबके पाप पुण्यका लेखा रखते हैं जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस मलकूत पर पहुँचे तो, वहाँ मूसा को बैठे तौरीत पढ़ता पाया । कबीर साहबने वहाँ पहुँचकर सलाम अलैक किया। तब वह मूसा सलामका उत्तर देकर उठे और उनका हाथ चूमकर बड़ी ताजौम की । तब कबीर साहबने मुहम्मद साहबको इस मुकामके समस्त गुण बतलाये तथा वहाँके वृत्तान्तसे विज्ञ कराकर आगे चले ।

सत्रहवाँ प्रकरण ।

तीसरे जिबरुत मुकामका वर्णन ।

तीसरा स्थान जिबरुत है । इस जिबरुत स्थानको कबीर साहबने आँझरी द्वीप कहा है । यह निर्गुण ब्रह्म अलख निरञ्जनका स्थान है । यही तीनों लोकका कर्ता धर्ता सम्प्राट है, यह स्थान, वैकुण्ठसे अठारह करोड़ योजन ऊपरको ऊँचा है, यह बड़ा सुन्दर स्थान है, यहाँपर चार करोड़ ज्योतिका प्रकाश है । इस मुकाम में चारों फरिश्ते जिबराईल, मेकाईल, इसराफ़ील, इजराईल सदा खड़े रहते हैं । इन्हीं चारोंको ब्रह्मा, विष्णु, शिव और यम-इत्यादिके नामसे पुकारते हैं । समस्त आज्ञाएँ इसी स्थानमें प्रचलित हुआ करती हैं । चारों फरिश्ते इन्हींके आज्ञाकारी हैं । वेद तथा किताबोंके प्रचार कर्ता आपही हैं और सब आपहीके आज्ञाकारी तथा अधीन सब हैं । अध्या तथा निरञ्जन इसी राजधानीमें बैठकर तीनों लोकको राज्य, करते हैं । जब कबीर साहब रसूल अल्लाहको साथ लेकर पहुँचे तो, देखा कि हजरत ईसा वहाँ बैठे हुए इञ्जील पढ़ रहे हैं । वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने अस्सलाम अलैक कहा। तब हजरत ईसा सलामको उत्तर देकर उठखड़े हुए और

अनुरागसागरका प्रमाण

उनके हाथको चूम लिया । तब कबीर साहब मुहम्मद साहबका उन स्थानोंके गुणका विवरण करके आगे चले ।

अठारहवाँ प्रकरण ।

चौथे मुकामका वर्णन ।

चौथा मुकाम लाहूत, जिबरूत और लाहूतके बीचमें ग्यारह पालङ्गका अन्तर है । एक पालङ्ग आठ करोड़ योजनका होता है । यह लाहूत स्थान अक्षर अंशका है । वहाँ अक्षर और योगमाया शक्ति रहते हैं । यह बड़ा सुन्दर स्थान है । जब कबीर साहब और मोहम्मद साहब इस स्थानपर पहुँचे, तब कबीर साहबने मोहम्मद साहबसे कहा कि, हे मुहम्मद ! देखो वह आपका स्थान है । यहाँही वह अक्षर पुरुष, जिसको आप बेचूनोचेराका खुदा कहते हैं, रहता है । फिर उस स्थानके गुण दिखलाकर आगेको चले ।

उन्नीसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें हाहूत मुकामका वर्णन ।

पाँचवाँ स्थान हाहूत है यह हाहूत स्थान एक असंख्य योजन शून्यके ऊपर है । अर्थात् लाहूत और हाहूतके बीचमें एक असंख्य योजन शून्य अर्थात् खला और अंधकार है । यह हाहूत स्थान अचिन्त्य पुरुषका है । यहाँ अचिन्त्य पुरुष सप्तनीक रहते हैं । यह स्थान बड़ाही मनोहर है । अचिन्त्य पुरुषके सामने तीन सौ अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं । अचिन्त्य पुरुष निःशंक तथा निर्विघ्न रहते हैं । कबीर साहब इस स्थान और इस पुरुषका सब विवरण मुहम्मद साहबसे कहके आगेको चले ।

बीसवाँ प्रकरण ।

छठऐ बाहूतमुकामका वर्णन ।

यह बाहूत छठा स्थान है । बाहूत और हाहूतके बीचमें तीन असंख्य योजन शून्य और अंधेरा है अर्थात् हाहूतसे बाहूत तीन असंख्य योजनकी ऊँचाईपर है यह अत्यंत मनोहर स्थान है । इस स्थानमें सोहंग पुरुष रहते हैं । सोहङ्ग पुरुषकी अर्धाङ्गिनीका नाम अर्धङ्ग है । यह सोहंग पुरुष अपनी शक्ति सहित अर्धगके साथ सिंहासनपर अधिकृत है । उस स्थानमें सदैव सोहंग ओहंगका शब्द सुनाई दिया करता है । जब कबीर साहब मुहम्मद मुस्तफाको लेकर इस स्थानपर पहुँचे तो, वहाँके समस्त वृत्तान्तोंका विवरण उन्होंने उनसे कहा और फिर आगे चले ।

धर्मरायकी चिन्ता विचित्र भाटकी कथा लंकामें

इक्कीसवाँ प्रकरण ।

सातवें साहूतमुकामका वर्णन ।

यह स्थान साहूत, बाहूतसे पाँच असंख्य योजन ऊँचा है। बाहूत और साहूतके बीचमें पाँच असंख्य योजन ख़ला और अत्यंत अंधकार है। यह इच्छापुरुषका स्थान है। इस स्थानकी सुन्दरता तथा यहाँ की सुख-सामग्रीका विशेष विवरण है। इस स्थानको कबीर साहब मुहम्मद साहबको दिखलाकर आगे चले।

बाईसवाँ प्रकरण ।

आठवें राहूत मुकामका वर्णन ।

राहूत स्थान साहूतके चार असंख्य योजन ऊपर है। साहूत तथा राहूतके बीचमें चार असंख्य योजन ख़ला और अत्यंत अंधकार है। इस राहूत स्थानमें अंकुर पुरुष अपनी शक्ति सहित रहते हैं, अत्यंत सुन्दर तथा मनोहर स्थान है, जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको लेकर इस स्थानमें पहुँचे तो, उसके सब गुण दिखलाकर आगे चले।

तेईसवाँ प्रकरण ।

नववें आहूत मुकामका वर्णन ।

हाहूत राहूत दो असंख्य योजन ऊपर है बीचमें ख़ला (पोल) तथा अंधकार है, इस स्थानमें सहज पुरुष रहते हैं, सत्यपुरुषके सबसे बड़े पुत्र यह कहलाते हैं। यह नववां स्थान सबसे सुन्दर और आनन्दका कहलाता है। कबीर साहबने मुहम्मद साहबको वह स्थान दिखलाया और उसका विवरण करके फिर आगेको चले।

चौबीसवाँ प्रकरण ।

दशवें जाहूत मुकामका वर्णन ।

आहूत और जाहूतके बीचमें दश असंख्य लाख योजनका अन्तर है अर्थात् स्थान जाहूत आहूतके ऊपर दश असंख्य लाख योजनपर है, यही स्थान सत्यपुरुषका है, इसकी सुन्दरताका वर्णन किया जा नहीं सकता है, इसी स्थानसे कबीर साहब सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर आया करते हैं। आप इसी स्थानके अहदी रसूल पाक हैं।

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना

पञ्चीसवाँ प्रकरण ।

सत्यलोकका वर्णन ।

सत्य पुरुषके लोकमें जब हंस पहुँचते हैं, तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है । इन हंसोंका आगमन फिर कभी नहीं होता, वहाँ वे सदा सत्यपुरुषकी स्तुति किया करते हैं । वे हंस सत्यपुरुषके रूप हो जाया करते हैं । सत्यलोकके अधीन अट्टासी सहस्र द्वीप हैं, सब द्वीपोंमें सत्यगुरुके हंस आनन्द करते हैं । द्वीप द्वीपोंमें हंस स्वतंत्र फिरा कहते हैं, उन्हें कहीं भी रोकटोक नहीं है ।

इस तयलोकके गुणोंका वर्णन किसी प्रकार भी किया नहीं जा सकता है । जो कोई उस लोकको जावे उसको कालपुरुषके भयसे सदाके लिये छूट जाता है, इस लोकमें स्त्री पुरुषका भेद नहीं और न वहाँ काम क्रोधादिकी झंझट है । सब हंस सत्यपुरुषके स्वरूप हैं । शारीरिक विकार यहाँ तनिक भी नहीं है, सब हंस समस्त बुराइयोंसे पवित्र होकर सत्यपुरुषके साथ सदैव आनन्दमें रहते हैं ।

छठ्ठीसवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन होना ।

कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस स्थानमें पहुँचे और सत्यपुरुषका दर्शन कराये । कबीर साहब और मुहम्मद साहब दोनोंने सत्यपुरुषको दंडवत् किया । मुहम्मद साहब सत्यपुरुषका दर्शन करके अत्यंत प्रसन्न और नम्र हुए । सत्यपुरुषकी दया तथा कृपा मुहम्मद साहबपर हुई तब मुहम्मद साहब कबीर साहबके अत्यंत अनुगृहीत तथा कृतज्ञ हुए । सत्यपुरुषकी ओरसे मुहम्मद साहबको कितनीही शिक्षा मिली, धर्म कर्मकी कुल आज्ञाएँ वहींसे प्रदान हुई । जब सब आज्ञाएँ मिल चुकीं, तब मुहम्मद साहबको कबीर साहबने पुनः मक्काममें पहुँचा दिया ।

सत्ताईसवाँ प्रकरण ।

पाँच कलमाका वर्णन ।

कबीर वचन ।

नबी मुहम्मद बन्दगी कीन्हा । दर्शन पायके भय लौलीना ॥
तहाँते फिर मृतलोक चलि आये । और निज नाम को पान भी पाये ॥
अब आपनो कौल फिर दीजे । पीछे पान जीवके लीजे ॥

साखी—शब्द भरोसे नामके, दिया नबीको पान ।

तब हम साँचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥

तुम आपनो फ़रमान चलाये । खुदको भेद तुम धरु छिपाये ॥
जो यह भेद तुम परगट करिहौ । तो तुम कौलके बाहर परिहौ ॥
चारो कलमः परगट भाखो । पँचवाँ कलमः गुप्त राखो ॥
पँचवाँ कलमः इल्म फ़कीरी । जाके पस्ने कुफ़ हो दूरी ॥
हम काशीको जात हैं भाई । उबलों अपनो कौल बजाई ॥
तुम पर दाय़ा समरथ केरी । पाँचों कलमः दिलमें फेरी ॥
साखी—हम काशीको जात हैं, तुम मक्के अस्थान ।
हम रामानंद गुरु करें, तुम देव जगत फ़रमान ॥
फ़रमान जग को दीजिये, उलटी अदल चलाय ।
तुम कलमः का हुक्मले, निभंय निसान बजाय ॥

मुहम्मद साहबको कबीर साहबने चार कलमः प्रगट करनेको कहा, और एक कलमः को गुप्त रखनेके लिये कहा । कुल पाँच कलमः मुहम्मद साहबको पढ़ाया जिसमेंसे एक छिपा रखनेके लिये कह दिया, चार कलमः मुसलमानोंको बतानेके लिये कहा । जब मुहम्मद साहब वह कलमः पढ़ा करते थे उस समय किसीको निकट आने नहीं देते थे, उस कलमका भेद मुहम्मद साहबके अतिरिक्त और कोई भी जानता नहीं था । कबीर साहबने मुहम्मद साहबको अपना पान दिया और मुहम्मद तथा मुहम्मदियोंको मुक्ति दिलानेकी आशा दिलाई । सो चार कलमः तो मुसलमानोंको मिले और पाँचवाँ कलमः स्वयम् मुहम्मद साहबके निमित्त था दूसरोंको उसका कुछ भी पता नहीं है ।

अट्टाईसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें कलमका वृत्तान्त ।

मशकात बाब क्रैयाम शहर रमजान फ़स्ल औबल ज़ेद बिन साबितकी खायत दोखारी और मुसल्लमसे यों लिखा है कि, हज़रत रसूल अल्लाहने मस्जिद में चटाईकी एक झोपड़ी बनाई थी, और इस झोपड़ीमें अकेले निमाज पढ़ा करते थे । जब लोगोंने यह दशा देखी तो वे लोग आने लगे । तब भी कई रात्रियोंके उपरान्त एक रात्रिको आए बाहर नहीं निकले तब लोग बाहर खड़े खड़े खँखारने लगे, कदाचित् हज़रत आवाज सुनकर बाहर निकल आवें और निमाज़ पढ़ें परन्तु हज़रत न आये बल्कि कह दिया कि, तुम्हारी रुचि सबैव निमाजपर रहे—पर मैं इस कारण निमाजके निमित्त बाहर नहीं आता कि, कहीं खुदा इस निमाजको भी तुम पर फर्ज न करदे । क्योंकि, यदि यह तुम्हारा फर्ज होगया तो तुम उसको पूर्ण

मधुकरकी कथा

न कर सकोगे । इस कारण ए मनुष्यों ! यही उत्तम है कि, इस निमाजको तुम लोग अपने २ घरोंमें पढ़ा करो । यह बात तालीम मुहम्मदीमें लिखी है जो चाहे सो देख ले । यह पुस्तक मौलवी अमाउद्दीन रचित है ।

अब जानना चाहिये कि, यह वही निमाज और कलमः है जिसके विषयमें कबीर साहबने मुहम्मद साहबको मना किया था कि, किसीपर प्रकट न करना । स्वयम् मुहम्मदसाहब भी इसको गुप्तरीति से पढ़ा करते थे । इस कलमेकी खबर किसी मुसलमानको तनिक भी नहीं है ।

इस तेजोमय पुरुषको, जिसने मुहम्मद साहब को सत्पुरुषका दर्शन करवाया और पाँच कलमा पढ़ाकर पुनः मक्केमें पहुँचाया, जो पहचानेगा सो मुक्ति पावेगा । सो मनुष्य उस सत्यगुरुको पहचानता है उसमें फिर किसी प्रकारकी बुराई नहीं रह जाती है । वह कदापि किसी प्रकार किसी जीवको दुःख नहीं पहुँचाता और न किसी प्रकार किसीको कष्ट पहुँचने देता है, वह सबपर दयालु होता है ।

उनतीसवाँ प्रकरण ।

नवा बर प्रगट होकर इबराहीम अधम सुलतानको शिक्षा देने और शिष्य करनेका वृत्तान्त ।

इब्राहीम अधम बादशाह बलखको बोध करनेका वर्णन सुलतान बोध नामक ग्रन्थमें है जो बोधसागरमें श्रीवैकटेश्वर प्रेसमें छप चुका है । यहाँ पर स्वामी परमानन्द ने उसका विस्तारसे वर्णन नहीं दिया है, इसका कारण यह है कि, आगे इसी ग्रन्थके दूसरे भागमें इनका वृत्तान्त विस्तारसे लिखा है । यद्यपि कितने संत महात्माओंका कहना है कि, यहाँपर भी ग्रन्थोंका प्रमाण देना चाहिये किन्तु, जब आगे विस्तारसे कथा आती है तब यहाँ विशेष लिखकर ग्रन्थ बढ़ाना उचित न समझ कर, इतनी सूचना देनाही अलम है । पाठक दूसरे भागमें देख लेवें । वहाँ विस्तारसे कथा है । यों तो बल बोधकी रमैनी, निर्भय ज्ञान आदि ग्रन्थोंमें भी बहुत रोचक और उपदेशप्रद रीतिसे सुलतान इब्राहीमकी कथा लिखी हुई है ।

तीसवाँ प्रकरण ।

दशवीं बेर कबीर साहबका काफिरिया देशमें प्रगट होना और उस देशके काफिरोंको समझाने तथा शिक्षा देनेका वृत्तान्त ।

द्रापरयुगकी कथा

(काफिर बोध दूसरा अभीतक नहीं मिला जो मिला सो यहाँ दे देते हैं।)

काफिर बोध

कौन सो काफिर कौन मुर्दार । दोऊ शब्दका करो विचार ॥
गुस्सा काफिर मनी मुर्दार । दोऊ शब्दका यही विचार ॥
हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ धूँठे सरवर के तीर ॥
चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ।
नंगे पायन पृथ्वी फिरें । हाट न लूटै वाट न परें ॥
हमतो किसीका कछु न विगारें । दर्दमन्द दिल दया सवारें ॥
दुनिया लोक सो उल्टी करें । सत्यनाम सदा उच्चरे ॥
सिकका देखि न कहिये फकीर । फकीर, न कूटे पुरानी लकीर ॥
काफिर सो कुफराना करे । अल्लाह खुदा सो नाहीं डरे ॥
करें न बन्दगी फिरे दिवाना । गरब वाँधि फिरे गैवाना ॥
बोल कुबोल सेवा बिसरावैं । खून खराफात न द्वार बहावैं ॥
दिलमें चोर कमरमें कत्ती । लोगनके घर भाजे रत्ती ॥
अलहके नामें बाँटे खाना । सो कहिये साँचे मुसलमाना ॥
मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥
खड़ी ना छेडे पड़ी न खाय । सो मुसलमान बिहिश्त को जाय ॥
कलमा पढैं न आवैं बिहिस्त । हिरदे रहे बापकी दिष्टि ॥
हिन्दू मुसलमान खुदाक बन्दे । हमतो योगी न राखे छन्दे ॥
देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम अधार ॥
टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दावैं हाथ न बढै ॥
तहाँ न अग्नि पवनका डर । ऐसा अलखपुरुष जिन्दपीर का घर ।
चूरा पथ्थर बनाया दादा आदमकी करनी । हमतो रहें अलेख
पुरुष, जिन्दा पीरकी शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत

छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलना करे विचार । मक्खी किया बटा अहँकार ॥

मक्खी तो गाये भखे, तो सूअर भखे मक्खी तो हला भखे, मक्खी
तो मुर्दार भखे ॥ मक्खी जाय विगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह
परवाना । कोरा कलमा बहुतेरा बोलै । खैर मिहरका खीस न खौले ॥
मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस-
बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहि
चाना । दर्दमन्द दुरवेश बखाना ॥ रहमत है सुरशिद पीरको ॥ जहमत

रानी इन्द्रमतीकी कथा अनुरागसागरका प्रमाण

सूम महसूदको ॥ निश्चय परिचे निमाज गुजारै । श्रवण नेत्रको वैर
निहारौ ॥ मुहम्मद मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढै ॥ किधर
किधरकी राह बतावे । विनु गुरु पीर राह ना पावे ॥

साखी—हाजी गाजी गुरु चेला, खोजो दस दरकाजा ।

अलख पुरुष कहूँ माथ नवाओ, इस विधि सरै निमाज ॥

सभै साचे काजी, साँचे साँचे मुलना वेद कुरान ॥

कहै कबीर आबसो सब आलम उपजाना ॥

हिन्दू कहिये कि, कहियै मुसलमाना । राम रहीम बसे एक थाना ॥
मनको जाने सोई मुल्ला जान । दरको जाने सोई दरवेश बखान ॥
हमतो बाबा नेकी बदी सो न्यार । दुनिया मति कोइ लावे दोष हमार ॥
हम तो कहि हैं अकेलेदस्त । ताका साहेब मक्का वस्त ॥
मक्कवन्तका साहेब अकिल मन्द । अकिल मन्द अकिल सो जाना ॥
मनमुरीद दोस्ती दाना ॥ सहर गदाई कौन पार । सिर खुरदती कौन
यार ॥ बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशायी कौन यार ॥ काया
यार सिर खुर्दनी । दिल यार माहीं मर्दनी ॥ जीव यार बन्दी खाने ॥
मन यार निशस्त बादशाही ॥ मन लाल दिल लाल लाल पोतदार ।
रहममाही हम साहसाह पोतदार ॥

इति कबीर साहबका वचन उचार विचार ।

अथ खान मुहम्मद अली बादशाहका प्रबोध ।

कलिक कीमोक लिप्त रसमेकी चशमें । खदयर संयम करदम ।

ओजूद राह चकित करदम ।

औबल—अक्ले पीर है मन मुरीद है । तन शहीद है असल कदाई है ॥
तकबुर दुश्मन है । गुस्सा हराम है । नफस शौतान है । चोरी लानती है । जुवारी
पलीदी है । अदब आदिल है । बे अदब कम असल है । राह पीर है । बैराह
बेपीर है । सांच बिहिश्त है । झूठ दोजख हैं । मोमदिल पाक है । संग दिल
नापाक है । हिर्स है । हैवान है । बेहिर्स वली है ।

लाइलाह हरकत है । अचेतबेगुलाम है । असलजाबेको सलाम है ।
कृतहीन जर्दरू है । दाना जौहरी है । असलकी दोस्ती है दाना शायर है । बूझे
महबूब है । बन्दगी कबूल हैं । अल्लाह नूर है । आलम हद्द है । साहिब बेहद्द
है । यकीन मुसलमान है । शील रोजा है । शर्म सुन्नत है । ईमान मुसलमान

है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है । बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है । नासबूरी मक्कारी है । दरोग दन्द है ॥

इति समझौता ।

अथबन्द ।

प्रथम बोलिये मूल बन्ध दुजे बोलिये बोलिये कमर बन्ध । तीजे बोलिये लंगोट बन्ध पाँचवे बोलिये दानिश बन्ध ॥ छठै बोलिये शस्त्र बन्ध । सातवाँ बोलिये सहस बन्ध ॥ आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म विरले पाया ॥ मक्के हिंस मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौवल वीर मुसलमान कहाया । मुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दूके छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं मुसलमान ॥ दादा आदमने गाया । बडे बडे पीरनको फरमाया । खुदाने अली बादशाहको चिताया । हिम्मतें बन्दा मददे खुदा । दुआ फकीरा रहम अल्लाह । कदम दवैशाँ रद्द बलाय दादा आदम मामा हौ आ । मक्क मदीनेमें चढा तवा, पहिली रोटी फकीरको खा ॥ ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा हौवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजीने कह्यो ॥ कहै कबीर वीरको जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण बानी ।

इति श्रीकाफिरबोध ।

फिरिस्तोंका ब्यान ।

१ ओवल फिरिस्ता वसर (दृष्टि) है । जैसे खुदाकी सूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बसरकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने यह फिरिस्ता सब ीवधारीके संग लगा दिया है जो हर एकको बतलाता है कि, देखकर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिस्ता समग्र (श्रवणेंद्रिय) है उसक द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह (बुरा) मरगूब (भला) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

३ तीसरा फिरिस्ता शाम (घ्राणेंद्रिय) है । यह फिरिस्ता सुगन्धि दुर्गन्धि को बतलाता है ।

४ चौथा फिरिस्ता लमस (स्पशेंद्रिय) है जो बतलाता है कठिन और कोमल को ।

५ पाँचवा फिरिस्ता जायका (रसेन्द्रिय) है जो छः प्रकारके रसोंका ज्ञान बतलाता है ।

६ छठा फिरिस्ता हाथ है जो हाथसे करने योग्य कामोंको सिखाता है ।

७ सातवों फिरिश्ता पोंब है जो चलने फिरनेको बतलाता है ।
८ आठवों फिरिश्ता जबान (जिह्वा) है जो भला और बुरा वचन बोलनेको सिखाता है ।
९ नवों फिरिश्ता आलातनासुल (जननेन्द्रिय) है जो मूत्र त्याग करने और संसारकी वृद्धि करनेका मार्ग बतलाता है ।
१० दशवों फिरिश्ता मेकअद (गुदेन्द्रिय) है जो शरीरके मलोंको बाहर निकालता है ।
११ ग्यारहवों फिरिश्ता दिल (मन) है जो इच्छा उत्पन्न करता है और राग द्वेष करता है । दिल वह नहीं है जिसको राक्षस मांसाहारी लोग कबाब बनाकर खाते हैं ।
१२ बारहवों फिरिश्ता इदराक (चित्त) है जो सर्व पदार्थोंका चिंतन करता है ।
१३ तेरहवों फिरिश्ता अहंकार है जो जीवनकी रक्षा करता है ।
१४ चौदहवों फिरिश्ता अकल (बुद्धि) है जिसे जिबराईल कहते हैं । जो सबके भेदको जानता है और सबको उपयुक्त मार्ग बतलाता है ॥
१५ पन्द्रहवों फिरिश्ता शहवत (काम-रजोगुण) है जिसको ब्रह्मा कहते हैं ।
१६ सोलहों तमीज (विवेक-सत्तोगुण) है जो सत्य असत्यका विचार बतलाता है इसीको विष्णु कहते हैं ।
१७ सत्तरहवों फिरिश्ता गजब (अहंकार-तमोगुण) हैं जो दुखदाई पदार्थोंसे रक्षा करता है इसीको शिव कहते हैं ।

इसी प्रकार पांच तत्त्व और सर्व प्रकृतियाँ आदि संसारके सर्व वस्तु फिरिश्ते हैं और जिस प्रकार शरीरका राजा जीव है, उसी प्रकार सब, जड़ चैतन्यका स्वामी निजस्वरूप साहिब है जिसके शरणमें जानेसे अटल सुख प्राप्त होता है ।

इति काफिरबोध ।

इकतीसवों प्रकरण ।

ग्वारहवों बेर कबीर साहबका प्रगट होना और शंकराचार्य संन्यासीको बोध देने और समझानेका वृत्तान्त ।

स्वामी शंकराचार्य और कबीर साहबकी गोष्ठी कबीर भानुप्रकाशमें विस्तारसे दिया है, वहांसे देखना चाहिये और इस कबीरमन्शूरके दूसरे भागके पहले अध्याय में भी देखो ।

बत्तीसवाँ प्रकरण ।

बारहवीं बेर रामानुज स्वामी वैष्णवको उपदेश करनेका वृत्तान्त ।

तेतीसवाँ प्रकरण ।

तेरहवीं बेर शेख मनशूर आदिको बोध करनेका वृत्तान्त ।

२९ से ३३ तकके चारों प्रकरणोंका पूरा खुलासा इसी कबीर मनशूरके दूसरे भागमें मिलेगा । इसके आगे ।

कबीर साहबका काशीमें चौदहवीं बेर प्रागट्य की उत्थानिका ।

सत्यपुरुषके तेज तथा ज्योतिका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशीके लहर तालावमें ठहरना, पृथ्वी तथा आकाशका प्रकाशमय होजाना, समस्त तालावमें प्रकाश तथा जगमगाहटका फैल जाना । अष्टानन्दजीका इस आश्चर्यमयप्रकाशको देखकर आश्चर्यान्वित होना और इस घटनाका समाचार रामानन्द स्वामीको देना । उस प्रकाशका बालकके रूपमें होकर कमलके पुष्पों पर ठहरना । नीरू जोलाहेका अपनी स्त्रीका गवन लिये हुए उस तालाबके समीपसे होकर जाना । जोलाहिनका बालकको तालाबमें देखना और उसको लेकर अपने घरमें ले जाना । कबीर साहब का नीरू जोलाहेके घरमें रहना और भाँति २ के कौतुक दिखलाना । फिर रामानन्द स्वामीका शिष्य होना और समस्त सिद्धोंके साथ शास्त्रार्थ करके सबको वादविवादमें परास्त कर, वैष्णव धर्मकी रक्षा करना । शाह सिकन्दरलोदी का काशीजीमें आना । शेखतक्री बादशाहके पीर, का ब्राह्मणों तथा मुल्लाओं की साटसे कबीर साहबको बावन कसनी देना और कितनेही कौतुक कबीर साहब द्वारा प्रगट होकर कबीर साहबका निष्कलंकित रहना, उन्हें किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचना । कबीर साहबका स्वसम्बेदकी आज्ञाएँ प्रगट करना फिर आपका अन्तिमलीला करनेको मगहर जाना और हिन्दू मुसलमान दोनों जातियोंका कबीर साहबकी लाशको न पाना । वहाँ से आपका विलोपित हो जाना और शवकी जगह केवल चादर और कमलोंका फूल मिलना । हिन्दू मुसलमानोंका केवल चादर तथा कमलोंके फूलोंकी समाधि और कबर बनाना । और हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकताका वृत्तान्त । फिर अपना बाँधो गढ़में प्रगट होकर धर्मदास द्वारा सत्यपथ चलाना ।

सत्य पुरुषकी आज्ञा ।

सत्यपुरुषने जानी से कहा कि, ऐ जानीजी ! कालपुरुषने सब जीवोंको