भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 264

धर्मदास बचन ।

साखी—धर्मदांस विनती करें, कृपा करहु गुरुदेव ।
नवी मुहम्मद जस भये, सो सब कहिये भेव ॥

सत्यकबीर बचन—रमैनी

धर्मदास बूझ्यो भल वानी । सो सब कथा कहूँ सहिदानीं ॥
विगस्यो पुहुप उठी अस वानी । मुक्तामणि सुनिये तुम ज्ञानी ॥
भवमें जाव जीवके काजा । जीवन कष्ट देत यमराजा ॥
मुक्तामणि चले शीश नवाई । तत्छण भवमें पहुँचे आई ॥
तबहीं मिले मुहम्मद पीरा । तिन सब हुकुम कीन तागीरा ॥
तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ॥
नजर दिदार जो कीन हमारी । मस्त गयन्द केर असवारी ॥
कहु भाई तुम कहाँ भरमाये । कहाँते आय कहाँको जाये ॥
हुये हैरान नजर नहीं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये ॥
कहर छोड मिन्हदिल आये । तव तुम साँचे पीर कहाये ॥
वाहक को नहीं साहब राजी । पढो कुरान पूछो तुम काजी ॥

मुहम्मद बचन ।

साखी—कहाँ से आये पीर, तुम क्यों कर किया पयान ? ।
कौन शक्सका हुकम है, किसका है फरमान ? ॥

रमैनी ।

पीर मुहम्मद सखुन जो खोला । अल्लाः हमसे परदै बोला ॥
हम अहदी अल्लाः फरमाना । बतन लाहूत मोर अस्थाना ॥
उन भजे रूह बारह हजार । उम्झतके हम हैं सरदारा ॥
तिस कारण जो हम चलि आये । सोबत थे सब जीव जगाये ॥
जीव खाबमें परा भलाई । तिसकारन फरमान ले आई ॥
तुम बूझो सों कौन हो भाई । अपनो इस्न कहो समझाई ॥
साखी—दूर की बातें जो करो करते रोजः नमाज ।
सो पहुँचे लाहूतको, छोड़े कुलकी लाज ॥

कबीरबचन ।

कहैं कबीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ॥
तुम भूलै सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हे भरमाया ॥