भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 265

फिर फिर आवे फिर फिर जावे । बद अमली किसने फरमाए ॥
लाहूत मुकाम बीचका भाई । बिब तहूकीक असल ठहराई ॥
तुम ऐसे उनके बहु तेरे । लै फरमान जाव तुम डेरे ॥
साखी—खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गौना गोन ।
खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचू न ।
बेचू ना जग राचिया, साई नूर निनार ।
आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दीदार ॥

रमैनी ।

तुम लाहूत रचे हो भाई । अगम गम्म तुम कैसे पाई ॥
यह तो एक आदि विसरामा । आगे पाँच आदि निज धामा ॥
तहाँ ते हम फरमाँले आए । सब बदकेलको अमल मिटाए ॥
उन फरमान जो हम को दीना । तिनका नाम बेचून यम लीना ॥
साखी—साहबका घट दूर है, जासु असल फरमान ।
उनको कहो जो पीर तुम, सोइ अमर अस्थान ॥

मुहम्मद वचन—रमैनी ।

कहैं मुहम्मद सुनो कबीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥
लाहूत भेट जो अगम बताई । खुद खुदाय हमहूँ नहिं बाई ॥
हम जानें खुद आपै आही । तुम कुदरत करथा पोताही ॥
हम तो अर्थ हाजिरी आए । तुम तो कुदरतसे ठहराए ॥
तुम्हरे कहिए भरम मोहि आओ । खुद खुदाय तुम दूर बताओ ॥
आप सुनाआ खुदकी बानी । आलम दुनिया कहो बखानी ॥
लाहूत मुकाम हम निजकर जाना । सो तो तुम कुदरत कर ठाना ॥
हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुकम अल्ला फरमाई ॥
साखा—साई मरशिद पीर, साँचा जिस फरमान ।
हलकी मुलकी बासरी तीन हुकूम फरमान ॥

कबीर वचन—रमैनी

सुनो मुहम्मद कहूँ खुदबानी । खुद खोदायकी कहूँ निशानी ॥
कादिरथे तब कुदरत नाही । कुदरत थी कादिरके माहीं ॥
ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रूहको देउँ बताई ॥
असल रूहकी दीदार जो पावे । बोवे निज मुसलमान कहावे ॥
जब लग तख्त नजर नहिं आवे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥