कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेटूं अचित केर रजधानी । मेटूं ब्रह्मा वेद निशानी ॥
चौदह यमको बाँध नचावन । मृत अंधा मगहर लेआवन ॥
धर्मरायते झगर पसारा । निरञ्जन बाँध रसातल डारा ॥
वेद कतीबको अमल मिटाऊँ । घर घर सार शब्द फँलाऊँ ॥
पाँचहजार पैंचसौ बरस कलियुग जब जाए । महापुरुष फरमा तब आए ॥
समरथ हुकम चले सब माहीं । व्यापे सत्य असत उठ जाहीं ॥
मुहम्मद वचन ।
पीर मोहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहि जानी ॥
सुना कान नहिं आखिन देखा । विन देखे को करे विवेका ॥
जो नहिं देखूं अपने नैना । कैसे मानूं गुरुको बैना ॥
जो तुम खुद अहदी होइ आए । हुकम हुजूर फरमान ले आए ॥
जौ न राहते तुम चलि आओ । तवन राह मोको बतलाओ ॥
साखी—हंसनको सुस्थान देख, तब मानूं फरमान ।
जो समरथको हुकम है, सोमानू फरमाना ॥
कबीरवचन ।
सुनो मुहम्मद कहैं बुझाई । साहब तुमको देउँ बताई ॥
चले सैरको दोनों पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥
अब यहां कबीर साहब मुहम्मद साहबको साथ लेकर संमस्त लोकों की सैर कराते चें और सबका वृत्तान्त बतलाते और सब कुछ दिखलाते चले ।
पन्द्रहवाँ प्रकरण ।
प्रथम नासूत मुकामका वर्णन ।
कबीर साहब मुहम्मदसाहबको पहले नासूतको ले गये, यह मुकाम सुमेरु पर्वतके उत्तर ओर पृथ्वीसे छत्तीस सहस्र योजन ऊँचा है । यहांपर दयाअंश रहते हैं । यह मायाका स्थान है, महामाया इस जगह अपनी ज्योति फँलाती निवास करती है । जब कबीरसाहब और मुहम्मदसाहब उस स्थानपर पहुँचे तब, वहां हजरत दाऊदको बैठे तथा ज़बूरको पढ़ते पाया । वहां पहुँचकर कबीर साहबने अस्सलाम अलैक कहा, तब हजरत दाऊद अलैकुमसलाम कहकर उठ खड़े हुए और उनके हाथोंको चूमकर बड़ी आवाभगतसे उनका स्वागत किया । तब कबीर साहब मुहम्मदसाहबको इस मुकामकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले ।