कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 271, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चीसवाँ प्रकरण ।
सत्यलोकका वर्णन ।
सत्य पुरुषके लोकमें जब हंस पहुँचते हैं, तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है । इन हंसोंका आगमन फिर कभी नहीं होता, वहाँ वे सदा सत्यपुरुषकी स्तुति किया करते हैं । वे हंस सत्यपुरुषके रूप हो जाया करते हैं । सत्यलोकके अधीन अट्टासी सहस्र द्वीप हैं, सब द्वीपोंमें सत्यगुरुके हंस आनन्द करते हैं । द्वीप द्वीपोंमें हंस स्वतंत्र फिरा कहते हैं, उन्हें कहीं भी रोकटोक नहीं है ।
इस तयलोकके गुणोंका वर्णन किसी प्रकार भी किया नहीं जा सकता है । जो कोई उस लोकको जावे उसको कालपुरुषके भयसे सदाके लिये छूट जाता है, इस लोकमें स्त्री पुरुषका भेद नहीं और न वहाँ काम क्रोधादिकी झंझट है । सब हंस सत्यपुरुषके स्वरूप हैं । शारीरिक विकार यहाँ तनिक भी नहीं है, सब हंस समस्त बुराइयोंसे पवित्र होकर सत्यपुरुषके साथ सदैव आनन्दमें रहते हैं ।
छठ्ठीसवाँ प्रकरण ।
मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन होना ।
कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस स्थानमें पहुँचे और सत्यपुरुषका दर्शन कराये । कबीर साहब और मुहम्मद साहब दोनोंने सत्यपुरुषको दंडवत् किया । मुहम्मद साहब सत्यपुरुषका दर्शन करके अत्यंत प्रसन्न और नम्र हुए । सत्यपुरुषकी दया तथा कृपा मुहम्मद साहबपर हुई तब मुहम्मद साहब कबीर साहबके अत्यंत अनुगृहीत तथा कृतज्ञ हुए । सत्यपुरुषकी ओरसे मुहम्मद साहबको कितनीही शिक्षा मिली, धर्म कर्मकी कुल आज्ञाएँ वहींसे प्रदान हुई । जब सब आज्ञाएँ मिल चुकीं, तब मुहम्मद साहबको कबीर साहबने पुनः मक्काममें पहुँचा दिया ।
सत्ताईसवाँ प्रकरण ।
पाँच कलमाका वर्णन ।
कबीर वचन ।
नबी मुहम्मद बन्दगी कीन्हा । दर्शन पायके भय लौलीना ॥
तहाँते फिर मृतलोक चलि आये । और निज नाम को पान भी पाये ॥
अब आपनो कौल फिर दीजे । पीछे पान जीवके लीजे ॥
साखी—शब्द भरोसे नामके, दिया नबीको पान ।
तब हम साँचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥