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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

ग्यारहवींबेर कबीर साहिबका प्रकट होना और शंकराचार्य सन्यासीको बोध देने और समझानेका वृत्तान्त

सत्ताईस वंश उनके हैं ताजदार । दखिन देशके आदमी बाजदार ॥
गुरु तीसरे राय बनके बशिकें । लिया तख्त ओ ताजशाही बफर्कें ॥
सोलह वंशले हुक्म जारी करें । जो सतगुरु तवस्सल तयारी करें ॥
गुरु चौथे सदते बम गरब कहे । बमैं सात फरजंदके छिप रहे ॥
ये चारों गुरु मुक्तिके रास हैं । फकत एक जाहिर धरमदास हैं ॥
धरमदासका सब पसारा हुआ । जहाँ मैं जहाँतक हजारा हुआ ॥
न अबतक वह जाहिर गुरु तीन हैं । कि सतगुरुके फरमान आधीन हैं ॥
गुरु चार दुनियांमें जब आयेंगे । नहजदे करी दौर दिखलायेंगे ॥
तो सारी जमींमें हो यह गुलगुलः । है सतनाम सत और सब बुलबुलः ॥
शिलह शोर तीनों कभीं गाहमें । हैं पोंशीदः सतगुरु हुकुम चाहमें ॥
निकल जब पड़ीं फौज साल तीन । हो मुक्तिसे मामूर सारी जमीन ॥
बमैं वंश चारों हुकुम पायेंगे । शपातीं किधरके किधर जायेंगे ॥
पडे शोर आलममें सत् नामका । हो शोदरः निजाते सरअज्जामका ॥
बहर सिम्र डंका हे साहब कबीर । फिरें बोलते सत्य नामे सफीर ॥
गुरु चार सतनाम डंका दिया । पुरुष कालके दिलमें सनका दिया ॥
बहरा जुझाऊ बजे डढ़ढ डोल । कि सब कैदियों की ही जञ्जीर खोल ॥
बजे झौझ और शंख मिरदङ्ग जो । जिसे देखते दूतदल दङ्ग हो ॥
न वे जूर पुर नूर है सब समात । तुलू मल्ल है कट गई सारी रात ॥
गुरु चार हरजाय बोले नकीब । न बाकी रहा और कोई कीब ॥
करे गुप्तगू उनसे जो दूबदू । मती सारे उनके न कोई अदू ॥

धर्मदाससाहबके बयालीसवंशकी प्रशंसाके

उर्दू शेर ।

धरमदासके जो बयालीस वंश । सो सब सत्य सुकृतिके रूप हंस ॥
जुदागानः तारीफ उनकी लिखूँ । कदम दतके पर अपने शिरको रखूँ ॥
है औवल बचन वंश चौरा'मनी । गुरु सत्य मारग धरमके धनी ॥
कि इनसाँका जिसमें गुजारः हुवा । परम पुर्ण यह पर न जारह हुवा ॥
बचनसे जो सतगुरुका अवतार है । उसीके महर जीव भवपार है ॥
सुदर्शन साहब दूसरे नाम जो । करे जीव भवपार कण्डहार सो ॥
जो कुल'पति साहब तीसरे नानदार । पनह जिसके सब जीव हों कामगार ॥

बारहवीं बार रामानुज स्वामीजीको बोध करनेका वृत्तान्त

जो परमोद गुरु चौथे बाला हैं पीर । सो शाफी बवाजी जे खतरःखतीर ॥
कमल नाम साहब कहूँ पाँचवाँ । जगतके गुरु पीर सो बेगुमाँ ॥
हैं छटएँ खुदाबन्द नामे अमोल । कि जिस खौफसे भागजा यमकेगोल ॥
जो सूरत सनेही साहब सातवाँ । कि जङ्गी मेहर देखिए आतमाँ ॥
जो पैदा हुए आठवें नाम इक । मलिक मौत काहो गया सीनःशक ॥
नवै पाक साहब हुए नाम पाक । भरम भूतको सो मिलाया है खाक ॥
प्रगट नाम साहब प्रगट हैं दहम । कि सामान मुक्ति किया सो बहम ॥
धीरजनाम साहब इग्यारवें जो आए । कि धीरज निगह जीव धीरज हुए ॥
उगार नाम साहब हुए बारहवें । परम पंथ परचार इस अह्द में ॥
तेरहवीं उदय पहने आदम कबा । तो जमशेर गुरां भगा दुम दवा ॥
हुई तेरहवीं कुरसी आली दिमाग । किदरजा हरे हागए खुशकबाग ॥
हुवा जोर ओ शोर सत नामको । सला है करम^११^ खास ओ आमको ॥
मिलीं बारहों पंथ इस अह्दमें । सतायश करें गुरुकी यक मह्दमें ॥
कु^१२^रु नाम साहब कहे चौदहवाँ । कि जिनकी बुजुर्गी बदरहो जहाँ ॥
जो परका^१३^श परकाश हो रहीं । सना इस्दअस्त नाम दरजा कहीं ॥
उदि^१४^स्त सोलहवीं साथ जोशन हुए । तो जम जङ्गमें नाम रोशन हुए ॥
कि जब सत्रहवीं होवें साहब मुकु^१५^न्द । हुए कालके दाँत इस वक्त कुन्द ॥
अरध^१६^ नाम अट्टारवीं दर्दमंद । कि आवागमनकी किया राह बंद ॥
जो उन्नीसवीं नाम शानी गुरु । करें जीव को पुर्षके खबरू ॥
कहो बीसवीं साहब हंस मन । न जिनसे लगे काल का कोई फन ॥
सु^१७^कृति नाम साहब हुए बीस एक । तो सुकीरतकी जगमें रहे खूब ठीक ॥
अरज^१८^ नाम बाईस जाहिर हुए । तो इनसाँ परमपदके माहिर हुए ॥
हैं रस^१९^ नाम साहब जरस बीसती । सुन आवाज ताबे हुई सब जमीन ॥
हों चौबिसवीं गङ्गा^२०^ मुनि साहब । गुनहसे हों सब आदमी तायब ॥
पुरुष^२१^ नाम साहब दरस बीस पाँच । नजिउको लगे सङ्गेसो जाकी प्राँच ॥
छबीसबी जागृत^२२^ नाम साहब जगे । न इनसाँको रहजनव ठग तब ठगे ॥
हुए भृगु^२३^ मुनि साहब सात बीस । रहे रास्त दुश्मन दिया जिसने दास ॥
अस्त^२४^ नाम साहब कहे बीस आठ । कि यमदूतको जो दिया मार काठ ॥
हैं उन्तीसवीं साहब कंठ^२५^ मुन । किया कालको मारकर सो दफन ॥
हैं सन्तोष^२६^ मुनि साहब तीसवें । पयान पुरुष आवे ईस अह्दमें ॥

तेरहवीं बेर शेख मन्शूर आदिको बोध करनेका वृत्तान्त कबीर साहिबके काशीमें चौदहवीं बेर प्राकटयकी उत्थानिका सत्य पुरुषकी आज्ञा, सत्य पुरुषके तेजका लहर तालावमें उतरना

यह खुशवक्त दौरों दिखाया हमें । परम पुरुष पैगाम आया हमें ॥
जमीं सारी सतनामकी हांक है । तो दर कामको मुक्तिकी झाँक है ॥
हुई सारे आलममें यह धूम धाम । तअस्युयतजो और भजो सत्यनाम ॥
जमीं सारी पर हुक्मरानी हुई । बाहर कौमपर मेहरबानी हुई ॥
यहूदी दितार मुसलमा हिन्दा । पढ़े कलमये सत्यनामे हुरूदा ॥
चार्तक^१^नाम साहबका एकदूसीस दौर । जमींपर न बाकी रहे यमका जोर ॥
बत्तीसवें बरामद हुए आदि^२^नाम । हुए सारे नफसानी हरकत गुलाम ॥
हैं तैतीसवें वेद^३^नामें बुजुर्ग । कि जिस सामने हो न शौता सतर्ग ॥
साहब आदि^४^नाम हुए तीस चार । कि उस महसे जीव हों कामकार ॥
महा^५^नाम साहब हैं पैंतीसवों । जमींपर हुवा है अमन ओ अमों ॥
छतीसवें हैं निज^६^नाम साहब खदीन । न बाकी रहे रेव कुछ नफस देन ॥
साहब^७^दास साहबका सैंतीस अक्ष । दियबारश इनसानके जिसने वक्ष ॥
उदय^८^दास साहस हों अडतीस पुशत । इलम दिलम सबमें न कोई दुरश्त ॥
कुरद^९^नाम साहबका नौतीस वक्त । बहरहो जहांजिनको है ताजो तख्त ॥
चेहेले दूग^१०^मुनि साहब नामले । तो सत्यलोकके आदमी सब चले ॥
महा^११^मुनि साहब नाम चालीस एक । बदी बेखकुत आदमी सारे नेक ॥
बयालीस^१२^मुक्तामनी साहब है । आखिर जमां सत्पुरुष नायब है ॥
यह जबतक बयालीस पीढ़ी रहे । परमधामकी जगमें सीढ़ी रहे ॥
बयालीस का जबतलक नाम है । न कब्बीर का जगत में काम है ॥
यह सद्गुरुके सब हंस हैं जानशीं । परम पुरुषके सार शब्द अभीं ॥
बयालीस जबतक रहेंगे बजीर । जहां में न जाहिर फिरें फिर कबीर ॥
बहर एक फरमाँ रवाई खिताब । कहे हैं खुदावन्द ऐसा हिसाब ॥
बरस इनके पच्चीस ओ बीस रोज । हरके तख्तपर होवें रौनक फिरोज ॥
हजार एक ऊपर दो पञ्जाही साल । महे तीन दिन बीस गद्दी बजाल ॥
इतें रोज सतपुर्ष फरसान है । जो आवे शरन सोई निर्बान है ॥
जो सतपुरुषके हंस गायब हुए । न हों बहरः वर कोई जो साय बहुए ॥
यह कलियुगमें सतयुग गुजर जायगा । पुरुष कालका अहद तब आयगा ॥
करे आदमी फिर जो तदबीर कोट । कभी सो सके नाबचा यमकी चोट ॥
मेरी बात जो कोई जाने दरोग । कभी फेर उसको न होवे फरोग ॥

परमपुर्ष पीरो शनासिन्दगां । उसी लोक जावेंगे सो बन्दगां ॥
यह कलियुगमें सतयुग तगी हैलड़ी । सह्र सिम्त है आसे हैं वों वाझड़ी ॥
हैं गुरु मुख कोई उनके गोशिन्दगां । जो सतगुरु मोहब्बतमें जो शिन्दगां ॥
जो उस गुरुके मिलनेकी कोशिश करे । अजर ओ अमर जामः पोशिश करे ॥
जो पहचान सोई हैं शाहंशहाँ । न जानें जिन्हे आदमी इवलहाँ ॥
बयालीसका जबसे ठीका हुवा । न इनसानका बाल बीका हुवा ॥
यह माहूद ठीका जो पूरा हुवा । तो यमजालका फिर सहूरा हुवा ॥
जो इस अहूदमें हो कोई बख्त मंद । जेढ़ बाम बाला बनामें कमंद ॥

गजल ।

बयालीस वंश सतगुरुकी निशानी । हैं बखशिन्वः हयाते जान हानी ॥
उसी हम शकलमें सब ना खुदा यह । रहे दुनियाँमें जबतक यह कहानी ॥
सना ख्वानी हैं करते हंस जिनकी । कहे सौबार सतगुरु खुद जबानी ॥
तमीजो अकलसे खुदे पर्ख लीजे । मक्कामें हंस आए लामकानी ॥
दरोगोरास्त अब पहचान होगा । जो सुतफ़र्रिक करेंगे दूध पानी ॥
कदम उनके पकड़ परवाज कर अब । गुजर बग चालसे अपने दुरानी ॥
हवासो अकल ओ हम लङ्गपा हैं । वहाँ पहुँचे नकुरओं वेदबानी ॥
समझ ओ बूझ कर लीजे खमोशी । अवज शिरके मिलेगी राजदानी ॥
करे क्या यह बनी आदम बेचारा । मदद पावे न जबतक आसमानी ॥
पेयाला इश्क पीकर मस्त होजा । जो चाहे चेहरए खुद अरगवानी ॥
पड़े खाते हैं गोता भेष पाखंड । बरहमनभाटओ मुल्ला कुरानी ॥
मेहर हौं गाय बकरी मुरगियोंपर । खुदाबन्द मोहाफ़िज पासवानी ॥
उत्तर चल पार इस दरियाके आजिज । हुई तुझपर जो मुरशिद मेह्लवानी ॥

यह चार गुरु तथा बयालीस वंश जो मुख्य कबीरपंथी कहलाते हैं उनका विवरण हो चुका । इस समय धर्मदास साहबके वंश उपस्थित हैं उन्हींके पथ दिखाने से समस्त मनुष्य सत्यलोकको जाते हैं । दश स्थानोंका चिह्न जो मैंने दिया है उन सब स्थानका पथ इन्हींकी दयाके द्वारा प्राप्त होता है । नौ स्थानोंको पार करके दशवें स्थानको पहुँचता है । इन समस्त स्थानोंके बीचमें शून्यकी डोरी लगी हुई है । वे शून्य (खला) की डोरियाँ हैं । उन डोरियोंके भिन्न १ नाम कबीर साहबने कहे हैं । उन डोरियोंपर सत्यगुरुके पथ दिखानेसे हंस चढ़कर पार हो जाते हैं । जबलों पारख गुरु नहीं मिलता तबलों उन डोरियोंकी तनिक भी सुध नहीं मिलती । ये गुरुलोग भवसागरके पार उतारनेवाले हैं । उनकी प्रशंसा अनेक बार स्वयम् कबीर साहबने की है ।

देखो ग्रंथ कबीरसागर नं. १०—शवासगुञ्जार पृ० १११—११२.

साखी—बिरछा नाहीं फल भखैं, नदी न अचवैं नीर ॥

परमारथके कारणें, सन्तन धरा शरीर ॥

सन्त बड़े परमाधरथी, घन जाबरसैं आय ॥

तप्त बुझाव औरकी, अपनो पारस लाय ॥

साधु सराहिय ताहिको, जाको सतगुरु टेक ॥

टेका बनाए देह भर रहे शब्द मिल एक ॥

सत्य शब्द हित जानके, सुमिरे सतगुरु धीर ॥

धरमदास तुम वंश को, सिरंज्यो गुरु कबीर ॥

चौपाई ।

सत्य सुकृति सुमिरो मन माहीं । टूटत बजर राखलेउ राहीं ॥

साखी—सत्यसुकृतिके बाल कहै, जो चितवै कर डीठ ॥

ताजन तोरों चौहटे, गुनहगारकी पीठ ॥

ज दिया कहूँ तो जगतरे, परगट कहो न जाय ।

गुप्त परवाना देत हौं, राखौ शिरै चढाय ॥

जिन डरपो तुम काल को, कर मेरी परतीत ॥

सप्तद्वीप नौखण्डमें, चलिहौं भवजल जीत ॥

यहांतक तो चार गुरु और बयालीस वंशका लेखा लगचुका है । इनके अतिरिक्त कबीर साहबके बारह पंथ और भी हैं । वे भी कबीरपंथीही कहलाते हैं ।

कबीर साहबके बारह पंथोंका सामान्य परिचय ।

१—नारायणदासजीका पंथ । २—यागौदासजीका पंथ । ३—सूरत गोपाल पंथ । ४—मूलनिरंजनका पंथ । ५—टकसारी पंथ ॥ ६—भगवान्दासजीका पंथ । ७—सत्यनामी पंथ । ८—कमाली पंथ । ९—रामकबीर पंथ । १०—प्रेमधामकी वाणी । ११—जीवा पंथ । १२—गरीबदास पंथ ।

यह तो कबीर साहबके बारह पंथ हैं । इनमें कोई २ अच्छे हैं और कोई विश्वासके निर्बल हैं । राम कबीरके लोग ठाकुरपूजा करते हैं । सत्यनागियोंके यहां प्रायः ध्यानभी प्रचलित हैं । इन बारह पंथोंका यही विवरण है ।

१ बूझ, २ खांयें, ३ सीखें, ४ लिये, ५ महात्माओंने ६ परोपकारी, ७ मेघ, ८ तहर, ९ पारसकी तहका सत्य उपदेश, १० प्रण, ११ उनके उपदेशसे होतेही उसीमें लगजाय, १२ माना, १३ धर्मदास, १४ वज्र, १५ मार्ग, १६ देखे, १७ दृष्टि १८ प्रत्यक्ष, १९ चिट्ठी, २० मत, २१ विश्वास २२ संसार सागर ।

श्वपच सुदर्शनके माता पिताके तीन जन्मका वृत्तान्त (अनुराग सागरसे) नीमा और निरूका बालक पाना

उनके भिन्नपंथ ।

इन बारह पंथोंके अतिरिक्त कबीर साहबके और भी पंथ हैं । जैसे नानक पंथ । दादूपंथ । यानिपपंथ । मूलकदासपंथ । गणेशपंथ । इत्यादि ।

इन पंथोंके अतिरिक्त हिन्दू और मुसलमानोंमें कबीर साहबके दूसरे भी कितनेही पंथ हैं जिनकी यथार्थता अभी लोगोंको भली भाँति ज्ञात नहीं हुई है इस कारण मैं कुछ लिख नहीं सकता । पंथके कितनेही लोग ऐसे हैं जिनके कि पंथके मनुष्य अब साहबको नहीं मानते । जैसे—नानकशाह, और दाऊद राम और शिवनारायणदास इत्यादि ।

जो लोग कबीर साहबको नहीं मानते उनका नाम शिष्योंमें लिखना किसी प्रकार युक्तिसङ्गत नहीं है । तो भी यह नहीं कहा जासकता है कि, जो कबीर साहबको नहीं मानते हैं उसमें उनके गुरुओंका अथवा उनके पथदर्शकोंका दोष है जिसका दोष होगा बही दोषी माना जावेगा ।

महाप्रलयकी कथा ।

महाप्रलयके विवरणका निचोड़ यह है । कि, प्रलयके अनेक भयानक चिह्न परिलक्षित होंगे । पृथ्वीपर विशेष पाप होंगे । महाप्रलयके सवासी वर्ष पहिलेसे बराबर ग्रहण लगता जावेगा, एकसौ वर्षपर्यन्त बराबर चन्द्रग्रहण होगा । इसके उपरान्त सूर्यग्रहण होगा । जब सूर्य और चंद्र ग्रहण समाप्त हो चुकेगा तब महा-प्रलय आवेगी । इतनी पानीकी विशेषता होगी कि, पृथ्वीसे ऊपर इतना ऊँचा पानी चढ़ेगा कि, जलकी झाग व लहरही दश सहस्र योजन ऊँची उठेगी । समस्त जीव मरजावेंगे समस्त शून्य हो जावेगा । पृथ्वी तथा आकाशमें कुछ दिखलाई न देगा । समस्त संसारकी रचनाको कालपुरुष समेट लेगा । पाँच तत्व तीन गुण कालपुरुषमें समा जावेंगे—आद्याको कालपुरुष निगल जावेगा । निरञ्जनके


१ शिक्ख—कबीर दासजीको नानक देवजीको गुरु नहीं मानते इसका कारण यह है कि, सुलतान बहलोदलोधीके शासन कालमें संवत् १५२६ विक्रमी कार्तिक शुक्ला क्षत्रिय (खत्री) पूर्णिमाको चार घडीके तड़के श्री कल्याण रायके; घर माता तुप्तीके उदरसे तलवण्डी (लहोर) में गुरु नानक देवजीने जन्म लिया । १५३२ पंद्रहसौ बत्तीसमें पाठशालामें पढ़ने बिठाया, १५३५ में पं. ब्रजनाथजीके पास संस्कृत पढ़ने भेजा । १५३९ में वहां फारसी आरंभ कराई १५४१ में सुलतान पुर (कपूरथला) गये तथा १५४२ में वहां नबावके मोदीखानेका कार्य किया । १५४५ में विवाह किया । १५५१ में नानक देवजीके घर श्री चन्द्रजीका जन्म हुआ । संवत् १५५४ में वे ईनामकी नदीपर स्नान करतीबार एकदिव्य साधुसे मुलाकात होते ही गृहकार्य त्यागकर कबरिस्तानमें आसन जा जमाया । यही समय नानक देवके प्रकटमें विरक्त होनेका हुआ है । १५६१ में दिल्ली गये तथा १५६३ में काशी आये तथा रघुनाथपुर कबीरजीसे मिलने पहुंचे, कबीर जी मार्गमें ही मिल गये वहां दोनोंमें सुन्दर सत्संग हुआ ऐसा तो सिक्ख भी मानते हैं परन्तु नानक देवजी शिष्य हुए ऐसा नहीं मानते ।

बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना

मस्तकमें एक अर्ध गोलाकार प्रसादभृङ्गके समान एक स्थान है, उसी स्थानमें समस्त रचना सूक्ष्मरूपमें प्रविष्ट होजायगी । क्योंकि, समस्त रचनाको वह अपने मस्तकके उसी विशेषस्थानमें रख लेता है । तथा अपने शिरके बीचके गुम्बदमें लिए हुए सत्तर युगपर्यन्त बराबर शून्यमें फिरा करता है । सत्तरयुगके उपरान्त उसका चित्त व्याकुल हो जाता है । एकान्त होनेके कारण उसके मनमें अत्यंत घबराहट होती है, उससे कुछ हो नहीं सकता है, वह अपने चित्तमें यह सोचता है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ । वह बल अपनेमें नहीं पाता दुःखी होता है कि, अब क्या करूँ ? तब वह सत्यलोककी छाया अर्थात् आस पास जाकर निवेदन करता है । तब समर्थकी आज्ञा होती है कि, ऐ ज्ञानी ! शून्यमें निरञ्जनके पास जाओ और कहो कि, वह जाकर अब कूर्मजीकी पीठ के ऊपर तीन लोककी रचनाका प्रस्तार करे । उस समय ज्ञानीजी सत्य पुरुषका समाचार लेकर निरञ्जनके पास जाते और समर्थकी आज्ञा सुनाते हैं जब पुरुषकी आज्ञा सुनते हैं, उसी समय निरञ्जन दौडकर कूर्मजीकी पीठके ऊपर तीनों लोककी रचनाका सामान करते हैं । तब निरञ्जन अपने मुँहसे आद्याको उगल देता है । आद्या तथा निरञ्जन मिलकर तीन देवताओंको उत्पन्न करते । फिर पांचों मिलकर सब सृष्टिकी उत्पत्ति करते हैं पहले सत्यस्वरूप सृष्टि उत्पन्न होती है । सब लोक नितान्तही धर्मात्मा होते हैं जैसा—कि कुछ मने पूर्वमें लिखा है उसी प्रकार समस्त रचना प्रगट होती है । इस प्रकार उत्पत्ति स्थिति तथा बिनाश हुवा करता है और जब उत्पत्ति होती है तब इसी प्रकार कबीर साहब मनुष्योंकी शिक्षाके निमित्त पृथ्वीपर आया करते हैं मनुष्योंको मुक्तिप्रदान किया करते हैं ।

यह तो ब्रह्माण्डके महाप्रलयका विवरण हुवा । इसी प्रकार पिण्डकी प्रलयभी होती है । कारण यह कि, जो कुछ पिण्डमें है सोई ब्रह्माण्डमें है, तनिक भी भिन्नता नहीं है । परन्तु सबसे बड़ा महाप्रलय भी एक दिवस होगा । जब केवल एक सत्यपुरुष और सत्य लोकही रह जावेगा । और कहीं कुछ न रहेगा । अर्थात् दयाद्वीप नासूतसे लेकर सहजद्वीप अर्थात् आहूत स्थानपर्यन्त सब विलोपित हो जावेंगे । केवल सत्यलोकमें ही शान्ति रहेगी । सत्य लोकके हंस सब सुरक्षित और सत्य पुरुषकी रक्षामें सदैव समान रहेंगे ।

अन्तर्धान होनेकी कथा ।

जब काशीके मनुष्योंने कबीर साहबकी अनेक लीलाएँ देखलीं और जान लिया कि, ये तो स्वयम् परमेश्वर हैं न किसीके मारनेसे मरते हैं, न काटनेसे कटते हैं, न डुबानेसे डूबते हैं, न जलानेसे जलते हैं । न कोई हथियार आपके ऊपर

काजियोंका नाम धरने आना और कबीर नामका निश्चय होना

फलित होता है, मनुष्य तथा पशु और देवता आदि आपको किसी प्रकारकी क्षति पहुँचा सकता है। तब उन लोगोंने आपसे पूछा कि, आपकी मृत्यु क्योंकर होगी ? उस समय आपने कहा कि, मैं मग्गह देशमें जाकर छिप जाऊँगा। आपके कथनानुसार कबीर साहब जब एकसौ बीस वर्षपर्यन्त काशीजीमें रह चुके, केवल दो दिवस आपके जानेमें शेष रह गए तब आपने लोगोंसे कहा कि, अब मैं यहाँसे कूच करूँगा मग्गह देशको जाऊँगा, वहाँ छिप रहूँगा, यह बात सुनकर काशीके लोगोंको अत्यंत दुःख हुआ, दुःखोंके बादल काशीजीपर छागये। लोग अत्यंत दुःखित हुए और कहने लगे कि, आज काशी शून्य तथा उजाड़ जान पड़ती है। आज काशीका सूर्य छिपचला नेत्रोंके सामने अंधकार होने लगा। सब लोग कहने लगे कि, हाय ! हम बड़ेही अभागे हैं, हमने ऐसे सत्यवादी महात्माकी आज्ञाको अङ्गीकार नहीं किया। समस्त नगरमें इस बातकी धूम मच गई कि, अब कबीर साहब काशीजीसे चले जायेंगे। समस्त नगर दुःख तथा कष्टसे भर गया। काशीके लोग हाहाकार करते हुए कहते थे कि, अब हम क्या करेंगे। हाय ! हमने ऐसे महात्माका कहना नहीं माना। पीछेसे खरा खोटा जान पड़ता अबतक हमलोगोंको दिखलाई नहीं दिया। बनारसके राजा रायबीरसिंहजी बघेलने जब सुना कि, सत्यगुरु मग्गहदेशको जायेंगे वहाँ जाकर अन्तर्धान हो जायेंगे, अब जानेके केवल दो दिवस शेष बचे हैं। तब उक्त राजाभी अपने दलबलसहित पहलेहीसे वहाँ जा पहुँचा—वहाँपर सत्यगुरुकी प्रतीक्षा कर रहा था। काशीवासी कबीर साहबको घेर रहे थे। उस समय आपके समीप दश सहस्र सेवक और शिष्य उपस्थित थे उनमें कुहराम पड़ रहा था। सब विलाप कर रहे थे। उस समय मग्गहदेशका अधिपति नौबाब बिजलीखों पठान था। वह कबीर साहबका शिष्य था। जब उसने सुना कि, कबीर साहब अपना अन्तिम दिवस यहाँ करेंगे, तब बड़ा प्रसन्न हुवा कि, यह अच्छी बात हुई—कफन दफन सब कुछ अपने मत्यनुसार करूँगा। वह प्रतीक्षा कर रहा था और कबीर साहब काशीसे चलकर मग्गहदेशमें जा पहुँचे, आमी नदीके किनारेपर किसी साधुकी कुटी थी इस कुटीमें जाकर बैठ गए। उस समय राजा वीरसिंह, नौबाब बिजलीखों, कबीर साहबके और बहुतसे सेवक शिष्य वे सब उस नदी जिसके कि, किनारेपर कबीर साहब आकर बैठ गए थे, आ बैठे। वह अनेक दिवसोंसे शुष्क पड़ी थी। कबीर साहबने गुप्त रीतिसे कमलपुष्प तथा दो चादरें मँगवाईं, आप लेट गए, लोगोंसे कहा कि, अब ताला बंद कर दो। तब राजा वीरसिंहने कहा कि, गुरुजी मैं आपके शवको लेकर हिन्दूधर्मानुसार क्रिया कर्म इत्यादि करूँगा।

काजियोंका निरूको कबीरके कत्ल करने की सलाह देना

तब नौवाब बिजलीखों बोले कि, मैं आपको ऐसा कदापि नहीं करने दूंगा, मैं मुसलमान धर्मानुसार उनका कफन दफन करूँगा, तब कबीर साहबने देखा कि ये दोनों युद्धके निमित्त प्रस्तुत हैं, इसमें व्यर्थका रक्तपात होगा, दोनोंको युद्धके निमित्त प्रस्तुत, और दलबल सहित देख, समझाकर कहा कि, सावधान ? आपसमें विवाद न करना । कदापि शस्त्र मत चलाना, जो मेरी बात मानेगा सो प्रसन्न रहेगा, सत्यगुरुकी आज्ञाको दोनों दलोंने स्वीकार कर लिया । तब सबोंने सत्यगुरुको दंडवत् प्रणाम किया, सबका चित्त खेदसे भर गया । तब कबीर साहबने चलानेका शब्द पढा चादर तानकर लेट गए, अपने मुंहपर कपडा लेलिया । लोगोंसे कहा कि, अब इस कोठरीका ताला बंद कर दो, लोगोंने वैसाही किया । जब ताला बंद किया तब एक ऐसा शब्द हुवा कि, जिसको सुनकर उपस्थित मनुष्योंके चित्तपर बड़ा प्रभाव पडा । जय जयकार हुवा कि, सत्यगुरु सत्यलोकको सिधार गए ।

जब उस कोठरीका ताला खोला तब केवल दो चादर मिले और कुछ कमलके पुष्प मिले, इनमेंसे एक चादर और आधे फूल राजा वीरसिंहने लिए, दूसरी चादर और कमलके फूल नौवाब बिजलीखॉने लिये । कबीर साहबका शव कहीं दिखलाई नहीं दिया । राजाने चादर तथा पुष्प लेकर सत्यगुरुकी समाधि बनायी । बिजलीखॉनेभी कबर बनायी और वह समाधि तथा कबर मगहदेशमें इस समयभी वर्तमान है ।

हिन्दू मुसलमान दोनों गुरुभाइयोंने एक मन्दिर बनाया । अब भी हिन्दू मुसलमान दोनों कबीरपंथी वहाँ मौजूद हैं । आमी नदी जो बहुत कालसे शुष्क पड़ी थी, उसमें जल भर गया, जो अबतक प्रवाहित है । अगहन शुदी एकादशी सम्बत् १५७५ विक्रमीको कबीर साहब छिप गये । अन्तिम प्रागटचमें एक सौ उन्नीस वर्ष पाँच महीने और सत्ताईस दिवसोंपर्यन्त आप पृथ्वीपर प्रगट हो लोगोंको शिक्षा देते रहे ।

कबीर साहबका आदि और अन्तमें शरीर नहीं था केवल एक तेजका प्राकटच था । ऐसा कबीर साहबका प्रगट होना तथा छिप जाना है । जब इच्छा हो तब प्रगट हों, जब इच्छा हो तब छिप जावें । जब कबीर साहब मगहरमें गुप्त हुये, तब पुनः मथुरा नगरमें प्रगट हुये, वहाँ रत्ना को शिक्षा देकर फिर धर्मदासजीको बोधागढमें दर्शन दिये । उनको सब सत्यपंथका पथ और धर्म-कर्मकी राह बता बयालीस वंशके नियम भली प्रकार कहे एवं कालपुरषके कपटजालसे भली भाँति सावधान करके अन्तर्धान हो गये ।

बालक कबीरका दूध पीना

कबीर साहबके गुप्त हो जानेका वृत्तान्त ग्रन्थमें मैंने ग्रन्थ कबीरभानु-प्रकाशमें लिखा है उसको इस ग्रन्थसे मिलाकर शुद्ध करलेना उचित है। यह ग्रंथ भली भाँति शुद्ध करके लिखा गया है।

शञ्जल।

खुरशेद परस्व परतव मादूम हुआ है। इन्सान खबर खैर से महकूम हुआ है ॥ आई जो खिजां और गया वक्त बहारी। बुलबुल सुजरा जाए नशीं बूम हुआ है ॥ है कौन जहां में जो मिटा डाले वह तस्तीर। जो कुछ कि कजा काजी से मरकूम हुआ है। तकदीर वयक नायः बिठाला है दो महमल। एक नेकनुमा दूसरा बदशूम हुआ है ॥ वाको न रहे और कहीं शम्स शोभाय। अफवाज लिये तब महे मालूम हुआ है ॥ पा खाक तेरेसै धरा एक जरः सर अपने। सो रहम दो दारैन का मौसूम हुआ है। जो जहर मो अस्सर बहमःसालिको मसलूक। हंर इन्स व जिन उससेही मसमूम हुआ है ॥ आई शब्र और पुष्ट दिखाया। शहे आदल। रैयत जमाः जम जोरसे मजलूम हुआ है ॥ इस अहदमें कोई न सुन मर्दूम फरियाद। मखलूक मलिक मौत का महकूम हुआ है ॥ है मौतका चारः आदम जाद विचारः। अज रोंजे अजल उसकेही मकसूम हुआ है ॥ क्या कह सके तुझसे न कहा जाय सो आजिज। जो कुछ कि तुझे गैब से मफहूम हुआ है।

अध्याय ॥ ५ ॥

कबीरपन्थके धार्मिक नियम।

१—एक अविगत अतीत ब्रह्म सत्य पुरुषका भक्त हो, उसके अतिरिक्त किसी ओर भी ध्यान न करे।

वह ब्रह्म (सत्य पुरुष) केवल पारख गुरुकी शिक्षा एवं स्वसंबेदके अध्ययन (पढ़ने) से जाना जाता है। दूसरा कोईभी मार्ग उसकी प्राप्तिका नहीं है।

२—सत्य पुरुष और कबीर साहब एकही हैं; केवल नाममात्रकाही भेद है। वे एकही दो नामसे कहे जाते हैं उनमें लेशमात्र भी भेद नहीं समझे जो भेद समझेगा उसका मुक्ति होने में भी अवश्य भेद रहेगा।

३—गुरुकी सेवा तन, मन, धनसे करे। गुरु वचनका विश्वास करे। गुरुका आज्ञाकारी रहे। सत्य कबीर और गुरुमें कुछ भी भेद न समझे, गुरुके ऐश्वर्य्य सिद्धि आदिका विचार न करे। जो अपने गुरुको ईश्वर करके

बाल लीला

मानता है, ईश्वरके समानही उसमें भक्ति रखता है उसीका कार्य पूर्ण होता है; पर जो गुरुमें भेदबुद्धि करता है, वह हत भाग्य सदा निष्फलताही प्राप्त करता है ।

अपने उपाजनका दशवों भाग अवश्य गुरुको भेंट करे । सदा अधीनतासे गुरुका धन्यवाद करता रहे ।

४—साधुकी सेवा, भेदबुद्धि त्यागकर, सदा प्रेम और भक्तिसे करे जिस पर संत गुरुकी दया होती है वही दोनों लोकोंमें भाग्यवान होता है । वही दोनों लोकोंमें सफल मनोरथ होता है ।

सर्व प्रकारके साधुओंकी सेवा निष्कपट हृदयसे करना परन्तु ज्ञानी विचारवान्, विवेकी पारखी संत जो सत्य पुरुषकी भक्तिका उपदेश करें, सदाचरणमें लगावें, उनकी सेवामें सदा तत्पर रहे । विशेषतः स्वधर्मके सच्चे विवेकी संतोंकी शिक्षाको सावधानीसे सुने, उनको ध्यानपूर्वक विचारें क्योंकि, स्वधर्ममें पूर्व दृढ़, संतोंके वचनसे धर्ममें दृढ़ आस्था एवं स्वधर्मप्रायणता होती है । इसके उलटा परधर्म (विपक्षीधर्म) के पक्षपाती साधुओंके वचनसे स्वधर्ममें अश्रद्धा और भ्रम होता है ।

जिस साधुमें अपने गुरुसे मिलते हुये गुण पाये जायें उनको अपने गुरुसे भिन्न न समझे, अभेदबुद्धिसे श्रद्धापूर्वक निष्कपट भक्ति करे ।

५—सर्व चराचर जीवधारियोंपर समान भावसे दया रखे । किसी स्वरूप आकारमें कोई भी जीवधारी हों, सबको अपने शरीर और आत्मामें समान जानें । किसी देश कालमें भी किसी जीवधारीको दुख न दे । संसारमें अपना निर्वाह इस प्रकार करे कि, कभी भी अपनी ओरसे किसी जीवधारीको किसी प्रकारकी हानि न पहुँचे । सब जलचर, थलचर, वनवर, पशु-पक्षी स्थावर, जंगमपर समान दयादृष्टि रखे, सबको अपनेही शरीर और प्राणके समान समझे ।

६—मांस आहारको सब घोर पापोंमें बड़ा पाप समझे ।

मांस अहारी चाहे कैसे भी गुण और पुण्यसे पूर्ण क्यों न हों पर कभी भी वह सत्य मार्गको प्राप्त नहीं कर सकते, मांसाहारी आत्मज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकते, उसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।

७—मदिरा तथा अन्य सब मादक पदार्थभी मांसके समानही छोड़ने चाहिये । कोई मादक पदार्थका व्यसनी ध्यान नहीं कर सकते, ध्यान बिना ज्ञान-प्राप्त नहीं होता, ज्ञान बिना मोक्ष नहीं मिलता ।

नीरुके घर मांस आनेकी बातको जानकर कबीर साहिबका अन्तर्धान होना

८—व्यभिचारीको नर्क निश्चय ही होता है ।

९—जितने आकार रूप ब्रह्माण्डमें हैं वे सब बुत कहलाते हैं उनमेंसे रूप या नाम किसीको भी पूजनेवाला मोक्षका अधिकारी नहीं हो सकता । जिस प्रकार बुतपरस्ती ज्ञान मार्गकी टट्टी है, उसी तरह ईश्वर गुरुमूर्तिके ध्यान भक्ति, द्वारकी कुंजी हैं ।

१०—जो कुछ, भोजन, छाजन आदि अपनी संसार यात्रा सम्बन्धी पदार्थ हों, वे सब प्रथम परमात्मा (सत्य पुरुष) को अर्पण कर ले तब स्वयम् स्वीकार करे ।

कोई भी पदार्थ जो प्रथम किसी देवी देवताको अर्पण हो चुका हो, उसे सत्य पुरुषकी भक्ति करनेवालेको कदापि ग्रहण न करना चाहिये, क्योंकि, सत्य पुरुषको अर्पण किये बिना किसी भी पदार्थको ग्रहण करना महापाप है जो पदार्थ दूसरे देवी, देवताको भोग लग गया वह सत्य-पुरुषको अर्पण हो नहीं सकता क्योंकि, दूसरे देवका अर्पित पदार्थ, सत्य-पुरुषको अर्पण करना एक तुच्छ सेवकके जूठे पदार्थको बादशाहको अर्पण करनेके तुल्य महान् अपराध एवम् अनर्थका करनेवाला है ।

कभी भी सत्यपुरुषको भोग लगाये बिना कोई पदार्थ ग्रहण न करे । जो सत्यपुरुषको अर्पण करके किसी पदार्थको ग्रहण करता है, उसका फल अमृत समान मिलता है । इसलिये उचित है कि, अत्यन्त शुद्ध और स्वच्छ भोजन आदि काममें लावे ।

११—न झूठ बोले एवं न झूठे वचन दे, न झूठेका संगही करे । न झूठेसे किसी प्रकारका व्यवहार करे ।

१२—चोरी करना, चोरोंका साथ देना, उनकी सम्मतिमें सहमत होना, उनको सम्मति देना, उनका माल लेना और उनके निकट न जाना चाहिये ।

१३—जूआ न खेले क्योंकि, जूआ महान् दुःखका घर है जूआरियोंकी महा-दुर्दशा होती है । महाराजा नल, महाराजा युधिष्ठिर आदि पुण्यस्वरूप धर्मावतारोंको भी इस जूआने कँसा नष्ट और दुर्दशा ग्रसित कर दिया था जूआ, झूठ, चोरी, व्यभिचार और हिंसा आदि सब पाप परस्पर संबंध रखते हैं, एक दोष आनेसेही क्रमशः सर्व आपही आप आ जाते हैं । इनमेंसे किसी भी एकको धारण करनेवाले पुरुष महान् दुःखोंका अनुभव करते हुये परलोकमें नर्कके भागी होते हैं ।

मुन्नत

१४—शरीरके ऊपर द्वादश तिलक लगावे । कपालमें खड़ी लकीरके समान सीधा तिलक करे, वैसेही मस्तक दोनों ओँख, नाभि, हृदय, दोनों भुजा और दोनों छातियोंसे लेकर मोढेकी ओर फिरता हुआ, पीठ और कानपर तिलक करे ।

१५—उज्वल वस्त्र श्वेत रखे ।

१६—ग्रीवामें तुलसीकी माला एवं तुलसीकी कंठी धारण करे ।

१७—सत्यनामका जप, कीर्तन और भजन करता रहे ।

१८—सत्यपुरुषकी भक्ति तथा सत्यपंथका उपदेश करे । एक मनुष्यको सत्यपुरुषकी भक्ति और सत्यपंथमें प्रवेश करानेके फल करोड़ों गऊओंको कसाईके हाथसे बचानेके पुण्यसेभी बढ़कर है ।

१९—यंत्र, मंत्र, तंत्रादिकी ओर कभी ध्यान भी न दे क्योंकि, ये मुक्ति और भक्तिके शत्रु हैं । इनका साधन करनेवाला छल कपटके व्यसनमें फँसकर महादुराचारी हो नर्कका अधिकारी हो जाता है । जितने तंत्रादिक साधन हैं सब नर्ककेही मार्ग हैं ।

२०—स्वसंबेदके बिना दूसरी पुस्तकोंसे मुक्ति पथ मिलनेकी आशा न रखना चाहिये परन्तु अन्य पुस्तकोंका बोध और ज्ञान बृद्धिके हेतु पढ़े ।

२१—सत्य कबीर और उनके सच्चे हंस और कंडिहारके बिना दूसरेको मुक्तिपथका दर्शन नहीं समझे ।

२२—पारख गुरुकी शिक्षा बिना कदापि मुक्ति नहीं होती ।

२३—सत्य पुरुषकी भक्तिके बिना अन्य सब भक्तियाँ भवसागरमें डुबानेवाली हैं ।

२४—सकाम तीर्थ व्रत आदि सब यमके बन्धन हैं ।

२५—सकाम नौधाभक्ति और चार प्रकारकी मुक्तिकी चाह सब बन्धनही हैं ।

२६—कामी निर्गुण और सगुणके ध्यान करनेवाले भी हों बंधनमेंही रहते हैं ।

२७—हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सब जाति और धर्मके लोग कबीर पंथमें मिल सकते हैं, सबके हेतु समानही भक्ति और मुक्ति है ।

१ यंत्र मंत्र तंत्रका आशय, देखो पण्डित श्रद्धाराम फिल्लोरी विरचित सत्यामृत प्रवाह पृष्ठ १८० में ।

२ वेदादि विद्या सब, बोध हेतु हिय धार ॥ सब मत महरम करे, तब देखे निज सैन ॥

३ कबीर— हम वासी वहि देशके, जहाँ जाति वरण कुल नाहि ।

शब्द मिलावा होय रहा, देह मिलावा नाहि ॥

जाकी मर्यादा जौन विधि, बरते सोई प्रमान ।

जमा माँहि कछु भेद नहि, उज्वल धर्मओ ज्ञान ॥ ६

कुरबानी

२८—नर्क स्वर्ग तथा अन्य सर्व लोक अज्ञानियोंके हेतु ठहराये गये हैं जिसको सत्य आत्मज्ञान प्राप्त हुआ उसके हेतु सब असत्य और भ्रम मात्र हैं ।

२९—सारशब्दके बिना मुक्तिका द्वार कोई भी नहीं है ।

३०—निन्दा, ईर्षा, वैमनस्य, छल, कपट, अभिसान आदि मुक्तिके बँरी हैं ।

३१—अधीनताके द्वारा सब शुभ गुण और पुण्य प्राप्त हो जाते हैं ।

३२—मुक्तिमार्ग बहुत सांकरा और नर्कका मार्ग बहुत चौड़ा है ।

३३—कबीर साहब विदेह हैं उनका देह कभी नहीं कल्पे है ।

३४—कौसीही विपत्ति क्यों न आपडे अपने सत्यगुरुको छोड किसी दुसरेकी सहायताका ध्यान न करे । सत्यगुरुके अतिरिक्त किसीसे भी किसी प्रकारकी आशा न रखे ।

३५—जो कोई सतगुरुकी शरणमें आवे उसे शरणके नियमोंको भली प्रकार पूर्ण करना उचित है । पूर्ण विश्वास रखे कि, सत्यगुरु अवश्य कालके जालसे निकालेंगे और दुखसागरसे पार करेंगे ।

३६—सत्यगुरुकी कृपाका धन्यवाद कभी न भूले क्षण क्षणमें धन्यवादही देता रहे । ऐसा नहीं कि, प्रथम तो प्रार्थना करे पीछे भूल जावे कृतघ्नी कभी मुक्त नहीं होता ।

३७—ईश्वरीय भय मुक्तिका चिह्न है । मृत्युको सदा स्मरणमें रखे ।

३८—सच्चे प्रेमके बिना भक्ति निष्फल है ।

३९—धन्य हैं वे जो शरीरका मोह छोडकर भक्तिमें लगते हैं ।

४०—उदारताके बिना कोई भी भक्तिका पद प्राप्त नहीं कर सकेगा । उदार दोनों लोकोंमें सुखी होता है । उसका थोडा पुण्यभी बहुत फलदायक होता है । कृपणके भजन और तपस्या निष्फल होते हैं चाहे वह जितना भक्ति और भजनका ढोंग करे । कृपण दोनों लोकोंमें दुःखकाही भागी होता है ।

४१—मौन परम उत्तम गुण है । आवश्यकताके अनुसार यथाअवसर बोलें, निरर्थक बकबक न करे । मिथ्या प्रलाप करनेसे आत्मा शरीर सबकी हानि है ।

४२—सत्य गुरु (कबीर साहब) की वाणीका पाठ करे, बारम्बार मनन करे, उनके आशयके ऊपर विचार करे, उनके भेदको भली प्रकार सोचे, समझे सदा काल उन्हींका चिंतन रखे । उनके आशय समझनेमें कोई भी युक्ति उठा नहीं रखे । सत्य गुरुके शब्दोंको यथा अवसर गावे और कीर्तन करे । सत्यगुरुकी प्रशंसा और प्रार्थना सदा करता रहे ।

४३—जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं ऐसा कबीर पन्थियोंको ध्यान करना चाहिये, परन्तु उनके मुक्ति दाता तो स्वयम् (कबीर साहब) और चार गुरु तथा उनके वंशोकोही ठहराया गया है, दूसरेको नहीं कहा ।

४४—किसीको कभी शाप न देना, किसीसे कुवचन न बोलना, एवं किसीका अहित चिंतन न करना चाहिये ।

४५—परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेको तुल्य जाने ।

४६—अभिमानी कभी परमात्माको ध्यापक नहीं देख सकता ।

४७—गुरुकी आज्ञाकारिताही परम तपस्या है ।

४८—जबतक शरीरसे लाड प्यार है उसके पोषणमें वृत्ति लगी हुई हैं इसमें आज्ञाकारिता असम्भव है ।

४९—मूर्ख, शठ तथा विद्याहीनको मुक्ति पद कभी नहीं मिलता ।

५०—जबतक शरीरका भय और चिंतन यानी देहाभिमान है तबतक विदेह पद कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो विदेहको प्राप्त हो ।

कबीर साहबके लोक तथा हंसोंकी कथा ।

कबीर साहबका वह लोक है जिसके कि, गुण कहने सुननेसे बाहर है । केवल स्वसंवेदही थोडासा विवरण करता है । जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समयके उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता । भला उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका कि एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान् है, जिसके कि सामने करोड़ों सूर्य छिप जावें, उन हंसोंके मनमें तनिक भी वासना नहीं रहती । निरञ्जन, आद्या, ब्रह्मा, यम, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाकेही आधीन हो बारम्बार अवतृत होते हैं—राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्मवासनासे अवतार लेते हैं ।

जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर चलकर प्रथम विष्णुको निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है । जब हंसकबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्द्वारा अपने पूर्ण बलसे ऊपरकी ओर चढे चले जाते हैं, ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं, तब धर्मराजकी तीन-सौ साठ कन्या मिलती हैं, जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण करूँ ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है

जो कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे । वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालें, जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्षद्वारा उनको सौहित करना चाहती हैं । परन्तु वे उनकी ओर तनिकभी ध्यान न देते हुए कहते हैं कि, दूर हो चली जा ? तुम्हारी तनिक भी इच्छा हमको नहीं है । तब वे निराश होकर लौटती हैं । भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं । जब हंस उनको अनादर करके चलते हैं, तब आगे धर्मराय मिलते हैं दंडवत् प्रणाम करते हैं, पीछे हंस ऊपरकी ओर चले जाते हैं । जब सत्यलोकको पहुँचते हैं, तब सत्यलोकके हंस उनकी अगवानीके निमित्त बाहर निकलते हैं, प्रत्येक हंस अपने हृदयसे लगाता, मिलता और प्रसन्न होता है, कहता है कि, बहुत दिवसोंके पृथक् हुये हंस आज हमसे आकर मिले । सभी हंस मिलकर उनको सत्यपुरुषके पास ले जाते हैं वे हंस सत्यपुरुषका दर्शनपा दंडवत् प्रणाम करके कृतार्थ हो लोकमें वास करते हैं ।

शोर' ।

भुर्गू रूह आखिरीं नफसको । जब छोडे इस उनसरी कसफको ॥
सतलोग सिधार साथ सतसाज । उस वक्त करे बुलन्द परवाज ॥
दर सिम्त शुमाल सर बसर जाय । बासुरअत सो उबूर कर जाय ॥
वह नूरो जलाल बेबयों है । गुप्ततारे कबीरमें आयों है ॥
जब सुकृत लोक रखरवों हो । रागोरंग देखते दवों हो ॥
देखे कहीं सज्जः लाल जारों । बाहुस्नो जमाल गुलअजारों ॥
सदहा गुलशन चमनबहारी । शीरीं नहरेँ पुर आब जारी ॥
गहे बर्क बदन है नाजनीनाँ । है खूब लगी बजारे मीनाँ ॥
है फिरते कहीं ये हूरो गिलमाँ । बैठे कहीं जाहिदो मुसलमाँ ॥
सैकड़ों प्रकारकी बस्तियाँ और सृष्टिकी रचना देखते हुए ऊपरको चलते हैं । स्वर्ग तथा वैकुण्ठकी सैर करते हुए समस्त बस्तियों और शून्यको पार करके पीछे सत्यलोकको पहुँच जाते हैं ।

कबीर साहबकी मङ्गलवाणी ।

चल हंसा सतलोक हमारे, छोडो यह संसारा हो ॥
यहि संसार काल है राजा, कर्म को जाल पसारा हो ॥
चौदह खंड बसे वाके मुखमें, सबहीं को करत अहारा हो ।

जारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥
ब्रह्मा विष्णू शिवतन धरिया, और को कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छलछल मारे, ले चौरासीमें डारा हो ॥
मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।
ताका रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भान उजियारा हो ॥
श्वेतस्वरूप शब्द जहां फूले, हंसा करत बिहारा हो ॥
कोटिन चांद सुरज छिपि जहँ, एक रोम उजियारा हो ।
वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृतधारा हो ॥
कहे कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥

इस सत्यलोककी मनोहरता और हंसोंका रहन सहन और रीति व्यवहार सूक्ष्मवैदके पढनेसे जाना जा सकता है ।

मुस'दस ।

यह हरदो जहां काल पुरुष के हैं इजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वैद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहां तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पाबन्द हुवा तिफली जवानी व वृद्धापा ॥
सब पर है लगा मलिक मौत मोन्ह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥
जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥२॥
अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत ।
एक इश्क जदः भई है एक हुश्न है औरत ॥
हर कौन कियों भौन है यह मोहिनी मूरत ।

१—यह मुसदस कबीर साहब की मंगलवाणीके भावका विशद अनुवाद है "चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो—“चल हंस अचल मोलिदो आताद हमारे” यह अनुवाद है। “यहि संसार काल है राजा, कर्मको जाल पसारा हो—इसका “यह हरदो जहाँ” यहाँसे “तलवार दो धारे” यहाँतक अनुवाद है, पर कुछ भाव बढाकर किया है। इसी तरह प्रत्येक पावके भावका कल्पना के साथ अनुवाद किया है विस्तारके भयसे पूरा नहीं मिलाते।

दिल पारः हुवा पारः बमह पारए सूस्त ॥
बाजार खड़े मार व वीमार नजारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ३ ॥
कैलास चलेगा व जिन् लोक् चलेगा ।
अमरावती अलकावती गोलोक चलेगा ॥
सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा ।
जो हृद जनो मर्द में सो लेछा चलेगा ॥
वोभी चल जावे जहां नौलाख सितारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ४ ॥
कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा ।
आवे जो वहांसे सो खबर उसकी कहेगा ॥
सब कौल कर शमः अजिले सोल बहेगा ।
जिसको वह नजर आवे सो फिर कुछ न चहेगा ॥
निश्चल सो रहे कायम जहां अमृत धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ५ ॥
हंसोंकी हुस्न खूबी कही जाए सो कैसे ।
यह नातिकः गुम सुम्म बर्या कीजिए ऐसे ॥
एक मूय मुनौविर कह इस नूर का जैसे ।
छिप जायें करोड़ों महेश्वर तलअत तैसे ॥
सब हंस पुरुषरूप पुरुष उनको दुलारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ६ ॥
जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा ।
सोहङ्ग ढुरै चँवर करे पुरुष अनन्दा ॥
यक मुरत सारे न खुदावन्द न बन्दा ।
इस मंजिल नजदीका नहीं कालका फंदा ॥
जिस लोक हमेशः को परमहंस पधारै ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ७ ॥
सतगुरुकी शरण लेके चलो बहूके उस पार ।
वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ।
कर पलमें सुबुकदोश उठा उसका गर्रा बार ।
पहुँचावे बतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥

आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ८ ॥

अध्याय ६.

कबीर साहबकी कुछ लीलाएँ ।

कबीर साहबकी लीलाएँ असीम तथा अनन्त हैं, जिनका कि विवरण किसी प्रकार किया नहीं जा सकता । क्योंकि, जब जब सृष्टि होती है तब तब कबीर साहब पृथ्वीपर प्रगट होते हैं, लोगोंको शिक्षा देनेके लिये कौतुक दिखलाते हैं, सत्ययुग त्रेता द्वापर और कलियुग इन चारों कालोंमें आपकी लीलाएँ एक तरहकी प्रगट होती हैं, उनकी गणना कौन कर सकता है, आप उत्पत्तिके आरंभसे महा प्रलयपर्यन्त मनुष्योंको सिखलाते और शिक्षा देते रहते हैं, अगणित लीलाएँ आपसे प्रगट होती हैं, प्रत्येक स्थानपर जा जाकर आप पुकारते हुए मनुष्योंको शिक्षा देते फिरते हैं, कोई कोई भाग्यवान् मान लेता है, नहीं तो प्रायः लोग आपकी बातों को सुनकर घृणा करते हुए भागते हैं । क्योंकि, समस्त मनुष्योंकी बुद्धिपर कालपुरुषने ताला चढ़ा रखवा है, इस कारण सत्यगुरुकी बातोंको कोई २ पसंद करता है । कालपुरुषका विष सबमें प्रवेशित हो रहा है । जैसे नीमके कीड़ेको नीमही पसंद है । मिश्री तथा चीनी उसके दक्किर नहीं होती । न नीमके अतिरिक्त और किसी वस्तुसे उसकी तृप्ति होती है । सहस्रों लीलाएँ देखते हैं, तो भी उनको विश्वास नहीं होता । समस्त कालोंमें जो लीलाएँ आपसे होती हैं, उनको लिखनेवाला कोई नहीं है । यदि समस्त समुद्रोंकी मसि बनावे, समस्त पृथ्वीका कागज करे, समस्त वृक्षोंकी कलमें हों, समस्त देवतागण लिखें तो कदाचित् कुछ लिख सकें तो लिख सकें । मुझसे तुच्छ मनुष्यमें क्या सामर्थ्य है कि, लिख सकें । क्योंकि, वह समस्त जगतका रचयिता और समस्त लोकोंका मालिक है । समस्त परमेश्वरोंका परमेश्वर है । उसके सामनेकी लीलाओंकी क्या गणना है ? जो समस्त महामान्योंका महामान्य है उसकी लीलाका विवरण व्यर्थ है । फिर भी अपने पाठकगणोंके मनोविनोदके लिये कुछ कौतुक नीचे लिखता हूँ ।

गरीबदासजीकी बाणी इत्यादिमें लिखा है कि, सम्मन नामका एक भक्त था । कबीर साहब शेख फरीद और कमाल सहित उसके घर गये उस समय सम्मनके घरमें भोजनके लिये कुछ नहीं था । सम्मनकी स्त्रीका नाम नेकी और पुत्रका नाम सीब था । सम्मनने अपने पुत्र और पत्नीसे परामर्श किया कि,

कबीर साहिबकी मुन्नत वू. क. कसोटी बालक कबीरका नीरुके घरसे अन्तर्धान

हमारे गृहमें साधु मेहमान आये हुए हैं। हमारे पास भोजनके निमित्त कुछ नहीं है अब क्या किया जाय। तब सम्मनने सीवसे कहा कि, अब तो कोई उपाय नहीं, चलो चोरी करें। तब पिता-पुत्र दोनोंने रात्रिके समय एक महाजनके घर सँध लगाया— सीव द्वार तोड़कर भीतर गया, तीन सेर आटा सीधा तीनों मेहमानोंके पेट भरनेके हिसाबसे चुराकर अपने पिताके हाथ धरा, जब आप छेदसे बाहर निकलने लगा यानी जब छेदसे शिर बाहर निकाला, तब पाँव भीतर ही रह गया—महाजनने भीतरसे पाँव पकड़ लिया। सीवने अपने पितासे कहा कि, मैं तो पकड़ा गया। मेरी हुरमत जाती रहेगी। इस कारण तू मेरा शिर काटले, जिसमें मैं न पहचाना जा सकूँ। सम्मनने अपने पुत्रका शिर काट लिया। आटा सीधा और अपने पुत्रका शिर लेकर अपने घर आगया। सीवका शव वहाँ ही पड़ा रहा। सम्मनने अपने बेटेके शीशको एक ताकपर रख दिया। आटा सीधा अपनी स्त्रीको देकर कहा कि, भोजन प्रस्तुत करो परन्तु सावधान, रोना नहीं। यदि रोओ व दुःख प्रगट करोगी तो साधु भोजन नहीं करेंगे। नेकीने तुरन्त भोजन प्रस्तुत किया, सम्मन उन तीनों साधुओंके लिये भोजन लेगया। तीन पत्तल कबीर साहबके सामने रखकर कहा कि, महाराज ! आप तीनों साधुजन भोजन करें। कबीर साहबने तीन पत्तलके छः टुकड़े किये, और छः भाग करके कहा कि सम्मन ! अब तुम अपने पुत्रको बुलाओ हम छः मनुष्य एक साथ भोजन करेंगे, सम्मनने कहा कि, महाराज ! हम तीनों पीछे आवेंगे—आप तीनों संत पहले भोजनकर लें कबीर साहबने कहा कि, ऐसा कभी न होगा, हम सबके सब एक साथ भोजन करेंगे—कबीर साहबने कहा कि, सीव तू कहाँ है, शीघ्र उपस्थित हो, सीवके शीशसे शब्द निकला कि, महाराज ! मैं किस प्रकार आऊ मेरा तो शीश कटा हुवा ताकपर धरा है। और धड़ कहीं पड़ा है। तब कबीर साहबने कहा कि, शिर तो चोरोंके कटते हैं भक्तोंके शीश नहीं कटते। तू चला आ। कबीर साहबके इतना कहतेही सीवका शव आकर मस्तकसे मिल गया। और वह उसी समय जैसा था वँसा जीवित होकर प्रसन्नतापूर्वक कबीर साहबके पास आ बैठ। छः मनुष्योंने भोजन किया, दूसरे दिन बिदा होने लगे उस समय कबीर साहबने कमाल और शेष फरीदसे कहा कि, यहाँसे शीघ्र चलो। कल तो इसने यह कार्य किया आज न जाने और क्या करडाले।

एक बेर कुछ वैरागी जो रामानन्दके चले थे, कबीर साहब सहित अपने गुरुद्वारे दक्षिण देश तोताद्रिको चले। वे जब काशीजीसे चले थे तब एक भँसा भी अपने साथ लेलिया था उसके ऊपर सबने अपनी गुदडी तथा कठारी इत्यादि