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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

राजा जग जीवन

शिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक धेनु ॥
गरीब-अनब्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल ।
पीयो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥
गरीब-कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि ।
चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥

रामानन्द स्वामी और कबीर, साहब की बातेंलाप की साखी ।

गरीब-भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं एक विरञ्च ।
ऊत भूतको घ्यावना, पाखण्ड और परपञ्च ॥

गरीब-रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार ।
देश द्राविड़ छाड़िके, आये पुरी विचार ॥

गरीब-योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता, सकल शरीर ।
तिरवेणीके घाटमें अटक रहे बलवीर ॥

गरीब-तीर्थ बरत एकादशी, गंगोदक अस्नान ।
पूजा विधि विधानसो, सर्वकलासों गान ॥

गरीब-करे मानसी सेवनित, आत्म तत्वको ध्यान ।
षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥

गरीब-चौदह सौ चले किये, काशीनगर मँझार ।
चार सम्प्रदा चलत हैं, और है बावन द्वार ॥

गरीब-पांच बरसके जब भये, काशी माहिं कबीर ।
दास गरीब अजीब कला, ज्ञान ध्यान गुण थीर ॥

गुल भया काशीपुरी, में अटपट वैन विहंग ।
दास गरीब गुणी थके, सुनि जुलहा परसंग ॥

रामानन्द अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश ।
दास गरीब विलम्ब ना, ताहि नवावत शीश ॥

रामानन्दको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाय ।
दास गरीब दरस भये, पैयन लगी जो लाय ॥

पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन ।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये परवीन ॥

आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त ।
दास गरीब उलझ छबि, अधर डाक कूदन्त ॥

कौन जाति कुल पन्थ है, कौन तुम्हारा नाउँ ।

दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाऊँ ॥
जाति हमारी जगद्गुरु, परमेश्वर यह पन्थ ॥
दास गरीब लिखत परे, नाम निरञ्जन कन्त ॥
रे बालक दुर्बुद्धि सुनू, बट मठ तन आकार ।
दास गरीब दर दर लगे, बोले सिरजनहार । ।
तू मोमिनके पालुवा, जुलहे के घर वास ।
दास गरीब अज्ञान गति, एता दूढ़ विश्वास ॥
मान बड़ाई छाडिके, बोलै बालक वैन ।
दास गरीब अधम मुखी, इतना तुम घर फैन ॥
कलियुग क्षेत्रदपाल है, क्या भैरो कोई भूत ।
दास गरीब विडंबना, गया जगत सब ऊत ॥
मनी मग्ज माया तजो, तजिये मान गुमान ।
दास गरीब सो बात कहि, नहीं पावेगो जान ॥
हे बालक बुधि तोरि गति, कौडी साखन भाँड ।
दास गरीबहि हूदेस करि, नहीं लेवेंगे डाँड ॥
शाह सिकन्दर के बधे, पग ऊपर तर शीश ।
दास गरीब अगाधि गति, तोर कहा जगदीश ॥
कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच ।
दास गरीब जहान मैं, तुम सर जोरा मीच ॥
मरत मरत सब जग मुवा, लखै नऽ स्थिर ठौर ।
दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न औरू ॥
नादबिन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन ।
दास गरीब पलक फना, जैसे बुद बुद लीन ॥
तिरन कत लों से बोलते, रामानन्द सुजान ।
दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥
नीच मीच से ना डरे, काल कुल्हाड़ अशीश ।
दास गरीब अदत्त है, तँ जो कहा जगदीश ॥
जड़िहों हाथ हथकडी, गले तौक जञ्जीर ।
दास गरीब परख बिना, यह बाणी गुणगीर ॥
परख निरख नहीं तोहिको, नीच कुलीन कुजात ।
दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥

हे बालक नीची कला, तुमही बोलो ऊँच ।
दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥
महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन ।
दास गरीब मनी मरी, मैं अजिज आधीन ॥
मैं अविगत गतिसे परे, चारवेद से दूर ।
दास गरीब दशो दिशा, सकल सिन्धु भरपूर ॥
सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ ।
दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥
जात पाँत मेरे नहीं, नहीं स्त्री नहीं गाउँ ।
दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥
नाद विन्द मेरे नहीं, नहि गोद नहि गात ।
दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥
सब सङ्गी बिछुरु नहीं, आदि अन्त बहु जाँहि ।
दास गरीब सकल बसों, बाहर भीतर माँहि ॥
हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीरू ।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत पुरुष कबीर ॥
अनन्त कोटिसलिता बडो, अनन्त कोटि घर ऊँच ।
दास गरीब सदा रहूँ, नहीं हमारे कूँच ॥
पुहमी धरनी अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर ।
दास गरीब न दूसरा, हम सम तुल नहि और ॥
मैं माया मैं कालहूँ, मैं हंसा मैं बंस ।
दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥
ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव ।
दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥
हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम ।
दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥
हम मौला सब मुल्कमें, मुल्क हमारे माँहि ।
दास करीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाँहि ॥
हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश ।
दास गरीब हम नित रहें हम तजि जात हमेश ॥
हमहीं लाल गुलाल है, हम पारस पद सार ।

दस गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥
हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश ।
दास गरीब तत्त्वपञ्चमैं, हमहीं शब्द निवास ॥
सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्च ।
दास गरीब हम रूप विन, और सकल परपञ्च ॥
हम रोवत हैं सृष्टिको, वो रोवति है मोंहि ।
दास गरीब वियोगको, और न वृक्ष कोइ ॥
मैं बूझू मैंही कहूँ, मैंही किया वियोग ।
गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥
चारो जुगनमें हम फिरेँ, नहिं आवेँ न जाउँ ।
गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥
रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह ।
गरीबदास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन ॥
लगी महम गनीम पर, काल कटक कटकन्त ।
गरीबदास निर्भय करूँ, जो कोइ नाम जपन्त ॥
मैं बालक मैं वृद्ध हूँ, मैं ही जवाँ जमान ।
गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥
गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह ।
गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥
आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप ।
गरीबदास जलतरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥
गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल ।
गरीबदास दृढ़त फिरूँ, हीरे माणिक लाल ॥
इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाऊँ ।
गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥
बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल ।
गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥
सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान ।
गरीबदास सिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥
स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गले डार ।
गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥

राजा जगजीवनकी रानियोंके नाम

डचोढ़ी, परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय ।
गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल पर वेश ।
गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥
यह तो तुम शिक्षा दयी मान लिये मत मोर ।
गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥
हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छाड़ो आशा रीत ।
गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥
सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाड़ूँ रीत ।
गरीबदास गुदड़ी लगी, जन्म जात है बीत ॥
चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह ।
गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊ बाह ॥
हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ ।
गरीबदास वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥
शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन मुरारि ।
गरीबदास मुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥
दूधोंकी नदियाँ बगें, श्वेत वृक्ष शोभान ।
गरीबदास मन्दिर मुकुट, स्वर्गपुरी अस्थान ॥
रत्नन जड़ाऊ मनुष सब, गण गँधर्व सब सेब ।
गरीबदास उस धामकी, कैसे छाड़ूँ सेव ॥
चार वेद गावें उसे, सुर नर मुनी मिलाप ।
गरीबदास ध्रुव पुर यश, मिट गये तीनों ताप ॥
नारद, ब्रह्मा यश रटें, गावें शेष गणेश ।
गरीबदास वैकुण्ठसे, और परेको देश ॥
सुनुस्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊँ तोहि ।
गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोय ॥
तीन लोकके जीव सब, विषय बासना भाय ।
गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥
कृष्ण विष्णु भगवान्के, जहाँ गये हैं जीव ।
गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥
सुनु स्वामी तोसों कहूँ, अगम द्रौपकी सैल ।

१५ अध्याय कबीर साहबके कलियुगके शिष्य

गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥
कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन विहण्ड ।
गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण औ पिण्ड ॥
बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार ।
गरीब दास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ।
तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सद्गुरु हम हंस ।
गरीब दास तुम रूप विनु, और न पूजो बंस ॥
मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश ।
गरीब दास अविगत मिले, मिटी मनकी प्यास ॥
दोनों ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय ।
गरीबदास हमकारने, उतरे मगम जोय ॥
बोले रामानन्दजी, सुनु कबीर सुजान ।
गरीबदास मुवित भयी, उधरे पिण्ड ओ प्राण ॥
गुष्ठि रामानन्दसे, काशीनगर मझार ।
गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥

पृ. २९६ में कबीर साहिबके १२ पन्थोंका सामान्य परिचय दिया जा चुका है अनुरागसागरकी भूमिकामें इनका विस्तारके साथ वर्णन किया है तथा उनकी परंपराभी दिखाई है उन्हींके विषयमें कथन है कि, बारहों पन्थोंके आचार्य हंस कबीर हैं। वे सब सद्गुरुके धामको पहुँचेंगे।

रहन सहन

भारतवर्षमें कबीर साहबके अनुयायी बहुत हैं। वे लोग वेद धर्मियोंके साथ मिले मिलाये रहते हैं। वे भ्रम भूतकी पूजासे दूर भागते हैं। वे तीर्थोंमें श्रद्धाके साथ जाते हैं। दान पुण्य आदि करते हैं। जो ठीक कबीरपन्थी नहीं, नाममात्रको कबीरपन्थी बन बैठे हैं उनके विचार तथा ध्यान दूसरेही प्रकारके हैं। कबीर साहबका कथन है कि, हे धर्मदास ! जिसमें तुम ऐसे चिन्ह पाओ उसको उपदेश दो। जिसमें भक्ति, दीनता, साधुसेवा, गुरुसेवा न हो उसको अपने हंसोंमें भूलकर भी स्थान न देना। जिस समय मित्र आदि रविदासजीके जब सब सहायक हार मान गये तब रविदासजीने सत्यगुरुको पहचाना। कपटियोंका भरोसा छोड़कर कबीर साहबके शिष्य हो परमानन्दमें बहने लगे।

भारतवर्षमें बहुत लोग हैं, जो अपनेको कबीरपन्थी कहते हैं, परन्तु उन लोगोंको आज्ञा है कि तुमलोग जब धर्मदास साहबके बचन चूड़ामणिदासकी

शरणमें आओगे तब तुम्हारे सब अपराध क्षमा किये जायँगे, तब तुम मुक्ति पाओगे जबकि सब एक रङ्ग हो जावेंगे । जितने लोग कबीर साहबकी आज्ञापर चलते हैं उनकी धर्म पुस्तक स्वसंवेद है । यह स्वसंवेदही यथेष्ट है अन्यान्य सभी नकल है । जितने शास्त्र तथा विद्या हैं वो सब स्वसंवेदसे हैं । स्वसंवेद एक नदी है । जिससे एक बूंद निकल कर सर्व संसारमें फैल रहा है । उसीमें चिड़िया एक चोंच भरकर प्यास बुझा लेती है । इसी प्रकार सारे पृथ्वीसे परमेश्वर और संसारभरके आचार्य इस स्वसंवेदका कोई भाग अथवा कोई टुकड़ा निकालकर अपना शास्त्र बनाके बैठे हैं । स्वसंवेदहीसे सभीने श्रेष्ठता पाई है परन्तु अपने पिताकी प्रतिष्ठा तथा मर्यादाको किसीने न जाना । इसकी सूक्ष्मता तथा स्वच्छतासे कोई विज्ञ नहीं । सहस्रोंने पन्थ चलाया चलाते हैं वो सब कबीर साहबकी वाणीका आसरा लेकर अपने अपने पन्थको प्रचलित कर रहे हैं । कितने तो ऐसे हुये और होते हैं कि, कबीर साहबके ग्रन्थ तथा वाणी देखकर अपनी वाणी बनाते और अपनेको कबीर साहबके बराबर अथवा बढ़कर ठहराते हैं । ऐसे कृतघ्न स्वार्थियोंको कभी भलाईकी आशा न करनी चाहिये ।

जिस प्रकार भारतवर्षमें हैं इसी प्रकार अरब, फारस, काबुल, तुर्कस्तान, तातार इत्यादिमें कबीर साहबके अनेक धर्मावलम्बी हैं । शेख जुम्नेद बुगदादी और हसनबशरी इन बड़े बड़े शेखोंमें कितनेसे एक तो शेख कबीरका धर्म मानते हैं । कितने मुसलमानी धर्म मानते हैं । पर आपसमें मिले रहते हैं परन्तु इन दोनों प्रकारके शेखोंमें बड़ा भेद है । दोनोंकी रीति न्यारी न्यारी हैं । कबीर साहब प्रत्येक ध्यानपर एक समान भावसे उपस्थित रहते हैं । एक देशसे गुप्त होते हैं फिर दूसरे देशमें प्रगट रूपसे फिरा करते हैं । जैसे एशियाके रहनेवालोंपर दया होती है, उसी तरह अफ्रिका, अमेरिका और योरोप तथा अन्य द्वीपोंके निवासियोंपर भी कृपा हुआ करती है, परन्तु आपका भेद कोई नहीं जान सकता । कहीं से छिपते हैं तो कहीं प्रगट हो जाते हैं । सहस्रों स्थानोंपर कब्र तथा समाधियाँ हैं न कभी जन्म लेते हैं और न कभी मरते हैं । सर्व ब्रह्मण्डोंमें स्वच्छन्द लीला करते हुए अधिकारियोंको उपदेश किया करते हैं ।

सन् १८५२ ई. का वृत्तान्त है । मैं उस समय सेयालकोट था, उसी समय मुझको एक कबीरपन्थी साधु मिला जब मैंने उसको देखा तो उसके पैरकी उँगलियाँ झरी दिखाई दीं । मैंने उससे पूछा कि, तुम्हारे पाँवकी उँगलियाँ कैसे झर गयीं ! उसने उत्तर दिया कि, जब दोस्त मुहम्मदख़ाँ अमीर काबुल जीवित था । अंग्रेजी सैन्य युद्धके निमित्त काबुलपर चढ़ गयी थी, उस समय मैं भी काबु-

लमें गया था। उस सालमें बहुतही बरफ पड़ी, मारे ठण्डके मैं अपना पाँव सेकने लगा, जब बरफकी सरदीके उपरान्त गरमी लगी तो मेरी उँगलियाँ झड़ गयीं। फिर वह साधु मुझसे कहने लगा कि, मैंने सुना है खैबरके ऊपर कबीर साहबकी कब्र है। उसके सैयद अहमद कबीरकी कब्र ऊपर नियत समय पर मेला लगा करता है। एवं बहुतसे दर्शक वहाँ आते जाते हैं। यह बात सुनकर मेरी कामना कब्रके दर्शन करनेकी हुई। तब मैं दूँढ़ता हुआ वहाँ जा पहुँचा तो देखा कि चारों ओर बड़ा सन्नाटा छाया है। कहीं कोई मनुष्य नहीं है, वहाँ केवल एक कब्र बनी हुई थी। उस कब्रके ऊपर एक वृद्ध जिसकी बहुत लम्बी श्वेत दाढ़ी थी बैठा था। उस वृद्धको देखकर मैंने झुककर दण्डवत प्रणाम किया तब वह वृद्ध दयालुहुआ उसने मुझको एक सेबका फल प्रसादमें देकर कहा कि, तुम अब यहाँसे चले जाओ। मैं उस फलको लेकर अपने डेरे चला आया उस फलको एक ताकपर धर दिया कि, दूसरे समय खाऊँगा। थोड़ी देर बाद देखा तो उस फलको उस ताकपर न पाया, वह गायब हो गया था। मैंने बहुत खेद किया वह फल न मिला, इसे मैं अपना दुर्भाग्य समझकर चुप चाप कबीर साहिबका ध्यान करने लगा। पश्चिम देशोंमें कबीर साहिब स्थान स्थानपर सैयद अहमद कबीर और शोख कबीरके नामसे प्रसिद्ध हैं। शोख कबीरके जो अनुयायी आचार्य हैं उनकी भजनकी रीति भाँति मुसलमानी आचार्योंसे निराली ही है कबीर साहबके धर्मपर चलनेवाले प्रत्येक देशमें सभी स्थानोंपर मौजूद हैं। उनका भेद किसीको मालूम नहीं है न मनुष्य उनको यह पहचानही नहीं सकते हैं कि, ये ही कबीर साहब समस्त संसारमें छाये हुए हैं, या कोई दूसराही है। उसका पहचानना बड़ा कठिन है। वह स्वयं जिसपर दया करता है वह पहचान सकता है। दूसरेकी क्या सामर्थ्य है कि, उसको जान सके। इस ब्रह्माण्डके भीतर जितने लोक और बस्तियाँ हैं, जितने ब्रह्माण्ड तथा संसार अन्यान्य स्थानोंमें हैं सभीमें कबीर साहब उपस्थित रहते हैं सबके द्रष्टा हैं, प्रत्येक जीवधारीकी सुध लेते रहते हैं। वे सबको याद करते हैं उनको सभी याद करते हैं। समस्त ब्रह्माण्डोंका रचयिता जो प्रत्येकके साथ रहता है उसीका नाम सत्य कबीर बन्दीछोर है। उसीकी रक्षायें सब रट रहे हैं।

गुरुकी कृपा

जो वस्तु प्रयत्नसे किसी प्रकार भी प्राप्त नहीं हो सकती वह गुरुकी कृपासे प्राप्त होती है, बिना गुरुकी पूर्ण कृपाके वासनाएँ धूलमें मिला देती हैं। शोख फरीद जैसे सच्चे वेदान्ती गुरुके विमुख होते ही इतने विषयोंमें फँसे कि,

विवाह करके संसारी हो गये । विषय वासनाके सामने उनकी तपस्या किस काम आई ! हाँ सच्चे गुरुके पूरे भक्त बने रहते तो भवसागरके पार हो जाते । जो सच्चे गुरुको पहिचानकर उसकी शिक्षाके अनुसार सत्यलोकको पा सकता है । स्वसंवेदका यही सार है कि, गुरुके चरणोंको दृढ़तासे गहे रहे । क्योंकि, बिना उसकी पूजाके कुछ न प्राप्त होगा । सदा गुरुकी सीख माननी चाहिये उसकी कृपामें ही सर्वस्व है कबीर साहिबका तो वारंवार यही कथन है कि, गुरुकी मूर्तिमें मुझको पाजाओगे । जबतक दममें दम रहे गुरुको मानता रहे, गुरुकी मूर्तिमें मुझे समझकर उससे सब कुछ माने अणुमात्र भी अभिमान न करे, अपने कल्याणका उपाय सत्य गुरुकी भक्तिही समझे ।

जो सत्यगुरुसे प्रेम तथा श्रद्धा करेगा उसको सत्य शब्द मिलेगा उसे सब कुछ प्राप्त होगा । जिसकी गुरुपर श्रद्धा नहीं है वह शून्य रहेगा । गुरुका प्रेम श्रद्धाही धर्मकी जड़ है । सत्यगुरुका मत निर्गुण तथा सगुणसे अलग है । दोनों कार्य्य सिद्ध हो नहीं सकते । गुरुमें भक्ति करोगे तो जगत् छोड़ना पड़ेगा । यदि लोगोंसे प्रेम करोगे तो भक्तिमें विघ्न होगा । मुरीद नाम मुरदेका है । इसका तात्पर्य यह है कि जैसा गुरु कहे वैसाही करे । अपनी बुद्धि न लगावे और जब तक यह अवस्था न हो तब तक आपको जीवित तथा संसारी समझे । नाम तो समस्त संसार जप रहा है पर जो नाम सत्यगुरु द्वारा मिलता है वही सच्चा है । सहस्रों ब्रह्मा तथा ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर आदि हो गये हैं वे सब विषयकी अग्निमें जल रहे हैं परम अभिमानमें डूबे हुए हैं, इस कारण उनको सत्यगुरुके दर्शन नहीं होते जिसमें सत्यगुरुका प्रेम तथा विश्वास है वही मुक्तिका अधिकारी है । मनुष्योंमें वही भाग्यवान् है जो सत्यगुरुकी सेवा करता है दर्शनको जानेसे पग पवित्र होते हैं । दर्शनसे नेत्र पवित्र होते हैं, जल भरनेकी सेवासे शरीर पवित्र होता है, वचन सुननेसे अन्तःकरण पवित्र होता है । इसी प्रकार समस्त पवित्रता प्राप्त होती है । यदि नाममें बल होता तो सहस्रों मनुष्यों नाम जप रहे हैं । किसीको तो फल मिलता ? इससे जान पड़ा कि, यथार्थ बल सत्यगुरुमें ही है जो सत्यगुरुकी सेवा करता है । इस कारण उसीका दोनों लोकमें कल्याण है । गुरुमुख उसीका नाम होता है जो सत्यगुरुको सबका मालिक समझता है । इसी विषय पर एक दृष्टान्त देते हैं कि, दक्षिण देशमें एक परम श्रेष्ठ महात्मा अपने शिष्यों सहित रहते थे । एक दिन सत्संग हो रहा था, उसी स्थानपर एक मुसलमान भोलबी आगया, वह मक्का जाने को प्रस्तुत था, उसने मक्केकी यात्राकी बहुत प्रशंसा करके कहा कि, "शाहसाहब ! मक्का अत्यंत श्रेष्ठ

स्थान है वहाँ आपके शिष्योंको भी जाना उचित है।” उस समय महात्माके शिष्य अत्यन्त रुष्ट हुए, बड़े चलेने मोलवीकी गरदन पकड़ कर उसका शिर महात्माके चरणोंपर धर कर कहा कि, देख ! करोड़ों मक्के इन चरणोंमें हैं। महात्मा नित्य किया करने गये उस समय मोलवीका उस शिष्यसे बहुत वाद विवाद हुआ। जब महात्मा आये तब मोलवीने शिकायत की। उस समय महात्माने अपने शिष्यको समझाया कि, मक्काके विषयमें मोलवीका कहना बहुत ठीक है। वह पवित्र स्थान दर्शन योग्य है। तू भी मोलवीके साथ मक्काके दर्शनको चला जा। वह शिष्य गुरुमुख था, हाथ बाँध कर खड़ा होगा, उसी समय मोलवीके साथ जहाजपर सवार हो गया। थोड़ी दूर जहाज चला था कि, एक तूफान आया जिससे जहाज टूट गया, सब आदमी डूब गये, पर वह चेला एक तख्ते पर बैठा रह गया, वह भी डूबनेके समीप भी था ही उसी समय समुद्रसे एक हाथ निकलक साथ शब्द हुआ कि, यदि तू अपना हाथ मुझे पकड़ा दे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हो ? फिर शब्द आया कि, मैं पैगम्बर साहब हूँ। उस चलेने जवाब दिया, मैं नहीं जानता कि, पैगम्बर साहब कौन हैं ? मैं केवल अपने गुरु महाराजको जानता हूँ दूसरेसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखता। तब वह हाथ छिप गया, वह गुरुमुख तख्तपर बैठा हुआ डूबकी खाता जाता था। कुछ कालके पीछे एक हाथ और निकला, शब्द हुआ कि, मुझे अपना हाथ पकड़ादे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हैं ? तब उत्तर आया, कि मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ। गुरुमुखने उत्तर दिया कि, मैं अपने गुरुके सिवाय दूसरे किसीको भी नहीं मानता। मेरा परमेश्वर तो मेरा गुरु है, दूसरे परमेश्वरको मैं नहीं जानता। तब वह हाथ भी छिप गया। कुछ कालके पीछे तीसरा हाथ निकला उसने पुकार कर कहा कि, तू अपना हाथ मुझको पकड़ा मैं तेरा दादा गुरु हूँ। इसने उत्तर दिया कि, मैं अपना हाथ अपने गुरुको पकड़ाऊँगा दूसरेको हाथ कदापि न दूँगा। चाहे जीवित रहूँ या मर जाऊँ। तब वह हाथ भी विलुप्त हो गया। इसके पीछे स्वयम् सत्यगुरु आये। इस शिष्यको हृदयसे लगा लिया उसे तुरंतही अपने स्थान पर लेआये गुरुमुखकी पूरी परीक्षा हो चुकी। सर्व शब्द उन्हीं गुरु महाराजके ही थे। जो शिष्यकी पूर्ण परीक्षाके लिये प्रकट किये थे। इस कथनका परिणाम यह है कि, चाहें कोई किसी भी प्रकारके तीर्थ व्रत करे दान पुण्य यात्रा कर्म उपासना ज्ञानकी पूर्णता प्राप्त करे, कठिनसे कठिन तपस्या करे शुभकर्मोंको सीमा पर्यन्त पहुँचावे परन्तु मुक्ति केवल गुरुमुखकी ही होगी बाकी सारा संसार भवसागरमें डूब जावेगा।

गुरुमुख सांसारिक पदार्थोंपर ध्यान नहीं देता । जैसे हो वैसेही करलेता है, किसीसे राग द्वेष नहीं रखता, प्रत्येक बातमें सत्यता तथा स्वच्छता बर्तता है, अपने गुरुसे ऐसा प्रेम करता है जैसा कि, जलसे मछली करती है, वो प्राकृतिक मनुष्योंसे कम प्रेम रखता है । गुरुमुख जो कार्य करता है । वो केवल गुरुकी प्रसन्नताके लिये गुरुकी आज्ञाके अनुसार करता है । गुरुमुख अपना अहङ्कार छोड देता है सब कार्य सत्यगुरुकी ओरसे जानता है । वह काम सब सत्यगुरुके अर्पण करता है । गुरुमुख सदैव आलस्य तथा नींद आदिसे पृथक् रहता है । वह सदैव अपने सत्यगुरुकी प्रशंसा तथा कृतज्ञता स्वीकार किया करता है । गुरुमुख जो कार्य करता है वो परमार्थके लिये करता है वो धैर्यको कभी नहीं छोडता । मनमुखके जितने काम होते हैं वो सब गुरुमुखके विपरीत हैं । ग्रन्थ लोक संदेशासे थोडा यहाँ लिखता हूँ—

धम्मदास बचन

चौ० — धम्मदास जी बिनती लावे । संशय एक मेरे दिल आवे ॥
काया मध्य बहुत अस्थाना । कौन वस्तुका धरिये ध्याना ॥
कौन ताल और कौन द्वारा । कहैं होई हंसा करे बिहारा ॥
कहिये सत्गुरु मोहिं अरथाई । देखूं तो मो मन पतियाई ॥

सत्यगुरु बचन

जैसे दूधमें घीव रहाई । ऐसे पुरुष है तनके माहीं ॥
सद्गुरु पहले भेद बतावे । शब्द विदेह हंस घर आवे ॥
शब्द चढ़ि सो हंसा आवे । तबही पुरुषको दर्शन पावे ॥
छांडो धरती छाड अकाशा । छांडो पाँच तत्वको बासा ॥
कह कबीर निरन्तर घर पावे । हंसा घर होई सुरति लगावे ॥
विदेह नामको अङ्क जो पावे । यमसे जीव जान मुक्तावे ॥
सप्त स्वर्ग और सप्त पताल । चौदह भुवन तजि होइ निराला ॥
शब्दै धरती शब्द प्रकाशा । शब्द सँग हंसा देखि तमाशा ॥
शब्द ले हंसा करहू बाता । ताको आद्या करै न घाता ॥
ररा शब्दको देव वहाई । अमी शब्द मैं बैठो आई ॥
अमी शब्दकी बोलें बानी । तहवाँ सुरति करो पहचानी ॥
जब हंसा देही गुण त्यागे । तबनहिं चोर धर्मरायको लागे ॥
हम धर्मरायसे बाचा हारा । सौंप दीन्ह सकलो संसारा ॥
नतगुण होई जीवको बासा । सो सब रहे तुम्हारे पास ॥

जब लगिजीव गुण छूटेनाहीं । तबलगि रहे चौरासी माहीं ॥
जब लगि पाप पुण्यकी आशा । तब लगि लेई गर्भमें वासा ॥
कोटिन ज्ञान कथ दिखलावे । कोटिन ध्यान समाधि लगावे ॥
धर्मरायसे छूटे नाहीं । गुणतत जब लगि जीवके माहीं ॥

धर्मदास बचन

धर्मदास विनती तब लाई । अचरज बात जो कहो गोसाई ॥
देहीके गुण जो कैसे छाँडे । कैसे निगुण उलटे माँडे ॥
कैसे तन आपा विसरावे । कैसे जीव परम पद पावे ॥
ततगुण बिनु काया नहिं चाले । कौन जुगुतसे उनको पाले ॥
कैसे मनुवा अस्थिर होही । कैसे हंसा होय विदेही ॥
आठ काठसे देह बनाई । उनको कैसे दे विसरा ॥
निःअक्षरको कैसे पावे । कैसे गुणको मार ढहावे ॥
सब जिव तुम सौपे धरमराये । हंसको पन्थ दृढावन आये ॥
एको जीतन होय उबारा । मोसे चलै न पन्थ तुम्हारा ॥

साखी- तत्त्वगुण छुट न देहको, कैसे होय उबार ।
पन्थ तुम्हारा कठिन है, धर्मराय बरियार ॥

सत्यगुरु बचन

चौ० -धर्मदास तू परमहित मोरा । तुम्हरो पला न पकरै चौरा ॥
जिते जीव परवाना पावे । तब सो हंसा लोक सिधावे ॥
लोक जानमें भेद है भाई । कोई न पूछै चित्त लगाई ॥
सहज अठासी द्वीप सुधारा । जहां सब हंसा करे विसारा ॥
जैसे चाल चलै संसारा । तैसे तैसे द्वीप मझारा ॥
सर्व मूल तोहि देउँ बताई । तुमसे कछू न राखुँ छिपाई ॥
द्वीप अंशके हैं बड़े भारा । सकल हंस उन द्वीप मझारा ॥
निःतत्त्वी जाय पुरुष दरबारा । सकल द्वीपसे द्वीपसो न्यारा ॥
पुरुष हजूर जौ चाह रहाई । सो जिव आप दिये विसराई ॥
एक छन मांहि अमर घर जाई । छनहा हंस देउँ पहुँचाई ॥
जब सद्गुरु मन्दिर पग देई । चरण धोइ चरणामृत लेई ॥
सेवाकरत सुरति चल आई । तबहि काल घर बजै बधाई ॥
धर्मदास मैं कहूँ पुकारा । विरला जाय पुरुष दरबारा ॥

साखी - शब्दको खोज करें नहीं, चिन्ता देह शरीर ॥
बिना शब्द पहुँच नहीं, अस कथ कहैं कबीर ॥

बिना अहारी जीव है, बिना अग्नि बिन पान ।
बिना पिण्ड हंसा चलै, है छन कर पहचान ॥
चित्र हंस बिना पिण्डका, उदय सो देखो नाम ।
भेद जो दे गुरु समर्थ, तब देखो वह ठाम ॥

शब्द—धरमनि वहि देश हमारो बासा ।

अमर पुरुष जहाँ आप विराजै हंसा करत विलासा ॥
विष्णु विरञ्जि औ शिव सनकादिक थके ज्योतिके पासा ।
चौदह खण्ड वसै यम चौदह यह सब काल तमशा ॥
सात सुरतिके आगे समरथ श्वेत भूमि परकाशा ।
संशय लोक नहीं है बाकी खुले केवडा बारह मासा ॥
वहांके गये बहुरि नहिं आवे आवागमनको नाशा ।
सदा आनन्द होत है वा घर कबहू न होत उदासा ॥
चन्द्र न सूर दिवस नहिं रजनी नहिं धरणी आकाशा ।
अमृत भोजन हंसा पावे रहत पुरुष के पासा ॥
कहैं कबीर सुनो धरमदासा छाडो खलक की आशा ।

सत्यगुरु कबीर साहब कहते हैं कि, जो जीव पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग हो वही सत्यपुरुषके दरबार पहुँचता है । परन्तु जितने जीव सत्यगुरुके शरणमें आते हैं उन सब पर साहबकी दया होती है । उनको रहने को उत्तम स्थान दिये जाते हैं, जहाँ वे सुखपूर्वक निर्भयतासे रहते हैं, परन्तु पुरुषका दर्शन नहीं पाते । जो पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग होते हैं, वही त्रिगुणातीत लोग सत्यपुरुषके दर्शनके अधिकारी होते हैं । इसी कारण सत्यगुरुने कहा है कि, सत्यलोकमें अट्ठासी सहस्र द्वीप हैं, उन सब द्वीपोंमें हंसोंका स्थान होता है, जहाँ वे आनन्द पूर्वक रहते हैं । जो कोई उसमें कर्म करता है, वह सत्यगुरुकी दयासे पाँच तत्त्व तथा तीन गुणसे छूट जाता है । बिना पाँच तत्त्व तीन गुणसे छूटना अत्यन्त असम्भव है । युगों युगोंमें सत्यगुरुके हंस अपने कर्तव्योंसे सत्यपुरुषोंके लोकके मार्गका उपदेश देकर जीवोंको सत्यलोकके पथपर करते हैं । पीछे अपने कथनको चरितार्थ करते हुए अपनी चर्यासे सिद्ध करके दिखाते हैं कि, सत्यपुरुषके हंस ऐसे होते हैं, कलियुगके हंसोंने भी इस कराल युगमें सिद्ध करके दिखा दिया है कि, इस कराल युगका भी सत्य पुरुषके हंसोंपर कोई असर नहीं होता ।

उनका शास्त्र

कबीर साहिबकी स्वसंवेद वाणी है क्योंकि, उसमें परमार्थका निरूपण है यही वाणी सभी हंसोंके लिये नियत है स्वच्छ तथा निर्मूल है अनेक स्थानोंपर स्वसंवेदकी भिन्न २ पुस्तकें मिलती हैं सन्त महन्त उनके बड़ी सावधानीसे रक्षा करते हैं कि, उनमें किसी प्रकारका उलटफेर न हो जायें एवं जो मिथ्या पक्षपाती जनोंने अपनी ओरसे कुछ मिला दिया हो तो वो जाननेमें आजावे इस कारण पूरी चौकसी की जाती है। इतना करने पर भी छली लोग छलसे नहीं चूकते। इसी कारण कबीर साहब कुछ सताद्वियोंके पीछे अपनी पुस्तकोंको रद्दकर देते हैं। वर्तमान कालमें कबीर पन्थियोंके पास सत्ययुग, त्रेता, और द्वापर युगोंकी पुस्तकें नहीं हैं। उसका भी मुख्य कारण यही बात है गरीबदासजी अपने अर्जनाम में यही बहुत लिखते हैं कि—

है सतगुरु मेहवीन अविनत' कबीर । छुटे इस्मके 'नालजनम की जञ्जीर ॥
वाबन लाख वाणी जो दीनी डुबोय । सुने रामानन्दा रहे मुख गोय' ॥
अगम धन्य ध्यानं अमानं अमाँ । स्वसम्बेद साखी सुरती कर वयौ' ॥
स्वसम्बेद पढिये जो पूरन मुराद' । स्वसम् पर स्वसम्बाच लागी समाध ॥
है सत्यपुरुष साहब दयाके जो मूल' । गरीबदास झूले समाधान फूल ॥

किन्हीं २ छला कपटी, तथा विद्वोही गुरुविमुखियोंने स्वयं ग्रन्थबनाकर उसमें अपने मतलबकी सारी बातें रखदी हैं पर उनमें वक्ता कबीर साहब और श्रोता धर्मदासजीको ही लिखा है। सद्गुरुके हंस लोग तो उन छलियोंके छल को शीघ्रही पहचान लेते हैं, कितने एक सरल दृश्यके भोले भाले लोग उन ग्रन्थोंको पढ सुनकर भटक जाते हैं। इस प्रकार कालपुरुष तथा उसके पुत्रलोग बड़ा छल करके स्वच्छ अमृतको विषमय करनेका उद्योग करते हैं। परन्तु बुद्धिमान सचेत लोग तुरन्तही पहिचान लेते हैं स्पष्ट जान लेते हैं कि, जो कबीर साहबके प्राचीन ग्रन्थ तथा वाणी हैं उसके विरुद्ध यह बात कैसे हो सकती है। इस कारण स्वसंवेद पाठ करनेवालोंको सदा सावधान रहना चाहिये कि, जब सत्यगुरुके ग्रंथ तथा वाणीको पढे अथवा सुनें तो उसपर भली प्रकार शोध विचार किया करें। जहाँ कहीं कबीर साहबके वाणीके विरुद्ध पावें तो तुरन्त समझ लें कि, यहाँ तो काल के पुत्रोंमेंसे किसीकी कबीरके नामसे बनावट है कि, वो कितनेही कबीर पन्थी कबीर साहब तथा धर्मदासजीके नामसे धूर्तता करके कबीर पन्थियोंको भटकाया चाहते हैं वही यमके दूतोंकी धूर्तता है। कालके पुत्रोंने अनेक युक्तियाँ

शाहंजाह इबराहीम अहम श्रेष्ठ मन्शूर और शिवली

की और कर रहे हैं कि, मनुष्योंको सत्यपन्थसे भटका दें इस कारण कबीर साहबने पहलेहीसे प्रबंध कर दिया है कि कुछ गाड़िया पुस्तकोंकी दिल्ली नगरमें गड़वादी हैं जो नियत समय पर निकलेंगी वे शुद्ध तथा निर्दोष हैं । वही प्रचलित होगी जिनमें कुछभी दोष न होगा । उपरोक्त पुस्तकें सर्वथाही निर्दोष और अनुपम हैं । उन ग्रन्थोंके पढ़ने सुननेसे यमके कपट निरर्थक हो जावेंगे । केवल चारसौ वर्षोंने कबीर साहबकी वाणीकी यह दशा होने लगी तो ऐसी अवस्थामें इतिहास तथा अन्यान्य पुस्तकोंकी क्या गणना है ! जो अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें थीं सब दूषित हो गईं, वे तनिक भी शुद्ध नहीं रहیں । सब ग्रन्थ कट कुट हो गये हैं पर स्वसंवेद अशुद्ध नहीं होता क्योंकि, सब औपधर्म्यके ग्रंथोंके श्रोता वक्ता मर गये । परन्तु स्वंवेदके श्रोता वक्ता कदापि नहीं मरते, सदैव जीवित रहते हैं । स्वसंवेद जब मृत्युके समीप पहुँचता है तो फिर उसमें जी डाला जाता है जिससे हरा भरा हो जाता है । स्वसंवेदकी शिक्षा उत्पत्ति कालसे लेकर आजतक बराबर चली आती है । परन्तु उस पर चलनेवाले थोड़े होते हैं । उसका कारण ये है कि, १-कालपुरुष मुंह २ से बोलता हुआ संसारको भटकाता है जीवोंकी बुद्धिको नष्ट करता हुआ अन्तःकरणको अशुद्ध कर देता है । २-यह जीव पशुवत् कर्मकी तृष्णाको नहीं छोड़ता है, मांस खाता है, निषेध कर्मोंको करता है । उसमें ऐसा लुब्ध हो जाता है कि, उनको छोड़ना उसे अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है । ३-इस संसारकी मान बड़ाई तथा लज्जा आदि भी इस जीवको नहीं छोड़ते । ४-प्रत्येक पुरुषकी बुद्धिपर बैठकर काल पुरुष अपनी प्रभुताई कर रहा है । ५-कबीर साहबकी दयादृष्टि हो पर उसके गुरुकी दया न हो तो भी कार्य्य नहीं चलता दोनोंकी ही दयादृष्टि होनी चाहिये । जिस समय गुरु दया करते हैं तो कबीर साहबकी उस पर पूरी दयादृष्टि हो जाती है फिर उसके उद्धार होनेमें कोई भी कसर नहीं रह जाती । सत्ययुग द्वापर त्रेता और कलियुगके हंसोंके लिये युगानुरूप सत्यपुरुषका शास्त्र रहा है, जिससे सहजही में जीव सत्यपुरुषके उपदेशोंको समझले । जिस किसीने इन चारों युगोंमें सत्यपुरुषका कहना न माना उसे दुखसागरमें मग्न होना पड़ा पर जिसने कथन माना उसका उद्धार हो गया कालका उनपर कुछ भी प्रभाव न चला । सत्यपुरुषका शास्त्र युगानुसारी भाषामें रहता है कलियुग के जीवोंको जैसा चाहिये उसी भाषामें सत्यपुरुषका शास्त्र मौजूद है इसीसे अग्नित जीवोंका उद्धार हो गया है इबराहीम अद्वम आदिको इसी युगकी भाषामें उपदेश मिला था ।

भिन्न पन्थोंके संस्थापक शिष्य गण ।

नानक शाह साहब

नानकशाह साहब कबीर साहबके खास चेलोंमें थे। उनको सत्य गुरुने पञ्जाब प्रान्तकी गुरुवाई प्रदान की थी, उसका जन्म मौजा तिलोंडी जिला लाहौर (पञ्जाबदेशमें) हुआ था। सम्बत् १५२६ विक्रमीमें कालू नामक खत्रीके गृहमें उनका जन्म हुआ। लड़कपनसेही श्रेष्ठताके चिन्ह परिलक्षित थे। जब उनका वयस सोलह वर्षका हुआ तब माताने एक दिवस बीस रुपये देकर कहा कि, इन रुपयोंसे उत्तम सौदा कर लाओ। नानक साहब उन रुपयोंको लेकर चले, आगे एक मण्डली साधुओंकी मिली इसको देखकर इनका हृदय स्वच्छ हुआ सोचा कि, साधुओंको खिलानेसे बहुत अच्छा सौदा हो सकता है वह बीस रुपया जो पासमें था उससे भण्डारा करके उस स्थानपर सब साधुओंको खिला घरको चले गये। फिर जब नानक साहबकी वयस (आयु) अठ्ठाईस वर्षकी हुई तब सम्बत् १५५३ विक्रमीमें उन्होंने बेईनदीके भीतर गोता मारा। तब उस समय आपको जिन्दा बाबा मिले, दूध उपदेश देकर अपना शब्द भली भाँति दृढ़ाया नदीके बाहर निकले तो पञ्जाब देशमें उनकी महिमा फैली। उनके शिष्योंकी लाम लग गई।

नानकशाह साहब तो अपने जीवन भर गुरुके आज्ञाकारी ही होकर सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश किया करते थे। पर नानकशाहके पीछे इस पन्थके लोग कबीर गुरुसे फिर गये इस कारण सत्यपुरुषकी भक्ति और स्वसंवेदकी शिक्षा छूट गई। काल पुरुषकी भक्तिको और लोग झुक पड़े। गुरुके विरुद्ध होनेपर अनेक काल तक उनके पास कोई ग्रंथ नहीं रहा। गुरु अर्जुनजीने सन्तोंकी बाणी एकत्रित करके एक ग्रंथ प्रस्तुत किया जो अबतक उनके पास उपस्थित है। अब वे लोग कबीर साहबको तो अपना गुरु स्वीकार नहीं करते, वरन् अन्यान्य भक्तोंके समान एक भक्त जानते हैं। इस कारण अनेक प्रमाणोंको एकत्रित करता हूँ कि, नानक देवके कबीर साहिबही गुरु थे।

इतिहासिक प्रमाण १—एच. एम. एलफिन्स्टन साहब जो अंग्रेजी इतिहास लिखनेवालोंमें नामी और बहुत बड़े इतिहास लेखक हो गये हैं वह अपने भारतके इतिहासमें इस प्रकार लिखते हुए नानकशाहके विषयमें साक्षी देते हैं कि नानक शाह कबीर साहबके शिष्योंमेंसे एक शिष्य थे। परन्तु उन्होंने अपने लेखमें कोई पृथक् वृत्तान्त कबीर साहबके विषयमें नहीं लिखा है, इसका

कारण यह है कि, उसके अनुगामियोंमेंसे किसीने भारतके देशी इतिहासमें कोई भाग नहीं लिखा ।

एलफिन्स्टन साहबके भारत इतिहासके १२ वें जिल्दके प्रथम भागके ६७८ पृष्ठमें देखो—वह सिक्खोंके विषयमें इस प्रकार लिखते हैं कि, इस धर्मके आचार्य नानक पन्द्रहवीं शताब्दीके अन्तमें प्रगट हुये थे । वे कबीर साहबके शिष्य थे । अतएव वह एक प्रकारके हिन्दू एक ईश्वरवादी थे । परन्तु उनके धर्मका मुख्य अभिप्राय सबको एक धर्ममें मिलाकर भेदभाव मिटानेका था ।

द्वितीय प्रमाण २—भारतके इतिहासका संक्षेप, जिसको कौलास चन्द्र मच्छना बी. ए. और देवेन्द्रनाथ राय बी. ए. आफ एल. एम. एस. कालेज भवानी-पुरने लिखा है । वह इस प्रकार है, देखो भारतके इतिहासके एकसौ पाँच पृष्ठ में ।

रामानन्दके बारह शिष्योंमें कबीर साहब बड़ेही सुप्रख्यात हुये । उन्होंने बीजकका निर्माण किया । पण्डितोंके लिये शास्त्र तथा वेदके आशयको गूढ़ बताया । नानक साहबने सर्व धार्मिक युक्तियाँ कबीर साहबसे सीखी थीं ।

फिर देखो उसी पुस्तकके एकसौ आठ पृष्ठमें नानकशाहने सिक्खधर्म, पन्द्रहवीं शताब्दीमें स्थापित किया । उन्होंने सर्व धार्मिक रीतियाँ कबीर साहब से प्राप्त कीं ।

तृतीय प्रमाण ३—एच. एच. विलसन साहब अपनी दरसनामक किताबमें तीसरे प्रकरण पृष्ठ ६९ में हिन्दुओंके धर्मके विषयमें लिखते हुए कबीरपंथियोंके विषयमें लिखते हैं कि, कबीर साहबकी शिक्षाका प्रभाव उनके मुख्य २ शिष्योंपर बहुत पड़ा । वो उनकी अनुपस्थितिमें उससे भी बढ़कर सिद्ध हुआ । क्योंकि सर्व पन्थोंको इस पन्थकी शाखायें कह सकते हैं । गुरु नानक, साहब जो हिन्दुओं में एक विशेष धर्मके आचार्य हुये हैं, प्रायः अपने धार्मिक ध्यानमें कबीर साहबका ही प्रायः अनुकरण किया है ।

चतुर्थ प्रमाण ४—ग्रन्थ लेखकके पहिले लिखेका व्याख्यान करनेके समय मालकाम साहबके लेखसे निम्नलिखित अनुवाद किया है । “प्रख्यात तथा सुप्रसिद्ध कबीरके विषयका नानकने अनुकरण किया है । कबीर पंथी कहते हैं, कि, नानकने कई सहस्र साखिया कबीर साहबके पुस्तकोंसे ली हैं ।” मालकाम साहबकी पुस्तक भारतके इतिहासको देखो । वहां यह सब मिलेगा ।

पंचम प्रमाण ५—मोनियर विलियम साहब एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज जिन्होंने स्वयम् भारतवर्षका भ्रमण किया है जो ब्लेयल कालेज आक्स फोर्डमें प्रोफेसर थे, अपनी पुस्तक भारतके धार्मिक ध्यान तथा आयुके छठे प्रकरणके १५८ पृष्ठमें लिखते हैं जो इस प्रकार आरम्भ होता है ।

तत्त्वा और जीवा

एकता धर्म जिसके रचयिता कबीर साहब हुए हैं—

इसमें कोई संदेह नहीं कि, पन्द्रहवीं तथा लोलहवीं शताब्दीके बीच उत्तर भारत में कबीर साहबके धर्मका बड़ा प्रचार हुआ। इसमें संदेह नहीं कि, यही धर्म पञ्जाबी सिख धर्मकी जड़ है, यह इस बातसे जाना जाता है कि, कबीर साहबकी बाणी नानकशाह तथा उनके स्थानापत्रोंने स्थान स्थानपर अपनी पुस्तकोंमें उद्धृत की है।

षष्ठप्रमाण ६—ये ही महाशय अपनी पुस्तकके १६२ पृष्ठमें सिक्खधर्मके ग्यारहवें प्रकरणमें नानक साहबका विवरण करते हैं तथा जो कुछ वह करते हैं, वह ट्रम्प साहबके ज्ञातव्यकी उस विज्ञताके अनुसार करते हैं, जिसे कि, उन्होंने स्वयम् लाहौरमें आकर प्राप्त किया था, उनका लेख यह है कि, नानक शाहने नये धर्मके बनानेकी बात नहीं कही यथार्थमें उस धर्मकी जड़ कबीर साहबकी बाणी ही है। क्योंकि, कबीरके धर्म पुस्तकको ही वह अपनी पुस्तकमें उद्धृत करते हैं।

सप्तम प्रमाण ७— राजा शिवप्रसाद साहब बनारसी कृत तारीख आइ-नानुभा प्रथम भाग जो नौनाब लेपिटनेण्ट गवर्नर बहादुर, अवध पश्चिमोत्तर प्रान्त सन् १८७२ ई. की आज्ञानुसार सरकारी मुद्रालयोंमें सातवीं बार पाँच सहस्र छपा था। उसके एकसौ पाँच पृष्ठकी पहली पंक्तिमें यह लिखा है कि, पन्द्रहवीं शताब्दीमें कबीर साहबके शिष्योंमें से नानकशाहने सिक्खोंका एक नवीन धर्म प्रचलित किया।

अष्टम प्रमाण ८— डबल्यू. डबल्यू. हण्टर सी. आई. ई. एल. एल. डी. साहबने अपनी इण्डियन इम्पायर इतिहास पुस्तकके एक सौ चौरानबे पृष्ठमें कबीर साहबके कौतुकोंके विषयमें लिखा है। फिर इसी पुस्तकके १०३ और १०४ पृष्ठमें कबीर साहब तथा नानक शाहके विषयमें लिखा है।

नवम प्रमाण ९—एक दिवस साधू हॉसूदासजी आकर गोस्वामी धर्म दासजीसे कहने लगे कि हे स्वामीजी ! आज दिनतक एक साधु पञ्जाब देशसे आया है, उसने नानकशाहका विचित्र वृत्तान्त और करामातकी बातें सुनाई हैं। धर्मदास साहबने कहा कि, वह बातें सुनाओ हॉसूदासने कितनी ही बातें सुनाई उन्हें सुनकर धर्मदास साहबने कहा कि, हे हॉसूदासजी ! गुरु नानकजी तो मेरे गुरु भाई ही हैं।

दशम प्रमाण १०—गोस्वामी गरीबदास स्पष्ट रूपसे कहते हैं कि, नानकशाह तथा दादुराम इत्यादि कबीरसाहबके अनन्य शिष्य हैं।

एकादशमा प्रमाण ११ कितनेक कबीर पन्थी विद्वान्, गुणी साधु कहते हैं कि नानकशाह, कबीर साहबके शिष्य हैं । इसमें कोई सन्देहही नहीं है ।

द्वादशमा प्रमाण १२— जब यह फकीर (अर्थात् पुस्तकका रचयिता) सन् १८५२ ई. में अपने गुरु महाराजके साथ था वह भी यही कहा करते थे कि, नानकशाह कबीर साहबके शिष्य हैं अनेक बार उनका विवरण मेरे समक्ष करते थे जिससे मैंने जाना कि, वास्तवमें नानकदेव कबीर साहबके अनन्य शिष्योंमें हैं । अनेक पुस्तकोंमें कबीर साहब तथा नानक साहबका वृत्तान्त लिखा हुआ है । अब मैं इस पुस्तकके अन्तमें (आठवें परिच्छेदके १२२ प्रश्नके उत्तरमें) समप्रमाण और भी लिखूंगा ।

नानकशाह साहबके जन्म साखीकी विशेष बातें ।

यहाँ अब मैं वह बातें लिखता हूँ जिनको स्वयम् नामक साहबकी जन्म साखीसे चुना है । सब जन्म साखियोंमें भाई वालेकी जन्म साखी सर्वोत्कृष्ट तथा बड़ी प्रामाणिक मानी जाती हैं, इसी जन्म साखीको सब मानते भी हैं । नानक साहबके परमधाम सिधार जानेपर भाई बाला गुरु अङ्गदजीके पास गया । अङ्गदजी नेत्रोंमें जलभर कर उससे कहने लगे कि, हे भाई बाला ! आप तो गुरुजीके साथ फिरते रहे हो आपको सब वृत्तान्त अच्छी तरह मालूम है । मुझे सत्यगुरुके भ्रमण तथा घूमने फिरनेका सब हाल कहो । इस बातपर भाई बालाने गुरु अङ्गदजीसे जो कुछ कहा वही बात इस जन्म साखीमें लिखी हुई है । यह जन्म साखी सम्बत् १५८३ विक्रमीकी है जिससे ये बातें लिखी गई हैं । सवाल जवाब पंजाबीमें है उनका साथही साथ अर्थ कर दिया गया है । जन्म साखी २६६ पृष्ठ भाई मरदाना नानक साहबसे प्रश्न करता है कि—

प्रश्न—हे महाराज तू सानू जो गुरु मिलिया सो कौन मिलिया, आहा ते नाम उसदाकी आहा ।

अर्थ—हे महाराज ! तुमे कौन गुरु मिला है, उसका नाम क्या है !

उत्तर—ता फिर नानकजीने कहिया, नाम उसदा बाबा जिन्दा हुआ है, जित्यै तोड़ी पवन और जल है सब उसदे बचन बिच चलदे हैं ।

अर्ध—उसका नाम बाबा जिन्दा है, जहाँतक पवन और जल हैं, सब प्राणी उसकी अज्ञाके बीच चलते हैं ।

फिर देखो (पृष्ठ २२६) भ्रमणके समय एक साधुने नानक साहबसे पूछा कि, तुसाड़ा (अर्थात् तुम्हारा) गुरु कौन है ? तब नानकजीने उत्तर दिया था कि, मेरा गुरु जिन्दा है ।

फिर देखो ३४६ पृष्ठ । जब नानक साहब कन्धार देशको गये तब उनको यारअली नामक एक फकीर मिला । उसके नानकशाहसे बहुतेरे प्रश्नोत्तर हुये । उनमें एक प्रश्न यह भी था—

बारअलीने पूछा कि, आपका गुरु कौन है ! तब नानक साहबने उत्तर दिया कि, मेरा गुरु बाबा जिन्दा है ।

अब मैं यहाँ वही भाषा लिखता हूँ जिसमें यारअली और नानक साहबमें बातें चीतें हुई थीं—

बोलो भाई बाहु गुरु ! नानक उभ्ये उडारी लेभो ता जाय कन्धार विच्छ खड़े हुये । उत्थे एक मुगल फकीर आहा उस नाल भेट गई तब उसने पूछया ।

अर्थ—नानकजी वहाँसे उडके कन्धारमें पहुँचे वहाँ एक मुगल फकीरसे भेट हुई, तब उसने नानक साहबसे पूछा ।

“शु’माचे नाम दारी? ता गुरु नानक बोल्या” मा’, नाम नानक निरङ्कारी! फिर मुगल बोल्या “न’ फहमीदम” ता गुरु नानक बोल्या मा’ बन्द ए खुदायेम । फिर मुगल बोल्या, “शुमा’ पीर कुदाम” ता गुरु नानक बोल्या, मा’ पीर जिन्दा पीर” ता फिर मुगल बोल्या “शुमा’ पीर जिन्दा पीर” ता गुरु नानक कहा? आरे’ आ’रे । ता फिर मुगल कहा? ‘मा’ एतकादनेस्त” ता गुरु नानक कहा । “चेगुप्त” ता “मुगल कहा, पैदा” शुदी मुरीद शुदी ।

ता गुरु नानक कहा, “यक” खुदाय पीर शुदी कुल आलम मुरीद शुदी फकीर खबरदार निगाह दीगर नदारी । ता मुलग’ पीर उत्थ डगा ।

ता गुरु नानक कहिया, “एक” खुदायदीरा दीगरे नेस्त । ता मुगल बोलिया “शुभा” पीर मामुरीद।”

ता गुरु नानक कहिया “शु”मानाकचे’दारी” ता मुगल कहिया “ना”म मन यार अलीअस्त” ता गुरुनानक कहिया, “ना”म शुमाबाबुलकन्धारी ।”

पृष्ठ ३९६ जब नानक शाह बाबर बादशाहके साथ वार्तालाप कर रहे थे, तब बाबर शाहने पूछा कि, सुन नानक ! तू कबीरका चेला है ? तब गुरु-नानकने कहा, हाँ ।


१ प्र०—तुमारा नाम क्या है? २ उ०—मेरा नाम नानक निरंकारी है । ३ प्र०—मैंने नहीं समझा । ४ उ०—मैं ईश्वरका दास हूँ । ५ प्र०—तुमारा कौन गुरु है । ६ उ०—मेरा जिन्दा पीर गुरु है । ७ प्र०—तुमारा गुरु जिंदा पीर है ? । ८ उ०—हाँ हाँ । ९ मुझे विश्वास नहीं है । १० क्या कहा ? ११ पैदा होते ही शिष्य हुआ । १२ ईश्वर-गुरु है संसार चेला है सन्तको उसके अतिरिक्त दूसरी दृष्टि नहीं होती । १३ मुगल चरणोंपर गिरा । १४ एक ईश्वरके बिना दूसरा कोई नहीं है । १५ आप मेरे गुरु, मैं आपका चेला हूँ । १६ तुमारा नाम क्या है ? १७ मेरा नाम यारअली है । १८ तुमारा नाम बाबुल कन्धारी ।