कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलमें गया था। उस सालमें बहुतही बरफ पड़ी, मारे ठण्डके मैं अपना पाँव सेकने लगा, जब बरफकी सरदीके उपरान्त गरमी लगी तो मेरी उँगलियाँ झड़ गयीं। फिर वह साधु मुझसे कहने लगा कि, मैंने सुना है खैबरके ऊपर कबीर साहबकी कब्र है। उसके सैयद अहमद कबीरकी कब्र ऊपर नियत समय पर मेला लगा करता है। एवं बहुतसे दर्शक वहाँ आते जाते हैं। यह बात सुनकर मेरी कामना कब्रके दर्शन करनेकी हुई। तब मैं दूँढ़ता हुआ वहाँ जा पहुँचा तो देखा कि चारों ओर बड़ा सन्नाटा छाया है। कहीं कोई मनुष्य नहीं है, वहाँ केवल एक कब्र बनी हुई थी। उस कब्रके ऊपर एक वृद्ध जिसकी बहुत लम्बी श्वेत दाढ़ी थी बैठा था। उस वृद्धको देखकर मैंने झुककर दण्डवत प्रणाम किया तब वह वृद्ध दयालुहुआ उसने मुझको एक सेबका फल प्रसादमें देकर कहा कि, तुम अब यहाँसे चले जाओ। मैं उस फलको लेकर अपने डेरे चला आया उस फलको एक ताकपर धर दिया कि, दूसरे समय खाऊँगा। थोड़ी देर बाद देखा तो उस फलको उस ताकपर न पाया, वह गायब हो गया था। मैंने बहुत खेद किया वह फल न मिला, इसे मैं अपना दुर्भाग्य समझकर चुप चाप कबीर साहिबका ध्यान करने लगा। पश्चिम देशोंमें कबीर साहिब स्थान स्थानपर सैयद अहमद कबीर और शोख कबीरके नामसे प्रसिद्ध हैं। शोख कबीरके जो अनुयायी आचार्य हैं उनकी भजनकी रीति भाँति मुसलमानी आचार्योंसे निराली ही है कबीर साहबके धर्मपर चलनेवाले प्रत्येक देशमें सभी स्थानोंपर मौजूद हैं। उनका भेद किसीको मालूम नहीं है न मनुष्य उनको यह पहचानही नहीं सकते हैं कि, ये ही कबीर साहब समस्त संसारमें छाये हुए हैं, या कोई दूसराही है। उसका पहचानना बड़ा कठिन है। वह स्वयं जिसपर दया करता है वह पहचान सकता है। दूसरेकी क्या सामर्थ्य है कि, उसको जान सके। इस ब्रह्माण्डके भीतर जितने लोक और बस्तियाँ हैं, जितने ब्रह्माण्ड तथा संसार अन्यान्य स्थानोंमें हैं सभीमें कबीर साहब उपस्थित रहते हैं सबके द्रष्टा हैं, प्रत्येक जीवधारीकी सुध लेते रहते हैं। वे सबको याद करते हैं उनको सभी याद करते हैं। समस्त ब्रह्माण्डोंका रचयिता जो प्रत्येकके साथ रहता है उसीका नाम सत्य कबीर बन्दीछोर है। उसीकी रक्षायें सब रट रहे हैं।
गुरुकी कृपा
जो वस्तु प्रयत्नसे किसी प्रकार भी प्राप्त नहीं हो सकती वह गुरुकी कृपासे प्राप्त होती है, बिना गुरुकी पूर्ण कृपाके वासनाएँ धूलमें मिला देती हैं। शोख फरीद जैसे सच्चे वेदान्ती गुरुके विमुख होते ही इतने विषयोंमें फँसे कि,