भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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विवाह करके संसारी हो गये । विषय वासनाके सामने उनकी तपस्या किस काम आई ! हाँ सच्चे गुरुके पूरे भक्त बने रहते तो भवसागरके पार हो जाते । जो सच्चे गुरुको पहिचानकर उसकी शिक्षाके अनुसार सत्यलोकको पा सकता है । स्वसंवेदका यही सार है कि, गुरुके चरणोंको दृढ़तासे गहे रहे । क्योंकि, बिना उसकी पूजाके कुछ न प्राप्त होगा । सदा गुरुकी सीख माननी चाहिये उसकी कृपामें ही सर्वस्व है कबीर साहिबका तो वारंवार यही कथन है कि, गुरुकी मूर्तिमें मुझको पाजाओगे । जबतक दममें दम रहे गुरुको मानता रहे, गुरुकी मूर्तिमें मुझे समझकर उससे सब कुछ माने अणुमात्र भी अभिमान न करे, अपने कल्याणका उपाय सत्य गुरुकी भक्तिही समझे ।

जो सत्यगुरुसे प्रेम तथा श्रद्धा करेगा उसको सत्य शब्द मिलेगा उसे सब कुछ प्राप्त होगा । जिसकी गुरुपर श्रद्धा नहीं है वह शून्य रहेगा । गुरुका प्रेम श्रद्धाही धर्मकी जड़ है । सत्यगुरुका मत निर्गुण तथा सगुणसे अलग है । दोनों कार्य्य सिद्ध हो नहीं सकते । गुरुमें भक्ति करोगे तो जगत् छोड़ना पड़ेगा । यदि लोगोंसे प्रेम करोगे तो भक्तिमें विघ्न होगा । मुरीद नाम मुरदेका है । इसका तात्पर्य यह है कि जैसा गुरु कहे वैसाही करे । अपनी बुद्धि न लगावे और जब तक यह अवस्था न हो तब तक आपको जीवित तथा संसारी समझे । नाम तो समस्त संसार जप रहा है पर जो नाम सत्यगुरु द्वारा मिलता है वही सच्चा है । सहस्रों ब्रह्मा तथा ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर आदि हो गये हैं वे सब विषयकी अग्निमें जल रहे हैं परम अभिमानमें डूबे हुए हैं, इस कारण उनको सत्यगुरुके दर्शन नहीं होते जिसमें सत्यगुरुका प्रेम तथा विश्वास है वही मुक्तिका अधिकारी है । मनुष्योंमें वही भाग्यवान् है जो सत्यगुरुकी सेवा करता है दर्शनको जानेसे पग पवित्र होते हैं । दर्शनसे नेत्र पवित्र होते हैं, जल भरनेकी सेवासे शरीर पवित्र होता है, वचन सुननेसे अन्तःकरण पवित्र होता है । इसी प्रकार समस्त पवित्रता प्राप्त होती है । यदि नाममें बल होता तो सहस्रों मनुष्यों नाम जप रहे हैं । किसीको तो फल मिलता ? इससे जान पड़ा कि, यथार्थ बल सत्यगुरुमें ही है जो सत्यगुरुकी सेवा करता है । इस कारण उसीका दोनों लोकमें कल्याण है । गुरुमुख उसीका नाम होता है जो सत्यगुरुको सबका मालिक समझता है । इसी विषय पर एक दृष्टान्त देते हैं कि, दक्षिण देशमें एक परम श्रेष्ठ महात्मा अपने शिष्यों सहित रहते थे । एक दिन सत्संग हो रहा था, उसी स्थानपर एक मुसलमान भोलबी आगया, वह मक्का जाने को प्रस्तुत था, उसने मक्केकी यात्राकी बहुत प्रशंसा करके कहा कि, "शाहसाहब ! मक्का अत्यंत श्रेष्ठ