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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

निरंजनका कबीरसाहिबसे वरदान

कबीर मन्शूर प्रथमभाग ।

तृतीय अध्याय ।

चौथे युग कलियुका वृत्तान्त ।

कलियुगमें ज्ञानीजीका पृथ्वीपर प्रगट होना और सत्य कबीर सैयद
अहमद कबीर व शेख कबीर जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे होकर
मनुष्योंके उद्धार करने का वृत्तान्त ।

पहिला प्रकरण ।

उत्थानिका ।

द्वापरयुग जब समाप्त हो चुका और कलियुग आरंभ हुआ तब इस कलियुगमें ज्ञानीजी सत्य कबीर और कबीर साहबके नामसे प्रसिद्ध हुए मुसलमान लोग आपको सैयद अहमद कबीर और शेख कबीर कहते हैं । हिन्दू मुसलमान तथा संसार के सब कौमोंसे आप गुरु तथा पूजनीय हैं । चारों युगोंमें आपके चार नाम हैं—अर्थात् सत्यसुकृत सत्ययुगमें, मुनीन्द्र त्रेतामें, करुणामय स्वामी द्वापरमें और कबीर साहब कलियुगमें । इन चारों नामोंसे चारों युगोंमें आप सर्व मनुष्योंको शिक्षा दिया करते हैं । प्रत्येक समय प्रत्येक काल और प्रत्येक स्थानपर कबीर साहब सदैव पृथ्वीपर उपस्थित रहते हैं । इस कलियुगमें अनन्त बार आप पृथ्वीपर प्रगट होते हैं और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं । परन्तु कुछ बेरकी सुध जो मुझको है उसका वृत्तान्त मैं थोडा लिखता हूँ ।

दूसरा प्रकरण ।

श्वपच सुदरशनको चेताना ।

जब कलियुगके आरंभ और द्वापरके अन्तमें पहले कबीर साहब पृथ्वीपर प्रकट हुए तब काशी नगरीमें दिखलाई दिये । वह समय कृष्ण तथा पाण्डवोंका था । उस समय मनुष्योंको उपदेश करने और अपने धर्मकी शिक्षा देने लगे । सुदर्शन नामक एक डोम था उसने आकर सत्यगुरुको दंडवत् करके निवेदन किया कि, हे महाराज ! मुझको अपनी शिक्षा दीजिये । तब सत्यगुरु उसपर दयालु हुए और उसको सत्यनामका उपदेश किया । वह सत्यगुरुकी शिक्षा पाकर बड़े प्रेमके साथ साधुसेवा और भक्ति करने लगा । इसी श्वपच सुदर्शनको वाल्मीकि भक्तभी कहते हैं । पाण्डवोंने जब महाभारतके उपरान्त यज्ञ किया और करोड़ों

छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तान्त निरंजनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार

साधुओंने भोजन किया, स्वयम् श्रीकृष्णजीने भी भोजन किया और अनेक प्रकारके दान पुण्य हुए किन्तु उससे यज्ञ पूरा नहीं हुआ और न आकाशमें घण्टाही बजा । परन्तु जब श्वपच सुदर्शनने भोजन किया, तब सात बार आकाशमें घण्टा बजा और पाण्डवोंका यज्ञ पूरा हुआ । इस श्वपच सुदर्शनका वृत्तान्त आगे लिखूंगा ।

अथ कलियुगका प्रमाण ।

द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको चेतानेकी कथा । (अनुराग सागर)

तीन जुगके सुना परभाऊ । अब कहिये कलजुगका दाऊ ॥
ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परवीना ॥
कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पति नागर ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

धर्मनि पुनि आये जगमाही । रानी पति लै गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मंझारा । कछुक दिन रहे पुरुष दरबारा ॥
जबे पुनि कलिजुग नियराना । धरभराय तबहीं बरियाना ॥
पुरुष अवाज उठी तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
तब चले हम मस्तक नायी । द्रापरगत कलि जुग नहिं आयी ॥
परथमहि पुरुष नाम गोहराई । कासीनगर महाँ दीना पाई ॥
पुरुष आयुस पाइ तेहि बारा । ततछिन पुनि आयउ संसारा ॥
कासी नगर तहां चलि आये । नाम मुदरसन सुपच जगाये ॥

श्वपच सुदर्शनकी कथा ।

नाम मुदरसन सुपच रहाई । ताकहैं हम सत सबद दिढाई ॥
सबद विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि सब्दके मेला ॥
निश्चय वचन मांन तिन्ह मोरा । लखी परतीत बंद तिहि छोरा ॥
नाम पान दियो मुगति संदेशा । मेटचो सकल काल कलेसा ॥
सबद ध्यान तेहि दीन्ह दिढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई ॥
सतगुरु भगति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई ॥
तात मात तेहि हरष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा ॥
धर्मनि यह संसार अँधेरा । बिनु परिचय जिव जमको चेरा ॥
मातु पितु देखे हरखाई । पान नाम हमरो नहिं पाई ॥
भगति देख हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाई ॥

अधिकता, अहिंसक सुखी हैं

परगट देख चीन्हे नहि मूढा । परे कालके फन्द अगूढा ॥
जैसे स्वान अपावन रंवेउ । तिमिजगअमीछोडिविषखांचेउ ॥
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिनपुनिकीन्हजग्यको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते जग्य रचन चित दीन्हा ॥
क्रिस्त केर जब आज़ा पाई । तब पांडव सब साज मंगाई ॥
जग्यकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हंकारी ॥
पांडव प्रति बोले जदुपाला । पूरण जग्य जान तिहि काला ॥
घंट अकास बजत सुनि आवे । जग्यको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी बैरागी झारी । आये ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सर्बहि जेवाई ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घंट नहि बाजा राय लजावा ॥
जबही घट न बाज अकासा । चकित भयो राय बुद्धि नासा ॥
भोजन कीन सकल रिषिराया । बजा न घंटा भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहि क्रिस्त पहुँ गयऊ । मन संसय करि पूछत भयऊ ॥

युधिष्ठिर वचन ।

करिके किरपा कहो जदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥

कृष्ण उत्तर ।

क्रिस्त अस कारन तासु बताया । साधू कोई न भोजन पाया ॥

यधिष्ठिर वचन ।

चकित हो तब पांडव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले जदुनाथा ॥

कृष्ण वचन ।

सुपच सुदरसनको लै आवो । आदर मान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहि कोई । पूरन जग्य जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

क्रिस्त आज़ा जब अस पयऊ । पांडव तब ताके ढिग गयऊ ॥
सुपच सुदरसन को लै आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाँये ॥
भूप भवन भोजन कर जबहीं । बजा अकासमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भगत जब आस उठावा । बाजो घंट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नास जम हाट बिकानी ॥
भगत जीव कहैं काल सताये । भगत अभक्त सबन कहैं खाये ॥

हैयताका कारण, भ्रष्ट करनेवाला, रक्त- पातका काल, हत्याका प्रायश्चित्त

क्रिस्न बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बन्धु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहि जग्य करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजी हिमालय तिन्हें गलावा ॥
चार बन्धु सह द्रोपदि गलेऊ । उबरे सत्य जुधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस् कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरिचन्द्र करन बड दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आसा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जानि जिव आसा लावें । आसा बांधि काल मुख जावें ॥
सब कहैं काल नचावे नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं वाचा ॥
जो रच्छक तेहि खोजे नाहीं । अन चीन्हें जमके मुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
अस जम बुद्धि हरी सबकेरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य सबद कोई परखे नाहीं । जमदिसि होय लरै हम पाहीं ॥
जब लगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जनम भरन नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जायी । क्रित्रिम नामते जम धरि खायी ॥
पुरुष नाम परवाना पावे । कालहिं जीत अमर घर जावे ॥

छंद—सत नाम परताप धर्मनि, हंसलोक सिधावई ।

जन्म मरनको कष्ट मेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥

पुरुषकी छवि हंस निरखहिं, लहे अति आनंद घना ।

अंशहंस मिल करे कुतूहल, चंद्रकुमुदिनि सँग बना ॥

सोरठा—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हरषई ।

तैसइ हंस सुख पाव, पुरुष दरसके पावत ॥

नहीं मलीन मुख भाव, एकप्रभाव सदा उदित ।

हंस सदा सुख पाव, सोक मोह दुख छनक नहिं ॥

जबै सुदरसन ठेका पूरा । ले सत लोक पठाया सूरा ॥

मिले रूप सोभा अधिकारा । अरु हंसन संग कुतूहल सारा ॥

षोडस भानुरूप तब पावा । पुरुष दरस सो हंस जुडावा ॥

उस कालमें एक तो श्वपचसुद'शॉन और दूसरे शिष्य गरुडजी हुए । ये

हिंसकोंके मारनेका कारण, सबसे हिंसक और अहिंसक, पापी और कृत-कृत्य, डखलाकी असूल, नूकितके अधिकारी

दोनों शिष्य बड़े प्रसिद्ध हुए और तीसरे दुर्वासा ऋषि । इन तीनोंकी खबर मुझको है और इनके अतिरिक्त जो और चले कबीर साहबके उस समयमें हुए उनका वृत्तान्त मुझको मालूम नहीं हैं । उस समय कबीर साहब कृष्णजीको और सहस्रों ऋषयों मुनियोंको उपदेश देते फिरे, जिसने आपका उपदेश सुना और कहना माना, वह परमधामको पहुँचा और जिसको विश्वास नहीं हुआ वह कालका भोजन बना ।

दूसरीबार कलियुगमें कबीर साहबके पृथ्वीपर प्रगट होनेका वृत्तान्त ।

धर्मदास बचन ।

हे साहिब इक विनती मोरी । खसम कबीर कहु बंदीछोरी ॥
भगत सुदरसन लोक पठाया । पाछे साहिब कहां सिधाया ॥
सो सतगुरु मुहि कहो संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥

कबीर बचन ।

अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसो कहों आगल व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलिजुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धरमराय कहैं देखो आई । मोहिं देखि जम गयो मुरझाई ॥

धर्मराय बचन ।

कहे धरम कस मोहिं दुखावहु । बच्छ हमार लोक पहुँचावहु ॥
तीनों जुग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा ॥
हार वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुडावन लीन्हा ॥
और बन्धु जो आवत कोई । छिनमहैं ता कहैं खात बिलाई ॥
तुमते कछू न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फिर जाहु जगमाहीं । शब्द तुम्हारा सुनै कोउ नाही ॥
करम भरम हम उसकें ठाटा । जात कोइ न पावै बाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोका दै दै जीव नचावा ॥
भरम भूत हो सब कह लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावैं नर लोई । मद्य मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांस मद्य सब मानुस ग्रासा ॥
चंडी जोगिन भूत पुजाओ । यही भरम महैं जग जहैं डाओ ॥
बांधि बहु फंदहि फंद फंदाओ । अंत काल कर सुधि बिसराओ ॥
तुम्हरी भगति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहैं बुझाई ॥

यूरोपके विद्वानोंकी संमर्तियाँ, मिस्टर लार्ड- वक और मिस्टर गॉजिज़्ज़ाल्ट

ज्ञानी वचन ।

धरमराय तें बहु छल कीन्हा । छल तोहार सकलो हम चीन्हा ॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहिं जो आज्ञा देहीं । तो सब जिव होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चैताऊँ । अंकुरी जीत सकल मुकताऊँ ॥
कोटी फंद जो तुम रचि राखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रगट कला जो धरी जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अडोल अमोलै ॥
जो जियरा सुभ अंकुरी होई । सब्द हमार मानी है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मकताओं । फंदा काटि लोक ले जाओं ॥
काटि भरम जा दैहों ताही । भरम तुम्हारा मानि हैं नाहीं ॥

छन्द-सत्य शब्द दिडाम सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहैं ।

छल तोर सब चिन्हाइ तबहीं, नाम बल जिय तारिहैं ॥

मन वचन सत्य जो मोहि चीन्हि, एक तत्त्व लौ लाइहैं ।

तब सीस तुम्हरे पांव देइहैं, अमल लोक सिधाइहैं ॥

सोरठा-मर्दहिं तोरा मान, सूरा हंस सुजान कोइ ।

सत्य शब्द सहिदान, चीन्हहि हंस हरष अती ॥

धर्मराय वचन ।

कहै धर्म जीवन सुखदाई । वात एक मुहिं कहो बुझाई ॥
जो जिव रहै तुम्हरो लौ लाई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
दूत हमार ताहि नहिं पावे । मुरछित दूत मोहिं पहैं आवे ॥
यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥

ज्ञानी वचन ।

सुनहु धरम जो पूछहुँ मोही । सो सब हाल कहौं मैं तोही ॥
सुनहु धरम तुम सत सहिदानी । सो तो सत्य शब्द आहि निरबानी ॥
पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रगट नाम सत हंस बखाना ॥
नाम हमार हंस जो गहई । भवसागरसे सो निरबहई ॥
दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥

धर्मराय वचन ।

कहै धरम सुनु अन्तरजामी । कृपा करहु अब मोपर स्वामी ॥
यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥

समीक्षा, प्रकृति वैपरीत्य, बेजिटेरियन

बीरा अंक गुप्त मन भाऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥
केहि कारन तुम जाहु संसारा । सोई कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥
हमहूँ जीवन सब्द चितायब । पुरुष लोककहँ जीव पठायब ॥
मोहि दास आपन कर लीजै । सब्द सार प्रभु मोकहँ दीजै ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनहू धर्म तुम कस छल करहू । परगट दास गुप्त छल धरहू ॥
गुप्त भेद नहि देहौं तोहीँ । पुरुष अवाज कही नहि मोहीँ ॥
नाम कबीर मोर कलिमाहीँ । कबीर कहत जम निकट न जाहीँ ॥

धर्मराय बचन ।

कहै धरम तुम मोहिं दुरैहो । खेल एक पल हमहूँ खेलैहो ॥
ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेब संग लाई ॥
तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब ॥

ज्ञानी बचन ।

अरे काल तू पुरुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥
जो जिव होइ है सब्द सनेही । छल तुम्हार नहि लागै तोही ॥
जौहरी हंस लहिं पहिचानी । परखिहँ ज्ञान ग्रन्थ मम बानी ॥
जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

यहि सुनि धरमराय गहु मौना । ह्वै अन्तरधान गयो निज भौना ॥
धर्मनि कठिन काल गति फन्दा । छलबुध कै जीवन कहँ फन्दा ॥

तीसरा प्रकरण ।

जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका ।

जब कृष्णजी महाराजका शरीर छूटा तब आपकी स्थापना जगन्नाथजीमें हुई ! उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था । उस राजा इन्द्रदमन को जगन्नाथजीने स्वप्न दिखलाया कि, तू मेरा मन्दिर उठा । जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर बनकर तय्यार हो गया तब समुद्र महा वेगसे लहरें मारता हुआ आया और मन्दिरको ढहाकर समेट ले गया और भूमि बराबर हो गयी । इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया, फिरभी उसकी वही दशा हुई । फिर बनवाया फिर वही दशा हो गयी । इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको पूर्ण होने नहीं दिया । तब राजाने दुःखित होकर उसका बनवानाही छोड़ दिया ।

रालिन्ससाहब, प्रोफ़ेसर फ़ाक्स साहब, डाक्टर नैम्ब, कतिपय चिह्न

चौथा प्रकरण ।

कबीर साहबके जगन्नाथ स्थापनाकी कथा ।

इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया । जैसा कि, मैं इतः पूर्व निरञ्जन और कबीर साहबकी गोष्ठीमें लिख गया हूँ कि, निरञ्जनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि, जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा, तब समुद्र मेरे मन्दिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटाकर और मेरे मन्दिर को स्थापित कर देवें । तब आप वचनबद्ध हुए थे कि मैं तुम्हारा मन्दिर स्थापित कर दूंगा और समुद्रको हटा दूंगा उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आ उत्तरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले कि, हे राजा ! आप जगन्नाथके मन्दिरको बनाओ । तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज ! समुद्र मंदिरको बनने नहीं देता, मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाकर तय्यार प्रस्तुत करता हूँ तब वह आकर ढा जाता है, मैं क्या करूँ ? तब कबीर साहबने कहा कि, हे महाराज ! मैं इसी प्रयोजनसे आपके निकट आया हूँ । अब आप प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वार बनवाओ मैं समुद्रको हटा-दूंगा, अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा । तब राजाने पुनः मन्दिरके बनवानेका प्रबन्ध किया और मन्दिर तय्यार होने लगा । कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर आसा'को अपने सामने लगा और समुद्रकी ओर मुंह करके बैठ गये । उधर ठाकुरका मन्दिर बनकर तय्यार होनेके समीप आ गया । समुद्रने देखा कि, अब तो ठाकुरका मन्दिर पूर्ण होने पर आया है, तब बड़े वेगसे दौड़ा । उसकी लहरें आकाशको उड़ीं । जब वह लहरें मारता कबीर चबूतरेके समीप पहुँचा, तब सामने कबीर साहबको बैठे देखकर ठहर गया, आगेको बढ़ नहीं सका । फिर ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दंडवत् प्रणाम करके निवेदन किया कि, ऐ महाराज ! मैं तो ध्रोखेसे आया और जगन्नाथका मंदिर ढाहना चाहता । किन्तु सामने तो आप बैठे हैं मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, आगे बढ़ सकूँ । आप न्यायकर्ता हैं मेरा न्याय कीजिये । तब कबीर साहबने कहा कि, हे जलधे ! मैं तुम्हारा हाल जानता हूँ—परन्तु अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो । मैं तुमको इस मन्दिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ,

१ आसाका दूसरा नाम योगदण्ड हठयोगी लोग सुमेरको सीधा रखने अथवा श्वास बदलनेके लिये रक्खा करते हैं ।

मस्तिष्कके बलकी अपेक्षा, स्वभावका परिवर्तन, प्रकृतिका नियम

तुम जाकर उसको ले लो । तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया । तबतक उधर जगन्नाथजीका मन्दिर बनकर पूरा हो चुका ।

जगन्नाथ मन्दिरकी स्थापनाका वृत्तान्त । (अनु०)

धर्मदास बचन ।

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगलचरित्र कहि समझाओ ॥

कबीर बचन धर्मदास प्रनि ।

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ैसे को महिपाला ॥

सतगुरु बचन ।

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडपकाज युगति सो कहई ॥

क्रिस्त देह छांडी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥

कृष्णका इन्द्रदमन राजाको सपना देना ।

स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मन्दिर देहु उठाई ॥

मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपहैं मैं आयउ यहि काजा ॥

राजा यहि विधि सपना पाई । ततछन मण्डप काम लगाई ॥

मण्डप उठा पूरन भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा ॥

जब जब मन्दिर लाग उठावे । क्रोधवन्त सागर तब धावे ॥

छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथ को मन्दिर तोरे ॥

मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहि लेत डुवाई ॥

हारा नृप करि बहुत उपायी । हरिमन्दिर तहैं उठै न भाई ॥

मन्दिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मनमांहि सम्हारी ॥

हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहां हम जायी ॥

आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीवन मोही चीन्हा ॥

पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहां बनायउ जाई ॥

इन्द्रदमन तब सपना पावा । अहो राय तुम काम लगावा ॥

मंडप शंक न राखो राजा । इहैंवा हम आये यहि काजा ॥

जाहु वेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु बचन हमारा ॥

राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चलि आयो ॥

सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोध चित धारा ॥

उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहन न पावे ॥

निरंजन गोष्ठी अनुरागसागरका प्रमाण

उमैंगि लहर अकासे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी ॥
दरश हमार उदधि जब पाया । अति भय मान ठठक ठहराया ॥
छंद-रूप धारचो विप्रको तब, उदधि हम पहुँ आइया ।
चरन गहिके माथ नायो, मरम हम नहि पाइया ॥
जगन्नाथ हम मोर स्वामी, ताहिंते हम आइया ।
अपराध मेरो छमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥
सोरठा-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये ।
वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे विनती करें ॥

पाँचवाँ प्रकरण ।

समुद्रके कोपका कारण ।

समुद्रके हरिमन्दिर तोड़नेका यह कारण था कि, जब कि, रामचन्द्रका अवतार हुआ था उस समय श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर जबरदस्ती किया था और सेतुबंध पुल बाँधकर पार उतरे थे । इसी कारण समुद्र आप पर रुष्ट था और आपसे बदला लेनेके निमित्त उद्यत हुआ था । रामावतार और कृष्णावतारमें तो बदला ले नहीं सका, पर जगन्नाथके अवतारमें अपना बदला लेनेके निमित्त तत्पर हुआ और उसके बदले द्वारका पुरीको डुबा दिया । इस प्रकार किसीका बदला नहीं छूटता, चाहे किसी जन्ममें बदला अवश्यही देना पड़ता है ।

कीन्हेउ गमन लंक रघुवीरा । उदधि बांध उतरे रनधीरा ॥
जो कोई करे जोरावरि आई । अलख निरंजन बोइल दिवाई ॥
मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेऊँ ओइल सुन अंतर्यामी ॥
कबीर वचन ।

बोइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥
यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरन टेकके चले हरषाई ॥
उदधि उमंग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जायी ॥

छठवाँ प्रकरण ।

भ्रम विमोचन ।

कबीर साहबके जगन्नाथमें छुआछूत मिटाने का कौतुक करना ।
जब ठाकुरजीका मन्दिर बनकर पूरा होगया, तब कृष्णजीने अपने पंडेको स्वप्नमें कहा कि, ऐ पंडो ! कबीर साहबने मेरा मंदिर स्थापित करा दिया ।

महापाप, कुत्तेके वचानेका महापुण्य

अब तुमलोग आकर मेरी पूजा करो । स्वप्न देखने पर पंडा घरसे चलकर पहले समुद्रतट पर कबीर चौतरेपर गया । वहाँ उसने कबीर साहबको बैठा देखा उस समय सत्यगुरुका वेष जिन्दाका था वैष्णव वेष नहीं था । जिन्दा वेषके साधु प्रायः मुसलमानोंमें होते हैं, इस कारण वह वेष देखकर उस ब्राह्मणने अपने मनमें भ्रम किया कि, प्रथम मैंने म्लेच्छका ही दर्शन किया, ठाकुरका दर्शन नहीं मिला । ऐसा संशय करके वह पण्डा तो ठाकुरके मन्दिरको चला गया । इधर कबीर साहबने उसके मनकी समस्त बातें जान लीं । जब वह पण्डा ठाकुरके मण्डपमें आया, तब उसका वहाँ विचित्र कौतुक दिखलायी दिया । ठाकुरका समस्त मंदिर कबीर साहबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । जिस ओर वह ब्राह्मण देखता उधर वहीं कबीर साहबकी मूर्तिको उपस्थित पाता है ठाकुरकी मूर्ति कहीं दिखलाईही नहीं देती । वह ब्राह्मण अक्षत और पूष्प लिये चकित होकर खड़ा रह गया कि, मैं किसकी पूजा करूँ, ठाकुर तो कहीं दिखलाई नहीं देते, समस्त मंदिर कबीर साहबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । वह अपने मनमें सोचने लगा कि, इसका क्या कारण है ? अन्तमें उसने अपने दोषको जान लिया कि, मैंने जो कबीर साहब को म्लेच्छ समझा था । इस कारणही मुझको यह दंड मिला है । यह सोच समझकर वह ब्राह्मण कबीर साहबकी स्तुति करने और अपने अपराधके लिये क्षमा प्रार्थना करने लगा । जब पण्डाने सत्यगुरुकी अत्यंत स्तुति की और अत्यंत नम्रता-पूर्वक अपने दोषोंके निमित्त क्षमा प्रार्थना किया, तब आप दयालु हुए और अपनी सब मूर्तियोंको समेट लिया, केवल एक मूर्ति रह गयी और ठाकुरकी मूर्ति दिखाई देने लगी । तब कबीर साहबने उस ब्राह्मणसे कहा कि, ऐ पंडा ! अब मेरी आज्ञा है कि, तुम ठाकुरको पूजो, पर इस बातका ध्यान रखना कि, आजके दिनसे इस जगन्नाथपुरी में छूत न रहेगी और जाति-पातिका भेद तनिक भी नहीं रहेगा । प्रत्येक जाति एक दूसरे जातिके साथ निधड़क भोजन करेगी । सो अब तक पुरुषोत्तम पुरीमें वही नियम प्रचलित है । सब जातिके लोग एक स्थानपर भोजन करते हैं, कोई किसीके जूठेका कुछभी ध्यान नहीं करता । इतनी बात कहकर कबीर साहब तो वहाँसे अन्तर्धान हो गये, और जगन्नाथकी पूजा संसारमें प्रचलित हुई ।

मंडप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहँवा कियऊ ॥
तब हरि पंडन स्वपन जनावा । दास कबीर मोहि पहुँ आवा ॥
आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमंग नीर तहँ आयी ॥
दरस कबीर उदधि हटि गयऊ । यहि विधि मंडप मोर बचयऊ ॥

पंडा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चल जाये ॥
चौरातीर पहुँचे जब पण्डा । मोहि देखि मन धरे पखंडा ॥
पंडन अस पाखंड लगायी । प्रथम दरस मलेच्छ दिखायी ॥
हरिके दर्शन मैं नहि पावा । प्रथमहि हम चौरा लग आवा ॥
तब हम कौतुक एक बनाये । कहों वचन नहि राखु छिपाये ॥
मंडप पूजन पंडा गयऊ । तहवों एक चरित अस भयऊ ॥
जहँ लग मूरति मंडप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥
हरि मूरति कहँ पंडा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥
अच्छत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहि ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥
देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मरम न पाया ॥
पंडा वचन ।

हम तुम काहि नहीं मन लाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥
छमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करें दौड़ कर जोरा ॥

कबीर वचन ।

छन्द— वचन एक मैं कहों तोसो, विप्र सुन तैं कान दे ।
पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छाड़ दे ॥
भ्रम भोजन करे जो जिव, अंग हीन हो साहिको ।
करे भोजन छूत राखे, सीस उलटे वाहिको ॥

सोरठा—चौरां करि व्यवहार, भ्रम विमोचन ज्ञान दूढे ।
तहँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥

सातवाँ प्रकरण ।

स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी ।

वैष्णवाचार्य रामानुज स्वामी जब उत्पन्न हुए और अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया, तब दक्षिण देशमें उनके धर्मका अच्छा प्रचार हुआ । जब आप पुरुषोत्तमपुरमें गये और यह इच्छा की कि, इस जगन्नाथपुरीमें आचार चलाऊँ । तब रामानुज स्वामीसे जगन्नाथजीने स्वप्नमें कहा कि, मेरी पुरीमें तुम्हारा आचार नहीं चलेगा, तुम इस ध्यानको अपने मनसे निकाल दो, परन्तु रामानुज-स्वामीने इस विचारको नहीं त्यागा । जब एक रातके समय रामानुज-स्वामी सोगये तब जगन्नाथजीने उनको जगन्नाथपुरीसे उठाकर श्रीरंगपुरीमें धर दिया । जब प्रातःकाल स्वामीजी उठे तब देखा कि, मैं श्रीरंगपुरीमें आन

कबीर साहिबका सत्यपुरुषकी आज्ञा पाकर आगे बढ़ना कालका अपने बारह पन्थकी बात०

पहुँचा । तब उन्होंने अपने विचारोंको छोड दिया और पुरुषोत्तमपुरमें आचार नहीं चला । इस बातको जो कोई जानना चाहे वह भक्तमालको देखले ।

आठवाँ प्रकरण ।

तीसरी बार कलियुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रगट होना
और शवपत्र सुदर्शनके माता-पिताको मुक्तिका उपदेश
देना और बालरूप धारण करके कमलोंके पुष्पोंमें
तालाबपर लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिलनेकी कथा ।

शवपत्र सुदर्शनजी कबीर साहबके शिष्य हुए परन्तु उनके माता पिता नहीं हुए । जब सुदर्शनजीकी देह छूटी और सत्य लोकको गये, तब उन्होंने सत्य-कबीरसे निवेदन किया कि, हे सद्गुरु ! मेरे माता पिताकी मुक्ति करो । तब कबीर साहब उनका निवेदन स्वीकार करके पृथ्वीपर आये । शवपत्रके जो माता पिता थे वह दोनों डोमका शरीर छोडकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी हुए थे, और चन्द्रवारे नगरमें रहते थे । पहले उनका नाम कुलपति और महेसरी फिर नरहर लक्ष्मणा हुआ । इस चन्द्रवारे नगरके तडागमें कबीरसाहब कमलोंके पुष्पोंमें एक छोटे बच्चेकी सूरत होकर रहे । प्रातःकाल वह ब्राह्मणी जब स्नान करनेको आयी तब स्नानादिसे निवृत्त होकर अपना अंचल पसारकर सूर्य भगवान्से पुत्र मांगने लगी क्योंकि, वह निःसंतान थी । उसी समय गुप्तरीतिसे कबीरसाहब उस ब्राह्मणीके अंचलपर आगये । इसपर उस ब्राह्मणीको निश्चय हुआ कि, सूर्य भगवानने मुझको बेटा दिया है वह पुत्रको लेकर अपने घरको आयी । ब्राह्मण ब्राह्मणी दोनों प्रसन्न होकर सेवा करने लगे । जब कबीर साहबको रात्रिके समय पलंगपर लेटाते और प्रातःकाल बिछौना झाड़ते तब प्रति दिवस एक तोला सुवर्ण बिछौनेके नीचेसे निकल पड़ता । इस प्रकार वे ब्राह्मण तथा ब्राह्मणी धनाढ्य होगये, और कबीर साहबकी दयासे उनका दारिद्र्य दूर हो गया । देखो ग्रंथ अनुरागसागर और निर्भयज्ञान इत्यादि वहाँ यह कथा विस्तारसे है । प्रमाण आगे ।

जब कबीर साहब, कुछ बड़े हुए तब दोनोंको सिखलाने लगे कि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तुम हमारा शब्द मानो तो मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा और तुम्हारे आवा-गमनका बंधन टूट जावेगा । पर उन दोनोंको सत्यगुरुके कहनेका निश्चय नहीं हुआ । बालक जानकर कहना नहीं माना, तब कबीर साहब उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये ।

कालका कबीर साहिबसे जगन्नाथ स्थापनाका वरदान मांगना

नवों प्रकरण ।

कबीरसाहबकी ४ थी, ५ वीं, ६ छठी और ७ वीं बार
प्रकट होनेका वृत्तान्त ।

४—"मूसा बोध" जिसमें कबीर साहबका हजरत मूसाको शिक्षा देनेका वर्णन है ।

५—"दाऊद बोध" जिसमें सदगुरुने हजरत दाऊदको उपदेश किया है ।

६—"सुलेमान बोध" जिसमें कबीर साहबने नवी सुलेमान बादशाहको शिक्षा दी है ।

७—"ईसा बोध" इसमें कबीर साहबने ईसाको उपदेश किया है ।

ये चारों बोध, मैंने अभीतक नहीं देखे, अपने कानोंसे तो सुना है कि, ये सब ग्रन्थ कबीर पंथियोंके पास हैं । ढूँढने तथा देखनेसे इनकी व्यवस्था प्रगट होगी । ×

दशवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबको चेतानेका वृत्तान्त ।

आठवीं बार कलियुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रगट होना ।

(मुहम्मद साहबको रक्तपातसे हटाना, मेआराज मुहम्मद होना और मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन कराना । सब आकाशोंकी सैर कराकर फिर मक्कः नगरमें प्रवेशित कराना और मुहम्मद तथा समस्त मुहम्मदियोंको मुक्तिकी आज्ञा कराना तथा रसुलल्लाःको पाँच कलमा पढ़ाना । चार कलमा प्रगट करने और पाँचवाँ कलमा गुप्त रखनेके निमित्त सावधान करना और मुहम्मदसाहबको आशीर्वाद देकर अन्तर्धान होजानेका वृत्तान्त वर्णन ।)

मुहम्मद साहबको चालीस वर्षकी वयमें पैगम्बरी मिली तब उन्होंने मुसलमानी धर्मका प्रचार किया । वह बलपूर्वक लोगोंको मुसलमान करने लगे और बहुत लोगोंको बंदी बनाकर उनके हाथ पैरमें जञ्जीरें डाल दीं और आज्ञा दी कि, जो मुसलमान होजावे उसको जीवित रखो तथा अन्यान्यका घात करो । बहुतसे मनुष्य मारे गये, जब व्यथित मनुष्योंकी क्रंदनध्वनि सत्यलोकपर्यन्त पहुँची, तब सत्यपुरुषको दया आयी और मुक्तामणिजीसे कहा कि, हे मुक्तामणिजी !

× ये सब ग्रन्थ मेरे पुस्तकालयमें उपस्थित हैं, सदगुरुकी कृपा होगी तो समयपर प्रकट करनेका प्रयत्न किया जायगा.

अनुवादक—श्रीयुगलानंद बिहारी.

धर्म रायका० कबीर साहिबको धोखा देकर उनसे गुप्त भेदका पूछना सत्ययुगका वृत्तान्त

(कबीर साहब ! ) पृथ्वीपर जाओ कालपुरुष मनुष्योंको अत्यंत पीड़ा पहुँचा रहा है, उनको उसके हाथसे बचाओ ।

तब मुक्तामणि साहब पृथ्वीपर आये और मक्काः नगरमें उतरे, देखा तो मुहम्मद साहब मस्त हाथीपर सवार, बड़े प्रतापके साथ शासन कर रहे हैं । उस समय कबीर साहब बोले सलाम अलैक और मुहम्मद साहबने सलामका उत्तर देकर पूछा कि आप कौन हो और कहाँसे आये हो ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, मैं सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर आया हूँ, आपसे पूछना चाहता हूँ कि, आप किसकी आज्ञासे ऐसी हिंसा करते हो । तब मुहम्मद साहबने कहा कि हमको लाहूतसे आज्ञा मिली है । तब कबीर साहबने कहा कि, लाहूत स्थान तो बार है, पारकी सुधि आपको नहीं । वह परमेश्वर जो समस्त संसारका स्वामी है उसकी यह आज्ञा नहीं है और व्यर्थके रक्तपातसे वह कदापि प्रसन्न नहीं होता, लाहूत मध्यका स्थान है वह संसारका यथार्थ कर्ता नहीं है । तब मुहम्मद साहबने कहा कि, इसका निश्चय मुझे तब हो जब मैं वह सत्यलोक स्वच्छुसे देखूँ । इस बात पर कबीर साहबने मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन कराया और फिर मक्काको ले आये और रक्तपात तथा मारकाट बंद कराया तथा मुहम्मद साहबको शिक्षा दिया ।

ग्यारहवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबके मेआराजके विषयमें मतभेद ।

मुहम्मद साहबके मेआराजके बारेमें मुसलमान अनेक अनुमान करते हैं । जैसा कि, हदीसों तथा तारीख मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबके नबी होनेके बारहवें वर्षमें यह घटना हुई कि, जिबराईल तथा मेकाइल रात्रिके समय रसूलल्लाहके निकट आये और उनका हृदय फाड़कर प्रत्येक प्रकारके पाप-युक्त दूषित रक्तसे हृदयको विशुद्ध किया और बुराक़ घोड़ा लाकर उसपर इन्हें सवार कराया जिबराईलने रिकाब पकडी और मेकाईलने बाग थामी । पहले बडे़ हैकल अर्थात् बंत अकसाके द्वारपर पहुँचे, बहुतसे फरिश्ते इस स्थानपर उनको सलाम करनेके निमित्त आये, हजरत घोड़ेको बांधकर आप हैकलके भीतर गये और वहाँ आपने समस्त पैगम्बरोंकी आत्माओंको देखा और उनसे वार्तालाप किया. फिर एक सोपान आकाशसे उतरी जिसको अरबी भाषामें मेआराज बोलते हैं वह सीढी पृथ्वीसे अकाशपर्यन्त रक्खी गई और मुहम्मद साहब बुराक़ पर सवार होकर मेआराज सीढी पर चढ़े और उसके डंडोंपर चढ़ते हुए आकाशको चले । जब पहले आकाशपर पहुँचे तब जिबराईलने पहले आकाशका द्वार खटखटाया

सत्य मुक्तका ब्रह्मादिकोंको उपदेश देना प्रमाण अनुराग सागरका

इसराईल नामक फरिश्तः बारह सहस्र फरिश्तों सहित द्वारकी रक्षा किया करता था। वह बोला कौन है ? तब जिबराईलने उत्तर दिया कि, मैं जिबराईल हूँ और मेरे साथ मुहम्मद साहब हैं तब उसने द्वार खोल दिया और सलाम किया।

फिर हजरत आदम मिले और कहा, धन्य है आइये बैठिये। आदमके दाहिने तथा बाएँ दो द्वार थे, एक नरकका तथा दूसरा बँकुण्ठका। एक ओर देखकर हजरत आदम रो थे और दूसरी ओर देखकर हँसते थे।

इसी प्रकारके वार्तालाप करते और प्रत्येक द्वारको खुलवाते मुहम्मद साहब ऊपर गये। जब सदर स्थानके आगे चले तब जिबराईलने कहा कि, अब आप आगेको चलिये। स्वयम् जिबराईल पीछेको हो लिये, आगे चलकर एक सुवर्ण खचित परदा मिला जब जिबराईल इस परदेके समीप पहुँचे तब भीतरसे आवाज आई कि, द्वार पर कौन है ! तब जिबराईलने उत्तर दिया कि, मैं जिबराईल हूँ और मेरे साथ मुहम्मद हैं। जिबराईलने हजरत मुहम्मदसे कहा कि, अब इससे आगे जानेकी मुझको आज्ञा नहीं है आप अकेले जाइये। तब सत्रह परदे मुहम्मद साहबने अकेले तँ किये। प्रत्येक परदेकी मोटाई पांच सौ वर्षकी राह थी अर्थात् प्रत्येक परदा एक दूसरेसे पांच सौ वर्षके मार्गके अन्तर पर था। आगे चल कर वह बुराक भी रह गया। तब वहाँ पर एक पक्षी जिसको रफ़रफ़ कहते हैं, मुहम्मद साहबकी सवारीके निमित्त आया। इस रफ़रफ़पर सवार होकर रसूल-अल्लाः खुदाके सिंहासनके समीप पहुँचे। रसूलअल्लाः और अल्लाःमें बहुत वार्तालाप हुई। मुहम्मद साहबके आने-जानेमें अनेक घटनायें हुईं जिसके लिखनेका स्थान इस स्थानपर नहीं है। पांचों रोजे, निमाज और समस्त आज्ञाएँ वहाँसे मिलीं यह सब बातें एक पलभरमें हुई। प्रातः काल उठकर मुहम्मद साहबने यह सब बातें दरबार आममें कही उस और अबूबकने सुनतेही इस बातका विश्वास करलिया। पर अबूजहलने यह बात सुनकर लोगोंमें बड़ा उपहास किया। जिसको सुनकर मुसलमानी धर्मसे कितनेही लोग विमुख हो गये। मुहम्मदी दीनके पंडितोंमें इस बातका मतभेद है, किसीका कथन है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न मात्र देखा था और कोई रूह तथा कोई शरीरसे मेआराज कहते हैं और किसीका कथन है कि, केवल बैतअक़सापर्यन्त मेआराज हुआ था। इस बातपर हदीसोंके भिन्न २ कथन हैं।

इस मेआराज मुहम्मदके विषयमें लोगोंके अनेक कथन तथा भांति-भांतिके ध्यान हैं। सूरतं नजम अर्थात् तिरपनबी सूरतमें वर्णन किया है कि, मुहम्मद साहब ने एक तेज स्वरूप व्यक्तिको देखा और फ़मुस्सरीन लिखते हैं कि, यह

कबीरसाहिबका ब्रह्मा-विष्णुके पास पहुँचना कबीर साहिबका शेषनागके पास जाना ब्रह्मादिके ध्यान द्वारा राम नामका प्राकट्य

तेजस्वरूप व्यक्ति हजरत जिबराईल थे । उस धर्मके धुरीण विद्वानोंमें मतभेद है—एक मण्डली उनमेंको कहती है कि, यह तेजस्वरूप व्यक्ति जिबराईल फिरशतः नहीं बरन् रवगम् जगदीश्वर था । सुतरां काजी बंजाबी लिखता है —

وَقِيلَ الصَّابِرُ كَلِمَا اللَّهُ تَعَالَى وَهُوَ الْعَزِيزُ الشَّكُورُ وَهُوَ الرَّزِاقُ وَهُوَ الْمَتِينُ

अर्थात् सब ज़मीर खुदाके निमित्त हैं और तात्पर्य है महाबलसे जिसका अर्थ है—बड़ा बलवाला । जैसे कि कुरानमें विवरण हुआ (अन्नदाता और सायब कूवतमतीं) अर्थात् दूध बलका स्वामी ।

मोआलिम तफ़सीर सूरत नजममें यह लिखता है —

وَأَخْلَفُوا فِي الدُّنْيِ رَأْسَهُمْ

अर्थात् और लोगोंने मतभेद किया है कि, मुहम्मदने देखा वह क्या था ।

فَقَالَ نَاسٍ جَبْرَئِيلَ وَصَوُّقُوا ابْنَ مَسْعُودٍ وَعَائِشَةَ

तब कहा एक मंडलीने कि, उसने देखा जिबराईलको और यह कथन इब्न मसऊद आयशःका है ।

وَقَالَ آخَرُونَ هُوَ اللَّهُ مَزَجَلُ

अर्थात् कहा औरोंने कि वह (जिसको देखा मुहम्मदसाहबे) अल्लाह इजक अल्ल था ।

ثُمَّ أَخْلَفُوا فِي رَأْسِهِ فَقَالَ بَعْضُهُمْ جَعَلَ بَصَرَهُ وَفَوَّادَ وَهُوَ قَوْلُ ابْنِ عَسَاكِرِ

अर्थात् पुनः मतभेद किया लोगोंने परमेश्वरके देखनेके विषयमें अर्थात् परमेश्वरको जो देखा तो किस प्रकार देखा, निदान कहा कुछ मनुष्योंने कि, अवश्य परमेश्वरने दृष्टि दी, उसके हृदयमें अर्थात् उसके हृदयचक्षु खोल दिये, निदान देखा उसने हृदयसे यह इब्न अब्बासका कथन है ।

फिरतवातर लेखकोंका अनुवाद करनेके उपरान्त मुआलिममें यह कथन इब्न अब्बासका लिखा है —

पृथ्वीपर आनेकी कथा

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ مَالِكِ بْنِ الْقَوَادِ مَا رَأَى وَلَقَدْ رَأَى نَزَلَ الْخَزَنَةُ قَالَ رَأَى بِنْدَلَةَ مَرْيَمَ

अर्थात् इब्न अब्बासका यह कथन है नहीं मिथ्या कहा हृदयमें जो उसने देखा उसको ।

एक स्थानपर और उल्लेख किया गया है कि, देखा उसको साथ हृदय अपनेके दो बेर । इसके उपरान्त मोआलममें यह लिखा है --

وَدَهْتَ جَمَاعَةً عَلَى أَنَّهُ رَأَى بَعْنِيَّةَ وَهُوَ قَوْلُ الْحَسَنِ وَأَبْنِي وَأَعْلَمُهُ قَالُوا أَرَأَى
مُحَمَّدُ بْنُ زِيَادٍ عُلْوَى عُلْوَمَةَ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ اللَّهُ أَضْطَنَى أَبْرَاهِيمَ بِالْحُكْمِ
وَأَضْطَنَى مُوسَى بِالْكَلَامِ وَأَضْطَنَى مُحَمَّدٌ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِالرَّيْسَةِ

अर्थात् एक मण्डलीवाले यह मानते हैं कि, देखा उसको अपनी दृष्टिसे अर्थात् मुहम्मद साहबने परमेश्वरको स्वच्छुसे प्रत्यक्ष किया और यह कथन है हसन उन्स और अकरमका । उन्होंने कहा है कि, देखा मुहम्मदने अपने परमेश्वरको । अकरमाने इब्न अब्बाससे वर्णन किया कि, चुन लिया अल्लाहने इबराहीमको मंत्रीसे, और चुन लिया मूसाको कलामसे तथा चुन लिया मुहम्मदको दर्शन देनेसे । पूर्वोक्त तफसीर मोआलमसे कई बातें जानी जाती हैं । प्रथम तो यह है कि, इब्न अब्बासका कथन ठीक है कि, मुहम्मद साहबने बुद्धिबल तथा ज्ञान चक्षु द्वारा परमेश्वरको निरखा था और जिबराईलको नहीं । कारण, यह कि, सूरए नजमसे प्रगट होता है कि, जिस प्रतापशाली पुरुषको मुहम्मद साहबने देखा उस पुरुषकी ऐसी बड़ाई और इतनी श्रेष्ठता वर्णन किया कि, वह उत्पत्तिवान् नहीं जान पड़ता था वरन उत्पन्न कर्ता । उनके मेआराजकी कहानी द्वारा प्रकट होता है कि, जिबराईल एक साधारण भूत्य अथवा चोबदारके समान आकाशोंपर गया था, जहां मुहम्मद साहब ठहरते थे वहां जिबराईल बुराकको बांधता था और जब बुराक सुस्ती करता तो वह उसको हांकता था । जब मुहम्मद साहब आकाशके पार पहुँचे तब अकेले मोहम्मदके जानेकी आज्ञा मिली, कारण यह कि, जिबराईल में ज्ञानका उतना प्रताप नहीं था जिससे वह आगे बुलाया जाता । तात्पर्य यह है कि, सूरए नजममें जिस प्रतापशाली मनुष्यको मुहम्मद साहबके देखनेका विवरण किया गया है, वह कदापि जिबराईल नहीं था, वरन् स्वयम् परमेश्वरही था ।

धोंधल राजका वृत्तान्त खेमसरीका वृत्तान्त ठीका पूरने परही लोककी प्राप्ति

बारहवाँ प्रकरण ।

खुदा साकार है ।

हसन उन्स और अकरमाके कथनसे प्रगट है कि, मुसलमानोंके कुरानानुसार यह विश्वास है कि, शारीरिक दृष्टिसेभी परमेश्वर देखा जाता है। सुतरां तफसीर, अजीजीमें शाह अबदुल अजीज साहबने प्रमाणित किया है कि, क्रयामतके दिन खुदा आकाशसे उतरेगा और सिंहासन पर बैठकर न्याय करेगा । उसका तेज तथा प्रताप सांसारिक सन्नाटोंके सदृश होगा । फिर कुरानसे प्रगट है कि, जो इबराहीम और मूसाका खुदा था वही खुदा मुहम्मद साहबका भी है । आदम, नूह मूसा और इब्राहीम इत्यादिने अपनी चर्मचक्षुसे खुदाको देखा । फिर मुहम्मदको खुदा दृष्टिसे कैसे देखा न जावेगा ? निस्सन्देह वह भी चर्मचक्षुसे देखा जाता है, और जो अन्तर दृष्टिसे देखा जाता है, उसका गुण कुछ कहा सुना नहीं जाता ।

तेरहवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबका जलाली खुदा ।

यह तजकीरेजलाली जो कुरान हदीस तथा तफसीरोंमें लिखा गया है, उस जलाली पुरुषसे कबीर साहबका तात्पर्य है । यदि मुहम्मदी दीनके विद्वान् इस बातकी भलीप्रकार जांच करेंगे तो, उनको पता लग जावेगा । कबीर साहबके अतिरिक्त और किसी देवता और मनुष्यमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, मुहम्मद साहबको एक क्षणमें समस्त आकाशोंका परिभ्रमण करावे और खुदाका दर्शन कराकर पुनः मक्कामें लौटा लूवे । वे लोग बाँग देते हैं और अल्लाह अकबरका नाम लेते हैं, सो अल्लाह अकबर जिसको कहते हैं उसीका नाम कबीर है । अकबर तथा कबीरमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है, जो अकबर है वही कबीर है और जो कबीर है वही अकबर है । वे लोग अल्लाह अकबरका नाम लेते हैं परन्तु (छोटे) अल्लाहकी पूजामें तन मन समर्पण करते हैं तथापि उनकी बाँग अकबर अल्लाहमें बड़ा प्रभाव है । यद्यपि छोटे अल्लाहको वे पूजते हैं तथापि बड़े अल्लाहकी उनको सहायता मिलती है सो इसी अकबरने मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन कराया, देखो ग्रन्थ मुहम्मद'बोधका संक्षेप ।

चौदहवाँ प्रकरण ।

(इस ग्रन्थमें कबीर साहबका मुहम्मद साहबको बोध देने,
सत्यपुरुषका दर्शन कराने और मेआराजका विवरण
प्रश्नोत्तर द्वारा विस्तारपूर्वक वर्णित है)

जीवोंके उपदेश करनेका फल आरतीका साज

धर्मदास बचन ।

साखी—धर्मदांस विनती करें, कृपा करहु गुरुदेव ।
नवी मुहम्मद जस भये, सो सब कहिये भेव ॥

सत्यकबीर बचन—रमैनी

धर्मदास बूझ्यो भल वानी । सो सब कथा कहूँ सहिदानीं ॥
विगस्यो पुहुप उठी अस वानी । मुक्तामणि सुनिये तुम ज्ञानी ॥
भवमें जाव जीवके काजा । जीवन कष्ट देत यमराजा ॥
मुक्तामणि चले शीश नवाई । तत्छण भवमें पहुँचे आई ॥
तबहीं मिले मुहम्मद पीरा । तिन सब हुकुम कीन तागीरा ॥
तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ॥
नजर दिदार जो कीन हमारी । मस्त गयन्द केर असवारी ॥
कहु भाई तुम कहाँ भरमाये । कहाँते आय कहाँको जाये ॥
हुये हैरान नजर नहीं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये ॥
कहर छोड मिन्हदिल आये । तव तुम साँचे पीर कहाये ॥
वाहक को नहीं साहब राजी । पढो कुरान पूछो तुम काजी ॥

मुहम्मद बचन ।

साखी—कहाँ से आये पीर, तुम क्यों कर किया पयान ? ।
कौन शक्सका हुकम है, किसका है फरमान ? ॥

रमैनी ।

पीर मुहम्मद सखुन जो खोला । अल्लाः हमसे परदै बोला ॥
हम अहदी अल्लाः फरमाना । बतन लाहूत मोर अस्थाना ॥
उन भजे रूह बारह हजार । उम्झतके हम हैं सरदारा ॥
तिस कारण जो हम चलि आये । सोबत थे सब जीव जगाये ॥
जीव खाबमें परा भलाई । तिसकारन फरमान ले आई ॥
तुम बूझो सों कौन हो भाई । अपनो इस्न कहो समझाई ॥
साखी—दूर की बातें जो करो करते रोजः नमाज ।
सो पहुँचे लाहूतको, छोड़े कुलकी लाज ॥

कबीरबचन ।

कहैं कबीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ॥
तुम भूलै सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हे भरमाया ॥