कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुम जाकर उसको ले लो । तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया । तबतक उधर जगन्नाथजीका मन्दिर बनकर पूरा हो चुका ।
जगन्नाथ मन्दिरकी स्थापनाका वृत्तान्त । (अनु०)
धर्मदास बचन ।
कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगलचरित्र कहि समझाओ ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रनि ।
राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ैसे को महिपाला ॥
सतगुरु बचन ।
राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडपकाज युगति सो कहई ॥
क्रिस्त देह छांडी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥
कृष्णका इन्द्रदमन राजाको सपना देना ।
स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मन्दिर देहु उठाई ॥
मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपहैं मैं आयउ यहि काजा ॥
राजा यहि विधि सपना पाई । ततछन मण्डप काम लगाई ॥
मण्डप उठा पूरन भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा ॥
जब जब मन्दिर लाग उठावे । क्रोधवन्त सागर तब धावे ॥
छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथ को मन्दिर तोरे ॥
मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहि लेत डुवाई ॥
हारा नृप करि बहुत उपायी । हरिमन्दिर तहैं उठै न भाई ॥
मन्दिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मनमांहि सम्हारी ॥
हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहां हम जायी ॥
आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीवन मोही चीन्हा ॥
पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहां बनायउ जाई ॥
इन्द्रदमन तब सपना पावा । अहो राय तुम काम लगावा ॥
मंडप शंक न राखो राजा । इहैंवा हम आये यहि काजा ॥
जाहु वेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु बचन हमारा ॥
राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चलि आयो ॥
सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोध चित धारा ॥
उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहन न पावे ॥