कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भेड़ियेका पाला मनुष्य, चरक स्मार
था एवं शिर हिलाते हुये बड़ी आन बानसे चलता था, चेमलेन सोंपकी तरह वह भी कपड़ा बदलता रहता है।
मकड़ी ।
मकड़ी एक प्रकारका कीड़ा है। प्रत्यक्षमें उसका शिर बाहर नहीं जान पड़ता। उसके अङ्ग उसके शरीरमें इस प्रकार लगे हुये होते हैं कि, तनिक छूनेसेही गिर पड़ते हैं। नरके पाँव अनेक लटकन होते हैं। मकड़ीके पाँव बहुत छोटे २ होते हैं इसी कारण वह गिर पड़ती है। उसके पाँव कुण्ठयाके समान होते हैं सामने पाँवमें टेढ़ी कठिया होती है जो हिलती है। नीचेकी ओर टेढ़ी हैं उसके नीचेकी ओरका एक टेढ़ा छिद्र होता है जिस पथसे कि, वह बिष निकालती है विष अपने पास रखती है उसके ऊपर एक पाँतर है उसमें बही प्रभाव है जो कि, शिरके स्थान प्रगट करती है। इसमें एक और टुकड़ा मिला होता है वह हिला करता है वह उसका नरम पेट हैं। इस देहके टुकड़ेमें चार अथवा छः गोली निकली हुई होती है। वह मांससे गठीली होती है सभी गोल तथा एक दूसरेसे मिली हुई होती हैं उनके सिरपर अनेक छोटे छोटे छेद होते हैं इनही स्थानोंसे रेशमी तार निकालती हैं। एक प्रकारका मसाला है—जो कि, उसके पेटके भीतर की झोलीमें रहता है। रेशम ऊँचे नीचे बर्तनोंमें रहता है वे बर्तन बहुत मोटे और बहुत छोटे कदके होते हैं। उनकी जड़ एक दूसरेसे जमी हुई होती हैं वे बाहरी समानके साथ मिली हुई होती हैं। जो मसाला भीतरी बर्तनोंमें प्रगट होता है वह स्वच्छ गोंद और लेईके समान होता है। तीक्ष्ण मदिरा अथवा जलसे नहीं गल सकता जब झुकाया जाय तो टूट जाता है। वह दुमदार तथा लचीला तभी होता है वह पतला पतला तार बनाया जावे यह गुण उससे निकलता है। बराबरसे अनेक छोटे २ बाल होते हैं, उनकी राहसे वह मसाला निकलता है, वे शून्य सूत काटनेवालेके स्थानपर लगे हुये होते हैं, एक कातनेके स्थानपर सहस्र २ बाल अथवा बूँद रहती हैं। इनहीसे गाढ़ा लार बूँद २ करके निकलता है, जिस समय वह बाहर निकलता है तो वायु लगतेही सुन्दर तथा महीन बन जाता है। प्रत्येक कातनेवालेके तार पहले मिले रहते हैं। जब वह किसी वस्तुसे लटकाती है उसमें बहुतेरे पदार्थ संयुक्त रहते हैं। पहले मकड़ीका तात्पर्य यह रहता है कि, वह अपने तारको किसी स्थानमें लगादे। इसके बाद अपना जाल बना किसीसे लगा देती है। इससे लगाकर अपने प्रत्येक चरखोंसे निकालती है। मकड़ी अपने पिछले पाँवको तकमेकी तरह काममें लाती है। उसके द्वारा वह अपने शरीरसे बराबर तार निकालती जाती है, इस मकड़ीकी तारकी बनावटमें भेद होता है।
कुता, रामकालका श्वान
एक प्रकारका तार तो चपचपा होता है दूसरा स्वच्छ तथा वारीक होता है । जो चपचपा होता है उसको तो वह वृक्ष अथवा दीवार इत्यादिसे लगा देती है वे दूर दूर तक तने रहते हैं । दूसरे तार जालके लिये हैं । इन्हीं तारों द्वारा मकड़ी अपना जाल बनाती है, इन्हीं जालोंसे आखेटको पकड़ती है । चिपचिपे तार तो घेरा करते हैं स्वच्छ तार केन्द्रके समान मध्यमें होते हैं । मकड़ियोंकी अनेक जातियाँ हैं ।
आठ आंखोवाली—कारसिका भूमिमें आठ आंखोवाली काली मकड़ी होती है । यह बहुत बलिष्ठ होती है, यह जानवरों तथा टिड़ियोंको पकड़ पकड़कर खाया करती है । मकड़ियोंके तारकी बनावट तथा सजावटके बारेमें अंग्रेजी पुस्तकोंमें बहुत कुछ लिखा हुआ है ।
चींटी
चींटी बड़ी परिश्रमी होती हैं । पूर्वकालसे विख्यात है कि, लड़ने तथा घरोंआ काम काज करनेमें यह बहुत निपुण होती हैं । यद्यपि ये छोटी हैं पर बहुत बलिष्ठ तथा दृढ़ हैं, जितना उसका शरीर अधिक है उससे दशगुणा बोज़ा उठाती है बहुत चुस्त चालाक होती हैं । शिर छोटा होता है, जाड़ बहुत दृढ़ होती है । उनका नीचेका होंठ छोटा और गोल चमचेके समान होता है । उसका पेट अण्डाकार होता है उसमें एक अथवा दो गोंठें होती हैं । नरके चार पर होते हैं । नरकी अपेक्षा मादा डील डीलमें बड़ी होती है व सम्भोग कालमें परदार होते हैं उनमें कितनीही मजदूरी तथा परिश्रम करनेवाली चींटियाँ होती हैं उनके जन्मभर पर नहीं निकलता । चींटियोंके घर बहुत अच्छे ढङ्गसे बने हुए होते हैं, उनकी बनावट बहुत विचित्र है । यदि बहारके आधे मौसमसे लेकर पतझड़के मौसम तक चींटियोंका घर देखा जावे तो पर तथा परहारसे भरा होगा । जो नर तथा मादा चींटियाँ हैं उनके पर चमकते होते हैं मिहनती चींटियोंके पर नहीं होते । परिश्रमी चींटियोंमें राजा तथा रानी कोई नहीं, केवल वे दास हैं ।
परवाली चींटियोंमें बादशाह बेगम तथा अमीर—भी होते हैं । राजा तथा अन्यान्य श्रेष्ठ चींटियाँ घरोंमें रहा करती हैं । जब वे बाहर निकलती हैं तो उनकी अरदलीमें सैन्य हुआ करती है । बाहर अकेले कदापि नहीं फिरती समस्त सैन्य उनकी प्रबन्ध तथा सेवामें रहा करती है, जिसमें वे अकेले बाहर न जावें यदि अमीरोंमें कोई अकेला बाहर निकल भी पड़े तो चौकीदार चींटियाँ उनको खींचकर भीतर कर देती हैं । ऐसी अवस्थामें तीन या चार चींटियाँ
उस भगोड़े अमीरको खींचकर भीतर करती हैं। पहरेदार चीँटियोंमें एक तरहका भाग जानेका स्वभाव होता है कि वे अपनी जन्मभूमिको छोड़कर भाग जाती हैं।
सहबास—जोड़ खानेके पीछे फिर कदापि पलट कर नहीं आतीं। उनका घर मादा विहीन होनेके कारण शीघ्रही उजाड़ हो जाता है। उनका जोड़ खाना विशेषतः घरके भीतर नहीं होता देखा गया है कि, चारों ओर जासूस फिरा करते हैं कि, जहाँ कहीं वे बच्चा जननेवाली मादा पावें पकड़ लावें। जासूस विशेषतः इसी विषयके लिये नियत किये गये हैं। यह बात जाँचसे जानी गई है कि, झुण्डके झुण्ड इधर उधर तितर बितर हो जाते हैं। जिसमें अच्छी मादा ढूँढ़कर ले आवें। उनके मकानके समीप न मिले तो दूर दूरकी यात्रा करती हैं। बहुत दूर दूर चली जाती हैं फिर लौटकर नहीं आतीं। समय पाकर नवीन बस्ती बसाने लगती हैं।
सहवासके बाद मौत—जोड़ खानेपर निश्चयही मर जाती हैं। दूसरे भी अन्यान्य कितने कीड़े मकोड़ोंके नर जोड़ा खानेके पीछेही मर जाते हैं। ऐसाही नियम चीँटियों का भी है। क्योंकि सेवक चीँटियाँ उनको पुनः अपने घर नहीं लातीं न उनकी ओर ध्यानही देती हैं। एक बार चीँटियाँ घरको छोड़ जाती हैं तो वे अवश्यही मर जाती हैं। क्योंकि, उनके पास न पर होता है न भोजन प्राप्तिका यंत्रही होता है।
चीँटियोंके पर—प्राचीन कालके मनुष्य ऐसा अनुमान करते थे कि चीँटियोंको नियत समयपर, पर निकलते हैं। वर्तमान कालके जानवरोंकी विद्याके प्रख्यात विद्वान परह्वेरेके विचारसे जान पड़ा कि, मादाके नियत समय-पर निकलते हैं, उगकर फिर गिर जाते हैं।
बच्चे—चीँटियोंके अण्डे ऐसे छोटे होते हैं कि, उनका नज़्ज़ी आँखोंसे देखना कठिन हो जाता है। दूसरे कीड़ोंके विपरीत चीँटियाँ अण्डे देती हैं उसी समय स्वेच्छापूरवक अपने पर गिरा देती हैं। जो मजदूर चीँटियाँ हैं वे समस्त अण्डोंको एक स्थानपर इकट्ठा करती हैं। जिस समय वे अंडे देतीं हैं उस समय बहुतेरी चाकर चीँटियाँ उनके चारों ओर एकत्रित रहती हैं। वे अण्डोंको एकत्रित करके पृथक् पृथक् मकानकी कोठड़ियोंमें पकनेके लिये सावधानीसे धर-देती हैं और पालती हैं। उनके पकनेके लिये वायुकी आवश्यकता होनेसे दिनके समय चीँटियाँ घरके टीलेके मुँहके समीप रखती जाती हैं। पर ऐसे स्थानोंमें धरती हैं जिसमें कि, सूर्यकी तपन आवश्यकतासे अधिक न होने पावे जितनी गर्मीकी आवश्यकता है उससे अधिक न लगने पावे, जब रात होती है उस समय
मनुष्यकीसी बात
अनुभवो चिटियाँ अण्डोंको उठाकर गरम करके चारों ओर रख देती हैं। जिसमें ऐसा न हो कि, उनकी प्राकृतिक उष्णता उनमेंसे निकल जावे। समस्त दाइयाँ अण्डोंकी रक्षामें बहुतही सचेत रहती हैं। जबतक सारे अण्डोंसे बच्चे नहीं निकल आते तबतक वे सब बराबर सेवामेंही लगी रहती हैं। रातके समय अपने घरके द्वारोंको चारों ओरसे बन्द कर लेती हैं। जिसमें कि किसी ओरसे वायुका प्रवेश न हो, सबेरा होतेही घरके बाहर धूपमें अण्डोंको धर देतीहैं, जिसमें उनको न बहुत धूप लगे न बहुत ठण्डकही सतावे, वे किसी समय कड़ी धूपमें भी धर देती हैं।
बच्चोंका भोजन—जबतक छोटे छोटे बच्चे बाल्यावस्थामें रहते हैं तबतक उनकी दाईं अथवा माता अपने पेटसे एक प्रकारका पतला पतला भोजन निकालकर खिलाया करती हैं। जब वे बच्चे बड़े हो जाते हैं तो वे सब एक प्रकारका झिल्लीदार श्वेतरङ्गका जौके समान सूत कातते हैं जिसको लोग भ्रमवश समझते हैं कि, यह वस्तु चीँटियोंका भोजन है। जो गरमीके समय ठण्डे दिनोंके निमित्त एकत्रित करती हैं
चीँटियोंका भोजन—यह बात भी जानी गई है कि, यूरोपकी चीँटियाँ मांसाहारी हैं। पादरी जेजी उड साहबका कथन है कि, चीँटियाँ शरदीके लिये संग्रह नहीं करतीं बरन जाडेके दिनोंमें वे अचेत होकर सुस्त पड़ी रहा करती हैं। उनके वास्ते भोजनकी आवश्यकता नहीं। इसके अतिरिक्त उस सैन समयमें भोजन पचाना इतना कठिन है कि, जैसे मनुष्यको सूखी घासका पचाना। चीँटियोंका विशेष भोजन चीनी है। जहाँ, कहीं चीनी होती है वहाँ वे अपने सृंघनेके बलकी सहायतासे पहुँच जाती हैं। मिठास वृक्षोंकी जड़ अथवा पुष्प इत्यादिसे मिठास प्राप्त करती हैं। चीँटियाँ इस मिठासको स्वयन् अपनी वस्तु समझती हैं
भोजनपर युद्ध—यदि कोई चीँटी बाधा दे तो उससे बहुत युद्ध होता है। यहाँतक कि, कितनीही चीँटियाँ इस लड़ाईमें मारी जाती हैं।
चीँटियोंके घर—चीँटियोंकी बुद्धिकी कहानियाँ बयानके बाहर ह। चीँटियोंके काम अत्यन्त आश्चर्य्यमें डालनेवाले हैं। मनुष्यकी बुद्धि कुछ काम नहीं करती। चीँटियोंके मकान बड़ीही कारीगरीके साथ बने हुए होते हैं नदीके समीप वे अपने घरोंको बनाती है। लाल श्वेत काले भूरे रङ्गकी चीँटियाँ होती हैं। श्वेत चीँटियोंको दीमक कहते हैं वे नदी किनारे अपने मकान बनाती हैं जिसमें उनको मकान बनानेके लिये पानी शीघ्रही मिल जावे। वह मकान गाव-
नानी कुतिया, डब्बू दूसरा, डब्बू, अन्तर्धामिनी कुतिया
डुम और ऊँचा होता है लकड़ी मिट्टी और पत्तियों आदिसे बना होता है। सहस्रों परिश्रमी मकान बनानेका सामान ढूंढते हुये, इधर उधर घूमा करते हैं। लकड़ियाँ पत्तियाँ लाकर अत्यन्त स्वच्छता पूर्वक मकान बनाते हैं, प्रत्यक्ष देखनेमें तो उनके घरोंमें किसी प्रकारकी कारीगरी नहीं देख पड़ती पर सूक्ष्म दृष्टि के साथ जाँचकर देखनेसे जान पड़ता है कि, बहुत हिकमत तथा गुणके साथ बने हुये हैं। उनपर वैरीका आक्रमण नहीं हो सकता, प्रचण्ड वायु क्षति नहीं पहुँचा सकती, धूपकी तपन नहीं तपा सकती। जब कभी वर्षाकी अधिकतासे उनके घरमें कोई छेद भेद हो जाता है तो, वे अत्यन्त परिश्रम पूर्वक तुरन्तही उसको बन्द कर लेती हैं। मकान इस स्वच्छता तथा निर्मलतासे बनाते हैं कि, मानो बहुत सावधानी तथा परिश्रम किया गया हो। कहीं कोई छेद इत्यादि रहने नहीं देते। वर्षा जल तथा मिट्टी इत्यादि लेकर भली प्रकार गूँधते हैं गूँध गूँधकर बराबर लगाते जाते हैं, सुन्दर मेहराब तथा पील पाये खम्भे बनाते हैं, जिनकी प्रशंसा नहीं कही जाती।
जंगी लड़ाई—चीटियों बहुत क्रोधयुक्त होती हैं, उनमें बहुत भयानक युद्ध हुआ करता है, लड़ते लड़ते इस प्रकार मरती और कटती हैं कि, उनका शिर तथा धड़ पृथक् पृथक् हो जाता है। फिर भी अपने वैरीके साथ जुटी रहा करती हैं। शिर शिरके साथ और धड़ धड़के साथ चिमटे हुयेही मर जाती हैं। इनमें एक अनूठी बात यह है कि, एक जातिकी चींटी दूसरी जातिकी चींटियोंके अण्डे बच्चे पकड़ लाती हैं। उनको पकड़ने जाती हैं तो आक्रमण करके उनको पकड़कर कैंदी बना लाती हैं उनको दास बनाती हैं, वे दास सैन्यके पीछे पीछे चलते हैं अनेकों प्रकारकी सेवा किया करते हैं
चुराने और चुरानेवालोंका रंग—एक विचित्र बात यह है कि, जो डाकू चीटियोंके अण्डे बच्चे पकड़ने जाते हैं उनको पकड़कर अपना दास बनाते हैं वे सब पीतवर्णके होते हैं जिनको लूटकर वे सब चुरा लाते हैं वे सब काले रङ्गकी होती हैं, पीले रङ्गवाले अत्याचारी डाकू जब चलते हैं तब उनके साथ उनकी अरदलीमें बहुतेरी चींटियाँ भी चलती हैं। डाका मारने अथवा धावा करने पर उद्भूत होते हैं दोनों जातियों में घोर युद्ध होता है। हबशी अर्थात् काली चीटियोंपर बहुत कठिनाई उपस्थित होती है। विजयी सैन्य उनके दुर्गोंको ढाह देती हैं उनकी शहर पनाहको गिराकर उनके बच्चोंको पकड़ लेती हैं, विजय-डङ्गा बजाते हुये लौट आती हैं। विजयी सैन्यके लोग दासोंके साथ कुव्यवहार नहीं करते जैसे मनुष्य अपने गुलामोंसे करते हैं, उनके साथ भी ठीक वही सलूक
मोती राम, पठानका कुता
होती हैं उनके रहनेको वैसाही घर मिलता है जैसा कि, उनका स्वामी उनके लिये पसन्द करे । कितनीही अंग्रेजी पुस्तकोंमें चींटियोंकी बुद्धिमानकी अनेक कहानियाँ लिखी हैं । हन्श तथा आमेजनकी चींटियोंकी बहुतसी विचित्र बातें लिखी हैं । लिटरेली और कबरली साहबों की रची पुस्तकोंके देखनेसे चींटियोंके विचित्र कौतुक तथा न्यारी २ लीलाएँ मालूम हो सकती हैं ।
हन्शकी चींटियाँ—जैसा डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहबने अपनी नेचर हिस्ट्रीमें लिखा है । हन्श देशमें चींटियोंके ऐसे बड़े बड़े घर होते हैं कि, जिसको पहले न देखनेवाला कभी अनुमानही नहीं कर सकता है कि, वे ऐसी छोटी चींटियोंकी बनाई होंगी । एक एक टीले पन्द्रह पन्द्रह फीट ऊँचे होते हैं । उन टीलोंके भीतर घर तथा ऊपरी घर आदिक अनेक सुघर घर बने होते हैं । बादशाही महल, तथा रईसोंके अलग और सेवकों तथा दासोंके निमित्त न्यारे न्यारे घर तैयार करती हैं । बादशाह तथा बेगम अपने अपने महलोंमें रहती हैं, चौकीदार तथा द्वारपाल द्वारपर खड़े होकर पहरा चौकी देते हैं । पहरेमें सचेत रहते हैं वैरीसे सामना करनेको सब हथियार बांधकर प्रस्तुत रहते हैं । चींटियाँ बहुत बच्चा जननी हैं जब उनको गर्भ रहता है । तो उनके हिजड़े गुलाबों पर सेवाका समस्त बोझ रहता है । वे गर्भिणी होती हैं तो उनका पेट इतना फुलता है कि, जितना उनका शरीर होता है उससे दो सहस्र गुनेसे अधिक बढ़ जाता है, जब अण्डे देती हैं तो दास रक्षामें तत्पर होते हैं । चौबीस घण्टोंके बीचमें एक चीटी आठ लाख अण्डा देती है । यदि पशु पक्षी और मक्खी इत्यादि उनको चुन चुनकर न खाजाये तो उनकी संख्यासे समस्त पृथिवी भर जावे । वे बड़ी २ चींटियाँ होती हैं वहाँके लोग उन्हें भून भूनकर खाते हैं उनका कबाब बनाते हैं । डाक्टर लाइस्टन् साहब इत्यादि उनकी युक्तियों और गुणोंकी बहुत प्रशंसा किया करते हैं । उनके देखनेसे मनुष्योंकी सारी युक्तियाँ निष्फल जान पड़ती हैं ।
चींटियोंका बादशाह और सुलेमान—मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है चींटियोंके बादशाहने सुलेमान बादशाहको ससैन्य निमंत्रण दिया । चींटियोंके बादशाहका न्याय सुविचार सुलेमान बादशाहके न्यायकी अपेक्षा उत्कृष्ट रहा । चींटियोंका बादशाह सुलेमान शाहके सिंहासन पर चढ़ गया । सुलेमानको यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि, मेरा न्याय तुमसे बढ़कर है । सुलेमानने मान लिया कि ऐ चींटियोंके बादशाह ! वस्तुतः आपका न्याय मुझसे बढ़कर है ।
दीमक—चींटियोंकी अनेक जातियाँ होती हैं । भारतवर्षकी श्वेत चींटियाँ लकड़ियोंको खा जाती हैं । उन्हें दीमक कहते हैं ।
कुताकी योनिमें कर्जी
राजा भोज और चैंटी, काशीके बकरियाकुंडका इतिहास ।
मैंने सुना था कि, सुलेमान शाहके समान राजा भोजभी पशुओंकी बातें समझ सकता था, एक दिन ऐसी घटना हुई कि, राजा भोज भोजन कर रहा था । एक चूरा पृथ्वीपर गिर पड़ा, जिसको एक चैंटी उठा ले चली । आगे एक दूसरी चैंटी मिली । उसने उससे कहा कि यह दाना मुझको दे, तू जाकर दूसरा उठा ला । चैंटीने कहा कि, मैं तुझको क्यों दूँ ? तू आपही जाकर ले आ । उसने कहा कि, मैं तो जातिकी चमारी हूँ, मैं राजाके थालके पास कैसे जा सकती हूँ ? तू ब्राह्मणी है तू जाकर लेआ यह बात जानकर राजा भोज हँसा । रानीने हँसीका कारण पूछा राजाने दोनों चैंटियोंका हाल कहा । रानीने कहा कि, मुझको भी यह विद्या सिखा दो । राजाने कहा कि, यह मुझको आज्ञा नहीं, यदि कहूँगा तो भर जाऊँगा । यद्यपि बहुत कुछ मना किया पर रानीने न माना, राजा विवश हुआ कहा कि, अब मुझको मरनाही पड़ेगा, अच्छा है कि, काशी चलकर बताऊँ क्योंकि, वहाँ मरनेसे मुक्ति प्राप्त होगी । बनारसमें पहुँचा तो देखा कि, एक, बकरी बकरा चरते फिरते हैं । एकस्थान पर एक फूटा कुवाँ था, उसके चहुँओर हरी २ घास उगी थी । बकरीने कहा, कि, मुझको यह हरी घास लादे तो मैं इसे खाऊँ । बकरेने कहा कि, मैं यह कार्य नहीं करूँगा । मैं राजा भोजके समान मूर्ख नहीं हूँ कि, एक स्त्रीके कहनेसे अपना प्राण गवाँ दूँ । बकरा बकरीकी यह बात सुनकर राजा चैतन्य हुआ, अपनी रानीको भली प्रकार डाँटा मारा, यह भी कह दिया कि, यदि तू फिर मुझसे पूछेगी तो मैं तुझको मार डालूँगा रानी चुप हो रही कोई बात नहीं कही । जहाँ पर राजाने बकरा बकरीकी बातें सुनी थी उसका नाम बकरियाकुण्ड है । मैंने उस स्थानको अपनी आँखोंसे देखा है, मैं उस बकरियाकुण्डके समीप छः माससे भी अधिक रहा था प्रत्येक वर्ष बकरियाकुण्डका मेला लगता है । अनेक मसखरे और कामीपुरुष तथा स्त्रियाँ वहाँ एकत्रित होती हैं । यह काशीका प्रसिद्ध मेला है ।
पक्षी ।
अब यहाँ पर एम्. आर एसली साहब और अन्यान्य अंग्रेजी पुस्तकों तथा अपनी बुद्धिके अनुसार पक्षियों की बातें भी लिखता हूँ ।
गिद्धकी—मुदूढ़ तीक्ष्णदृष्टि होती है, यह बहुत ऊँचा उड़ सकता है । इसमें तीन गुण हैं । प्रथम तो इसको देखनेकी शक्ति अत्यन्त तीक्ष्ण होती है । दूसरे इसकी सृंघलनेकी बड़ी शक्ति होती है । तीसरे सुननेके बलसे अपने आखेट पर टूटता है । इसके इन तीनों बलोंको स्वभाव वादियोंनेभी भली प्रकार जाँच कर देख लिया है । गिद्ध तीनों गुणोंसे विभूषित है । इन्हीं तीनों गुणोंद्वारा जान
कुता और संन्यासी
लेता है कि, इसका आखेट कहाँ है ? जहाँ कहीं प्रगट हो वहाँ तो आँखसे देख लेता है । जहाँ कहीं शिकार छिपी हो वहाँ गँधसे पहचान लेता है । उसके कानका बलभी इतना तीक्ष्ण है कि, मरनेके समीप पहुँचे हुये चिल्लाते पशुओंकी आवाज तुरन्तही सुन लेता है, तुरन्तही वहाँ पहुँच जाता है ।
मिश्रीकयरू—गिद्धकी जातियोंमें एक प्रकारका मिश्र देशी कयरू होता है । यह बहुत सुन्दर होता है । यह सारे देशमें पाया जाता है । अङ्गरेजी पुस्तकोंमें पूर्णरूपसे इसका हाल लिखा है, उसे मैं यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ । इसको फिर उनकी सन्तान कहते हैं । मिश्रके प्राचीन निवासी उसको पवित्र जानकर प्रतिष्ठा किया करते थे, अपने कबरोंपर स्मारक चिह्न के भाँति उसकी तसबीर खोदते थे । यह शांतिके साथ शीघ्र गतिते चलता है । हबशी लोग उसकी पूजा करते हैं । अनेक प्रकारके दूसरे रङ्गके गिद्ध भी हैं, पर सबकी बादशाह फिरउनकी संतानही हैं, यह बहुत सुन्दर होती है । उसका शिर तथा उसकी ग्रीवा बहुत चमकदार होती है । नारंगीके रंगके पर शरीर होते हैं ।
गिद्धोंका बादशाह—एक अथवा अधिक आखेटपर बड़ी आनवानसे आपहुँचता है । उस समय समस्त गिद्ध नम्रता तथा प्रतिष्ठा सहित वहाँसे पृथक हो जाते हैं उसके चारों ओर घेरा बाँधकर खड़े रहते हैं । बादशाह भलीप्रकार खाकर सन्तुष्ट हो जाता है, दूर जाकर वृक्ष अथवा पर्वतपर बैठता है तो दूसरे गिद्ध आखेटके पास जाते हैं नहीं तो सब बादशाहके सन्मुख दूर खड़े रहते हैं । जबतक बादशाह भलीप्रकार खाकर परितृप्त न हो जावे तबतक किसी गिद्धकी शक्ति नहीं है कि, आखेटके निकट जायें । सब भी प्रतिष्ठापूर्वक दूर खड़े रहते हैं । यहाँ तक कि, जबतक राजाके घरानेका कोई भी खाता रहेगा समस्त गिद्ध नम्रता पूर्वक दूर खड़े रहेंगे । बादशाहसे कोई असभ्यता नहीं कर सकता । अङ्गरेजी पुस्तकोंमें इनकी बुद्धि तथा समझकी अनेक बातें लिखी हैं । पर मैं विस्तारके भयसे लिखना नहीं चाहता ।
जटायु तथा सम्पाती—दो भाई बड़ी जातिके गिद्ध थे । ये मनुष्यों तथा पशुओंको पकड़के खा जाते थे । उनकी कहानी रामायणमें लिखी है कि, वे दोनों युवा वस्थाके घमण्डमें आये । उनकी इच्छा हुई कि, अब हम चलकर सूर्यको देखें । आकाशको उड़े, सूर्यकी गरमी बढ़ी । जटायु तो पृथिवीपर लौट आया पर सम्पाती अपने घमण्डवश ऊपर चढ़ता गया, सूर्यके अत्यन्त निकट पहुँचा तो उसके पर भस्म हो गये जिससे भूमिपर गिर पड़ा । पीछे एक पर्वतकी कन्दरामें पड़ा रहा, विश्वम्भर उसको वहाँ ही भोजन पहुँचाने लगा ।
विदुषी कुती, बुलहाउण्ड
राजा रावण सीताजीको चुराये लिये जाता था, सीताजी ढाड़े मार मारके रोती हुई राम राम करती जाती थी । जटायुने पहचाना कि, महाराजा रामचन्द्रजीकी स्त्री सीताजीको रावण लिये जाता है, वह दौड़ कर पहुँचा ललकारा कहा कि, दुष्ट रावण ! तू सीता माताको कहाँ लिये जाता है । सावधान खड़ा हो, दोनोंमें महायुद्ध होने लगा । जटायुने रावणको अचेत कर दिया, उसके रथको तोड़ डाला, सीताजीको छीन लिया । रावणने देखा कि, यह बहुत बलिष्ठ वंरी है किसी प्रकार नहीं मरता तो अग्निबाणसे मारा । जटायुके समस्त पर भस्म हो गये, राम २ कहकर वह पृथिवीपर गिर पड़ा तो रावण सीताको रथपर चढ़ा लङ्काको ले गया । रामचन्द्र तथा लक्ष्मणजी सीताको ढूंढते हुये उसी जगह पहुँचे जहाँ कि, जटायु पड़ा हुआ था । रामचन्द्रने पूछा कि तुम्हारी यह क्या दशा है ? जटायुने सारा हाल कहा कि, रावण मेरी ऐसी दशा करके सीताजीको लेगया । रामचन्द्रसे यह बात कहकर जटायु मर गया, रामचन्द्रजी महाराजने जटायुकी किया कर्म अपने हाथोंसे उसी प्रकार किये जैसे अपने प्यारे मित्र अथवा निकटस्थ सम्बन्धीकी किया करते हैं, भगवान् रामकी कृपासे जटायु दिव्यधामको चला गया ।
उक्ताब ।
यह बहुत सुन्दर तथा अत्यन्त बलिष्ठ होता है । यह दक्षिणी अमेरिकामें होता है जिस प्रकार मैंने फिरोजकी सन्तानकी बात लिखी है वैसेही उसकी भी है । यह जब आखेटके ऊपर आता है उस समय सारे मांसभक्षी पक्षी घेरा बांधकर दूर खड़े रहते हैं । जब तक यह राजा मांस खाकर पृथक न हो जाय तब तक कोई भी नीच जातिका मांसाहारी पक्षी आखेटके समीप नहीं जाता, यह भी सुदृढ़ तथा सुन्दर होता है ।
लगलग ।
व्यर्थका द्वेष—जीनबर्ग कालेजके घेरावके भीतर एक घरेला लगलग रहता था उसके निकटके घरके ऊपर एक घोंसला था । उसमें प्रत्येक वर्ष लगलग आया करते थे, अण्डे देकर पालते थे । एक दिन कालेजके लड़केने उस घोंसलेके पास आकर बन्दूक मारी, घोंसलेमें बैठा हुआ लगलग आहत हुआ । क्योंकि इसके बाद वह लगलग कई सप्ताह तक बाहर उड़ता दिखाई न दिया । अपने नियत समयपर दूसरे साथियोंके साथ चल दिया । इसके पीछे वसन्त ऋतुके आरम्भमें एक लगलग कालेजकी छत पर दिखाई दिया, वह परोंको खड़खड़ाता था शायद वह परोंके शब्दसे घरौवे लगलगको बुलाता था । पर घरौवे लगलगने
क्विसरोट जानका, कथन, स्केमेक्सका कुता, अनुचितकी लज्जा, बेंडका लानेवाला
अपने परोंके कतरे जानेके कारण उसकी बुलाहट स्वीकार नहीं की । कुछ, दिनोंके पीछे वह जड़ली लगलग कालेजके आँगनमें आगया, घरेलूको देखनेके लिये अपने पर खड़खड़ाये । घरेला लगलग उसकी अगवानीके लिये चला पर जंगली लगलग अत्यन्त रुष्ट होकर घरेलूके ऊपर दौड़ा । घरके लोगोंने बचाया । पर वह जड़ली सारी गरमीकी ऋतुभर उस घरेलूको कष्ट पहुँचाता तथा आक्रमण करता रहा दूसरे गरमीके मौसममें चार लगलग उसी कालेजके आँगनमें आये, चारोंने एक बारगी ही घरेलू लगलग पर आक्रमण किया । घरेला लगलग इस योग्य नहीं था कि, अकेला अपने वैरियोंका सामना करे, उस घरके रहनेवाले समस्त मुर्गे मुर्गियों और बत्तख इत्यादि घरेलू लगलगकी सहायता करने आये, उसको उसके वैरियोंके हाथसे बचा लिया । सब लोग उस घरेलू लगलगको विशेष सतर्कतासे रखने लगे कि, इस वर्ष वह फिर किसी प्रकारका कष्ट न पावे । पर तीसरे वसन्त ऋतुके आरम्भमें बीससे अधिक लगलग आये, कालेजके आँगनमें पहुँचके किसी मनुष्य अथवा पक्षीकी सहायता पहुँचनेके पूर्व ही उसको मारकर चले गये ।
देखो निबलको सब मारते हैं बलिष्ठको कोई नहीं मारता । लड़केने बन्दूक मारी थी उससे तो बदला ले नहीं सके पर घरेलू लगलगको व्यर्थ ही मार गये ।
घरेलू और बनैलेकी ईर्षा—हम्बर्ग नगरके निकट एक किसान रहता था । उसके पास एक घरेला लगलग था । एक दिन वह जड़लसे एक लगलग लाया अपने घरमें रक्खा । तब वह घरेला उस जड़लीसे बहुत विरोध करने लगा । घरेलूने बनैलेसे ऐसी ईर्षा की कि, उसको मार भगाया । चार मासके पीछे बनैला लगलग चार लगलगों सहित आया घरेलू लगलगको मारकर चला गया ।
लगलगोंका न्याय—फ्रांस देशका एक जर्जाह था । उसने चाहा कि, कहींसे एक लगलग मिल जावे तो अच्छा है । तुर्क लोगोंके लगलगकी प्रतिष्ठा करनेके कारण यह बात असंभव प्रतीत हुई । उसने एक लगलगके घोंसलेके सारे अण्डोंको चुरा लिया । उसके बदले मुर्गेके अण्डे रख दिये । अण्डे फूटे उनसे बच्चे निकले । लगलग स्त्री पुरुष दोनोंको बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि, बच्चे मुर्गेके थे । कुछ दिवसोंके पीछे नर लगलग चला गया, तीन दिनोंके पीछे लगलगोंकी बूहत मण्डली लेकर आया उसके सारे साथी लगलग घेरा बांधकर बैठ गये । वहाँ लगलगोंका बड़ा झुण्ड बैठा, सहस्रों मनुष्य यह कौतुक देखनेको एकत्रित हुये । लगलगी उस सभाके बीचमें बुलाई गई उसकी जाँच होनेके पीछे सब लगलग उस मादापर टूट पड़े, उसको मारकर चले गये ।
डूबनेसे बचानेवाला
लगलगके राजाका न्याय—ऐसीही एक और कहानी है, बर्लीन नगरके निकट एक मनुष्यके धुवोंकशर्म एक लगलगने अपना खोता लगाया। वहाँ पर एक मनुष्य चढ़ गया उस घोंसलेमें एक अण्डा पाकर उठा लाया, उसकी जगह एक राजहंसका अण्डा रख आया। वह लगलग उस दगाबाजीसे अनभिज्ञ था। वह अण्डा जब पका उसमें से बच्चा निकला। नर लगलगने बच्चेके रङ्ग ढङ्गमें विभिन्नता देखी, अपने घोंसलेके चारों ओर चिल्लाता फिरा, अपने खोतेके चारों ओर कई बेर फिरकर अन्तर्धान हो गया, मादा लगलग तीन दिनोंतक उस अजनबी सन्तानकी रक्षा करती रही। चौथे दिन लोगोंने बहुत चिल्लाहट सुनी, देखा कि, उस मकानके समीप खेतमें पाँच सौ लगलग एकत्रित हैं। उनमेंसे एक बीस गजके अन्तर पर खड़ा ऐसा जान पड़ता था, मानो वह अन्यान्य लगलगोंसे बातें कर रहा है। सारे लगलग उसकी बातको ध्यान पूर्वक सुन रहे थे। जब वह बात सुनाकर अलग हुआ फिर दूसरा निकला उसी प्रकार वह भी बातेंकरने लगा—सब उसकी बातोंको सुनते रहे। फिर उसके हटनेपर तीसरा आया, उसी प्रकार अपनी बात कह अलग होकर खड़ा हुआ, इसी प्रकार और कई आते रहे और अपनी २ बात कहकर हट जाया करते थे। इसी प्रकार ग्यारह बजेतक मुकद्दमा होता रहा, बराबर रूपकारी जाँच होती रही। वह मादा लगलग अपने घोंसलेमें बैठी सारी बातें सुन रही थी। इसके पीछे समस्त लगलग भयानक शब्द करते हुए उठे समस्त लगलगोंका अगुवा और मुद्दी लगलग जो जाना जाता था उसने बड़े जोरसे तीन चार बार उस मादा लगलगको मारके घोंसलेके नीचे गिरा दिया। इसके पीछे सारे लगलग उस मादापर टूटे उसको उसकी अजनबी सन्तान सहित मारके नष्ट कर दिया। उस मादा लगलगने न कुछ कहा न अपवाद किया न वह वहाँसे भागी। समस्त लगलगोंने उस जगह घोंसलेका नाम निशान न रहने दिया पीछे सब वहाँसे चले गये। इसके पीछे कोई भी लगलग वहाँ दिखाई न दिया।
अनुमान—अलीमानके लोग ऐसा अनुमान करते हैं कि, लगलग बुरे मनुष्योंके घरके समीप अपना घोंसला नहीं बनाता। यदि किसी घरवालेके निकट घोंसला बनावे वह गृहस्वामी उसको मार डाले तो लोग उसको म्याजिस्ट्रेटके सामने लेजाकर उसके खूनका दावा करते हैं। एक बड़ा अस्पताल सारस तथा लगलगोंके लिये बना हुआ है। इस औषधालयमें रोगी सारस तथा लगलगको रखते हैं, जब वे मर जाते हैं तो उनको गाड़ देते हैं। लोग ऐसा अनुमान करते हैं कि, वे सब मनुष्य हैं। दूरके टापुओंमें रहते हैं। बरबर देश देखनेको
रोटी खरीदनेवाला
लगलगका स्वरूप धारण करके आते हैं वे अपने देशको पलट जाते हैं फिर व मनुष्यके स्वरूपमें हो जाते हैं मिश्री मनुष्य उनको पवित्र पक्षी मानते हैं ।
राजहंस ।
पूर्वोक्त पुस्तकमें राजहंसका हाल लिखा है कि, यह पक्षी अत्यन्त सुन्दर होता है, एक श्वेत तथा दूसरी काली ये उनमें दो जातियाँ हैं । राजहंस ऐसे शीघ्रगामी होते हैं, एक घण्टेमें एकसौ मीलतक उड़ जाते हैं । उथले जलमें तैरते फिरते हैं अथवा बहुतसे इकट्ठे उड़ते फिरते हैं, उनके पङ्खोंकी लेखनी बनाई जाती है । जहाँ वे चरते हैं वहाँ एक चौकीदार खड़ा रहता है जो बड़ी चौकशीसे इधर उधर देखता रहता है । जब कहीं कुछ आपत्ति दीखती है तो तुरंतही अङ्गरेजी बिगुलकी तरह शब्द करता है उसी समय सब सचेत हो बरीसे बच जाते हैं ।
राजहंसिनीकी सावधानी—प्टारफोर्ड नगरकी बात है कि, एक राजहंसिनी अठारह वर्षसे रहती थी, उसने अनेक अण्डे बच्चे दिये थे । उसके पड़ोसी लोग उसे अच्छा मानते थे । वह एक बार अपने चार पाँच अण्डोंपर बँठी थी । बहुत घास फूस जमा करनेमें लगीसी जान पड़ती थी । अपने घोंसलेको ढाई फीट ऊँचा कर लिया उसमें अपने अण्डोंको सुरक्षित रूपसे रक्खा । उसी रात ऐसी वर्षा हुई और इतना जल बढ़ा कि, सब कुछ डूब गया । इस विषयसे समस्त मनुष्य अनभिज्ञ थे, वर्षाका चिह्नभी कहीं नहीं था कि, वे लोग उससे बचनेका प्रबन्ध करते । एक बारही महावेगसे वर्षा हुई, सब कुछ डूब गया । पक्षीने पूर्व-सेही सब प्रबन्ध कर रक्खा था । उसके अण्डे जलसे ऊपर रहकर बच गये । देखो इस पक्षीका भी भविष्यदज्ञान और सावधानी मनुष्यसे कितनी बढ़कर है ।
मयूर ।
एक स्थानपर जहाँ मैं रहता था वो बस्तीसे दूर एक उजाड़ था । मेरी झोपड़ीके ईर्दगिर्द लोग जानवरोंके लिये दाने बिखेर जाते थे वहाँपर छोटे छोटे पशु पक्षी आह्लाद पूर्वक चरा करते थे । एक दिन एक मयूर अपने आनन्दमें मग्न हो डुम पसारने नाच रहा था । उस समय एक मनुष्य छिपकर धीरे धीरे आया । मोरको पकड़ लिया । आगे कहनेसे फिर उसको छोड़ दिया । छोड़ते ही वह उड़कर दूर भागा । उसने अपने सजातियोंको यह समाचार पहुँचाया, उस दिनसे कोई भी मोर वहाँ नहीं आया । बहुतेरे मोर प्रत्येक दिन दाना चुनने आते इस दिनसे समस्त मोरोंने एक एक करके वहाँका आना छोड़ दिया । इस मोरने अपने सजातियोंको सूचित किया कि, उधर न जाओ प्राणाघातका जाल बिछा हुआ है ।
बुद्धिमान् दण्डी गड़रियेका कुता
पेरू ।
सौतेली मांसे कष्ट—एक मादह पेरू जिसको कि, अङ्ग्रेजी भाषामें टर्को कहते हैं मारी गई । उसके बच्चे पल गये थे पर उड़ने योग्य नहीं हुए थे । कुछ दिनों तक उनका पिता उनको पालता रहा । जो कोई मनुष्य उसके घोंसलेके निकट आता तो वह चिल्लाता हुआ शब्द करता था । अन्तमें वह वहाँसे चला गया, दो तीन दिनतक अन्तर्धान रहा । फिर वह दूसरी मादा लेकर आया । इस अवसरमें वे बिचारे बच्चे भूखसे अधमुवे हो गये थे । उनकी सौतेली माँ आई तो उन बच्चोंको अत्यन्त आहत करके वृक्षके नीचे डाल दिया, उनमें दो बच्चे वृक्षकी जड़से लगे पड़े थे । उनमें थोड़ी जान थी । उनको लोगोंने ले जाकर एक स्थानमें पाला । उनके पर और बाल आये उनको स्वतंत्र कर दिया । वे कदापि दूर न जाते वहाँही रहा करते थे । पर दुष्ट सौतेली माता तथा पिताने उन्हें शीघ्रही पहचान लिया । वे उनपर आक्रमण किया करते थे । सौतेली माताके मेलसे उनका पिता भी वंरी हो गया था । वे दोनों तीन दिनतक उनपर बराबर आक्रमण करते रहे । बड़े सबेरे आकर बहुत बल तथा कड़ाईसे उनपर टूटते थे ।
गिनी फाउल ।
अङ्ग्रेजीमें गिनी फाउल नामका एक बड़ी जातिका मुर्ग है । उसकी एक मादा थी उसका नर मर गया । क्योंकि, उसको किसीने मार दिया था । कारण यह कि, वह छोटे-छोटे पक्षियोंकी बहुत हानि किया करता था । एक एक मादा बतख थी उसके कितनेही बच्चे थे । उस बतखको बाजने मार डाला उसके बच्चे अनाथ हो गये । उन अनाथ बच्चोंपर मादा गिनीफाउलने दया करके उनको पालना आरम्भ किया । यहाँतक कि, उनके मृत माता पितामे भी अधिक सावधान रहा करती थी । अत्यन्त आश्चर्यका विषय तो यह है कि, मादा गिनी फाउलने अपने स्वभावको छोड़कर बतखका स्वभाव धारण कर लिया था । बतखके छोटे छोटे बच्चे उसके पीछे पीछे फिरा करते । वह उन्हें एक क्षणके लिये भी पृथक् न किया करती । वे बच्चे अपने घोंसलेमें विश्राम करते तो वह पृथक् होती जब कभी कुत्ते समीप आते अथवा बालक उनको कष्ट देते तो समस्त बतखें चिल्लाने लगतीं, उस समय उनकी धर्ममाता जहाँ कहीं दूर होती वहाँसे दौड़कर शीघ्रही उनके निकट आ पहुँचती । इसी प्रकार उन बच्चोंकी अत्यन्त रक्षा तथा रखवाली किया करती । यद्यपि वह जड़ली चिड़िया थी तो भी यदि कोई लड़का उन बच्चोंके समीप जावे तो उसके पांवपर चोंच मारती थी, जिससे लड़कोंको बहुत भय रहता था । वह अपने धर्मके बच्चोंकी बहुत
हाग साहिब
रक्षा किया करती थी। बतखोंको आदत है कि, सौझके समय कीड़ोंके आखेटके लिये फिरा करते हैं यह बात गिनी फाउलके विरुद्ध है पर इन बच्चोंके लिये उनकी धर्मकी माता उनके साथ फिरा करती थी। बच्चोंके साथ फिरते फिरते थक जाती तो कुछ कालके लिये किसी वृक्षपर बैठ जाती। अपनी दृष्टि प्रत्येक समय बच्चोंपर रखती थी। तनिकसी आपत्तिकी आशङ्का होनेपर चिल्लाती हुई उनके पास आ पहुँचती थी। रात अथवा दिन हो उन बच्चोंसे कदापि अचेत न रहती। ऐसे कितनेही पशु होते हैं जो दूसरेकी सन्तानको अपनी जानकर प्रेम पूर्वक पालते हैं।
बतख ।
नमरुद बादशाहकी बतख—मैंने इबराहीम गुलजार अथवा किसी दूसरी मुसलमानी पुस्तकमें पढ़ा था, नमरुद बादशाहके पास एक बतख थी। वह उसके सारे नगरमें फिरा करती थी, उसको भविष्यका हाल मालूम था। नगरमें जहाँ कहीं चोर देखती पहचानकर तुरन्त ही चिल्लाने लगती। लोग दौड़कर तुरन्त उसको पकड़ लेते। उसकी चोरी अवश्यही प्रमाणित हो जाती। यदि वह चोर, चोर होनेकी बातको अस्वीकार करता तो उसको एक हौजमें डाल देते। उसमें यह गुण था कि, जो चोर उसमें डाला जाता वह शीघ्र ही अपनी चोरी स्वीकार कर लेता।
कौंज ।
दोनोंकी प्रेमाधिक्यसे मृत्यु—पञ्जाब देशके फुल्लोर गाँवके पासके एक गाँवमें कौंजोंका झुण्ड उड़ा जाता था। आखेट करनेवालेने बन्दूक दागी, एक कौंजके परमें छर्रा लगा वह चक्कर खाकर पृथिवीपर गिरपड़ी पर वह चिड़िया शिकारीके बहुत दूँढ़नेपर भी नहीं मिली। वह साधुकी झोपड़ीपर उसके सामने आ गिरी। साधुने चिड़ियाको उठा लिया, अपनी छातीसे लगाकर बहुत रोया और दया की। वह फकीर उसके जख्मी परकी औषध करने लगा, उसकी बहुत सेवा की पर ठीक हो गया अन्तमें वह पक्षी आरोग्य हो गया। आगे वह चिड़िया साधुसे ऐसी हिल गई और प्रेम करने लगी कि, निश्चिदिन उस साधुके साथ ही फिरा करती थी, दूसरे वर्ष कौंजोंका झुण्ड उसी ऋतुमें उस स्थानसे होकर चला। समस्त कौंजोंने शब्द किया। उनका शब्द सुनकर यह भी नीचेसे बोली। ऊपरसे एक कौंज उत्तरा उसके निकट आकर उसके गलेसे अपना गला मिलाकर बहुत चिल्लाने लगा। दोनोंके प्रेमकी अधिकताके कारण दोनोंके प्राण निकल गये। इनके मरने पर साधु बहुत रोया दुःखी हुआ फिर उनको गाड़ दिया।
मारटन साहिब स्यायल डाग, रूप्योंकी सेंभाल
यँ कौँज जा दूर २ देशकी सफर किया करती हैं। जब वे विश्राममें होती हैं तो एक दो चौकीदारकी तरह खड़े पहरे दिया करती हैं, आपत्तिके समय शब्द करते ही अपने बैरियोंसे सचेत हो जाती हैं। ये कौँजे अपना अण्डा पर्वत पर छोड़कर चली आती हैं। उनके संकल्पसे उनका अण्डा पककर बच्चा हो जाता है।
कौवा तथा कुलाग।
कागोंका न्याय—कौवा बहुत चालाक जानवर है, स्काटलेण्ड किम्वा फिरोमें कागोंकी बहुत बड़ी सभा एकत्रित होती है। उस समय ऐसी भीड़ होती है जिससे प्रमाणित होता है कि, वे किसी विशेष अभिप्रायसे वहाँ बुलाये हुए इकट्ठे हुये हैं। उनमें कुछ उच्च श्रेणीके कौवे बहुत गम्भीर और न्यायी दिखाई देते हैं शेषके सारे सावधान तथा चिल्लाते दिखाई देते हैं। एक घण्टेके बाद सब उड़ जाते हैं। जब सब इधर उधर चले जाते हैं तो उस स्थानपर दो एक कौवे मरे पड़े हुये होते हैं।
डाक्टर एडमेन्स मेन साहबका कथन है कि, कौवोंका बड़ा जमाव दो एक दिनोंतक बराबर रहता है। जब तक उनके अभियोगका न्याय न हो जावे तबतक उन लोगोंकी सम बराबर उसी प्रकार रहा करती है। काग चारों ओरसे आकर नियत स्थानपर इकट्ठे हो जाते हैं। जब सब एकत्रित हो जाते हैं तो बहुत चिल्लाहट होती है। कुछ कालके पीछे सारे कौवे एक अथवा दोनों पर आक्रमण करके जानसे मार डालते हैं। जब न्याय हो चुकता है तो समस्त इधर उधर हो अपनी राह लेते हैं।
खरगोशकी शिकार—एक सरायवालेके पास बनैला कौवा था वह जङ्गली कौवे तथा कुत्तेको लेकर आखेट करने जाया करता था, कुत्ता तो झाड़ीमें घुसकर खरगोशको उठाता था, काग बाहर सावधानी किया करता था। खरगोशके झाड़ीके बाहर निकलते ही काग तुरन्त उसको पकड़ लेता था। कुत्ता पीछेसे शीघ्रही आकर कागका सहायक होता था। दोनों मिलकर खरगोशको पकड़ लेते थे। उनसे बचकर कोई भी खरगोश न जाने पाता था।
कुत्तेसे मित्रता—एक कुत्ते तथा कौवेकी मैत्री हो गयी। एक दिन कुत्ता गाड़ीके नीचे दबके आहत हो गया। कौवा कुत्तेकी सेवा किया करता, हड़ियां ले जाकर कुत्तेके सामने धरा करता। काग उसके साथ पला था, दोनोंमें अत्यन्त प्रेम था। जब तक वह अच्छा नहीं हुआ, तब तक बराबर उसकी सेवा करता रहा। एक रात कुत्ता अस्तबलमें बँधा था उस रातको कागने अपने मित्रसे
स्मानियल रोवरकुता, साम नामका कुता
मिलनेके लिये चौंच द्वारा द्वारमें सूरालख कर दिया । उसके इस प्रेमके कारण सारे मनुष्य उससे प्रीति करने लगे ।
मानुषी वाक्—एक दिन एक पथिक विनचेष्टरके बनमें चला जाता था । उसमें उसने एक बहुत अचम्भेका शब्द तथा दुःखभरी आवाज सुनी । जैसे कोई कहता हो कि, ऐ महाशय ! न्याय कीजिये न्याय कीजिये, अन्याय न करिये । पथिक इधर उधर देखने लगा कि, कौन सताया हुआ इस बनमें रो रहा है, यह शब्द कहाँसे आता है । यह सुनकर वह अत्यन्त आश्चर्यान्वित हुआ कि, यहाँ तो किसी मनुष्यका चिन्ह मात्र नहीं है । यहाँ मनुष्यका कष्ट स्वर कैसे सुनाई देता है ? वह शब्द सुनकर पथिक उसी ओर चला जहाँसे कि, वह आवाज आती थी । आगे जाकर देखा तो दो कौवे एक कौवेपर आक्रमण कर रहे थे । दोनों वेगपूर्वक उसको मार रहे थे । एक कौवा अपने कष्टके कारण कह रहा था कि, ऐ महाशय न्याय कीजिये अन्याय न कीजिये । जिसपर अत्याचार किया जाता था वह काग कहीं आसपासका था, एक मनुष्यका पलुवा था । ठीक मनुष्यके स्वरमें कह रहा था । पथिकने वहाँ पहुँचकर सताये हुये कौवेको अत्याचारियोंके हाथसे बचा लिया, कौवे भी सिखानेसे अच्छी तरह बातचीत कर सकते हैं ।
चोर—डाक्टर स्टानली साहबने कहा है कि, एक महाशयके अनेक चांदीके चमचे तथा सामान खो गये थे । खानसामाको कुछ पता लगता नहीं था कि, चोर कौवे हैं । न किसीपर कुछ सन्देह ही था । अन्तमें उसने देखा कि, एक पलुवा कौवा मुंहमें चमचा लिये हुए है । खानसामा दूरसे विचारता रहा । जहाँ वह जड़ली कौवा चमचोंको छिपाकर रखता था, वहाँ छिपकर गया । वह स्थान उसने देख लिया, वहाँ बारह चमचे मिले ।
बगुला ।
बगुला अत्यन्त सावधानीके साथ मछलियोंको पकड़ता है । उसमें बहुत बल होता है । फरोटापूके रहनेवाले तथा कोई २ इङ्गलिलस्थानवासी भी ऐसा अनुमान करते हैं कि, यदि कोई बगुलेके पाँवको अपनी जेबमें रखकर आखेट करने जावे तो कृत्यकार्य हो जायगा, बगुलेके पाँवमें एक प्रकारका तेल है । जिसके कारण मछलियोंको अपनी ओर खींच लेता है विशेषतः बाम नामक मछली विशेषकरके उसकी ओर आकर्षित होती है । बगुलेमें एक विचित्र गुण है कि, वो अपनी छातीमेंसे एक प्रकारका प्रकाश निकालता है यह बहुत तीक्ष्ण होता है । उनके शरीरके अनेक स्थानोंपर पंखे नहीं होती उस स्थानमें वह वस्तु भरी होती है जो मछलियोंको खींचकर अपनी ओर लाती है । बगुलोंके
पूडल डाग
परोंमें भी एक प्रकारका बारूद भरा रहता है। उनका हाल अभी तक अवगत नहीं हुआ कि, किस अभिप्रायमें भरा गया। बगुले दूर दूरका भ्रमण किया करते हैं अपना सफर बहुत ही ठीक करते हैं। उनके चलने फिरनेसे उनकी बुद्धिकी तीक्ष्णता एवं विचारकी पवित्रता चमकती है।
मुर्गों ।
मुर्गाँकी अनेक मुर्गियां होती हैं। सबकी रक्षा और उनके बच्चोंका पालन मुर्ग करता है। यदि उनमें कुचाल दिखाई दे तो उसको दण्ड देता है। इसी पुस्तकका लेखक कहता है कि, एक दिन मैंने देखा कि, एक मुर्ग मुर्गाँको रगेदता फिरता था। उसके मुँहमें एक कीड़ा था। मुर्गने मुर्गाँके शिर पर चोंच तथा ठोकरें मारी जिस कारण उसके मुँहसे कीड़ा गिर पड़ा। उसको उसने छीन लिया एक अन्य दूर खड़ीको जाकर दे दिया। वास्तवमें वह कीड़ा उसी मुर्गाँका था, जिससे उस दूसरी मुर्गाने छीन लिया था। इस कारण उस मुर्गाने जिसपर अत्याचार किया गया था, उसी मुर्गाँका पक्ष करके हकदारका हक दिला दिया। समस्त जीवधारियोंकी अपेक्षा मुर्ग अपने बच्चोंसे अधिक प्रेम करते हैं।
मुरगाबी ।
सलबी साहब कहते हैं कि, सन् १८३५ में एक मुरगाबीने गर्मियोंमें तालाबके किनारे अपना घोंसला बनाया, वह बहुत विशाल तालाब था ऊपरके सोतों द्वारा तालाबको जलकी सहायता मिलती थी। एक बार ऐसी घटना हुई कि, मुरगाबी अपने अण्डोंपर बंठी थी पहले जितना जल था उससे कई इञ्च ऊपर चढ़ आया। जान पड़ा कि, जल अधिक होकर अण्डोंको नष्ट कर देगा। पक्षीको आपत्तिकी सूचना पहलेसेही मिल गई। उससे सचेत होकर तुरन्तही बचनेकी युक्तियोंमें लगी बाटिकाके रक्षकने देखा कि, दोनों पक्षी अत्यन्त संलग्न हैं दूर दूरसे घास फूस लाकर घोंसलेको ऊँचा करते जाते हैं। शीघ्रही उन्होंने अपने खोतेको इतना ऊँचा कर दिया कि, तालाबके किनारेसे अत्यन्त ऊँचा हो गया। उन्होंने उस स्थानसे अपने अण्डोंको उठाकर एक फीट ऊँचे तालाबके किनारे घासमें रख दिया, आधे घण्टेसे भी कममें वह मुरगाबी अपने अण्डोंको ऊपर ले जाकर सुखपूर्वक बैठ गई। पीछे बहुत वर्षा हुई।
उल्लू ।
एमेरिका देशमें एक उल्लू होता है यह बकरियों तथा चौपायोंमें जाकर उनके चिचड़ोंको खाया करता है बकरियोंकी छातीको चूसता है। उसके विषयमें
विविन्नपनिहा कुताकुतिया प्रणदेनेवाला, भविष्य दृष्टि, वर्तमानका ज्ञाता
वहाँके मनुष्य अनेकों प्रकारकी कहानियां कहा करते हैं। वे इस प्रकार विवरण करते हैं कि, उनके मृतक भाइयों तथा सम्बन्धियोंकी आत्मायें उनमें रहा करती हैं उनमें यह भी कहावत है कि, जब श्वेत मनुष्योंके घरके पास शब्द करें तो दुःख तथा शोक हो, यदि वे देशी मनुष्योंके घरके सामने चिल्लावें तो अनेक प्रकारकी आपत्तियां आती हैं।
मछली मार उल्लू—भी होता है वह मछलियोंका आखेट किया करता है। उसका यह नियम है कि, तालाबके किनारेपर जा बैठता है। उसकी आँख बहुत चमकीली तथा भड़कदार होती हैं। मछलियां उसकी आँखोंका प्रकाश देखनेको जलसे बाहर शिर निकालती हैं। उस समय वह उन मछलियोंको झपट्टा मारकर पकड़ लेता है, कदापि जाने नहीं देता। वह इस धोखेसे मछलियोंको पकड़ता है कि, तालाबके किनारे मछलियोंकी ताकमें चुपचाप बैठा रहता है मौका पाकर पकड़ लेता है।
कारभोरेण्ट ।
कारभोरेण्ट एक पक्षी है। चीन देशके मनुष्य इसके द्वारा आखेट किया करते हैं। एक २ मनुष्य दश बारह कारभोरेण्टको लेकर चला जाता है। समुद्रमें नाव जाती है। नावके बाहर उन समस्त पक्षियोंको छोड़ दिया जाता है। वे पानीपर इधर उधर फँल जाते हैं। मछलियां दूँदते फिरते हैं। उनकी तीक्ष्ण दृष्टियोंसे तुरंत जान पड़ता है कि, कहाँ गोता मारे। वे किसी मछलीको तीक्ष्ण चोंच द्वारा पकड़ लेते हैं तो फिर नहीं छोड़ते यदि मछली भारी हो एकके वशमें न आवे तो उसकी सहायता दूसरे सजातीय किया करते हैं उस आखेटको खींचकर अपने स्वामीके पास ले जाते हैं। उस मछलीको नावमें रखकर पुनः आखेटार्थ फिरने लगते हैं। उनमें से कोई भी आखेटमें मुस्ती करे तो उनका स्वामी एक लम्बे बाँसकी लाठी लेकर पानीपर भारता है रुष्ट होकर बोलता है। फिर वे सब अपने २ कार्यमें संलग्न हो जाते हैं। इन पक्षियोंकी शीवाके चारों ओर एक फीता लगा होता है जिसके कारण वे अपने आखेटको निगल नहीं सकते अत्यन्त ध्यान पूर्वक आखेट करते हैं गर्मीमें आखेट नहीं करते पर अक्टूबरसे मई मास तक करते हैं। यह पक्षी बत्तखके बराबर होता है यह बहुत खानेवाला है।
चमगीदड़ ।
रक्त पीनेवाली—दक्षिणी एमेरिकामें एक प्रकारकी चमगीदड़ होती है। जो बड़ी जातिका चमगीदड़ है उसके लगभग ढाई या तीन फीट लम्बे पर होते हैं। उसका यह नियम है कि, जब वह उड़ती और चलती है तो तनिकभी सूचना नहीं मिलती न शब्दही होता है। वह पशु पक्षियोंके शरीरमें इस प्रकार
मास्टिकजातिका कुता मास्टिककी बफादारी,
चपट जाती है कि उनको जान नहीं पड़ता समस्त रक्त चूस लेती है वे निर्जीव हो जाते हैं। जब वह उनका रक्त चूसती है तो अपने परोंमें पड़्डा करती जाती है, जिसमें कि वह जीव नितान्तही अचेत हो जाये। उसके दातोंकी तनिक भी घाव नहीं जान पड़ता। प्रायः घोड़ेकी श्रीवाका रक्त इस प्रकार पी जाती है कि, उसको तनिक भी सुधि नहीं होने पाती। सबेरे देखो तो उनकी गर्दन रक्तसे भरी जान पड़ती है।
गायनाकी चमगिदड़ी—बड़ीही विचित्र होती है। इसका नियम है कि, वह जहां कहीं मनुष्यको सोते पाती है अत्यन्त धीरेसे उसके पाँवके निकट उतरती है। सोनेवालेको तनिक भी सुध नहीं होती अँगूठेमें ऐसा छेद कर देती है कि, सूईकी नोंकसे भी बहुत बारीक होता है। उसी छिद्र द्वारा रक्त पीती है अपने परोंसे पड़्डा करती जाती है जिसमें वह मनुष्य नितान्तही अचेत हो जाये। उसका रक्त पीना अपने परोंसे पड़्डा करनाही मानो उसका मंत्र और जादू है। रक्त पीकर उसका पेट मशकके समान फूल जाता है वह दूर जाकर कँ कर देती है फिर आकर पीने लगती है फिर पेट भर जाता है तो दूर जाकर कँ कर देती है। इसी प्रकार प्रत्येक क्षण वह मनुष्य अचेत होता जाता है। अन्तमें शरीरका समस्त रक्त पी लेती है जिससे वह मनुष्य वहीं मर जाता है। मनुष्यके अँगूठे तथा पशुवोंके कानमें जो बहुत रक्त चलनेका स्थान है वहांही वह लगती है उसमें ऐसी बुद्धि तथा युक्ति है कि, किसीका कुछ वश नहीं चलता। वेदके उपनिषदोंमें लिखा है कि, पहले प्राण मनुष्यके अँगूठेके मार्गसे घुसा था। शायद इस चमगी-दड़ीको वह स्थान मालूम है। उसी मार्ग द्वारा रक्त खींचती है। रक्तके साथ ही प्राण है। रक्त जल है, वायु प्राण है। जब वायु और जल दोनों गये तो जीवित कँसे रह सकता है।
फाखता या पण्डुक।
फीरोजपुर जिलाके मुक्तसर गांवमें साहबू नामका एक मनुष्य रहता था जो जातिका रोड़ा था। एक दिवस वह मेरे पास आया मैंने उसको शिक्षा दी कि, तुम मांस न खाना और मदिरा पीना छोड़ दो, ये बहुत पापकी बात है। उसने कहा कि, मैं खाता पीता तो हूँ पर प्राणबध नहीं करता। क्योंकि, मैंने एक दिन बन्दूकसे दो फाखता मारा, उनको पकाकर खा लिया। उस दिन मुझको स्वप्न हुआ तो मेरे कानोंमें ऐसा शब्द सुनाई देने लगा कि, हम दोनों साधु फाखताके स्वरूपमें इस देशका भ्रमण करने आये यह निर्दयी कसाई हमको मारकर खा गया। जब साहबूरोड़ाने ऐसा स्वप्न देखा तो प्रतिज्ञा की कि,
माउण्ट सेन्ट वर्नर्ड हाथ निउफौण्ड लेण्ड डाग
भविष्यमें कभी किसी जानवरको न मारूँगा उसी समयसे बन्दूक फेंक दी, शिकार न करनेकी शपथ ले ली । फाख्ता बहुत ही निर्दोष पक्षी है ।
नूहको समाचार—इसीने नूह पैगम्बरको पृथिवीके गीले और शुष्क होनेकी बात बताई थी । यों कहते हैं कि इस फाख्ताका यह नियम है कि, जब इसका नर मर जाये तो वह दूसरा नर नहीं करती । यदि मादा मर जाये तो नर अपने लिये दूसरी मादा नहीं ढूँढ़ता । जोड़ मरनेके पीछे कभी सम्भोग नहीं करता । अपनी सारी उम्र अत्यन्त पवित्रताके साथ बिताता है ।
कबूतर ।
कबूतर पवित्र पक्षी है । ये उत्तरीय अमेरिका तथा अन्यान्य देशोंमें अधिकतासे हुआ करते हैं । उनकी अनेक जातियाँ हैं । जब वे उड़ते हैं तो उनकी इतनी अधिकता होती है कि, वे दो सौ मील तक बराबर आकाशको घेर लेते हैं । गिनतीमें दो अरबके निकट होते हैं । ये कबूतर पूर्व कालसे समाचार पहुँचानेवाले पक्षी समझे जाते हैं ।
आना करिञ्जन एक यूनानी शायर कहता है कि, कबूतर पत्र पहुँचाया करते थे ।
प्लेनी—नामक एक मनुष्य जो रुमियोंका बहुत बड़ा नॅचुरलिष्ट था, लिखता है कि, मिटोनिया अर्थात् मोदीना नगरके दुर्गका घेर हुआ था उस समय हेरिटीस डिसमिस प्राविटस्के बीच बराबर पत्रादि पहुँचाया करते थे । यह भी लिखा है कि, सेण्ट टोनीसकी लड़ाईमें कबूतर पत्र तथा समाचार ले आया करते थे ।
हुद् हुद्पर कुरान—कुरानमें लिखा है कि, हुद् हुद् सुलेमान बादशाहका पैगाम पहुँचाया करता था उत्तर भी लाया करता था ।
कप्तान ब्राउन साहबका कथन है कि, चलटरहमके सरायवालेके पास एक कबूतर था उसका बारह वर्षका वय था । उसकी कबूतरी उसको छोड़कर चली गई । उसकी जुदाईसे उसको अत्यन्त दुःख था । उसने नवीन सम्बन्ध नहीं किया । दो वर्ष तक बिना स्त्रीके रहा अन्तमें उसकी अविश्वासिनी स्त्री फिर आई । चाहा कि, मैं अपने नरके साथ रहूँ उसने अनेकों युक्तियाँ कीं कि, मेरा नर मुझसे पहिलेकी तरह प्रेमसे मिले । उसने बहुत हठ किया तो उसने उसको चोंचोंसे मारकर निकाल दिया । एक रातको उसने अपने लिये एक स्थान निश्चित किया तब कबूतर कुछ प्रसन्न हुआ । कबूतरीको अपने साथ रहने दिया वह शीघ्रही मर गई । उसके छोड़ जानेसे उसने ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की थी