कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 918, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरोंमें भी एक प्रकारका बारूद भरा रहता है। उनका हाल अभी तक अवगत नहीं हुआ कि, किस अभिप्रायमें भरा गया। बगुले दूर दूरका भ्रमण किया करते हैं अपना सफर बहुत ही ठीक करते हैं। उनके चलने फिरनेसे उनकी बुद्धिकी तीक्ष्णता एवं विचारकी पवित्रता चमकती है।
मुर्गों ।
मुर्गाँकी अनेक मुर्गियां होती हैं। सबकी रक्षा और उनके बच्चोंका पालन मुर्ग करता है। यदि उनमें कुचाल दिखाई दे तो उसको दण्ड देता है। इसी पुस्तकका लेखक कहता है कि, एक दिन मैंने देखा कि, एक मुर्ग मुर्गाँको रगेदता फिरता था। उसके मुँहमें एक कीड़ा था। मुर्गने मुर्गाँके शिर पर चोंच तथा ठोकरें मारी जिस कारण उसके मुँहसे कीड़ा गिर पड़ा। उसको उसने छीन लिया एक अन्य दूर खड़ीको जाकर दे दिया। वास्तवमें वह कीड़ा उसी मुर्गाँका था, जिससे उस दूसरी मुर्गाने छीन लिया था। इस कारण उस मुर्गाने जिसपर अत्याचार किया गया था, उसी मुर्गाँका पक्ष करके हकदारका हक दिला दिया। समस्त जीवधारियोंकी अपेक्षा मुर्ग अपने बच्चोंसे अधिक प्रेम करते हैं।
मुरगाबी ।
सलबी साहब कहते हैं कि, सन् १८३५ में एक मुरगाबीने गर्मियोंमें तालाबके किनारे अपना घोंसला बनाया, वह बहुत विशाल तालाब था ऊपरके सोतों द्वारा तालाबको जलकी सहायता मिलती थी। एक बार ऐसी घटना हुई कि, मुरगाबी अपने अण्डोंपर बंठी थी पहले जितना जल था उससे कई इञ्च ऊपर चढ़ आया। जान पड़ा कि, जल अधिक होकर अण्डोंको नष्ट कर देगा। पक्षीको आपत्तिकी सूचना पहलेसेही मिल गई। उससे सचेत होकर तुरन्तही बचनेकी युक्तियोंमें लगी बाटिकाके रक्षकने देखा कि, दोनों पक्षी अत्यन्त संलग्न हैं दूर दूरसे घास फूस लाकर घोंसलेको ऊँचा करते जाते हैं। शीघ्रही उन्होंने अपने खोतेको इतना ऊँचा कर दिया कि, तालाबके किनारेसे अत्यन्त ऊँचा हो गया। उन्होंने उस स्थानसे अपने अण्डोंको उठाकर एक फीट ऊँचे तालाबके किनारे घासमें रख दिया, आधे घण्टेसे भी कममें वह मुरगाबी अपने अण्डोंको ऊपर ले जाकर सुखपूर्वक बैठ गई। पीछे बहुत वर्षा हुई।
उल्लू ।
एमेरिका देशमें एक उल्लू होता है यह बकरियों तथा चौपायोंमें जाकर उनके चिचड़ोंको खाया करता है बकरियोंकी छातीको चूसता है। उसके विषयमें