भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तात्पर्य

कह सुलतान सुनो दर्वेशा । जिन्दारूप कौनको भेसा ॥

कहाँसे आये कहाँको जाय । कौन काज हमरे गृह आय ॥

*साखी — कहाँसे आय जिन्दाजी, कहाँको तुम जाय ।

हिन्दू तुर्क एकौ नहीं, मेंहि कह्यो समझाय ॥

सत्य कबीर बचन ।

कह दरवेश सुनो चितलाई । जिन्दारूप सुखदायक भाई ॥

यह बादशाह बड़े राग रङ्गमें डूब रहा था, यहाँलों कि, जब स्त्रियाँ उसके पैर को स्तनोंसे सुहलाने लगतीं थी तब उसको आराम मिलता विषय वासनासे एक बारगीही अंधा हो रहा था । परम सुन्दरी सोलह सहस्र स्त्रियाँ उसके पास थीं । जब कबीर साहबसे वार्तालाप होने लगी तब सत्यगुरुने पूछा कि, बादशाह ! तुम भोग विलासमें पड़े हो मृत्युके उपरान्त तुम्हारी क्या दशा होगी ? बादशाहने उत्तर दिया कि, हम वैकुण्ठको जावेंगे । साहबने पूछा कि, यह सब माल खजाना धन दौलतका क्या होगा ? बादशाहने कहा कि, यह सब कुछ मेरे साथ जावेगा । जिन्दाने बादशाहको एक सुई देकर कहा कि, जब आप वैकुण्ठको चलें तब इस सुईको भी अपने साथ लेते चलें, मैं इसको आपसे वहाँ ले लूंगा । बादशाहने लेकर कहा कि, सहस्रों सुइयों में आपको वहाँ देदूंगा । इतनी बातें हुईं । फिर कबीर साहब तो बिदा हो गये । दरबारका समय हुआ । सब दरबारी उपस्थित हुये सर्वसाधारणने दरबारमें बादशाहके हाथमें सुई देखकर निकटवर्तियोंने पूछा कि, जाँपनाह ! यह सुई क्यों लिये हुये हैं ? बादशाहने उत्तर दिया कि, यह सुई जिन्दा फकीरकी है । उसने कहा है कि, जब तुम वैकुण्ठको चलो तब मेरी सुईको वहाँ लेते जाना मैं इसे लेलूंगा । इस कारण मैंने इसको यहाँ रखलिया है । वहाँ उसको देदूंगा । दरबारियोंने समझाया कि शाहंशाह ! वहाँ तो आपका यह शरीर भी न जावेगा आप सुई कैसे ले जायेंगे । शाहंशाहके मनमें बड़ी चिन्ता हुई कि, जब एक सुई भी मेरे साथ न चलेगी तो इतनी संन्य तथा वीर धन संपत्ति आदि कैसे काम आवेगी ? ये सब मिथ्या है । यह शोचकर बादशाह दुःखसागरमें डुबकियों लगाने लगा, खाना पीना छोड़ दिया । प्रण कर लिया कि, जब फिर मैं जिन्दा फकीरका दर्शन पाऊँगा तभी भोजन इत्यादि करूँगा । फिर कबीर साहबने दर्शन दिया । संसार छुड़ा देनेके

  • 'कहाँसे आये' यह दोहा इन चौपाइयोंके बीचकी बहुतसी चौपाइयोंको छोडकर बादमें आया है । २३ चौपाई और बीचके एक दोहेको छोडकर बादमें यह दोहा आया है ।

गुप्तमुनि

हेतु अनेक शिक्षायें दीं । परन्तु शाहंशाह कुछ दिनोंतक शिक्षाका याद रखके फिर भूल गया । एक दिवस शिकार खेलने गया । शिकारमें एक कबूतर पर अपना बाज छोड़ा । उस बाजने कबूतरको पकड़कर तोड़ डाला । लोग बड़ी प्रशंसा करन लगे कि, बाजने कौसी फुरतीसे कबूतरको पकड़कर तोड़ डाला । इनकी बातें सुनकर बादशाह अत्यंत हर्षित हुआ । इतनेमें फिर कबीर साहब बादशाहके सामने आये । समझाया कि, हे बादशाह ! इसी प्रकार तुमको एक दिवस यमराज पकड़कर तोड़ डालेगा, जैसे कि, बाजने कबूतरको तोड़ा है । सावधान ! यमसे तुम्हारा बल नहीं चलेगा । सैन्य और भंडारा आदि काम नहीं आवेंगे । इतना कहकर कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । बादशाहके मनमें परमेश्वरका भय उत्पन्न हुआ और सत्यगुरुकी शिक्षा हृदयमें बैठ गई । फिर एक दिवस जब कि बादशाह बड़ेही सुख सम्भोगमें अचेत सो रहा था तब आकाशसे आवाजें आने लगीं । उस आकाश बानीने बादशाहको उपदेश दिया कि, “ऐ बादशाह ! तू सचेत हो, क्यों अचेत हो रहा है ?” तब बादशाह आश्चर्यनिवृत्त होकर इधर उधर देखने लगा कि, कौन मुझे शिक्षा देता है ? चारों ओर देखा पर कोई स्वरूप कहीं दिखाई नहीं दिया । तब निस्तब्ध होकर बैठ रहा ।

एक दिवस बादशाह अपने महलमें बैठा था कि, एक मनुष्यको अपनी छतपर फिरते पाया । उससे पूछा, तू कौन है ? मेरी छतपर क्यों फिरता है ? उसने उत्तर दिया कि, मैं $\times$ बूलूच हूँ मेरा ऊँट खोया गया है, दूँदता फिरता हूँ । तब बादशाहने कहा क्या छतपर ऊँट चढ़ सकता है ? तू कैसा बुद्धिहीन है ? तब बूलूचने उत्तर दिया कि, मैं तो मूर्ख नहीं वरन् ऐ बादशाह ! तू बिना बुद्धिका है । कारण यह कि, ऊँटका छतपर फिरना तो सरल है पर यह कठिन है कि, तू जो आशा रखता है कि, मैं बादशाही करता हुआ वैकुण्ठको जाऊँगा यह तो महामूर्खताका काम है । इतना कहकर वह बूलूच तो अन्तर्धान हो गया । बादशाहके मनमें अन्तदिवसकी गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हुई । फिर भी बादशाहको अचेत देखकर एक दिवस कबीर साहबने एक कुत्तेको उत्तेजित किया । वह दौड़कर बादशाहके सन्मुख आया । उसके समस्त शरीरमें घाव थे, जिसमें कि, बहुतसे कीड़े पड़े हुए थे, जो कि, उसके मांसको खाते थे जिससे वह अत्यन्त व्यथित और व्यग्र हो रहा था । जब वह बादशाहकी ओर दौड़कर चला । तब बादशाहकी लौडियोंने बहुत रोका और हटाने लगीं, तथापि उस कुत्तेने एक भी न माना, सुलतानके सामने जा खड़ा हुआ । मनुष्यकी भाषामें यों कहने लगा कि,


$\times$ बूलोचिस्थान देशके रहनेवालेको “बूलूच” कहते हैं ।

“ऐ सुलतान इब्रामहीम अद्वम ! मैं भी किरमान देशका बादशाह था । बहुत आखेट किया करता था । अब तू देख कि, मैं कुत्ता हो गया हूँ । जिन २ जीवोंको मैंने मारा और उनका माँस खाया वे सब जीव मेरा माँस खाते हैं, कीड़े होकर मेरे शरीरसे लगके अपना प्रतिशोध ले रहे हैं । इनसे अब मेरा छुटकारा नहीं हो सकता, अब मैं क्या करूँ । तू आखेट करता है तो तेरी भी यही दशा होगी” इतना कहकर, वह कुत्ता भाग गया । बादशाहके मनमें जीववध करने (आखेट करने) के कारण बड़ी बुरी चिन्ता उत्पन्न हुई, परन्तु थोड़े दिनोंके बाद, फिर भी भूल गया । ‘एक दिन शाहजु चलै शिकारा’ यहाँसे लेकर ‘नहीं वह कुत्ता नहीं दवैशा’ यहाँतक का यह हिन्दी अनुवाद है कि, एक दिवस बादशाह शिकार खेलनेको निकला, शिकारके पीछे अपना घोड़ा डाल दिया । जब अपनी सैन्यसे दूर निकल गया तब उसको बड़ी कड़ी प्यास लगी । उसके सब सेवक बहुत दूर हो गये थे । कहीं जलका चिन्ह न मिला, इस कारण बादशाहने विवश होकर अपना घोड़ा आगे बढ़ाया तो एक वटवृक्ष दिखाई दिया । बादशाह अपना घोड़ा दौड़ाकर इस वृक्षकी छाँहकी ओर चला । जब उस वृक्षकी छाया में पहुँचा, तो क्या देखता है कि, इस वृक्षके नीचे एक विरक्त बैठे है उसके दोनों ओर जलसे भरे दो कोरघडे रखे हैं, उनपर कोरें प्याले रखे हैं । उस महात्माने बादशाहको जल पिलाया । जब वह जल पीकर ठण्ढा हुआ तो क्या देखता है कि, उस महात्माके दोनों ओर दो कुत्ते बँधे हैं और एक भेख (खूँढा) खाली है । उस विरक्तने घी, मैदा, भाँति भाँतिके मेवे तथा मिश्री आदि निकालकर उन दोनों कुत्तोंके सामने मलीदा बनाकर रखवा, परन्तु उन कुत्तोंने वह मलीदा न खाया । वह महात्मा सोटेसे उन कुत्तोंको धमकाने लगा कि, मलीदा खाओ, नहीं तो मैं तुमको दण्ड दूंगा । पर वे कुत्ते मलीदेमें मुंह भी न लगाते थे । बादशाहने कहा कि साई साहब ! ये मलीदा खाना क्या जाने, उनको आप क्यों आँख दिखाते हैं ? फकीरने उत्तर दिया कि, “ऐ बादशाह ! यह बात नहीं; यह दोनों इसलिये यह पदार्थ नहीं खा सकते कि, इन्होंने पूर्वजन्ममें कुछ दान पुण्य नहीं किया है । यदि दान पुण्य करते तो निस्सन्देह खा सकते थे ।” बादशाहने पूछा कि, पूर्वकालमें ये दोनों कौन थे ? सन्तने उत्तर दिया कि ये, दोनों बलख बुखारेके बादशाह थे—(उन दोनोंका नाम भी कहा) तब शाहंशाहने

  • इब्राहीमका पिता कौन था इसके विषयमें पूर्वही लिख चुके हैं कि, सच्चे साधु, अद्वम शाह थे । जिसने सच्चे भक्तोंका दर्शन पाया वो कुत्तेकी योनिमें जावे यह सच्ची श्रद्धाके प्रति-कूल बात है । ऐसी ही बातोंको लेकर बोधसागरके इसी प्रकरण पर भारत पथिक कबीर पन्थी स्वामी युगलानन्दजीने एक टिप्पणी लिखी है कि, “जो शाह इब्राहीम अद्वमके बाप बाबाको-

दत्तात्रेय और कबीर

जाना कि, ये दोनों मेरे बाप तथा दादे हैं । नाम सुनकर बादशाह लज्जित हुआ, फिर पूछा तीसरीमेख किस प्रयोजनसे खाली रक्खी है ? फकीरने उत्तर दिया कि, इस समय जो बादशाह बलख बुखारके सिंहासनपर आसीन है जब वह मरकर कुत्ता होगा तब मैं उसे इस तीसरे मेखसे बाँधूंगा । इस बातको सुनकर बादशाहके मनमें बड़ा शोक हुआ । यदि मुझको मरकर कुत्ताही बनना पड़ेगा तो बादशाही तुच्छ है यदि मुझपर यही विपत्ति आती है तो सब सांसारिक वैभव लेकर क्या करूँगा ? इससे संसारसे घृणा उत्पन्न हुई, दुःखका बादल हृदय पर छा गया और अन्तका सोच हुआ कि, मैं कैसे कुत्ता न बनूँ ? साधुके उपाय बताते ही बादशाहने साधुको पहिचान लिया कि, सब अन्तर्धान हो गये ।

एक दिवस ऐसी घटना हुई कि, एक मनुष्य बादशाही दुर्गके भीतर आगया । सिपाही लोग उसको बाहर निकालने लगे परन्तु वह निकलता नहीं था और कहता था कि, ऐ भाई ! मैं पथिक हूँ, यह सराय है संध्या हो गई है, इस सरायमें रात बिताकर प्रातःकाल मैं यहाँसे विदा हो जाऊँगा । सिपाहियोंने समझाया कि, यह सराय नहीं, यह तो बादशाही दुर्ग है । उसने कहा कि, यह तो दुर्ग नहीं सराय है, मैं पथिक हूँ, इस सरायमें रात बिताकर प्रातःकाल यहाँसे चला जाऊँगा । यद्यपि सिपाही बहुत कुछ समझाते थे पर वह फकीर मानता नहीं था । बारम्बार यह कहता था कि, यह दुर्ग नहीं अवश्यही मुसाफिर खाना है । इस बात पर बड़ा हल्ला मचा, इस अवसरमें बादशाह वहाँ आय-हुँचा पूछा कि, यह कौसा हल्ला है ! सुलतानी सेवकोंने निवेदन किया कि, एक मनुष्य दुर्गके भीतर घुस आया है, यद्यपि उसको रोकते हैं पर यह नहीं मानता ।

बलखका बादशाह लिखा है यह बिलकूल निर्मूल है, क्योंकि, इसके पिता तो परम सन्त थे । यहाँ दोनों कुत्तोंको शाह इब्राहीम अदमके बाप दादे बतलाना बहुत ही भूल है । इससे जाना जाता है कि, इस पुस्तकमें उत्तरोत्तर मिलावट होती चली गई है । एवं मिलावट करनेवाले भी साधारण विचारके ही जान पड़ते हैं । ऐसी ऐसी मिलावट और भूलके कारण कबीर पन्थी साहित्यकी निन्दा होती है किन्तु बुद्धिमानोंको विचार वर्कहीन ही उसे ग्रहण करना चाहिये ।" इस प्रकरणको लेकर उक्त संशोधकजीने यह परिस्फुट कह दिया है कि, जो कबीर पन्थी; ग्रन्थोंमें ऐसी असंगत बातें हों उन्हें साधारण बुद्धिके लोगोंकी मिलावटकी समझनी चाहिये । यह विचार यहीके लिये हो यह बात नहीं । किन्तु सब जगहके लिये हैं । इसी सुलतानबोधमें अगाड़ी चलकर लिखा हुआ मिलता है कि, मेरे पास इसकी कितनी ही प्रतियाँ हैं जिनमें कई तो सौ वर्षसे भी अधिक पुरानी हैं । पुरानी प्रतियोंकी अपेक्षा नवीन प्रतियोंमें इतनी बातें मिलाई हैं कि, वे उससे ढयोढी हो गई हैं । इस सबसे तो यही प्रतीत होता है कि, या तो स्वामी परमानन्दजीने इसे अनुसंधानसे रख दिया है, या वे कुत्ते इब्राहीमके नाना पर नाना होंगे । सर्वथा ही निन्दास्तुतिकी सभी बात विचारणीय हुआ करती हैं । वो ऐसी नहीं होती कि बिना विचारे विश्वासके योग्य हों ।

कहता है कि, यह दुर्ग नहीं, सराय है, मैं इसमें रातभर रहूँगा दुर्गके बाहर नहीं निकलता । यह बात सुनकर बादशाहने प्रश्न किया कि, ऐ पथिक ! इस दुर्गको तू सराय कैसे कहता है ! पथिकने बादशाहसे पूछा कि, इस दुर्गको किसने निर्मित किया था ? बादशाहने अपने नाना अथवा परनानेका नाम बताया । पथिकने पूछा कि, बनानेवालेके उपरान्त फिर कौन रहा ! बादशाहने उत्तर दिया कि, मेरा नाना रहा । मुसाफिरने कहा, फिर कौन रहा ? बादशाहने उत्तर दिया कि, अब मैं हूँ । फिर कहा, तुम्हारे उपरान्त कौन रहेगा ? तब बादशाहने कहा कि मेरा पुत्र रहेगा । तब उस पथिकने कहा कि, बाबा जहाँ ? इतने पथिक आये और चले गये किसीको स्थिरता नहीं हुई वह दुर्ग कैसे ठहरा ? यह तो अवश्यही सराय है । यदि इस सरायमें एक दिवस मैं भी रह जाऊँगा तो आपति क्या है ! यह बात सुनकर बादशाह तथा सब मनुष्योंको चेत हो गया । क्योंकि वास्तवमें यह संसार सराय है और पूर्णतया अस्थिर तथा नाशमान है ।

इस बादशाहका वृत्तान्त अनेक पुस्तकोंमें लिखा है अंग्रेजी पुस्तकोंमें भी मने देखा है । एक पुस्तक अंग्रेजीमें एडिसनके नामकी है उसको मने देखा । उसके नोटमें इसी प्रकार लिखा था कि, जिस प्रकार कबीर साहब पथिक बनकर सरायमें रहे । दुर्गको सराय कहा और बूलूच होकर छत पर फिरे थे । जिस प्रकार लिखा अंग्रेजी पुस्तकोंमें है इसी प्रकार और देशके लोग इस बादशाहका वृत्तान्त लिखते हैं । पर फारस तथा अरबके लोग बहुत कुछ लिखते हैं । फारसी पुस्तकोंमें इनके अनेक किस्से हैं । इनकी फकीरी तथा बादशाहीका सब वृत्तान्त लिखा है, पर वह बात किसीको नहीं मालूम कि, इस बादशाहके गुरु पीर कबीर साहब हैं, कोई नहीं जानता कि, बादशाहका क्या धर्म था । प्रत्यक्षमें लोगोंको यही मालूम है कि, बादशाह मुहम्मदी फकीरोंमें थे, पर थे वो हंस कबीर, कबीर साहबकी दया उत पर हुई । इबराहीम अद्वमका वृत्तान्त अन्यान्य ग्रंथोंमें भी है । जहाँ कहीं जिसने जो बात पढ़ी वह उसकी बात बता सकता है । इस बादशाहके मनमें विश्वास तो भली भाँति जम गया था पर अबतक उसने बादशाही नहीं छोड़ी थी ।

सुलतान इबराहीम अद्वमने कबीर साहबके अनेक कौतुक देखे । अभी-तक उसको संसारसे पूर्णतया घृणा नहीं हुई । एक दिवस कबीर साहब बादशाही दासीका रूप बनकर उसके पलंग पर लेट रहे । वह पलंग फूलोंसे भली-प्रकार सुसज्जित था, उसपर लेटतेही नौंद आगई वह बाँदी अचेत होकर सो गई । जब बादशाह लेटनेको आया तब देखा कि, बाँदी पलंग पर लेटी हुई है ।

कबीर और नारद

उसको देखकर बड़ाही क्रुद्ध हुआ क्रोधमें आकर आज्ञा दी कि, इस लौड़ीको कोड़े मारो । जब कोड़े उसपर पड़ते थे तब वह हँसती थी । बादशाहने पूछा कि, ए बाँदी ! इसका क्या कारण है कि हँसती है ? यह तो रोनेकी जगह है हँसनेकी नहीं । उस लौड़ीने उत्तर दिया कि, मैं इस कारण हँसती हूँ कि, मैं तो केवल एक दो घड़ी इस पलङ्ग पर लेटी होऊँगी, उसके बदले तो मुझपर इतने कोड़े पड़ते हैं पर जो प्रतिदिन इसपर लेटते हैं उसकी क्या दशा होगी ! यह बात सुनकर बादशाहके कान खुल गये उसे ज्ञान हो गया । बादशाहने कहा न तो तू बाँदी है, न स्त्रीही है, तुम तो वही श्रेष्ठ महापुरुष है जिसने कि अनेक बार मुझे शिक्षा दी है । यदि आप वही महापुरुष हों तो आप अपना स्वरूप प्रगट कर दर्शन दीजिये । बादशाहके ऐसे कहते ही कबीर साहबने अपना महातेजो-मय स्वरूप दिखाकर उग्र प्रकाश प्रगट किया । उस समय बादशाहने चरणोंपर गिरके निवेदन किया कि, अब आपकी क्या आज्ञा है ? मैं वही करूँगा । कबीर साहबने कहा कि, मैं अमरलोकसे आया हूँ, जो कोई मेरा कहना मानेगा उसका मैं उद्धार करूँगा कालपुरुषके हाथसे छुड़ाऊँगा । मेरा यही आशय है कि, हे बादशाह ! तू सत्य पुरुषकी भक्तिमें लग जा ।

सत्य कबीर वचन ।

चौ० – तबही शाह भये आधीना । चरण धोय चरणोदक लीना ॥
भाव तुम्हार हम गुरु चीन्हा । मम कारण बहु फेरा कीन्हा ॥
अब साहब कीजे मम काजा । जाते मोहिँ छाड़ैं यमराजा ॥
कहैं कबीर सुनो चितलाई । सुरति निरति करि लेहु समार्ई ॥
सत्यगुरु ध्यान करो सब भाई । गुरु प्रताप अमर घर जाई ॥
यह सुनि शाहतखत तब छाड़ा । प्रगटा ज्ञान हृदय गुण बाढ़ा ॥

साखी – सोला सहस सहेली, तुरी अठारह लकख ॥

साईं तेरे कारने, छोड़ा शहर वलकख ॥

शब्द – सुलताना बलख बुखारेका ।

सब तजके जिन लिया फ़िक्री अल्लः नाम पियारे का ॥

खाते जा मुख लुकमा' उम्दा मिसरी कन्द छुहारेका ।

सो अब खाते रूखा सूखा टुकड़ा शाम सकारेका ॥

जिन तन पहने खासः मलमल तीनटंक नौतारेका ।

सो अब भार उठावन लागे गुदूर सेर दश भारेका ॥

सनकादि और कबीर, कबीरजी और ऋषभ नाथ, कबीर और भुशुण्डि कबीर और राजा जनक

चुन चुन फूलों सेंज बिछाई कलियाँ न्यारी न्यारीका ।
सो अब शयन करें धरतीमें कंकर नहीं बोहारेका ॥
जिनके सङ्ग कटक दल बादल झण्डा न्यारे न्यारेका ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो फक्कड़ हुआ आखाड़े का ॥ सुलताना०

इस बादशाहको कबीर साहबने अनेकों उपदेश दिये । बहुतेरे कौतुक दिखाये (जो भिन्न भिन्न पुस्तकोंमें पाये जाते हैं) बादशाहके मनमें संसारकी बड़ीही घृणा होगई । चाह्ता कि, बादशाहतको छोड़कर कहीं वनमें चला जाऊँ । इस बातका दृढ़ संकल्प उसने कर लिया । उसके आत्मसम्बन्धी अमीर बजीर और सब कर्मचारियोंने इसे घेर लिया समस्त सैन्यमें हल्ला मच गया कि, सुलतान फकीर होता है । जब सभोंने बादशाहको घेर लिया तब वह बड़ाही विवश हुआ । इसी घेर घारमें आधीरात बीत गई । जब आधीरात हुई तब सब मनुष्य और सब चौकीदार अचेत होकर सो रहे । उस समय बादशाहने अच्छा और समझा । नङ्गे पैर बाहर आकर अपनी सैन्य तथा आदमियोंसे दूर निकलके एक बड़े भारी मैदानमें पहुँचा जहाँ कि किसी आदमीका चिह्न भी नहीं था । उधर बादशाहके नौकर चाकर तथा आत्मसम्बन्धीगण जब जागे तब बादशाहको चारों ओर दूढ़ने लगे; पर कहीं पता नहीं लगा । तब निराश हो गये समस्त देशमें हाहाकार और शोक पड़ गया इधर बादशाहको तीन दिन भूखे बीत गये उस समय स्वयम् साहब बादशाहके निमित्त रूखा सूखा टुकड़ा लेकर सामने आये । वही रूखा टुकड़ा बादशाहने तीन दिवसके उपरान्त खाया परमेश्वरको धन्यवाद देकर पक्का फकीर हो गया । इस बादशाहको जब जब कबीर साहब मिलते थे तब तब न्यारे न्यारे स्वरूपोंमें दिखाई देते थे कि, वह और तो क्या पहचान भी नहीं सकता था ।

इसका वृत्तान्त मुसलमानी पुस्तकोंमें स्थान स्थानपर लिखा है । एक पुस्तकमें मैंने देखा था कि, इस बादशाहको पकड़कर लोगोंने एक अमीरकी बागवानी (माली) के काममें लगा दिया । एकवर्ष पर्यन्त आप बागवानी करते रहे । एक दिवस वह अमीर अपनी बाटिका देखने गया तब जैसा बागवानोंका नियम है बागके फल अनार इत्यादि लेकर उन्होंने उस अमीरकी भेंट किये । जब उसने अनारोंका चक्खा तो, सभीको खट्टा पाया । तब उसने कहा कि, कौसा बागवान है कि, मेरे निमित्त सब खट्टे अनारोंको उठा लाया । फकीरी भेषमें बने हुए बादशाहने उत्तर दिया कि मुझको खट्टे मीठेका ज्ञान नहीं है । क्योंकि, मैंने कभी चक्खा नहीं था । अमीरने पूछा कि तू कितने दिवसोंसे

बागवानी करता है । उन्होंने उत्तर दिया कि एक वर्ष हुये । तब अमीर आश्चर्यित हुआ कि यह कौन मनुष्य है कि, जो बरस भरसे बागवानी करता है, परन्तु बागका कोई फल नहीं खाया ऐसा ईमानदार यह कौन है । जब भली-प्रकार जाँच किया लोगोंने पहचाना तो कहा कि यह तो सुलतान इबराहीम अद्वम है । वह अमीर नितान्तही लज्जित हुआ हाथ बाँधकर अपना अपराध क्षमा कराने लगा, पर वे तो हँसकर कहोंके कहों चल दिये ।

एकबार इबराहीम अद्वमका बेटा जो सिंहासनरुद्ध था, रातके समय नदीके किनारे आनन्द विलास कर रहा था, नावें नदीमें चलाई जाती थीं खूब प्रकाश होरहा था, नाच तमाशा तथा ठट्ठा मसखरीमें लोग लगे हुये थे उस समय फकीरीकी अवस्थामें बादशाह इबराहीम अद्वम चले जाते थे । लोगोंने पागल समझकर उनको पकड़ लिया । रातभर ठट्ठा मसखरी करते रहे । जैसे होलीके भड़डवे होते हैं वैसाही ठट्ठा उनके साथ होता रहा, उन्होंने किसी प्रकारका अवरोध नहीं किया । जब प्रातःकाल हुआ सब लोगोंने पहचाना कि, यह तो हजरत हैं । तब बादशाहका जो पुत्र था वह देखकर बड़ा दुःखी होकर कहने लगा कि, पिताजी ! आपने अपनी कैसी बुरी दशा बनाली है, आप पागलोंके समान फिरते हैं । मैं इतना बड़ा बादशाह हूँ कि, जो चाहूँ सो करूँ, समस्त देश मेरे वशमें हैं, आप जो कहें सो मैं करूँ मेरे वशमें सब हैं । इबराहीम अद्वमने अपनी गुदडी सीनेवाली जो सूरई थी नदीमें फँकदी और अपने पुत्रसे कहा कि तू कहता है कि, मैं बड़ा बादशाह हूँ तो मेरी सूरई मँगवादे । शाहजादेने कहा कि, मैं सहस्रों सूरईयाँ मँगवाये देता हूँ । बादशाहने कहा कि, मैं तो अपनीही सूरई लूंगा तब शाहजादेने जाल डलवाए और बहुत ढुँढवाया पर वह सूरई नहीं मिली । तब इबराहीम अद्वमने कहा कि, हे नदी ! तू मेरी सूरई दे । उस समय नदीसे एक मछली वह सूरई मुंहमें लिये उनके पास आई, उनने अपनी सूरई लेली । शाहजादेसे कहा कि, देख, तेरी आज्ञा बढ़कर है, अथवा मेरी, तेरी आज्ञा तेरे देशमात्रमें है । मेरी आज्ञा नदी, पर्वत आदि जड़ चेतन स्थावर जंगम सभी मानते हैं ।

शेख मन्शूर और शिवली ।

जहाँ प्रेम और उसकी दृढ़तापर मर मिटनेवाले इस्लामी सम्भ्यताके सुयोग्य पुरुषोंका प्रसंग आता है तो उनमें शेख मन्शूरका सादर स्मरण हो आता है । अनल हक—‘अहं ब्रह्मास्मि’ का यह दृढ़ विश्वासी था, यद्यपि उस समयके इस्लामी कानूनोंके पंडितोंने ‘मैं खुदा हूँ’ यह कहनेके कारण उन्हें मारने योग्य

कहकर अपना फँसला देदिया था, पर कोई भी न तो इनके सामनेही ठहर सका था एवं न इनकी धारणाही बदल सका था। ये आज कलके रंगेश्वरोंकी तरह अनलहकके भक्त नहीं थे किंतु इनकी यह वानि सच्चे भावोंको लिये हुए थी। कँद हो जाने पर जो२ करामातें इन्होंने दिखाई थीं वह बड़ेसे बड़े सिद्ध पुरुषोंसे किसी प्रकार भी कम नहीं थी। मन्शूरके मुखसे ही नहीं किन्तु प्रत्येक रोमसे अनलहककी ध्वनि निकलती थी। शूली पर चढे पीछे खूनकी बूँदें भी अपने आन 'अनलहक' लिखती चली गईं। जलानेपर धूआँ भी वही बनकर उड़ा, तथा खाक भी नदीमें 'अनलहक' होकर ही बही। ये सिद्ध थे जैसे इन्होंने अपनी सिद्धिके प्रभावसे जैलकी दीवारोंको गिराकर सभी कैदियोंकी एक साथ बेडी काटकर उन्हें भगा दिया था उसी तरह आप भी अलक्ष्य हो जाते किन्तु अलक्ष्य होने पर इन्होंने इसीमें प्रेम और भगवानके नामका बड़ाई देखी इस कारण अपने नश्वर शरीर को शूलीके घाटपर उतार दिया।

जब कभी किसीको कोई प्रेमकी आखिरी मंजिल दिखाता है तो कहता है कि—

“खड़ा मन्शूर शूलीपर पुकारे इश्क बाजोंको है।

इश्के बामका जीना वों जीले जिसका जी चाहें॥

मन्शूर शूलीपर खड़ा हुआ पुकार २ कर कह रहा है कि, यह इश्कके ऊपरका जीना है। जिसमें सामर्थ्य हो वो जीले। किसीने परमात्माको उपालब्ध देते हुए उसीके लिये लिखा है कि—

तोडा है कोहेकनका शर पत्थरोंसे किसने।

मन्शूरको 'अनलहक' किसने कहाके मारा ॥

हे परमात्मन् ! यह तो बता कि, कोहकनका शिर किसने पत्थरोंसे तोडा था तथा यह भी बता कि, किसने मन्शूरके मुखसे 'अनलहक' कहलवाकर मौतके लिये भेजा था।

निर्भयदासजीने भी सच्चे वेदान्ती मन्शूरको बड़े सम्मानके साथ याद किया है कि—

जबतक जिन्दा रहा अनलहक कहता रहा शूलीपर भी कहे बिना नहीं माना क्योंकि, सनमका सच्चा प्यार पाना आसान नहीं है। किसी किसी बीरने तो इनकी फाँसीको किसी और ही रूपमें वर्णन किया है कि—

किया अच्छा जिन्होंने दारपर मन्शूरको खींचा।

कि था मन्शूरका जीना भी मुशकिल राहेदाँ होकर ॥

इनकी एक संप्रदाय इस्लामी समाजमें मौजूद है। इनकी अनेकों वाणी हैं। इनपर भी कबीर साहिबकी पूरी कृपा थी। इन्हें ज्ञान तो यों हुआ कि, कबीर साहिबने इन्हें नामका उपदेश दिया। उन्होंने २० वर्षतक गुफामें बैठकर उसका ध्यान किया, गुफाके बाहिर आतेही लोगोंसे भेट हुई इनके वचन साधारण नहीं कबीर साहब कैसे हैं यही कारण है कि, लोग इनके प्राणोंके ग्राहक बने थे इनमें यह शक्ति थी, कि वैरियोंके आक्रमणके समय अन्तर्धान हो गये। फिर इन्हें कौन ढूंढ सकता था? कौन ऐसा महाबली इस पृथ्वीपर था जो कि उनको पकड़ सकता था। परन्तु वे परमेश्वरकी भी वैसेही इच्छा देखकर स्वयम् उपस्थित हो गये। अपनेको स्वयम् ही हत्यारोंके हाथों पकड़ा दिया। मुसलमानोंने देखा तो पत्थर मारने लगे। उस समय शेख मन्शूर प्रसन्नता पूर्वक सब कठिनाइयोंको सहन कर रहे थे, यहाँ तक कि, ईश्वरेच्छा समझकर आह भी नहीं करते थे। उस समय मुसलमानोंने शेख शिबलीसे कहा कि, तू भी इस पर पत्थर मार। शिबलीने कहा कि, यह तो मेरा गुरुभाई है मैं ऐसा कार्य कभी भी न करूँगा। मुसलमानोंने शिबलीको भी पकड़ लिया बहुत विवश किया कि, तू इस पर अवश्यही पत्थर मार। उन्होंने एक पुष्प लेकर मन्शूरके ऊपर चलाया। जब वह पुष्प लगा तब आप गिर पड़े पुकारने लगे कि हाय मैं मर गया ! हाय मैं मर गया ! मन्शूरकी हाय हाय सुनकर शिबली उनके पास गये। पूछा कि इतने पत्थर आप पर पड़े आपने हाय नहीं की। मेरे एक पुष्पसे ऐसे घायल हुए कि हाय हाय करने लेंगे यह क्या बात है? मन्शूरने कहा कि, हे शिबली ! तुम्हारे एक पुष्पने जितना मुझे घायल किया वैसे पत्थरोंने नहीं किया। क्योंकि तुम भली प्रकार जानते हो कि, मैं कौन हूँ? तुम मेरे गुरुभाई हो। यह बात प्रसिद्ध है। लोग ऐसा गाते भी हैं कि, “शिबलीने फूल मारा। मन्शूर हा पुकारा” मुसलमानोंने जब उनको मारनेके लिये पकड़ लिया उस समय शेख कबीर आ पहुँचे। शेख कबीरको मुसलमानोंने घेर कर कहा कि, आप इसके मारनेकी आज्ञा दीजिये। शेख कबीर मुसलमानोंसे अन्यान्य बातें करते समझा रहे थे। परन्तु मुसलमानोंने मिथ्याही यह बात उडाली कि, शेख कबीरने बध करनेकी आज्ञा देदी है। शेख मन्शूरको पकड़ कर सूली पर चढ़ा दिया। जिस समय शेख मन्शूरको सूली पर चढ़ाया उस समय पृथ्वी कांपने लगी, अँधेरा छा गया और प्रलयके चिह्न दिखाई देने लगे।

कबीरसाहेबकी - रेखता।

मालिन पुकारे हे पिया। हाय हाय साहब तू ने क्या किया।
इक बूँद लज्जत कारने मन्शूर सूली यों दिया।

सबही बराती सज चले हैं व्याह करन उस पीवका ।
पहिरे गुलाबी सेहरा संशय पडा उस जीवका ।
होली तमाशे हो रहे सब देखनेको जायँगे ।
पीयसे रँगौली हो रहो रङ्ग देखिके ललचार्यँगे ।
जल जलकी रोवें माछली बन बनके रोवे बोरवा ।
महलोंकी रोवें वीबियाँ अल्ला इलाही क्या किया ।
कायाके अन्दर खोजले छज्जेमें तेरा जीव है ।
कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुझही में तेरा पीव है ।

जब शेख मन्शूरको सूलीपर चढ़ाया, उस समय आकाश पाताल तथा पृथिवी पर शोक छा गया पर उन्होंने तो अपना मारा जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया । शेख मन्शूरका हाल संसारमें प्रसिद्ध है । तजकिरे मन्शूर नामक किताबमें भी विस्तारके साथ लिखा हुआ ।

गज्जल ।

चढ़ादार पर जब शेख मन्शूर । हुये उस वक्त सूरज चन्द बेनूर ॥
जमीं कौपी व कौपा आसमाँ भी । हुआ तब सारा आलम गमसे मामूर ॥
जमीं रोती व रोता आसमाँथा । बनी आदम मलायक गिरियः मेहूर ॥
उठा हजरत गजन्द आसेब सारा । दिया देह दुनिया पर उडा धूर ॥
यही खूबी है सदगुरु हंस आजिज । रजा रब्बानी तन मन धन हुआ दूर ॥

पश्चिम देशमें कबीर साहबके बहुतेरे शिष्य हैं । और उन देशोंमें कबीर साहब, सैयद अहमद कबीर शेख कबीरके नामसे प्रख्यात हैं। तथा बहुत स्थानोंपर कबीर साहबकी समाधि भी बनी हैं ।

तत्त्वा और जीवा ।

कबीर कसोटीमें लिखा है कि, तत्त्वा और जीवा नामक दो भाई जातिके ब्राह्मण दक्षिणदेश गुजरातमें नर्मदा नदीके किनारेपर रहकर साधुओंकी सेवा करते थे । उन्होंने बटकी एक सूखी लकड़ी ले अपने मकानके आँगनमें गाड़कर यह प्रण किया था कि, जिस साधुके चरणामृतसे इस बटकी सूखी लकड़ी हरी हो जावेगी हम उसीके शिष्य होंगे । चालीस वर्षतक सहस्रों साधुओंके चरण धो धोकर इस बटके सूखे ठूँठपर डालते रहे पर वह हरा नहीं हुआ । इससे उस देशमें साधुओंकी निन्दा तथा अप्रतिष्ठा होने लगी साधुसेवा बन्द हो चली । यह देख साधुओंने विचार किया कि, अब तो कबीर साहबके शरण चलना

चाहिये । उनके बिना, दूसरे किसीमें भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है । कुछ साधु मिलकर दक्षिण देशसे काशीजीमें आये, कबीर साहबके पास जाकर सब वृत्तान्त इस प्रकार निवेदन किया कि, महाराज ! आपके होते हुये साधुओंकी इस प्रकार अप्रतिष्ठा होने लगी, अब कौनसी युक्ति करें ? कबीर साहब बोले कि—

साखी — कबीर, साधु हमारी आ'तमा, हम साधुनकी देह' ॥

साधुनमें यों रम' रहा, जो बादलमें मेंह' ॥

कबीर, साधु हमारी आतमा, हम साधुनके जीव ।

साधुनमें हूं यों रमूँ, ज्यो गोर'समें घी'व ॥

कबीर, साधुनमें हूँ यों रमूँ, ज्यों फूलनमें बा'स

साधु हमारी आत'मा, हम साधुनमें स्वाँस ॥

यह कहकर साधुओंको तो बिदा करके कहा कि, तुम लोग चलो हम पहुँचेंगे । वे साधु लोग बिदा होकर छः मासके उपरान्त वहाँ पहुँचे, जहाँ कि, वह बटका सूखा ठूँठ गड़ा था । वहाँ जाकर देखा तो क्या देखते हैं कि, कबीर साहब पहलेहीसे उस बटके सूखे ठूँठके सामने टहल रहे हैं । उन साधुओंने उन्हें देखकर दण्डवत् प्रणाम किया । उन दोनों भाइयोंने कहा कि, अब तुमलोग कबीर साहबके चरण धोकर चरणामृतको इत वृक्षपर डालो । उन दोनोंने वेंसाही काम किया । जैसेही साहबके चरणका जल उस ठूँठे वृक्षपर पड़ा वैसेही तुरन्त उस ठूँठमें से हरी डाल निकल पड़ी उसी समय वह वृक्ष हराभरा होकर लहलहाने लगा । उससे बहुतसी डालियों फूटकर निकल पड़ीं । वे दोनों भाई सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर शिष्य हो गये । कबीरके सोटीमें इस प्रकरण पर एक दोहा लिखा है कि—

तत्त्वा जीवाको मिल, दक्षिण बीच दयाल ।

सूख ठूँठ हरा किया, ऐसे नजर निहाल ॥

पर उन दोनों ब्राह्मणोंका कार्य सम्पूर्ण कर एवं उनको भली भाँति उपदेश देकर कबीर साहब पुनः काशीको लौट आये ।

दक्षिण देशीय ब्राह्मण जातिका अभिमान कुछ विशेष रखते हैं । इस लिए जब तत्त्वा जीवा ब्राह्मणोंके लडकी लडके विवाह योग्य हुये तब उन्होंने चाहा कि, उनका विवाह करें । उस समय उनके सजातीय कहने लगे कि, तुमने तो कबीर साहबको अपना गुरु बनाया है, हम तुम्हारे साथ सम्बन्ध नहीं करेंगे । वे दोनों ब्राह्मण सत्यगुरुसे आकर निवेदन करने लगे कि, हे सत्यगुरु ! अब हम क्या करें ? हमारे भाई बिरादरीके लोग तो हमसे ऐसा व्यवहार करने लगे कि,

वज्र देशके राजा राजा योग धीर

हमारे साथ सम्बन्ध नहीं किया चाहते हैं। कबीर साहबने, उन दोनोंको समझा कर कहा कि, तुम्हारी जातिवाले तुम्हारे बराबर बैठने योग्य नहीं हैं। अब तुम दोनों भाई आपसमें सम्बन्ध कर लो बेटे बेटीका लेन देन करो। तब उन दोनों भाइयोंने जो सत्यगुरुके आज्ञाकारी थे, आपसमें सम्बन्धका प्रबंध किया। ब्राह्मणोंने देखा कि, वास्तवमें आपसमें सम्बन्ध करने लगे तो अच्छा न होगा, अतएव जातिके समस्त ब्राह्मण खुशामद करने लगे कि, तुम ऐसा काम मत करो, हम तुम्हारे साथ सम्बन्ध करेंगे, वहाँके ब्राह्मण प्रसन्नता पूर्वक बेटे बेटीका लेन देन करने लगे।

वह * बटका सूखा ठंठ जिसको कबीर साहबने हरा किया था उसका वृत्तान्त सुनो कि, वह वृक्ष बहुत बड़ा हुआ बहुत फल गया। गुजरातमें है, कबीर बट कहलाता है। बहुत पवित्र और शुद्ध माना जाता है। प्रत्येक सालके कार्तिक मासमें वहाँ एक बड़ा भारी मेला लगता है, उस वृक्षकी छायामें सुखसे सात सहस्र मनुष्य रह सकते हैं। हस्तामलक भूगोलमें इस कबीर बटका हाल लिखा है। शिक्षा विभागके अंग्रेजी पुस्तकोंमें प्रायः इस कबीर बटकी प्रशंसा लिखी है। सरजान मिलटन नामक, जो अंग्रेजी भाषाका एक बड़ा प्रतिष्ठित कवि हो गया है, उसने भी इस कबीर बटकी बड़ी प्रशंसा की है, उस वृक्षकी बड़ी २ डालियाँ और लटें चारों ओरसे इतनी झूल पड़ी है कि वृक्षकी जड़ पहचानी भी नहीं जाती कि, कौन है। दूर दूर तक उसकी छाया है उसके नीचे बहुत लोग विश्राम लेते हैं। गरमीसे जो लोग जलते चले आते हैं इस वृक्षकी छायामें आकर ठण्डे हो जाते हैं, उनके शरीरसे सब तपन दूर हो जाती है। भेड़ बकरियाँ डाङ्गर डोर चरानेवाले लोग इस वृक्षकी छायामें बड़ा आराम पाते हैं। इस वृक्षसे डाल पात छाता समान चारों ओर छाया कर रहे हैं। वास्तवमें इस वृक्षके देखनेसे परमेश्वरकी मायाका कौतुक दिखाई देता है। यह बड़ाही सुन्दर है। इसका सौन्दर्य आश्चर्यमें डालता है। लोगोंको इस वृक्षसे बड़ा लाभ है। इसका डाढ़ोंमें बड़े रेशे हैं जिस प्रकार अन्यान्य पौधे तथा पशुओंका मांस सड़ जाता है इस वृक्षके डाढ़के रेशे कदापि नहीं सड़ते हैं। इनमें जो बड़ा वृक्ष होता है वह अपनी डाढ़ जब पृथ्वीकी ओर छोड़ता है, तबवे रेशे पहले नरम रहते हैं फिर पृथ्वीसे मिलकर जड़ पकड़ते हुये भली भाँति दूढ़ होकर बड़े वृक्ष हो जाते हैं। हिन्दू लोग इस वृक्षको बहुत चाहते हैं देव करके मानते तथा पूजन करते हैं। उस कबीर बटके समीप दो एक मन्दिर भी बने हैं। ब्राह्मण लोग इस वृक्षके नीचे

  • आज कल उक्त वृक्ष नर्मदाके बीचोबीच पड़ गया है अर्थात् टापूके समान जान पड़ता है। वहाँ उसके दर्शनार्थी लोग नावपर चढ़के जाते हैं। सं. १९०२-ई०

बैठकर पूजा पाठ किया करते हैं । प्रत्येक जाति तथा प्रत्येक मतके मनुष्य इस वृक्षकी छायामें बैठना पसन्द करते हैं । प्रत्येक मनुष्य छज्जेनुमा खेमेके सदृश डालियाँ देखनेको उत्सुक हैं । इस वृक्षके छायामें सूर्य्यकी तपन गरमीके मौसममें बिलकुलही असर नहीं करती । हिन्दुस्तानी फौजेंभी इस वृक्षके नीचे पड़ाव डालती है । नियत ऋतुमें सहस्रों हिन्दू इस वृक्षके नीचे एकत्रित होते हैं । विश्वासियोंकी मनोकामना पूर्ण होती है । अंग्रेज लोग जब उधर आखेटके निमित्त जाते हैं तो कई एक सप्ताहपर्यन्त वहाँ रहते हैं । इस सुन्दर तथा खेमावार वृक्षपर शुक्र, मयूर, पंङ्ङुङुङ इत्यादि सहस्रों प्रकारके पक्षियोंका निवास हुआ करता है लालबन्दर तथा बड़ेडील डौलके अनेक चमगीदङ्ङ इसपर रहते हैं । इससे एकही लाभ नहीं बरन् अनेकों लाभ हैं ; इसका फल बड़ाही सुन्दर तथा स्वादिष्ट होता है । पशु तथा मनुष्य दोनोंही इसको खाकर तृप्त हो जाते हैं, सहस्रों जीवों का प्रतिपालन इसके फलसे होता है, मनुष्य तथा पशु दोनोंको यह वृक्ष बड़ा लाभ पहुँचाता है । पहले तो यह बहुत बड़ा था पर अब कुछ कम हो गया है । दूरसे जो लोग इस कबीर बटके दर्शनके लिये जाते हैं वे इस बटवृक्षके पत्रोंको प्रसादतुल्य मानकर अपने घर लाते हैं । वर्तमान कालमें यह वृक्ष कबीर साहबके कौतुक का एक चिन्ह खड़ा वहाँ मौजूद है । जिस किसीको देखनेका उत्साह हो सो वहाँ जाकर देखकर अपनको कृतकृत्य करले, मैं इसकी विशेष प्रशंसा नहीं करता किन्तु अन्य जातिवाले इसकी विशेष प्रशंसा किया करते हैं । तत्त्वा जावा दोनोंकी हार्दिक आकांक्षाको सत्यगुरुने पूरा किया । जिन जिनने कबीर गुरु पाया वे सत्यगुरुके हंस होकर सत्यगुरुके देशमें विराजमान होगये । उनकी प्रशंसा शेष और शारदा भी नहीं कर सकते फिर मैं क्या चीज हूँ ? ॥

कबीरपन्थके प्रवर्तक महत्त्मा धर्मदासजी ।

कबीर साहब धर्मदासजीकी बड़ी प्रशंसा लिखते हैं । धर्मदास बोधमें इनका पूरा समाचार लिखा हुआ है । इनका वृत्तान्त यह है कि, इनका वैश्यके घर में जन्म हुआ था, बड़े धनाढ्य सेठ थे, नीमावत वैष्णव थे, ठाकुर पूजा किया करते थे, मूर्तिपूजाका बड़ा सामान साथ लिये तीर्थोंमें फिरा करते थे जब तीर्थों में घूमते यथुरा नगरीमें आये तो मूर्ति पूजाके परिपाकके समय वहाँ सत्यगुरुसे साक्षात्कार हुआ ।

धर्मदासजी बड़े आचारी थे अत्यन्त पवित्रता तथा शुद्धतापूर्वक रहा करते थे. अतुल सम्पत्ति होनेपर भी हाथसे रोटी बनाकर खाया करते थे, क्योंकि,

राजा भूपाल

यह स्वयम्पाकी थे, लकड़ियाँ भी धो धोकर जलाया करते, जिस समय धर्म-दासजी (मथुरामें) रसोई बना रहे थे उस समय कबीर साहब जिन्दा फकीरकी, सूरतमें सामने दिखलाई दिये, उसी समय धर्मदासजीने क्या देखा कि, आगमें जो लकड़ियाँ जल रहीं थीं उनमें से बहुतसी चीटियाँ निकल रही हैं। कुछ चीटियाँ जलभी गईं थी, बाकीको जल्दीसे चूल्हेके बाहर निकाल लिया। बड़ा खेद किया कि, इतनी चीटियाँ जल मरें। यहाँ तक कि, खेदवश उस दिन भोजन भी नहीं किया। कबीर साहब बोले कि, हे धर्मदास ! तुम रोज भगवानकी मूर्त्तिकी पूजा करते हो, तुमने उस समय इनसे न पूछ लिया कि, इन लकड़ियोंके भीतर क्या है ? धर्मदासजीने कहा कि, यदि भगवानसे पूछ लेता तो ऐसा पाप क्यों करता ? धर्मदास साहबको अपने पापका बड़ा दुःख हुआ देख कबीर साहबने गुप्त ज्ञान की बातें सुनाई, जिनको सुनकर धर्मदासजी कुछ अनुरागी हुए। पीछे जिन्दा-बाबा मथुरा नगरसे विलुप्त होगये, बनारसमें आ पहुँचे, धर्मदासको बड़ा प्रेम उत्पन्न हुआ, मथुरा नगरमें बहुत खोजा परन्तु न पाया। जब सत्यगुरुको न पाया तब मनमें बड़ी बिथा उपस्थित हुई कि, अब जिन्दा फकीरको कहाँ ढूँढ़ूं ? इसी सोचमें सत्यगुरुको स्थान स्थानपर ढूँढ़ने लगे, भण्डारे करने लगे, बहुत साधुओंको बुला बुलाकर भोजन देने लगे; इस ध्यानसे कि, हमारे भण्डारेमें दूसरे साधुओंके साथ जिन्दा बाबा भी आ जावें। बहुतही युक्तियाँ की तो भी जिन्दा बाबाका दर्शन नहीं हुआ, नगर नगरमें ढूँढ़ते फिरे कि, किसी प्रकार भी जिन्दा फकीरकी खबर मिले पर कहीं पता नहीं लगा। इसी प्रकार ढूँढ़ते २ बनारसमें पहुँचे तो देखा कि, एक स्थानपर कबीर साहब खड़े बक्तूता दे रहे हैं। चारों तरफसे बड़ी भीड़ खड़ी २ सुन रही है। तब उस भीड़को चीरकर धर्मदासजी भीतर घुसे। देखा तो कबीर साहब खड़े लोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, पर बनारसमें कबीर साहबका जिन्दा भेषके स्थानमें वैष्णव भेष था। कण्ठी, तिलक, माला, जनेऊ और धोती इत्यादि देखकर धर्मदासको मनमें कुछ सन्देह उत्पन्न हुआ परन्तु पहचान लिया कि, यह वही जिन्दा बाबा हैं; जिसके कि, प्रेममें मैं पागलके समान हो रहा हूँ। सत्यगुरुको पहचानकर चरणोंपर गिर पड़े कहा कि, हे सत्यगुरु ! मुझको आप अपने शरणमें लीजिये कबीर साहबने कहा कि हे धर्मदास ! तुम बड़े भाग्यवान् हो कि, तुमने मुझको पहचान लिया। अब मैं तुम्हारे जनम मरणका दुःख दूर करूँगा। पश्चात् धर्मदासजी सद्गुरुको अपने मकानपर बांधो गढ़ लेगये।

सद्गुरुने विधि पूर्वक चौका आरती करके दीक्षा दिया, उस, समय धर्म-दासजीके पास छप्पन करोड़ रुपया था। वह सब सद्गुरुके भेंट किया। सद्गुरुने वह सब रुपया भूँखे, नंगे, लूले, अंधे, गरीब तथा सन्त साधुओंमें लुटा दिया।

पीछे धर्मदास साहबने वैराग्य लिया । सद्गुरुके उपदेशको धारण कर परंधामको पहुँचे, उनके वंशको साहबने गुरुवाई प्रदान की, जो बयालीश वंशके नामसे प्रसिद्ध है; ये ही वर्तमान कबीरपंथके प्रवर्तक हैं । कबीरपंथी अपनी अपनी आजकी नूतन कृतियोंको भी प्रायः उन्हींके नामपर बनाते हैं यह उनके नामकी महिमा है ।

कबीर साहिब तथा धर्मदासजीमें सदा धार्मिक संवाद ही हुआ करते थे । सद्गुरु धर्मदाससे खुली बातें करते थे । अणुमात्र भी अपने स्वरूपको नहीं छिपाते थे । यहां उनकी बात चीतोंकी साखी रखता हूं ।

साखी — हम साहब सत्यरुष हैं, यह सब रूप हमार ।

जिन्द कहे धरमदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥

सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूं सब जात अजात ।

गरीब दास जिन्दा कहे, मेरे दिवस न रात ॥

बोले जिन्द कबीर जी, सुनु वाणी धरमदास ।

हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकाश ॥

गरुड़बोध बेदी रची, राम कृष्ण हैरान ।

लंकापर धाये जबे, तब का करूँ बखान ॥

दुर्वासा मुनि इन्द्रका, हुआ ज्ञान संवाद ।

दत्त तत्त्वमें मिल गये, जा घर वेद न बाद ॥

गरीब-सिख बन्दी सद्गुरु सही, चकवै ज्ञानअमान ।

शीश कटा मन्सूरका, फेरि दिया जिव दान ॥

धर्मदासजीकी तरह गरीबदासजी भी सद्गुरुके चरणोंके दासही रहे हैं ।

उनकी श्रद्धाको सूचित करनेवाले कुछ पद्य उद्धृत करता हूं —

सर्वांगकी साखी ।

गरीब-नामोंको सद्गुरु मिले, देवल देता फेर ।

पण्डा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेर ॥

गरीब-रबिदास रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त ।

चलत बार पाये नहीं, धन्य सद्गुरु भगवन्त ॥

संगतअङ्गकी साखी

गरी-ऐसी सङ्गति जो मिली, भक्ति गही प्रह्लाद ।

नारदसे सद्गुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥

धर्मदास साहबके खास मुख वचन मंगल धेला ।

प्रगट होनेकी-साखी ।

प्रगट हंस उबारने, मनमें कियो विचार ।
जेठ मास बरसातमें, पगधारे चँदबार ॥
चहुँ दिशि दमके दामिनी, श्वेत भँवर गुञ्जार ।
तहवौ आप विराजिहैं, जल पर सेज सँवार ॥
बालक कोठिन ठाठके, निकट सरोवर तीर ।
सुर नर मुनि जन हरषिया, साहब धन्यो शरीर ॥
चंदन साहुकी स्त्री, स्नान करन को जाय ।
सुन्दर बालक देखिके, कर गहि लियो उठाय ॥
प्रेम प्रीति करले चली, हँसत खेलत घर आय ।
चन्दन देखि रिसावई, तुम बालक कहाँ पाय ॥
बालक मोहि कर्ता दियो, सुनो साहु सतभाउ ।
यह बालक प्रतिपालिहैं, चलै तुम्हारो नाँउ ॥
डार डार यह बालक, मानो बचन हमार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करें, हँसि मारे परिवार ॥
यह बेश्याका बालका, सो तू लाई नार ।
लोग कुटुम्ब सब देखी हैं, तुमको देही बडार ॥
दासी हाथ बालक दियो, जलमें दीन्हों डार ।
देह धरे दुख पायो मैं, चेतो मूढ गँवार ॥
नीरू नाम जुलाहा, गमन किये घर आय ।
तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥
नीरू देखि रिसावही, बालक दे तू डार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करे, हँसि मारे परिवार ॥
जब साहब होँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति संदेश सुनाइहौं, मैं आयों यहि काम ॥
पूर्व जन्म तुम ब्रह्म ना, सुरति बिसारी मोहि ।
पिछिली प्रीति के कारने, दर्शन दीनों तोहि ॥
कर गहि वेग उठाइयाँ, लीन्हो कण्ठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ दरशिया, रङ्ग महाधन पाय ॥
भाव भक्ति करि ले चले, काशी नगर मझार ।
धन्य, भाग्य उस देशका, सद्गुरु जहाँ पगधार ॥

राजा अमरसिंह

अन्न पानि नहिं ग्रासहीं, दिन दिन बाढे अङ्ग ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, चडे, सवाया रङ्ग ॥
महादेव तेहि अवसर, जात रहे कैलास ।
नीमा पग धरि बूझही, पूजी मनकी आश ॥
तू नीमा बड भागिनी, पूर्व जन्म तप कीन्ह ।
तोरें घर प्रभु आइया, हँसि प्रभु दर्शन दीन्ह ॥
अक्षय वृक्ष फल पायके, सुख सम्पत्ति परिवार ।
दे भाँवर बर पूजले, गावें मङ्गल चार, ॥
धरमदास बर पावल, आपन रह्यो निनार ।
साहब कबीर जूको मङ्गल, गावें सुरति सम्हार ॥

तात्पर्य — जब कबीर साहब पहले चँदबारेमें प्रगट हुए थे जिसका कि, विवरण में पहिले कर आया हूँ, उस समय पहले कबीर साहब चन्दन साहूकार की स्त्रीको मिलें उस स्त्रीके भी कोई सन्तान नहीं थी । तब चन्दन साहूकारने अपनी दासीके हाथोंसे फिर उसी तालाबमें फिकवा दिया । उसके पीछे लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिले जैसा कि, अनुरागसागरमें दिखा है । इसके बाद नीमा और नीरू जुलाहेके घर आये । उस समय शिवजी महाराज कैलाशको जाते थे, वे नीमाके समीप जाकर कहने लगे—ऐ नीमा ! तू धन्य है ! बड़ी भाग्यवती है कि, स्वयम् साहब तेरे घर आये ।

यह सब वार्ता धर्मदास साहब और रामानन्द स्वामी इत्यादि सभी हंस लोग कहते चले आ रहे हैं यही बात गरीबदासजीने भी कही है; वे सब सर्वज्ञता के बलसे कहते आते हैं । ये बातें देखने तथा पढ़ने सुननेकी नहीं हैं । कबीर साहब जब जैसे काशीके लहर तालाबमें प्रगट हुए थे उसी तरह चँदबारेके तालाबमें तथा नरहर ब्राह्मण और लक्ष्मणा ब्राह्मणीके घर गये । चँदबारे तालाबकी वही शोभा थी जो काशीके लहर तालाबकी थी । इसी प्रकार कबीर साहब नरहर ब्राह्मणके घरमें जाकर रहे ।

महाराजा वीरसिंह ।

पृ. ३०० में लिख चुके हैं कि, कबीर साहबकी अन्त्येष्टि किया हिन्दू-रीतिके अनुसार करनेके लिये वीर सिंहजी वधेले मगहरके पठानसे लडने पहुँचे थे उन्हें कैसे बोध हुआ इस विषयपर वीरसिंह बोध एक ग्रन्थ है जो कबीर सागर नं० ४ बोधसागरमें सामिल है, उसके कुछ-बचनोंको वहीं उद्धृत करते हैं —

धर्मदास वचन ।

चौ० – धर्म दास पूछै 'अर्थार्ई । साहब मोहिं कहो समुझाई ॥
वीरसिंह राय कीन्ह तुम' सेवा । दयाकरी' कहिये गुखदेवा ।
वीरसिंह देव बड ज्ञानी' । कैसे साहब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करी कहिये सुखधामी' ॥

सद्गुरुवचन ।

धर्मदास भल वृक्षेउ वात्प । तुमसे वरणि कहो विख्याता ॥
तनमन धनको मोह न लावै' । सो' जिव हमरे संग सिध्दावै ॥
प्रथमहि चलै भक्त पहुँजाई' । सकल सन्त जहँ भक्ति कराई ॥
नामदेव भक्तिहि' मन लावा । सैन' औ धना जाट तहँ आवा ॥
रंका' बंका' सदन कसाई । पद्मावति' दीपक तहँ लाई ॥
छूटे' तान चंदेवा दीन्हा । ठाढ़े भगत तहँ गावन लीन्हा ॥
नामदेव लोटन कर' भाई । हात ताल रविदास' बजाई ॥
धना मृदङ्ग पद्म' उँजियारा । जुड़े सन्त सब भगत अपारा ॥
धर्मदास तहँवों हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कहेऊ ।
तब हम एक वचन कहि लीना । सकल भगतकाको मन दीना ॥
नामदेव केहि पूर्णहि ध्यावो । भक्ति करो काको मन लावो ॥

नामदेव वचन ।

नामदेव कह सन्त भुलाये । दूजा पुरुष कहाँ ठहराये ॥
हरिहर ब्रह्मा है बड़ देवा । करे सकल जग तिनकी सेवा ॥
यह प्रभु आदि मध्य औ अन्ता । शीश मुड़ाय जीव कहे सन्ता ।

सद्गुरु वचन ।

हरि ब्रह्मा शिव शक्ति जपाई । इनकी उत्तपति कहों बुझाई ।
बिना भेद भूले सब ज्ञानी । ताते काल बाँधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश दुहेला । सो वहि कहिये पर्मे सुहेला ॥
ताका मर्म सिद्ध नहीं जाना । कृत्रिम करता ते मन माना ॥

साखी – कृत्रिम रङ्ग सब भेदिया, वह पुरुष नीनार ॥
तीनलोक पर अलख है, पुरुष ताहिके पार ॥


१ चितलाई, २ किमिकीनी, ३ करिके दया, ४ बडा अभिमानी, ५ बहुनामी, ६ अरु, ७ जो, ८ गयऊ, ९ करन, १० सेना, ११ राका, १२ बाका, १३ पद्मावती, १४ ले, १५ चौहटे १६ सब । यह पाठ भेद हैं । १७ करे, १८ रैदास, १९ पद, ऐसा अनेक जगह पाठ भेद तथा उलटा पलटा है पाठक समन्वयके साथ पढ़ें ।

चौ० – बीरसिंह देव बघेला राजा । बैठे आनि महल चढ़ि छाजा ॥
राजा नजर सबनपै कीन्हा । सब बडे भाव भक्ति चित दीन्हा ॥
गावैं भक्त अनन्त व्यवहारा । एक भक्त कस बैठा न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीन्है । माला तिलक कूवरी लीहे ॥
श्वेत स्वरूप भक्तिकी काया । महा अनन्द रूप छबि छाया ॥

राजाबीरसिंह वचन ।

राजा छरीदार हँकराई । नामदेव कहैं आनि बुलाई ॥
वेगसो छरीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन ।

नामदेव पूंछे चितलाई । राव सँग कोई और हे भाई ॥
छरीदार पुनि वचन सुनाइ । कोई नहिं रावके भाई ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लियऊ । चलै चले राजापै गयऊ ॥
राजा देख ठाढ़ तब भयऊ । कर गहिंके आशन बैठयऊ ॥

राजाबीरसिंह वचन ।

सा० – भक्ति करो गोविन्दकी, एक चित ध्यान लगाय ॥
श्वेत स्वरूपी भक्त यक, सो कस न्यार रहाय ॥

भावारथ—कबीर साहिब धर्मदासजीसे कह रहे हैं कि, एकवार नामदेव लोटन, रबिदास आदि हरिकीर्तन करते हुए ज्ञानचर्चा कर रहे थे, महाराज वीर सिंहजी भी ऊपर बैठे सुन रहे थे कि, मैं भी वहाँ पहुँच गया पर मैं सबसे अलग बैठा हुआ था इसी पर राजाको सन्देह हुआ था, इसी संदेहको मिटानेके लिये राजा ने छड़ीदारके हाथ नामदेवजीको बुलाया एवं यही प्रश्न किया ।

नामदेव वचन ।

चौ० – राजा सुनहु वचन एक मोरा । हम तुम हरिहर ब्रह्मा दोरा ॥
ता हरि भक्ति करै बहु धासी । कहे एक पुरुष और अविनासी ॥
माला भेष ले साधु शरीरा । डीरा जोलाहा दास कबीरा ॥
कृत्रिम कहे सकल सब देवा । कहीं सौंच नहिं देखूं सेवा ॥
ऐसे कहत कबीर जुलाहा । झूठ दिबाना मन हम आहा ॥

साखी – जुलाहा निन्दत सबनको, बन्दत कोही नाहिं ।
झूठ कहत हर ब्रह्मा, कह निर्गुण यक आहिं ॥