कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 609, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबैठकर पूजा पाठ किया करते हैं । प्रत्येक जाति तथा प्रत्येक मतके मनुष्य इस वृक्षकी छायामें बैठना पसन्द करते हैं । प्रत्येक मनुष्य छज्जेनुमा खेमेके सदृश डालियाँ देखनेको उत्सुक हैं । इस वृक्षके छायामें सूर्य्यकी तपन गरमीके मौसममें बिलकुलही असर नहीं करती । हिन्दुस्तानी फौजेंभी इस वृक्षके नीचे पड़ाव डालती है । नियत ऋतुमें सहस्रों हिन्दू इस वृक्षके नीचे एकत्रित होते हैं । विश्वासियोंकी मनोकामना पूर्ण होती है । अंग्रेज लोग जब उधर आखेटके निमित्त जाते हैं तो कई एक सप्ताहपर्यन्त वहाँ रहते हैं । इस सुन्दर तथा खेमावार वृक्षपर शुक्र, मयूर, पंङ्ङुङुङ इत्यादि सहस्रों प्रकारके पक्षियोंका निवास हुआ करता है लालबन्दर तथा बड़ेडील डौलके अनेक चमगीदङ्ङ इसपर रहते हैं । इससे एकही लाभ नहीं बरन् अनेकों लाभ हैं ; इसका फल बड़ाही सुन्दर तथा स्वादिष्ट होता है । पशु तथा मनुष्य दोनोंही इसको खाकर तृप्त हो जाते हैं, सहस्रों जीवों का प्रतिपालन इसके फलसे होता है, मनुष्य तथा पशु दोनोंको यह वृक्ष बड़ा लाभ पहुँचाता है । पहले तो यह बहुत बड़ा था पर अब कुछ कम हो गया है । दूरसे जो लोग इस कबीर बटके दर्शनके लिये जाते हैं वे इस बटवृक्षके पत्रोंको प्रसादतुल्य मानकर अपने घर लाते हैं । वर्तमान कालमें यह वृक्ष कबीर साहबके कौतुक का एक चिन्ह खड़ा वहाँ मौजूद है । जिस किसीको देखनेका उत्साह हो सो वहाँ जाकर देखकर अपनको कृतकृत्य करले, मैं इसकी विशेष प्रशंसा नहीं करता किन्तु अन्य जातिवाले इसकी विशेष प्रशंसा किया करते हैं । तत्त्वा जावा दोनोंकी हार्दिक आकांक्षाको सत्यगुरुने पूरा किया । जिन जिनने कबीर गुरु पाया वे सत्यगुरुके हंस होकर सत्यगुरुके देशमें विराजमान होगये । उनकी प्रशंसा शेष और शारदा भी नहीं कर सकते फिर मैं क्या चीज हूँ ? ॥
कबीरपन्थके प्रवर्तक महत्त्मा धर्मदासजी ।
कबीर साहब धर्मदासजीकी बड़ी प्रशंसा लिखते हैं । धर्मदास बोधमें इनका पूरा समाचार लिखा हुआ है । इनका वृत्तान्त यह है कि, इनका वैश्यके घर में जन्म हुआ था, बड़े धनाढ्य सेठ थे, नीमावत वैष्णव थे, ठाकुर पूजा किया करते थे, मूर्तिपूजाका बड़ा सामान साथ लिये तीर्थोंमें फिरा करते थे जब तीर्थों में घूमते यथुरा नगरीमें आये तो मूर्ति पूजाके परिपाकके समय वहाँ सत्यगुरुसे साक्षात्कार हुआ ।
धर्मदासजी बड़े आचारी थे अत्यन्त पवित्रता तथा शुद्धतापूर्वक रहा करते थे. अतुल सम्पत्ति होनेपर भी हाथसे रोटी बनाकर खाया करते थे, क्योंकि,