कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 610, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह स्वयम्पाकी थे, लकड़ियाँ भी धो धोकर जलाया करते, जिस समय धर्म-दासजी (मथुरामें) रसोई बना रहे थे उस समय कबीर साहब जिन्दा फकीरकी, सूरतमें सामने दिखलाई दिये, उसी समय धर्मदासजीने क्या देखा कि, आगमें जो लकड़ियाँ जल रहीं थीं उनमें से बहुतसी चीटियाँ निकल रही हैं। कुछ चीटियाँ जलभी गईं थी, बाकीको जल्दीसे चूल्हेके बाहर निकाल लिया। बड़ा खेद किया कि, इतनी चीटियाँ जल मरें। यहाँ तक कि, खेदवश उस दिन भोजन भी नहीं किया। कबीर साहब बोले कि, हे धर्मदास ! तुम रोज भगवानकी मूर्त्तिकी पूजा करते हो, तुमने उस समय इनसे न पूछ लिया कि, इन लकड़ियोंके भीतर क्या है ? धर्मदासजीने कहा कि, यदि भगवानसे पूछ लेता तो ऐसा पाप क्यों करता ? धर्मदास साहबको अपने पापका बड़ा दुःख हुआ देख कबीर साहबने गुप्त ज्ञान की बातें सुनाई, जिनको सुनकर धर्मदासजी कुछ अनुरागी हुए। पीछे जिन्दा-बाबा मथुरा नगरसे विलुप्त होगये, बनारसमें आ पहुँचे, धर्मदासको बड़ा प्रेम उत्पन्न हुआ, मथुरा नगरमें बहुत खोजा परन्तु न पाया। जब सत्यगुरुको न पाया तब मनमें बड़ी बिथा उपस्थित हुई कि, अब जिन्दा फकीरको कहाँ ढूँढ़ूं ? इसी सोचमें सत्यगुरुको स्थान स्थानपर ढूँढ़ने लगे, भण्डारे करने लगे, बहुत साधुओंको बुला बुलाकर भोजन देने लगे; इस ध्यानसे कि, हमारे भण्डारेमें दूसरे साधुओंके साथ जिन्दा बाबा भी आ जावें। बहुतही युक्तियाँ की तो भी जिन्दा बाबाका दर्शन नहीं हुआ, नगर नगरमें ढूँढ़ते फिरे कि, किसी प्रकार भी जिन्दा फकीरकी खबर मिले पर कहीं पता नहीं लगा। इसी प्रकार ढूँढ़ते २ बनारसमें पहुँचे तो देखा कि, एक स्थानपर कबीर साहब खड़े बक्तूता दे रहे हैं। चारों तरफसे बड़ी भीड़ खड़ी २ सुन रही है। तब उस भीड़को चीरकर धर्मदासजी भीतर घुसे। देखा तो कबीर साहब खड़े लोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, पर बनारसमें कबीर साहबका जिन्दा भेषके स्थानमें वैष्णव भेष था। कण्ठी, तिलक, माला, जनेऊ और धोती इत्यादि देखकर धर्मदासको मनमें कुछ सन्देह उत्पन्न हुआ परन्तु पहचान लिया कि, यह वही जिन्दा बाबा हैं; जिसके कि, प्रेममें मैं पागलके समान हो रहा हूँ। सत्यगुरुको पहचानकर चरणोंपर गिर पड़े कहा कि, हे सत्यगुरु ! मुझको आप अपने शरणमें लीजिये कबीर साहबने कहा कि हे धर्मदास ! तुम बड़े भाग्यवान् हो कि, तुमने मुझको पहचान लिया। अब मैं तुम्हारे जनम मरणका दुःख दूर करूँगा। पश्चात् धर्मदासजी सद्गुरुको अपने मकानपर बांधो गढ़ लेगये।
सद्गुरुने विधि पूर्वक चौका आरती करके दीक्षा दिया, उस, समय धर्म-दासजीके पास छप्पन करोड़ रुपया था। वह सब सद्गुरुके भेंट किया। सद्गुरुने वह सब रुपया भूँखे, नंगे, लूले, अंधे, गरीब तथा सन्त साधुओंमें लुटा दिया।